अंग 391

अंग
391
राग आसा
राग: आसा · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਨਾ ਓਹੁ ਮਰਤਾ ਨਾ ਹਮ ਡਰਿਆ ॥
ਨਾ ਓਹੁ ਬਿਨਸੈ ਨਾ ਹਮ ਕੜਿਆ ॥
ਨਾ ਓਹੁ ਨਿਰਧਨੁ ਨਾ ਹਮ ਭੂਖੇ ॥
ਨਾ ਓਸੁ ਦੂਖੁ ਨ ਹਮ ਕਉ ਦੂਖੇ ॥੧॥
ਅਵਰੁ ਨ ਕੋਊ ਮਾਰਨਵਾਰਾ ॥
ਜੀਅਉ ਹਮਾਰਾ ਜੀਉ ਦੇਨਹਾਰਾ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਨਾ ਉਸੁ ਬੰਧਨ ਨਾ ਹਮ ਬਾਧੇ ॥
ਨਾ ਉਸੁ ਧੰਧਾ ਨਾ ਹਮ ਧਾਧੇ ॥
ਨਾ ਉਸੁ ਮੈਲੁ ਨ ਹਮ ਕਉ ਮੈਲਾ ॥
ਓਸੁ ਅਨੰਦੁ ਤ ਹਮ ਸਦ ਕੇਲਾ ॥੨॥
ਨਾ ਉਸੁ ਸੋਚੁ ਨ ਹਮ ਕਉ ਸੋਚਾ ॥
ਨਾ ਉਸੁ ਲੇਪੁ ਨ ਹਮ ਕਉ ਪੋਚਾ ॥
ਨਾ ਉਸੁ ਭੂਖ ਨ ਹਮ ਕਉ ਤ੍ਰਿਸਨਾ ॥
ਜਾ ਉਹੁ ਨਿਰਮਲੁ ਤਾਂ ਹਮ ਜਚਨਾ ॥੩॥
ਹਮ ਕਿਛੁ ਨਾਹੀ ਏਕੈ ਓਹੀ ॥
ਆਗੈ ਪਾਛੈ ਏਕੋ ਸੋਈ ॥
ਨਾਨਕ ਗੁਰਿ ਖੋਏ ਭ੍ਰਮ ਭੰਗਾ ॥
ਹਮ ਓਇ ਮਿਲਿ ਹੋਏ ਇਕ ਰੰਗਾ ॥੪॥੩੨॥੮੩॥
ना ओहु मरता ना हम डरिआ ॥
ना ओहु बिनसै ना हम कड़िआ ॥
ना ओहु निरधनु ना हम भूखे ॥
ना ओसु दूखु न हम कउ दूखे ॥१॥
अवरु न कोऊ मारनवारा ॥
जीअउ हमारा जीउ देनहारा ॥१॥ रहाउ ॥
ना उसु बंधन ना हम बाधे ॥
ना उसु धंधा ना हम धाधे ॥
ना उसु मैलु न हम कउ मैला ॥
ओसु अनंदु त हम सद केला ॥२॥
ना उसु सोचु न हम कउ सोचा ॥
ना उसु लेपु न हम कउ पोचा ॥
ना उसु भूख न हम कउ त्रिसना ॥
जा उहु निरमलु तां हम जचना ॥३॥
हम किछु नाही एकै ओही ॥
आगै पाछै एको सोई ॥
नानक गुरि खोए भ्रम भंगा ॥
हम ओइ मिलि होए इक रंगा ॥४॥३२॥८३॥

हिन्दी अर्थ: (हे भाई ! हम जीवोंकी परमात्मा से अलग कोई हस्ती नहीं।वह स्वयं ही जीवात्मा-रूप में शरीरों के अंदर बरत रहा है) वह परमात्मा कभी मरता नहीं (हमारे अंदर भी वह स्वयं ही है) हमें भी मौत से डर नहीं होना चाहिए। वह परमात्मा कभी नाश नहीं होता।हमें भी (विनाश की) कोई चिंता नहीं होनी। वह प्रभू कंगाल नहीं।हम भी अपने आप को भूखे-गरीब ना समझें। उसे कोई दुख नहीं छूता।हमें भी कोई दुख नहीं छूना चाहिए। 1। उसके बिना और कोई हमें मारने कीताकत नहीं रखता। (हे भाई !) जीता रहे हमें जिंद देने वाला परमात्मा (परमात्मा स्वयं सदा कायम रहने वाला है।वही हम जीवों को जिंद देने वाला है। 1।रहाउ। उस परमात्मा को माया के बंधन जकड़ नहीं सकते (इस वास्ते असल में) हम भी माया के मोह में बंधे हुए नहीं हैं। उसे कोई मायावी दौड़-भाग ग्रस नहीं सकती।हम भी धंधों में ग्रसे हुए नहीं हैं। (हमारे असल) उस परमात्मा को विकारों की मैल नहीं लग सकती।हमें भी मैल नहीं लगनी चाहिए। उसे सदा आनंद ही आनंद है।हम भी सदा (आनंद में) खिले ही रहें। 2। (हे भाई !) उस परमात्मा को चिंता-फिक्र नहीं व्याप्तता (हमारे अंदरवह स्वयं ही है) हमें भी कोई फिक्र नहीं होना चाहिए। उस पर माया का कोई प्रभाव नहीं पड़ता।फिर हमारे ऊपर क्यों पड़े। उस परमात्मा को माया का मालिक नहीं दबा सकता।हमें भी माया की तृष्णा नहीं व्यापनी चाहिए। जब वह परमात्मा पवित्र-स्वरूप है (वही हमारे अंदर मौजूद है) तो हम भी शुद्ध स्वरूप ही होने चाहिए। 3। (हे भाई !) हमारा कोई अलग अस्तित्व नहीं है (सब में) वह परमात्मा स्वयं ही स्वयं है। इस लोक में और परलोक में हर जगह वह परमात्मा खुद ही खुद है। हे नानक ! जब गुरू ने (हमारे अंदर से हमारी निहित अलग हस्ती के) भरम दूर कर दिए जो (हमारे उससे एक-रूप होने के राह में) विघन (डाल रहे हैं)। तब हम उस (परमात्मा से) मिल के उस से एक-मेक हो जाते हैं। 4। 32। 83।
ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਅਨਿਕ ਭਾਂਤਿ ਕਰਿ ਸੇਵਾ ਕਰੀਐ ॥
ਜੀਉ ਪ੍ਰਾਨ ਧਨੁ ਆਗੈ ਧਰੀਐ ॥
ਪਾਨੀ ਪਖਾ ਕਰਉ ਤਜਿ ਅਭਿਮਾਨੁ ॥
ਅਨਿਕ ਬਾਰ ਜਾਈਐ ਕੁਰਬਾਨੁ ॥੧॥
ਸਾਈ ਸੁਹਾਗਣਿ ਜੋ ਪ੍ਰਭ ਭਾਈ ॥
ਤਿਸ ਕੈ ਸੰਗਿ ਮਿਲਉ ਮੇਰੀ ਮਾਈ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਦਾਸਨਿ ਦਾਸੀ ਕੀ ਪਨਿਹਾਰਿ ॥
ਉਨੑ ਕੀ ਰੇਣੁ ਬਸੈ ਜੀਅ ਨਾਲਿ ॥
ਮਾਥੈ ਭਾਗੁ ਤ ਪਾਵਉ ਸੰਗੁ ॥
ਮਿਲੈ ਸੁਆਮੀ ਅਪੁਨੈ ਰੰਗਿ ॥੨॥
ਜਾਪ ਤਾਪ ਦੇਵਉ ਸਭ ਨੇਮਾ ॥
ਕਰਮ ਧਰਮ ਅਰਪਉ ਸਭ ਹੋਮਾ ॥
ਗਰਬੁ ਮੋਹੁ ਤਜਿ ਹੋਵਉ ਰੇਨ ॥
ਉਨੑ ਕੈ ਸੰਗਿ ਦੇਖਉ ਪ੍ਰਭੁ ਨੈਨ ॥੩॥
ਨਿਮਖ ਨਿਮਖ ਏਹੀ ਆਰਾਧਉ ॥
ਦਿਨਸੁ ਰੈਣਿ ਏਹ ਸੇਵਾ ਸਾਧਉ ॥
ਭਏ ਕ੍ਰਿਪਾਲ ਗੁਪਾਲ ਗੋਬਿੰਦ ॥
ਸਾਧਸੰਗਿ ਨਾਨਕ ਬਖਸਿੰਦ ॥੪॥੩੩॥੮੪॥
आसा महला ५ ॥
अनिक भांति करि सेवा करीऐ ॥
जीउ प्रान धनु आगै धरीऐ ॥
पानी पखा करउ तजि अभिमानु ॥
अनिक बार जाईऐ कुरबानु ॥१॥
साई सुहागणि जो प्रभ भाई ॥
तिस कै संगि मिलउ मेरी माई ॥१॥ रहाउ ॥
दासनि दासी की पनिहारि ॥
उन॑ की रेणु बसै जीअ नालि ॥
माथै भागु त पावउ संगु ॥
मिलै सुआमी अपुनै रंगि ॥२॥
जाप ताप देवउ सभ नेमा ॥
करम धरम अरपउ सभ होमा ॥
गरबु मोहु तजि होवउ रेन ॥
उन॑ कै संगि देखउ प्रभु नैन ॥३॥
निमख निमख एही आराधउ ॥
दिनसु रैणि एह सेवा साधउ ॥
भए क्रिपाल गुपाल गोबिंद ॥
साधसंगि नानक बखसिंद ॥४॥३३॥८४॥

हिन्दी अर्थ: आसा महला ५ ॥ हे माँ ! (प्रभू को प्यारी हो चुकी सत्संगी जीव-स्त्री की) सेवा अनेक प्रकार से करनी चाहिए। ये जिंद ये प्राण और (अपना) धन (सब कुछ) उसके आगे रख देना चाहिए (हे माँ ! अगर मेरे पर कृपा हो तो) मैं भी अहंकार त्याग के उसका पानी ढोने और उसको पंखा करने की सेवा करूँ। (उस जीव-स्त्री से) अनेकों बार सदके होना चाहिए। 1। हे मेरी माँ ! जो जीव-स्त्री प्रभू-पति को प्यारी लग जाती है वही सुहागन बन जाती है। (अगर मेरे पर मेहर हो।अगर मेरे भाग्य जागें तो) मैं भी उस सुहागनि की संगति में मिल के बैठूँ। 1।रहाउ। मैं उन सुहागिनों की संगति हासिल करूँ।उनकी दासियों की पानी ढोने वाली बनूँ। उन सुहागनों की चरन-धूड़ मेरी जिंद के साथ टिकी रहे। हे माँ ! मेरे माथे पर (पूर्बले कर्मों के) भाग्य जाग पड़ें तो पति-प्रभू अपने प्रेम रंग में आ के मिल पड़ता है। 2। (लोग देवताओं आदि को वश में करने के लिए कई मंत्रों आदि के जाप करते हैं।कई जंगलों में जा के धूड़ियां तपाते हैं।एवं अनेकों किस्म के साधन करते हैं।कई लोग तीर्थ-स्नान आदि निहित धार्मिक कर्म करते हैं।यज्ञ-हवन आदि करते हैं।पर।हे माँ ! उन सुहागिनों की संगत के बदले में) मैं सारे जाप।सारे ताप व अन्य सारे साधन देने को तैयार हूँ। सारे (निहित) धार्मिक कर्म।सारे यज्ञ-हवन भेट करने को तैयार हूँ। (मेरी ये तमन्ना है कि) अहंकार छोड़ के।मोह त्याग के मैं उन सुहागिनों की चरण-धूड़ बन जाऊँ (क्योंकि। हे माँ !) उन सुहागिनों की संगति में रह के ही मैं प्रभू-पति को इन आँखों से देख सकूँगी। 3। (हे माँ !) मैं पल-पल यही मन्नत माँगती हूँ (कि मुझे उन सुहागिनों की संगति मिले और) मैं दिन-रात उनकी सेवा का साधन करती रहूँ। बख्शनहार गोपाल गोबिंद-प्रभू जी उस पर दयाल हो जाते हैं हे नानक ! जो जीव-स्त्री साध-संगति में जा पहुँचती है । 4। 33। 84।
ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਪ੍ਰਭ ਕੀ ਪ੍ਰੀਤਿ ਸਦਾ ਸੁਖੁ ਹੋਇ ॥
ਪ੍ਰਭ ਕੀ ਪ੍ਰੀਤਿ ਦੁਖੁ ਲਗੈ ਨ ਕੋਇ ॥
ਪ੍ਰਭ ਕੀ ਪ੍ਰੀਤਿ ਹਉਮੈ ਮਲੁ ਖੋਇ ॥
ਪ੍ਰਭ ਕੀ ਪ੍ਰੀਤਿ ਸਦ ਨਿਰਮਲ ਹੋਇ ॥੧॥
ਸੁਨਹੁ ਮੀਤ ਐਸਾ ਪ੍ਰੇਮ ਪਿਆਰੁ ॥
ਜੀਅ ਪ੍ਰਾਨ ਘਟ ਘਟ ਆਧਾਰੁ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਪ੍ਰਭ ਕੀ ਪ੍ਰੀਤਿ ਭਏ ਸਗਲ ਨਿਧਾਨ ॥
ਪ੍ਰਭ ਕੀ ਪ੍ਰੀਤਿ ਰਿਦੈ ਨਿਰਮਲ ਨਾਮ ॥
ਪ੍ਰਭ ਕੀ ਪ੍ਰੀਤਿ ਸਦ ਸੋਭਾਵੰਤ ॥
ਪ੍ਰਭ ਕੀ ਪ੍ਰੀਤਿ ਸਭ ਮਿਟੀ ਹੈ ਚਿੰਤ ॥੨॥
ਪ੍ਰਭ ਕੀ ਪ੍ਰੀਤਿ ਇਹੁ ਭਵਜਲੁ ਤਰੈ ॥
ਪ੍ਰਭ ਕੀ ਪ੍ਰੀਤਿ ਜਮ ਤੇ ਨਹੀ ਡਰੈ ॥
ਪ੍ਰਭ ਕੀ ਪ੍ਰੀਤਿ ਸਗਲ ਉਧਾਰੈ ॥
ਪ੍ਰਭ ਕੀ ਪ੍ਰੀਤਿ ਚਲੈ ਸੰਗਾਰੈ ॥੩॥
ਆਪਹੁ ਕੋਈ ਮਿਲੈ ਨ ਭੂਲੈ ॥
ਜਿਸੁ ਕ੍ਰਿਪਾਲੁ ਤਿਸੁ ਸਾਧਸੰਗਿ ਘੂਲੈ ॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਤੇਰੈ ਕੁਰਬਾਣੁ ॥
ਸੰਤ ਓਟ ਪ੍ਰਭ ਤੇਰਾ ਤਾਣੁ ॥੪॥੩੪॥੮੫॥
आसा महला ५ ॥
प्रभ की प्रीति सदा सुखु होइ ॥
प्रभ की प्रीति दुखु लगै न कोइ ॥
प्रभ की प्रीति हउमै मलु खोइ ॥
प्रभ की प्रीति सद निरमल होइ ॥१॥
सुनहु मीत ऐसा प्रेम पिआरु ॥
जीअ प्रान घट घट आधारु ॥१॥ रहाउ ॥
प्रभ की प्रीति भए सगल निधान ॥
प्रभ की प्रीति रिदै निरमल नाम ॥
प्रभ की प्रीति सद सोभावंत ॥
प्रभ की प्रीति सभ मिटी है चिंत ॥२॥
प्रभ की प्रीति इहु भवजलु तरै ॥
प्रभ की प्रीति जम ते नही डरै ॥
प्रभ की प्रीति सगल उधारै ॥
प्रभ की प्रीति चलै संगारै ॥३॥
आपहु कोई मिलै न भूलै ॥
जिसु क्रिपालु तिसु साधसंगि घूलै ॥
कहु नानक तेरै कुरबाणु ॥
संत ओट प्रभ तेरा ताणु ॥४॥३४॥८५॥

हिन्दी अर्थ: आसा महला ५ ॥ हे मित्र ! (जो मनुष्य) परमात्मा की प्रीति (अपने दिल में बसाता है उसे) सदा आत्मिक आनंद मिला रहता है। (उसको) कोई दुख नहीं व्याप सकता। (वह मनुष्य अपने अंदर से) अहंकार की मैल दूर कर लेता है। (ये प्रीति उसे) सदा पवित्र जीवन वाला बनाए रखती है। 1। हे मित्र ! सुनो।(परमात्मा के साथ डाला हुआ) प्रेम-प्यार ऐसी दाति है कि ये हरेक जीव की जिंद की।हरेक जीव के प्राणों का आसरा बन जाता है। 1।रहाउ। हे मित्र ! (जिस मनुष्य के दिल में) परमात्मा की प्रीति (आ बसी उसको।मानो) सारे खजाने (प्राप्त) हो गए। उसके हृदय में (जीवन को) पवित्र करने वाला हरी-नाम (आ बसता है)। (वह लोक परलोक में) सदा शोभा-महिमा वाला बना रहता है। उसकी हरेक किस्म की चिंता मिट जाती है। 2। हे मित्र ! (जिस मनुष्य के हृदय में) परमात्मा की प्रीति (आ बसती है) वह इस संसार समुंद्र से पार लांघ जाता है। वह जम-दूतों से भय नहीं खाता (उसको आत्मिक मौत नहीं छू सकती। वह खुद विकारों से बचा रहता है और) अन्य सभी को (विकारों से) बचा लेता है। (हे मित्र !) परमात्मा की प्रीति (ही एक ऐसी राशि-पूँजी है जो) सदा मनुष्य का साथ देती है। 3।(पर। हे मित्र ! परमात्मा के साथ प्रीति जोड़नी किसी मनुष्य के अपने बस की बात नहीं) अपने उद्यम से ना कोई मनुष्य (परमात्मा के चरणों में) जुड़ा रह सकता है और ना ही कोई (विछुड़ के) कुमार्ग पर पड़ता है जिस मनुष्य पर प्रभू दयावान होता है उसे साध-संगति में मिलाता है (और।साध-संगति में टिक के वह परमात्मा के साथ प्यार डालना सीख लेता है)। हे नानक ! कह, हे प्रभू ! मैं तुझसे कुर्बान जाता हूँ। तू ही संतों की ओट है।तू ही संतों का तान-बल है। 4। 34। 85।
ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਭੂਪਤਿ ਹੋਇ ਕੈ ਰਾਜੁ ਕਮਾਇਆ ॥
ਕਰਿ ਕਰਿ ਅਨਰਥ ਵਿਹਾਝੀ ਮਾਇਆ ॥
आसा महला ५ ॥
भूपति होइ कै राजु कमाइआ ॥
करि करि अनरथ विहाझी माइआ ॥

हिन्दी अर्थ: आसा महला ५ ॥ (हे भाई ! अगर किसी ने) राजा बन के राज (का आनंद भी) भोग लिया (लोगों पे) ज्यादतियां कर-कर के माल-धन भी जोड़ लिया।

संदर्भ: यह अंग 391 है, राग आसा का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।

M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।

Civil Services के interview के बाद का wait, घर का माहौल।

ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।

यह अंग कुल 59 पंक्तियों का है, 4 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 391” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।

राग के context में: आसा राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।

पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।

अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।

“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।

नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।

अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।

तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।

हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।

ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।

दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।

“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।

हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।

अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।

आगे का अंग: अंग 392 →, पीछे का: ← अंग 390

हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।

(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)

शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।

संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।

शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।

संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।

एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।

अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।

स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।