आसा दी वार · Asa di Vaar
गुरु नानक की सुबह वाली वार। संगत में गाई जाने वाली। सलोकों और पउड़ियों की एक सीढ़ी, जिस पर चढ़ते हुए बात होती है उस रचने वाले की, अहम् की, और सच्ची ज़िंदगी की।
पहले एक बात
राग आसा सुबह की पहली रोशनी का राग है, उम्मीद से भरा, चलने को तैयार। आसा का अर्थ ही आशा है। और यह वार सिख परम्परा के सुबह-कीर्तन का केंद्र-स्तंभ रही है, चार-पाँच सदियों से। हर सुबह संगत इसे साथ गाती है।
बनावट सीधी है, और सुंदर। वार 24 पउड़ियों की है। हर पउड़ी से पहले कुछ सलोक आते हैं, ज़्यादातर गुरु नानक के, और कई गुरु अंगद के भी। सलोक एक तस्वीर या एक चोट देते हैं, और पउड़ी उस बात को आगे ले जाकर उस एक की ओर मोड़ देती है। पउड़ी का अर्थ ही सीढ़ी का डंडा है।
और एक धागा पूरी वार में चलता है। गुरु नानक बार-बार बाहरी कर्मकांड, जनेऊ, सूतक, तीर्थ, भेष, को नरमी से किनारे रखते हैं, और भीतर की सच्चाई, नाम, सेवा, नम्रता, और रज़ा को आगे लाते हैं। आइए, इस सीढ़ी पर पहला डंडा रखते हैं।
इसे कैसे पढ़ें
क्रम से, धीरे। हर इकाई को एक साँस की तरह लीजिए, पहले सलोक, जो ज़मीन तैयार करते हैं, फिर पउड़ी, जो ऊपर ले जाती है। एक प्यारी बात, पउड़ियों के अंत की पंक्ति अक्सर पूरी इकाई का निचोड़ होती है; उस पर एक पल ठहरिए। और जनेऊ वाली पंद्रहवीं, सूतक वाली अठारहवीं, और स्त्री को आदर देने वाली अठारहवीं-उन्नीसवीं की लाइनें, इन्हें थोड़ा धीमे पढ़िए, ये वार का दिल हैं।
पउड़ी 1
वार यहीं से शुरू होती है। पहले मूल मंत्र, एक साँस में परमात्मा का पूरा परिचय, फिर एक सूचना कि यह वार टुंडे असराज की धुन में गाई जाती है। और गुरु नानक का पहला सलोक अपने ही गुरु पर वारी जाने का है। हर पउड़ी से पहले इसी तरह सलोक आएँगे, और पउड़ी उन सलोकों की बात को आगे ले जाएगी।
पहला सलोक गुरु की महिमा का है। गुरु नानक कहते हैं, हम अपने गुरु पर एक दिन में सौ बार सदके जाते हैं, जिसने मनुष्यों से देवता बना दिए, और बनाते हुए ज़रा भी देर न लगी।
ੴ सति नामु करता पुरखु निरभउ निरवैरु अकाल मूरति अजूनी सैभं गुर प्रसादि ॥
आसा महला 1 ॥
वार सलोका नालि सलोक भी महले पहिले के लिखे टुंडे अस राजै की धुनी ॥
सलोकु मः 1 ॥
बलिहारी गुर आपणे दिउहाड़ी सद वार ॥
जिनि माणस ते देवते कीए करत न लागी वार ॥1॥
दूसरा सलोक गुरु अंगद का है, और एक प्यारी तस्वीर देता है। सौ चाँद उग आएँ, हज़ार सूरज चढ़ जाएँ, इतनी रोशनी होते हुए भी, गुरु के बिना घोर अँधेरा ही रहता है।
महला 2 ॥
जे सउ चंदा उगवहि सूरज चड़हि हजार ॥
एते चानण होदिआं गुर बिनु घोर अंधार ॥2॥
तीसरा सलोक फिर गुरु नानक का। जो गुरु को याद नहीं करते और अपने आप में चतुर बने रहते हैं, वे उस सूने खेत के जले हुए तिलों जैसे हैं, जिनका कोई मालिक नहीं। ऊपर से फलते-फूलते दिखते हैं, पर भीतर फली में राख ही होती है।
मः 1 ॥
नानक गुरू न चेतनी मनि आपणै सुचेत ॥
छुटे तिल बूआड़ जिउ सुंञे अंदरि खेत ॥
खेतै अंदरि छुटिआ कहु नानक सउ नाह ॥
फलीअहि फुलीअहि बपुड़े भी तन विचि सुआह ॥3॥
और अब पहली पउड़ी, जो वार की नींव रखती है। परमात्मा ने पहले अपने आप को रचा, फिर अपना नाम। फिर कुदरत रची और उसमें आसन जमा कर अपना ही खेल देखने लगा। वही दाता है, वही करता; जीव को जिंद और शरीर देकर वही फिर वापस ले लेता है।
पउड़ी ॥
आपीन॑ै आपु साजिओ आपीन॑ै रचिओ नाउ ॥
दुयी कुदरति साजीऐ करि आसणु डिठो चाउ ॥
दाता करता आपि तूं तुसि देवहि करहि पसाउ ॥
तूं जाणोई सभसै दे लैसहि जिंदु कवाउ ॥
करि आसणु डिठो चाउ ॥1॥
पउड़ी 2
दूसरी पउड़ी से पहले तीन सलोक हैं, और तीनों एक ही बात पर ठहरते हैं, सच। जो सदा रहने वाला है, वही सच है; बाक़ी सब आता-जाता है।
पहला सलोक एक टेक की तरह चलता है, हर लाइन में एक ही शब्द लौटता है, सचा। गुरु नानक कहते हैं, आपके खंड सच्चे, ब्रह्मांड सच्चे, आपका हुकम सच्चा, आपकी सिफ़त सच्ची। और जो जन्म-मरण के चक्कर में पड़े हैं, वे अभी कच्चे हैं।
सलोकु मः 1 ॥
सचे तेरे खंड सचे ब्रहमंड ॥
सचे तेरे लोअ सचे आकार ॥
सचे तेरे करणे सरब बीचार ॥
सचा तेरा अमरु सचा दीबाणु ॥
सचा तेरा हुकमु सचा फुरमाणु ॥
सचा तेरा करमु सचा नीसाणु ॥
सचे तुधु आखहि लख करोड़ि ॥
सचै सभि ताणि सचै सभि जोरि ॥
सची तेरी सिफति सची सालाह ॥
सची तेरी कुदरति सचे पातिसाह ॥
नानक सचु धिआइनि सचु ॥
जो मरि जंमे सु कचु निकचु ॥1॥
दूसरे सलोक की टेक है वडी वडिआई। परमात्मा की बड़ाई इसमें है कि उसका नाम अटल है, उसका न्याय सच्चा है, उसका आसन अडोल है, और वह सबके दिल का भाव जानता है। किसी से पूछ कर नहीं देता, अपने आप बख़्शता है।
मः 1 ॥
वडी वडिआई जा वडा नाउ ॥
वडी वडिआई जा सचु निआउ ॥
वडी वडिआई जा निहचल थाउ ॥
वडी वडिआई जाणै आलाउ ॥
वडी वडिआई बुझै सभि भाउ ॥
वडी वडिआई जा पुछि न दाति ॥
वडी वडिआई जा आपे आपि ॥
नानक कार न कथनी जाइ ॥
कीता करणा सरब रजाइ ॥2॥
तीसरा सलोक गुरु अंगद का है, और एक प्यारी तस्वीर देता है। यह जगत सच्चे की कोठरी है, और वही इसमें बसता है। किसी को अपने हुकम से तार लेता है, किसी को इसी में रखता है। यह बात बताई नहीं जा सकती कि किसका बेड़ा पार होगा।
महला 2 ॥
इहु जगु सचै की है कोठड़ी सचे का विचि वासु ॥
इकन॑ा हुकमि समाइ लए इकन॑ा हुकमे करे विणासु ॥
इकन॑ा भाणै कढि लए इकन॑ा माइआ विचि निवासु ॥
एव भि आखि न जापई जि किसै आणे रासि ॥
नानक गुरमुखि जाणीऐ जा कउ आपि करे परगासु ॥3॥
दूसरी पउड़ी धर्मराज की बात करती है। जीवों को रच कर परमात्मा ने धर्मराज को उनके किए का लेखा लिखने पर बिठाया। वहाँ निबटारा निरे सच से होता है। आपके नाम में रंगे जीते जाते हैं, और ठगी करने वाले हार कर जाते हैं।
पउड़ी ॥
नानक जीअ उपाइ कै लिखि नावै धरमु बहालिआ ॥
ओथै सचे ही सचि निबड़ै चुणि वखि कढे जजमालिआ ॥
थाउ न पाइनि कूड़िआर मुह काल॑ै दोजकि चालिआ ॥
तेरै नाइ रते से जिणि गए हारि गए सि ठगण वालिआ ॥
लिखि नावै धरमु बहालिआ ॥2॥
पउड़ी 3
तीसरी पउड़ी से पहले दो सलोक हैं, और दोनों एक ही हैरानी पर खड़े हैं। एक में बार-बार लौटता है विसमादु, यानी अचरज; दूसरे में कुदरति, यानी उसकी कारीगरी।
पहला सलोक पूरी सृष्टि को एक अचरज की तरह देखता है। नाद, वेद, जीव, रूप, रंग, हवा, पानी, आग, मेल, बिछोह, भूख, भोग, सब विसमादु। यह सारा इलाही तमाशा बड़े भाग्य से ही समझा जा सकता है।
सलोक मः 1 ॥
विसमादु नाद विसमादु वेद ॥
विसमादु जीअ विसमादु भेद ॥
विसमादु रूप विसमादु रंग ॥
विसमादु नागे फिरहि जंत ॥
विसमादु पउणु विसमादु पाणी ॥
विसमादु अगनी खेडहि विडाणी ॥
विसमादु धरती विसमादु खाणी ॥
विसमादु सादि लगहि पराणी ॥
विसमादु संजोगु विसमादु विजोगु ॥
विसमादु भुख विसमादु भोगु ॥
विसमादु सिफति विसमादु सालाह ॥
विसमादु उझड़ विसमादु राह ॥
विसमादु नेड़ै विसमादु दूरि ॥
विसमादु देखै हाजरा हजूरि ॥
वेखि विडाणु रहिआ विसमादु ॥
नानक बुझणु पूरै भागि ॥1॥
दूसरे सलोक की टेक है कुदरति। जो दिखता है, जो सुनाई देता है, पाताल, आकाश, वेद, पुराण, जातियाँ, रंग, भलाई और बुराई, सब आपकी ही कुदरत है। आप कादिर हैं, और हुकम के अंदर रह कर सबको संभाल रहे हैं।
मः 1 ॥
कुदरति दिसै कुदरति सुणीऐ कुदरति भउ सुख सारु ॥
कुदरति पाताली आकासी कुदरति सरब आकारु ॥
कुदरति वेद पुराण कतेबा कुदरति सरब वीचारु ॥
कुदरति खाणा पीणा पैन॑णु कुदरति सरब पिआरु ॥
कुदरति जाती जिनसी रंगी कुदरति जीअ जहान ॥
कुदरति नेकीआ कुदरति बदीआ कुदरति मानु अभिमानु ॥
कुदरति पउणु पाणी बैसंतरु कुदरति धरती खाकु ॥
सभ तेरी कुदरति तूं कादिरु करता पाकी नाई पाकु ॥
नानक हुकमै अंदरि वेखै वरतै ताको ताकु ॥2॥
तीसरी पउड़ी माया में फँसे जीव की बात कहती है। परमात्मा स्वयं ही जीव बन कर भोग भोगता है; फिर शरीर मिट्टी हो जाता है और जीवात्मा-रूपी भँवरा उड़ जाता है। दुनिया के धंधों में फँसा जीव गले में संगल डलवा कर जाता है, और आगे सिर्फ़ उसकी कीर्ति की कमाई गिनी जाती है।
पउड़ी ॥
आपीन॑ै भोग भोगि कै होइ भसमड़ि भउरु सिधाइआ ॥
वडा होआ दुनीदारु गलि संगलु घति चलाइआ ॥
अगै करणी कीरति वाचीऐ बहि लेखा करि समझाइआ ॥
थाउ न होवी पउदीई हुणि सुणीऐ किआ रूआइआ ॥
मनि अंधै जनमु गवाइआ ॥3॥
पउड़ी 4
चौथी पउड़ी से पहले दो सलोक हैं, और दोनों में एक ही शब्द हथौड़े की तरह लौटता है, भै, यानी डर, उस परमात्मा का अदब।
पहला सलोक कहता है, हवा उसके भय में बह रही है, लाखों नदियाँ उसके भय में, आग, धरती, इंद्र, सूरज, चाँद, सिद्ध, नाथ, बड़े-बड़े योद्धा, सब उसी अदब में बँधे हैं। एक निरंकार ही भय-रहित है।
सलोक मः 1 ॥
भै विचि पवणु वहै सदवाउ ॥
भै विचि चलहि लख दरीआउ ॥
भै विचि अगनि कढै वेगारि ॥
भै विचि धरती दबी भारि ॥
भै विचि इंदु फिरै सिर भारि ॥
भै विचि राजा धरम दुआरु ॥
भै विचि सूरजु भै विचि चंदु ॥
कोह करोड़ी चलत न अंतु ॥
भै विचि सिध बुध सुर नाथ ॥
भै विचि आडाणे आकास ॥
भै विचि जोध महाबल सूर ॥
भै विचि आवहि जावहि पूर ॥
सगलिआ भउ लिखिआ सिरि लेखु ॥
नानक निरभउ निरंकारु सचु एकु ॥1॥
दूसरा सलोक उसी एक की बात आगे ले जाता है। उस निरंकार के सामने और बड़े-बड़े तुच्छ हैं। गाने-नाचने, मुंदरे-हार पहनने से ज्ञान नहीं मिलता; जिस तन पर ये पहने जाते हैं वह तन राख हो जाता है। ज्ञान बातों से नहीं ढूँढा जाता, वह कृपा से ही मिलता है।
मः 1 ॥
नानक निरभउ निरंकारु होरि केते राम रवाल ॥
केतीआ कंन॑ कहाणीआ केते बेद बीचार ॥
केते नचहि मंगते गिड़ि मुड़ि पूरहि ताल ॥
बाजारी बाजार महि आइ कढहि बाजार ॥
गावहि राजे राणीआ बोलहि आल पताल ॥
लख टकिआ के मुंदड़े लख टकिआ के हार ॥
जितु तनि पाईअहि नानका से तन होवहि छार ॥
गिआनु न गलीई ढूढीऐ कथना करड़ा सारु ॥
करमि मिलै ता पाईऐ होर हिकमति हुकमु खुआरु ॥2॥
चौथी पउड़ी कृपा और गुरु की बात कहती है। अगर आप नज़र की कृपा करें, तो उसी कृपा से सतिगुरु मिलता है। यह जीव कई जन्म भटका, फिर सतिगुरु ने शबद सुनाया। सतिगुरु जितना बड़ा दाता और कोई नहीं, और जिन्होंने भीतर से अपना आपा गँवाया, उन्हें सच मिल गया।
पउड़ी ॥
नदरि करहि जे आपणी ता नदरी सतिगुरु पाइआ ॥
एहु जीउ बहुते जनम भरंमिआ ता सतिगुरि सबदु सुणाइआ ॥
सतिगुर जेवडु दाता को नही सभि सुणिअहु लोक सबाइआ ॥
सतिगुरि मिलिऐ सचु पाइआ जिन॑ी विचहु आपु गवाइआ ॥
जिनि सचो सचु बुझाइआ ॥4॥
पउड़ी 5
पाँचवीं पउड़ी से पहले दो सलोक हैं, और इनमें एक रास, यानी नाच-तमाशा, का रूपक चलता है। बाहर का तमाशा एक तरफ़, भीतर का सच एक तरफ़।
पहला सलोक कुदरत को एक रास की तरह देखता है। घड़ियाँ गोपियाँ हैं, पहर कान्ह, हवा-पानी-आग गहने, चाँद-सूरज दो अवतार। और इस माया की रास में ज्ञान से ख़ाली दुनिया ठगी जा रही है, और जमकाल उसे खाए जा रहा है।
सलोक मः 1 ॥
घड़ीआ सभे गोपीआ पहर कंन॑ गोपाल ॥
गहणे पउणु पाणी बैसंतरु चंदु सूरजु अवतार ॥
सगली धरती मालु धनु वरतणि सरब जंजाल ॥
नानक मुसै गिआन विहूणी खाइ गइआ जमकालु ॥1॥
दूसरा सलोक लंबा है, और रासधारियों की तस्वीर से शुरू होता है, जो रोज़ी के लिए नाचते हैं और अपने आप को ज़मीन से पटकते हैं। फिर एक मोड़ आता है, सेवक वही हैं जिनके मन में मेहर से चढ़दीकला है। और कोल्हू, चरखा, चक्की, लट्टू, पंछी, सब घूमते रहते हैं; नाचने-कूदने से कोई ऊँचाई नहीं मिलती। गुरु नानक का निचोड़, जिनके मन में भय है, उन्हीं के मन में भाव है।
मः 1 ॥
वाइनि चेले नचनि गुर ॥
पैर हलाइनि फेरनि॑ सिर ॥
उडि उडि रावा झाटै पाइ ॥
वेखै लोकु हसै घरि जाइ ॥
रोटीआ कारणि पूरहि ताल ॥
आपु पछाड़हि धरती नालि ॥
गावनि गोपीआ गावनि कान॑ ॥
गावनि सीता राजे राम ॥
निरभउ निरंकारु सचु नामु ॥
जा का कीआ सगल जहानु ॥
सेवक सेवहि करमि चड़ाउ ॥
भिंनी रैणि जिन॑ा मनि चाउ ॥
सिखी सिखिआ गुर वीचारि ॥
नदरी करमि लघाए पारि ॥
कोलू चरखा चकी चकु ॥
थल वारोले बहुतु अनंतु ॥
लाटू माधाणीआ अनगाह ॥
पंखी भउदीआ लैनि न साह ॥
सूऐ चाड़ि भवाईअहि जंत ॥
नानक भउदिआ गणत न अंत ॥
बंधन बंधि भवाए सोइ ॥
पइऐ किरति नचै सभु कोइ ॥
नचि नचि हसहि चलहि से रोइ ॥
उडि न जाही सिध न होहि ॥
नचणु कुदणु मन का चाउ ॥
नानक जिन॑ मनि भउ तिन॑ा मनि भाउ ॥2॥
पाँचवीं पउड़ी नाम के सहारे की बात कहती है। आपका नाम निरंकार है, और जो नाम सिमरे वह नरक में नहीं पड़ता। यह जिंद और तन सब उसी का है; वही खाने को देता है। और एक सीधी बात, अच्छा काम करके भी अपने आप को छोटा कहलवाना, यही सच्चा रास्ता है।
पउड़ी ॥
नाउ तेरा निरंकारु है नाइ लइऐ नरकि न जाईऐ ॥
जीउ पिंडु सभु तिस दा दे खाजै आखि गवाईऐ ॥
जे लोड़हि चंगा आपणा करि पुंनहु नीचु सदाईऐ ॥
जे जरवाणा परहरै जरु वेस करेदी आईऐ ॥
को रहै न भरीऐ पाईऐ ॥5॥
पउड़ी 6
छठी पउड़ी से पहले दो सलोक हैं। पहला अलग-अलग रास्तों को आदर से देखता है, दूसरा एक ज़मीनी तस्वीर से दिखावे की पोल खोलता है।
पहला सलोक एक बड़ा सलोक है, और बहुत प्यारा। मुसलमान शरीअत को सराहते हैं, हिंदू दर्शन से उस बेअंत को, योगी समाधि में उस अलख को। दानी देते हैं, पर बदले में और माँगते हैं; चोर-कूड़ियार भी हैं, और उनका भी कोई काम है। और भक्त? उन्हें बस सिफ़त की भूख है, और सच्चा नाम ही उनका आसरा।
सलोक मः 1 ॥
मुसलमाना सिफति सरीअति पड़ि पड़ि करहि बीचारु ॥
बंदे से जि पवहि विचि बंदी वेखण कउ दीदारु ॥
हिंदू सालाही सालाहनि दरसनि रूपि अपारु ॥
तीरथि नावहि अरचा पूजा अगर वासु बहकारु ॥
जोगी सुंनि धिआवनि॑ जेते अलख नामु करतारु ॥
सूखम मूरति नामु निरंजन काइआ का आकारु ॥
सतीआ मनि संतोखु उपजै देणै कै वीचारि ॥
दे दे मंगहि सहसा गूणा सोभ करे संसारु ॥
चोरा जारा तै कूड़िआरा खाराबा वेकार ॥
इकि होदा खाइ चलहि ऐथाऊ तिना भि काई कार ॥
जलि थलि जीआ पुरीआ लोआ आकारा आकार ॥
ओइ जि आखहि सु तूंहै जाणहि तिना भि तेरी सार ॥
नानक भगता भुख सालाहणु सचु नामु आधारु ॥
सदा अनंदि रहहि दिनु राती गुणवंतिआ पा छारु ॥1॥
दूसरा सलोक एक रोज़मर्रा की तस्वीर से बात कहता है। मुसलमान जहाँ मुर्दे दबाते हैं, वहाँ की वही मिट्टी कई बार कुम्हार के हाथ आ जाती है, और बर्तन-ईंट बन कर भट्ठी में जलती है। जलाने-दबाने से निजात या दोज़ख़ का कोई नाता नहीं; असली भेद वही करतार जानता है।
मः 1 ॥
मिटी मुसलमान की पेड़ै पई कुमि॑आर ॥
घड़ि भांडे इटा कीआ जलदी करे पुकार ॥
जलि जलि रोवै बपुड़ी झड़ि झड़ि पवहि अंगिआर ॥
नानक जिनि करतै कारणु कीआ सो जाणै करतारु ॥2॥
छठी पउड़ी फिर गुरु पर लौटती है। सतिगुरु के बिना किसी को वह जगजीवन दाता नहीं मिला, क्योंकि परमात्मा ने अपने आप को गुरु के अंदर रखा है। जिसने भीतर से मोह दूर किया, और जिसने सच्चे से चित्त जोड़ा, उसी को वह दाता मिला।
पउड़ी ॥
बिनु सतिगुर किनै न पाइओ बिनु सतिगुर किनै न पाइआ ॥
सतिगुर विचि आपु रखिओनु करि परगटु आखि सुणाइआ ॥
सतिगुर मिलिऐ सदा मुकतु है जिनि विचहु मोहु चुकाइआ ॥
उतमु एहु बीचारु है जिनि सचे सिउ चितु लाइआ ॥
जगजीवनु दाता पाइआ ॥6॥
पउड़ी 7
सातवीं पउड़ी से पहले दो सलोक हैं, और दोनों एक ही चीज़ की पड़ताल करते हैं, हउमै, यानी अहम्, मैं-मेरा का वह भाव जो जीव को अपने कादिर से अलग कर देता है।
पहला सलोक एक टेक की तरह चलता है, हर लाइन में हउ विचि लौटता है। अहम् में जीव आता है, अहम् में जाता है, अहम् में देता-लेता, कमाता-गँवाता है; अहम् में ही कभी सच्चा, कभी कूड़ियार। जब अहम् को समझ ले, तभी उसका दर सूझता है।
सलोक मः 1 ॥
हउ विचि आइआ हउ विचि गइआ ॥
हउ विचि जंमिआ हउ विचि मुआ ॥
हउ विचि दिता हउ विचि लइआ ॥
हउ विचि खटिआ हउ विचि गइआ ॥
हउ विचि सचिआरु कूड़िआरु ॥
हउ विचि पाप पुंन वीचारु ॥
हउ विचि नरकि सुरगि अवतारु ॥
हउ विचि हसै हउ विचि रोवै ॥
हउ विचि भरीऐ हउ विचि धोवै ॥
हउ विचि जाती जिनसी खोवै ॥
हउ विचि मूरखु हउ विचि सिआणा ॥
मोख मुकति की सार न जाणा ॥
हउ विचि माइआ हउ विचि छाइआ ॥
हउमै करि करि जंत उपाइआ ॥
हउमै बूझै ता दरु सूझै ॥
गिआन विहूणा कथि कथि लूझै ॥
नानक हुकमी लिखीऐ लेखु ॥
जेहा वेखहि तेहा वेखु ॥1॥
दूसरा सलोक गुरु अंगद का है। अहम् यही जात है, अहम् में ही कर्म होते हैं, और यही बंधन बार-बार जूनियों में डालता है। यह दीरघ रोग है, पर इसका दारू भी इसी में है, गुरु का शबद कमाने से यह दुख दूर होता है।
महला 2 ॥
हउमै एहा जाति है हउमै करम कमाहि ॥
हउमै एई बंधना फिरि फिरि जोनी पाहि ॥
हउमै किथहु ऊपजै कितु संजमि इह जाइ ॥
हउमै एहो हुकमु है पइऐ किरति फिराहि ॥
हउमै दीरघ रोगु है दारू भी इसु माहि ॥
किरपा करे जे आपणी ता गुर का सबदु कमाहि ॥
नानकु कहै सुणहु जनहु इतु संजमि दुख जाहि ॥2॥
सातवीं पउड़ी संतोषी जनों की बात कहती है। जो संतोखी सदा एक सच्चे को सिमरते हैं, सेवा वही करते हैं। वे बुरे काम के पास नहीं जाते, सुकृत और धर्म कमाते हैं, दुनिया के बंधन तोड़ते हैं, थोड़ा खाते-पीते हैं। और आप बड़ी बख़्शिशें करने वाले हैं, यही सिफ़त कर के उस बड़े को पा लेते हैं।
पउड़ी ॥
सेव कीती संतोखीइंी जिन॑ी सचो सचु धिआइआ ॥
ओन॑ी मंदै पैरु न रखिओ करि सुक्रितु धरमु कमाइआ ॥
ओन॑ी दुनीआ तोड़े बंधना अंनु पाणी थोड़ा खाइआ ॥
तूं बखसीसी अगला नित देवहि चड़हि सवाइआ ॥
वडिआई वडा पाइआ ॥7॥
पउड़ी 8
आठवीं पउड़ी से पहले दो सलोक हैं, और दोनों गिनती और कर्मकांड को एक तरफ़ रख कर कृपा को आगे रखते हैं।
पहला सलोक एक लंबी सूची देता है, मनुष्य, वृक्ष, तीर्थ, बादल, खेत, द्वीप, लोक, चारों खानियाँ, इन सबकी गिनती बस वही जानता है जिसने इन्हें रचा। जिसने रचा, संभाल भी उसी की है। और सच्चे नाम के बिना तिलक-जनेऊ का कोई मोल नहीं।
सलोक मः 1 ॥
पुरखां बिरखां तीरथां तटां मेघां खेतांह ॥
दीपां लोआं मंडलां खंडां वरभंडांह ॥
अंडज जेरज उतभुजां खाणी सेतजांह ॥
सो मिति जाणै नानका सरां मेरां जंताह ॥
नानक जंत उपाइ कै संमाले सभनाह ॥
जिनि करतै करणा कीआ चिंता भि करणी ताह ॥
सो करता चिंता करे जिनि उपाइआ जगु ॥
तिसु जोहारी सुअसति तिसु तिसु दीबाणु अभगु ॥
नानक सचे नाम बिनु किआ टिका किआ तगु ॥1॥
दूसरे सलोक की टेक है लख। लाखों नेकियाँ, लाखों तप, लाखों तीर्थ, लाखों सूरमेपन, लाखों ज्ञान-ध्यान, ये सारी समझदारियाँ मिथ्या हैं। दरगाह में कबूल होने का सच्चा परवाना उसकी बख़्शिश ही है।
मः 1 ॥
लख नेकीआ चंगिआईआ लख पुंना परवाणु ॥
लख तप उपरि तीरथां सहज जोग बेबाण ॥
लख सूरतण संगराम रण महि छुटहि पराण ॥
लख सुरती लख गिआन धिआन पड़ीअहि पाठ पुराण ॥
जिनि करतै करणा कीआ लिखिआ आवण जाणु ॥
नानक मती मिथिआ करमु सचा नीसाणु ॥2॥
आठवीं पउड़ी सच की देन पर ठहरती है। हे प्रभू, एक आप ही सच्चे साहिब हैं, और आपने ही सच का यह सिलसिला वरताया। जिसे आप दें, उसे ही सच मिलता है और वही उसे कमाता है; सतिगुरु मिले तो हृदय में सच बस जाता है। मूर्ख इसे नहीं जानते, और मनमुख जन्म व्यर्थ गँवा देते हैं।
पउड़ी ॥
सचा साहिबु एकु तूं जिनि सचो सचु वरताइआ ॥
जिसु तूं देहि तिसु मिलै सचु ता तिन॑ी सचु कमाइआ ॥
सतिगुरि मिलिऐ सचु पाइआ जिन॑ कै हिरदै सचु वसाइआ ॥
मूरख सचु न जाणन॑ी मनमुखी जनमु गवाइआ ॥
विचि दुनीआ काहे आइआ ॥8॥
पउड़ी 9
नौवीं पउड़ी से पहले दो सलोक हैं, और दोनों पढ़ाई और भेष के घमंड की पोल खोलते हैं।
पहला सलोक एक ज़ोरदार तस्वीर देता है। इतनी पोथियाँ पढ़ ली जाएँ कि गाड़ियाँ लद जाएँ, बेड़ियाँ भर जाएँ, सारी उम्र और सारे साँस पढ़ने में बीत जाएँ, फिर भी दरगाह में बस एक बात गिनी जाती है, उसकी सिफ़त-सालाह। बाक़ी सब अहंकार की भटकन है।
सलोकु मः 1 ॥
पड़ि पड़ि गडी लदीअहि पड़ि पड़ि भरीअहि साथ ॥
पड़ि पड़ि बेड़ी पाईऐ पड़ि पड़ि गडीअहि खात ॥
पड़ीअहि जेते बरस बरस पड़ीअहि जेते मास ॥
पड़ीऐ जेती आरजा पड़ीअहि जेते सास ॥
नानक लेखै इक गल होरु हउमै झखणा झाख ॥1॥
दूसरा सलोक छोटी-छोटी तुकों में चलता है। जितना कोई पढ़ता है उतना जलता है, जितना तीर्थ घूमता है उतना बखानता फिरता है, भेष करता है और देह को दुख देता है। अंत में एक सीधी बात, गुरु के बिना सोया हुआ कैसे जागे? जिस पर मेहर हो, वही नाम मन में बसा कर सुख पाता है।
मः 1 ॥
लिखि लिखि पड़िआ ॥
तेता कड़िआ ॥
बहु तीरथ भविआ ॥
तेतो लविआ ॥
बहु भेख कीआ देही दुखु दीआ ॥
सहु वे जीआ अपणा कीआ ॥
अंनु न खाइआ सादु गवाइआ ॥
बहु दुखु पाइआ दूजा भाइआ ॥
बसत्र न पहिरै ॥
अहिनिसि कहरै ॥
मोनि विगूता ॥
किउ जागै गुर बिनु सूता ॥
पग उपेताणा ॥
अपणा कीआ कमाणा ॥
अलु मलु खाई सिरि छाई पाई ॥
मूरखि अंधै पति गवाई ॥
विणु नावै किछु थाइ न पाई ॥
रहै बेबाणी मड़ी मसाणी ॥
अंधु न जाणै फिरि पछुताणी ॥
सतिगुरु भेटे सो सुखु पाए ॥
हरि का नामु मंनि वसाए ॥
नानक नदरि करे सो पाए ॥
आस अंदेसे ते निहकेवलु हउमै सबदि जलाए ॥2॥
नौवीं पउड़ी भक्तों की बात कहती है। भक्त आपके मन को प्यारे लगते हैं, जो दर पर सिफ़त गाते शोभा पाते हैं। भाग्यहीन भटकते फिरते हैं, अपने मूल को नहीं समझते, और बिना गुण के अपने आप को बड़ा जताते हैं। गुरु नानक कहते हैं, हम तो आपके दर के अदना ढाढी हैं, और उन्हीं से नाम माँगते हैं जो आपको ध्याते हैं।
पउड़ी ॥
भगत तेरै मनि भावदे दरि सोहनि कीरति गावदे ॥
नानक करमा बाहरे दरि ढोअ न लहन॑ी धावदे ॥
इकि मूलु न बुझनि॑ आपणा अणहोदा आपु गणाइदे ॥
हउ ढाढी का नीच जाति होरि उतम जाति सदाइदे ॥
तिन॑ मंगा जि तुझै धिआइदे ॥9॥
पउड़ी 10
दसवीं पउड़ी से पहले दो सलोक हैं, और दोनों कूड़ और सच को आमने-सामने रखते हैं।
पहले सलोक में कूड़, यानी छल, हर लाइन में लौटता है। राजा छल, प्रजा छल, महल छल, सोना-चाँदी छल, रूप छल। इस छल से ही मोह बन जाता है, और करतार भूल जाता है। यह छल मीठा लगता है, और पूरे को डुबो देता है। गुरु नानक की अरज़, आपके बिना सब कूड़ ही कूड़ है।
सलोकु मः 1 ॥
कूड़ु राजा कूड़ु परजा कूड़ु सभु संसारु ॥
कूड़ु मंडप कूड़ु माड़ी कूड़ु बैसणहारु ॥
कूड़ु सुइना कूड़ु रुपा कूड़ु पैन॑णहारु ॥
कूड़ु काइआ कूड़ु कपड़ु कूड़ु रूपु अपारु ॥
कूड़ु मीआ कूड़ु बीबी खपि होए खारु ॥
कूड़ि कूड़ै नेहु लगा विसरिआ करतारु ॥
किसु नालि कीचै दोसती सभु जगु चलणहारु ॥
कूड़ु मिठा कूड़ु माखिउ कूड़ु डोबे पूरु ॥
नानकु वखाणै बेनती तुधु बाझु कूड़ो कूड़ु ॥1॥
दूसरा सलोक बताता है, सच कब समझ आता है। तब, जब हृदय में सच्चा बस जाए, जब सच से प्यार पड़े, जब जीवन की युक्ति समझ आए, जब सच्ची शिक्षा मिले और जीवों पर दया की जाए, जब भीतर के तीर्थ में निवास हो। यही सच सब रोगों का दारू बन जाता है।
मः 1 ॥
सचु ता परु जाणीऐ जा रिदै सचा होइ ॥
कूड़ की मलु उतरै तनु करे हछा धोइ ॥
सचु ता परु जाणीऐ जा सचि धरे पिआरु ॥
नाउ सुणि मनु रहसीऐ ता पाए मोख दुआरु ॥
सचु ता परु जाणीऐ जा जुगति जाणै जीउ ॥
धरति काइआ साधि कै विचि देइ करता बीउ ॥
सचु ता परु जाणीऐ जा सिख सची लेइ ॥
दइआ जाणै जीअ की किछु पुंनु दानु करेइ ॥
सचु तां परु जाणीऐ जा आतम तीरथि करे निवासु ॥
सतिगुरू नो पुछि कै बहि रहै करे निवासु ॥
सचु सभना होइ दारू पाप कढै धोइ ॥
नानकु वखाणै बेनती जिन सचु पलै होइ ॥2॥
दसवीं पउड़ी एक नम्र इच्छा है। संतों के पैरों की ख़ाक का दान मिले तो माथे लगाएँ; झूठा लालच छोड़ें और एक मन से उस अलख को ध्याएँ। जैसी कार करोगे वैसा फल; और यह ख़ाक भी अच्छे भाग्य से ही मिलती है। अपनी छोटी मति की टेक रखने से मेहनत बेकार जाती है।
पउड़ी ॥
दानु महिंडा तली खाकु जे मिलै त मसतकि लाईऐ ॥
कूड़ा लालचु छडीऐ होइ इक मनि अलखु धिआईऐ ॥
फलु तेवेहो पाईऐ जेवेही कार कमाईऐ ॥
जे होवै पूरबि लिखिआ ता धूड़ि तिन॑ा दी पाईऐ ॥
मति थोड़ी सेव गवाईऐ ॥10॥
पउड़ी 11
ग्यारहवीं पउड़ी से पहले तीन सलोक हैं। पहला रंग चढ़ने का रूपक देता है, दूसरा उस ज़माने के उलटे राज की पोल, तीसरा दरगाह के बराबर न्याय की बात।
पहला सलोक एक रंगरेज़ की तस्वीर है। संसार में सच उड़ गया और कूड़ छा गया है। जैसे कोरे कपड़े को पाह दिए बिना पक्का रंग नहीं चढ़ता, वैसे ही इस कोरे मन को भय की खुंब में रखो, मेहनत की पाह दो, फिर भगती में रँगो; तब माया का छल पास नहीं फटकता।
सलोकु मः 1 ॥
सचि कालु कूड़ु वरतिआ कलि कालख बेताल ॥
बीउ बीजि पति लै गए अब किउ उगवै दालि ॥
जे इकु होइ त उगवै रुती हू रुति होइ ॥
नानक पाहै बाहरा कोरै रंगु न सोइ ॥
भै विचि खुंबि चड़ाईऐ सरमु पाहु तनि होइ ॥
नानक भगती जे रपै कूड़ै सोइ न कोइ ॥1॥
दूसरा सलोक एक उलटे राज की तस्वीर है। जीभ का चस्का राजा, पाप मंत्री, झूठ चौधरी, काम नायब। प्रजा ज्ञान से ख़ाली, ज्ञानी नाच-नाच कर वाद गाते हैं, पढ़े-लिखे मूर्ख चालाकी में माया जोड़ते हैं। हर कोई अपने को पूरा समझता है; पूरा वही उतरता है जिसे दरगाह में आदर मिले।
मः 1 ॥
लबु पापु दुइ राजा महता कूड़ु होआ सिकदारु ॥
कामु नेबु सदि पुछीऐ बहि बहि करे बीचारु ॥
अंधी रयति गिआन विहूणी भाहि भरे मुरदारु ॥
गिआनी नचहि वाजे वावहि रूप करहि सीगारु ॥
ऊचे कूकहि वादा गावहि जोधा का वीचारु ॥
मूरख पंडित हिकमति हुजति संजै करहि पिआरु ॥
धरमी धरमु करहि गावावहि मंगहि मोख दुआरु ॥
जती सदावहि जुगति न जाणहि छडि बहहि घर बारु ॥
सभु को पूरा आपे होवै घटि न कोई आखै ॥
पति परवाणा पिछै पाईऐ ता नानक तोलिआ जापै ॥2॥
तीसरा सलोक दरगाह का न्याय दिखाता है। जो बात धुर से ठहर चुकी वही होती है, क्योंकि वह सच्चा ख़ुद संभाल रहा है। सब अपना ज़ोर लगाते हैं, पर होता वही है जो करता करे। वहाँ न जात चलती है न ज़ोर; भले वही गिने जाते हैं जिन्हें लेखे में आदर मिले।
मः 1 ॥
वदी सु वजगि नानका सचा वेखै सोइ ॥
सभनी छाला मारीआ करता करे सु होइ ॥
अगै जाति न जोरु है अगै जीउ नवे ॥
जिन की लेखै पति पवै चंगे सेई केइ ॥3॥
ग्यारहवीं पउड़ी फिर कृपा पर लौटती है। जिन पर आपने धुर से मेहर की, उन्होंने ही आपको सिमरा। इन जीवों के बस में कुछ नहीं; आपने रंग-बिरंगा जगत रचा। किसी को मिला लेते हैं, किसी को अपने से दूर रखते हैं। जिसके भीतर आपने अपनी समझ डाली, वह गुरु की कृपा से आपको पहचान कर सहज ही सच में समा गया।
पउड़ी ॥
धुरि करमु जिना कउ तुधु पाइआ ता तिनी खसमु धिआइआ ॥
एना जंता कै वसि किछु नाही तुधु वेकी जगतु उपाइआ ॥
इकना नो तूं मेलि लैहि इकि आपहु तुधु खुआइआ ॥
गुर किरपा ते जाणिआ जिथै तुधु आपु बुझाइआ ॥
सहजे ही सचि समाइआ ॥11॥
पउड़ी 12
बारहवीं पउड़ी से पहले चार सलोक हैं। पहला कुदरत में बसे करतार पर वारी जाने का; अगले दो गुरु अंगद के, असली धर्म और एक परमात्मा पर; चौथा पानी और घड़े का सुंदर रूपक।
पहला सलोक एक रहाउ की टेक रखता है, मैं उस कुदरत में बसे करतार पर सदके हूँ, आपका अंत नहीं पाया जा सकता। बिपता रोग का दारू बन जाती है, सुख कभी रोग बन जाता है; पर असली आत्मिक सुख मिले तो दुख रहता ही नहीं। हर जाति में, हर जोति में वही भरपूर है।
सलोकु मः 1 ॥
दुखु दारू सुखु रोगु भइआ जा सुखु तामि न होई ॥
तूं करता करणा मै नाही जा हउ करी न होई ॥1॥
बलिहारी कुदरति वसिआ ॥
तेरा अंतु न जाई लखिआ ॥1॥ रहाउ ॥
जाति महि जोति जोति महि जाता अकल कला भरपूरि रहिआ ॥
तूं सचा साहिबु सिफति सुआलि॑उ जिनि कीती सो पारि पइआ ॥
कहु नानक करते कीआ बाता जो किछु करणा सु करि रहिआ ॥2॥
दूसरा सलोक गुरु अंगद का है। योग का धर्म ज्ञान, ब्राह्मण का वेद-विचार, क्षत्रिय का सूरमापन, शूद्र की सेवा; पर सबका मुख्य धर्म एक ही है, उसका सिमरन। जो यह भेद जान ले, गुरु नानक उसके दास हैं।
मः 2 ॥
जोग सबदं गिआन सबदं बेद सबदं ब्राहमणह ॥
खत्री सबदं सूर सबदं सूद्र सबदं परा क्रितह ॥
सरब सबदं एक सबदं जे को जाणै भेउ ॥ नानकु ता का दासु है सोई निरंजन देउ ॥3॥
तीसरा सलोक भी गुरु अंगद का है, और सीधी बात कहता है। एक परमात्मा ही सारे देवताओं की आत्मा है, देवों के देव की भी आत्मा। जो उसकी आत्मा का भेद जान ले, गुरु नानक उसके दास हैं।
मः 2 ॥
एक क्रिसनं सरब देवा देव देवा त आतमा ॥
आतमा बासुदेवस्यि जे को जाणै भेउ ॥ नानकु ता का दासु है सोई निरंजन देउ ॥4॥
चौथा सलोक एक प्यारा रूपक है। जैसे पानी घड़े में बँधा ही टिका रहता है, वैसे ही मन गुरु के ज्ञान में बँधा ही टिकता है; और जैसे पानी के बिना घड़ा नहीं बनता, वैसे ही गुरु के बिना ज्ञान नहीं होता।
मः 1 ॥
कुंभे बधा जलु रहै जल बिनु कुंभु न होइ ॥
गिआन का बधा मनु रहै गुर बिनु गिआनु न होइ ॥5॥
बारहवीं पउड़ी कमाई पर निबटारा रखती है। अगर पढ़ा-लिखा मंदकर्मी हो जाए, तो अनपढ़ नेक को मार नहीं पड़ती; निबटारा कमाई पर होता है, पढ़ने पर नहीं। जैसी करतूत, वैसा नाम; इसलिए ऐसा खेल मत खेलो जिससे दरगाह में बाज़ी हार बैठो। जो मनमर्ज़ी चलता है, वह आगे मार खाता है।
पउड़ी ॥
पड़िआ होवै गुनहगारु ता ओमी साधु न मारीऐ ॥
जेहा घाले घालणा तेवेहो नाउ पचारीऐ ॥
ऐसी कला न खेडीऐ जितु दरगह गइआ हारीऐ ॥
पड़िआ अतै ओमीआ वीचारु अगै वीचारीऐ ॥
मुहि चलै सु अगै मारीऐ ॥12॥
पउड़ी 13
तेरहवीं पउड़ी से पहले दो सलोक हैं। पहला युगों के बदलते रथ का अनोखा रूपक है; दूसरा चारों वेदों और चारों युगों के नामों की बात।
पहला सलोक जीवन को एक रथ कहता है, और हर युग में रथ और रथवान बदल जाते हैं। सतजुग में रथ संतोख, सारथी धर्म; त्रेते में रथ जत, सारथी जोर; द्वापर में रथ तप, सारथी सत; और कलजुग में रथ अग्नि-तृष्णा, सारथी कूड़। यह भेद समझदार ही समझते हैं।
सलोकु मः 1 ॥
नानक मेरु सरीर का इकु रथु इकु रथवाहु ॥
जुगु जुगु फेरि वटाईअहि गिआनी बुझहि ताहि ॥
सतजुगि रथु संतोख का धरमु अगै रथवाहु ॥
त्रेतै रथु जतै का जोरु अगै रथवाहु ॥
दुआपुरि रथु तपै का सतु अगै रथवाहु ॥
कलजुगि रथु अगनि का कूड़ु अगै रथवाहु ॥1॥
दूसरा सलोक चारों वेदों और युगों के बदलते नामों पर चलता है, सेतंबर, राम, कृष्ण, और कलजुग में ख़ुदा-अल्लाह। हर युग ने उस मालिक को अलग नाम से पुकारा। पर गुरु नानक का निचोड़ एक है, प्रेमा-भक्ति कर के जो अपने आप को नीच कहलवाए, वही मुक्ति पाता है।
मः 1 ॥
साम कहै सेतंबरु सुआमी सच महि आछै साचि रहे ॥ सभु को सचि समावै ॥
रिगु कहै रहिआ भरपूरि ॥
राम नामु देवा महि सूरु ॥
नाइ लइऐ पराछत जाहि ॥
नानक तउ मोखंतरु पाहि ॥
जुज महि जोरि छली चंद्रावलि कान॑ क्रिसनु जादमु भइआ ॥
पारजातु गोपी लै आइआ बिंद्राबन महि रंगु कीआ ॥
कलि महि बेदु अथरबणु हूआ नाउ खुदाई अलहु भइआ ॥
नील बसत्र ले कपड़े पहिरे तुरक पठाणी अमलु कीआ ॥
चारे वेद होए सचिआर ॥
पड़हि गुणहि तिन॑ चार वीचार ॥
भाउ भगति करि नीचु सदाए ॥ तउ नानक मोखंतरु पाए ॥2॥
तेरहवीं पउड़ी सतिगुरु पर वारी है। मैं उस सतिगुरु से सदके हूँ, जिसे मिल कर मालिक याद आया, जिसने ज्ञान का अंजन दिया कि इन्हीं आँखों से जगत की असलियत दिख गई। जो मालिक को छोड़ दूजे से लगे, वे डूब गए; सतिगुरु ही जहाज़ है, पर किसी विरले ने यह समझा।
पउड़ी ॥
सतिगुर विटहु वारिआ जितु मिलिऐ खसमु समालिआ ॥
जिनि करि उपदेसु गिआन अंजनु दीआ इन॑ी नेत्री जगतु निहालिआ ॥
खसमु छोडि दूजै लगे डुबे से वणजारिआ ॥
सतिगुरू है बोहिथा विरलै किनै वीचारिआ ॥
करि किरपा पारि उतारिआ ॥13॥
पउड़ी 14
चौदहवीं पउड़ी से पहले दो सलोक हैं। पहला सिंबल के पेड़ और झुकने का रूपक; दूसरा पंडित के बाहरी कर्मकांड की पोल।
पहला सलोक सिंबल के पेड़ की तस्वीर देता है, ऊँचा, लंबा, मोटा, पर फल फीके, फूल बेस्वादे, पत्ते बेकाम; पंछी आस लगा कर आते हैं और निराश लौटते हैं। गुरु नानक कहते हैं, नीचे रहने, यानी नम्रता में मिठास है, और यही सब गुणों का सार है; पर झुकना मन से हो, सिर्फ़ सिर झुकाने से कुछ नहीं होता अगर भीतर खोट हो।
सलोकु मः 1 ॥
सिंमल रुखु सराइरा अति दीरघ अति मुचु ॥
ओइ जि आवहि आस करि जाहि निरासे कितु ॥
फल फिके फुल बकबके कंमि न आवहि पत ॥
मिठतु नीवी नानका गुण चंगिआईआ ततु ॥
सभु को निवै आप कउ पर कउ निवै न कोइ ॥
धरि ताराजू तोलीऐ निवै सु गउरा होइ ॥
अपराधी दूणा निवै जो हंता मिरगाहि ॥
सीसि निवाइऐ किआ थीऐ जा रिदै कुसुधे जाहि ॥1॥
दूसरा सलोक पंडित के बाहरी ठाठ की पोल खोलता है, पोथी पढ़ना, मूर्ति पूजना, बगुले की समाधि, माला, तिलक, दो धोतियाँ; पर मुँह से झूठ। गुरु नानक कहते हैं, सच्चाई के बिना ये सब फोके हैं; श्रद्धा से सिमरना ही रास्ता है, और वह रास्ता सतिगुरु के बिना नहीं मिलता।
मः 1 ॥
पड़ि पुसतक संधिआ बादं ॥
सिल पूजसि बगुल समाधं ॥
मुखि झूठ बिभूखण सारं ॥
त्रैपाल तिहाल बिचारं ॥
गलि माला तिलकु लिलाटं ॥
दुइ धोती बसत्र कपाटं ॥
जे जाणसि ब्रहमं करमं ॥
सभि फोकट निसचउ करमं ॥
कहु नानक निहचउ धिआवै ॥
विणु सतिगुर वाट न पावै ॥2॥
चौदहवीं पउड़ी मौत और कर्म की याद दिलाती है। यह सुंदर तन और रूप यहीं छोड़ जाना है, और अपने अच्छे-बुरे का फल आप ही भोगना है। जिसने मनमानी हुकूमत की, उसे आगे तंग घाटी से गुज़रना है; नंगा कर के दिखाया जाता है कि उसका रूप कितना डरावना है। बुरे काम कर के अंत में पछताना ही पड़ता है।
पउड़ी ॥
कपड़ु रूपु सुहावणा छडि दुनीआ अंदरि जावणा ॥
मंदा चंगा आपणा आपे ही कीता पावणा ॥
हुकम कीए मनि भावदे राहि भीड़ै अगै जावणा ॥
नंगा दोजकि चालिआ ता दिसै खरा डरावणा ॥
करि अउगण पछोतावणा ॥14॥
पउड़ी 15
पंद्रहवीं पउड़ी से पहले चार सलोक हैं, और चारों जनेऊ की रस्म के इर्द-गिर्द घूमते हैं। यह वार का सबसे चर्चित प्रसंग है।
पहला सलोक एक असली जनेऊ की कल्पना देता है, जिसकी कपास दया हो, सूत संतोख, गाँठें जत, बल सत। गुरु नानक कहते हैं, ऐसा जनेऊ हो तो डालो; वह न टूटता है, न मैला होता है, न जलता है। कपास के सूत वाला तो चार कौड़ी का है, और मरने पर शरीर से झड़ जाता है, जीव बेजनेऊ ही चला जाता है।
सलोकु मः 1 ॥
दइआ कपाह संतोखु सूतु जतु गंढी सतु वटु ॥
एहु जनेऊ जीअ का हई त पाडे घतु ॥
ना एहु तुटै ना मलु लगै ना एहु जलै न जाइ ॥
धंनु सु माणस नानका जो गलि चले पाइ ॥
चउकड़ि मुलि अणाइआ बहि चउकै पाइआ ॥
सिखा कंनि चड़ाईआ गुरु ब्राहमणु थिआ ॥
ओहु मुआ ओहु झड़ि पइआ वेतगा गइआ ॥1॥
दूसरा सलोक भीतर और बाहर का फ़र्क़ दिखाता है। मनुष्य लाखों चोरियाँ, झूठ, ठगी करता है, और बाहर बकरा मार कर जनेऊ की रस्म मनाता है; पुराना होने पर फेंक कर नया डाल लेता है। गुरु नानक कहते हैं, अगर धागे में जोर हो, यानी वह आत्मा को बल दे, तो वह टूटता ही नहीं।
मः 1 ॥
लख चोरीआ लख जारीआ लख कूड़ीआ लख गालि ॥
लख ठगीआ पहिनामीआ राति दिनसु जीअ नालि ॥
तगु कपाहहु कतीऐ बाम॑णु वटे आइ ॥
कुहि बकरा रिंनि॑ खाइआ सभु को आखै पाइ ॥
होइ पुराणा सुटीऐ भी फिरि पाईऐ होरु ॥
नानक तगु न तुटई जे तगि होवै जोरु ॥2॥
तीसरा सलोक छोटा और सीधा है। आदर तब मिलता है जब नाम दिल में दृढ़ हो; उसकी सिफ़त-सालाह ही सच्चा जनेऊ है, जो दरगाह में आदर दिलाता है और कभी टूटता नहीं।
मः 1 ॥
नाइ मंनिऐ पति ऊपजै सालाही सचु सूतु ॥
दरगह अंदरि पाईऐ तगु न तूटसि पूत ॥3॥
चौथा सलोक पंडित पर बहुत नरमी से चोट करता है। उसने इंद्रियों, हाथ-पैर, जीभ, आँख को कोई जनेऊ नहीं पहनाया कि वे बुराई से रुकें; ख़ुद बेजनेऊ भटकता है पर औरों को धागे डालता फिरता है। मन से अंधा, और नाम रखवाया हुआ सुजान।
मः 1 ॥
तगु न इंद्री तगु न नारी ॥
भलके थुक पवै नित दाड़ी ॥
तगु न पैरी तगु न हथी ॥
तगु न जिहवा तगु न अखी ॥
वेतगा आपे वतै ॥
वटि धागे अवरा घतै ॥
लै भाड़ि करे वीआहु ॥
कढि कागलु दसे राहु ॥
सुणि वेखहु लोका एहु विडाणु ॥
मनि अंधा नाउ सुजाणु ॥4॥
पंद्रहवीं पउड़ी सेवक और रज़ा की बात कहती है। जिस सेवक पर मालिक दयालु हो, उससे वही काम करवाता है जो उसे भाता है। रज़ा में राज़ी रहने से सेवक कबूल होता है और मालिक का घर पा लेता है; जो उसके मन-भाता करता है, उसे मन-भाता फल मिलता है, और वह दरगाह में आदर से जाता है।
पउड़ी ॥
साहिबु होइ दइआलु किरपा करे ता साई कार कराइसी ॥
सो सेवकु सेवा करे जिस नो हुकमु मनाइसी ॥
हुकमि मंनिऐ होवै परवाणु ता खसमै का महलु पाइसी ॥
खसमै भावै सो करे मनहु चिंदिआ सो फलु पाइसी ॥
ता दरगह पैधा जाइसी ॥15॥
पउड़ी 16
सोलहवीं पउड़ी से पहले दो सलोक हैं। पहला फिर पंडित के पाखंड पर, दूसरा झूठे मन के दिखावे पर।
पहला सलोक एक नदी के पत्तन की तस्वीर देता है। गाय और ब्राह्मण पर तो कर लगाते हैं, पर सोचते नहीं कि गोबर से संसार-समुंदर पार नहीं होता। धोती-तिलक-माला रखते हैं, पर खाते उन्हीं का अन्न जिन्हें मलेच्छ कहते हैं; छुप कर पूजा, दिखावे को क़ुरान। गुरु नानक कहते हैं, यह पाखंड छोड़ो; नाम सिमरोगे तभी पार होगे।
सलोक मः 1 ॥
गऊ बिराहमण कउ करु लावहु गोबरि तरणु न जाई ॥
धोती टिका तै जपमाली धानु मलेछां खाई ॥
अंतरि पूजा पड़हि कतेबा संजमु तुरका भाई ॥
छोडीले पाखंडा ॥
नामि लइऐ जाहि तरंदा ॥1॥
दूसरा सलोक लंबा है, और हाकिमों-मुंशियों-पंडितों के दोहरे आचरण की पोल खोलता है, माणस खाने वाले नमाज़ पढ़ते हैं, गले में जनेऊ और हाथ में छुरी, झूठी पूँजी और झूठा व्यापार। गुरु नानक कहते हैं, सच्चे को ध्याओ; भीतर की सुच हो, तभी सच मिलता है।
मः 1 ॥
माणस खाणे करहि निवाज ॥
छुरी वगाइनि तिन गलि ताग ॥
तिन घरि ब्रहमण पूरहि नाद ॥
उन॑ा भि आवहि ओई साद ॥
कूड़ी रासि कूड़ा वापारु ॥
कूड़ु बोलि करहि आहारु ॥
सरम धरम का डेरा दूरि ॥
नानक कूड़ु रहिआ भरपूरि ॥
मथै टिका तेड़ि धोती कखाई ॥
हथि छुरी जगत कासाई ॥
नील वसत्र पहिरि होवहि परवाणु ॥
मलेछ धानु ले पूजहि पुराणु ॥
अभाखिआ का कुठा बकरा खाणा ॥
चउके उपरि किसै न जाणा ॥
दे कै चउका कढी कार ॥
उपरि आइ बैठे कूड़िआर ॥
मतु भिटै वे मतु भिटै ॥ इहु अंनु असाडा फिटै ॥
तनि फिटै फेड़ करेनि ॥
मनि जूठै चुली भरेनि ॥
कहु नानक सचु धिआईऐ ॥
सुचि होवै ता सचु पाईऐ ॥2॥
सोलहवीं पउड़ी उस एक की संभाल दिखाती है। परमात्मा हर जीव को अपने ध्यान में रखता है, नज़र के नीचे चलाता है। ख़ुद बड़ाइयाँ बख़्शता है, ख़ुद कामों में जोड़ता है। वह सबसे बड़ा है, और अगर उलटी नज़र कर दे तो सुल्तानों से घास कटवा दे, और दर पर माँगने पर भीख भी न मिले।
पउड़ी ॥
चितै अंदरि सभु को वेखि नदरी हेठि चलाइदा ॥
आपे दे वडिआईआ आपे ही करम कराइदा ॥
वडहु वडा वड मेदनी सिरे सिरि धंधै लाइदा ॥
नदरि उपठी जे करे सुलताना घाहु कराइदा ॥
दरि मंगनि भिख न पाइदा ॥16॥
पउड़ी 17
सत्रहवीं पउड़ी से पहले दो सलोक हैं। पहला चोरी के माल पर पितरों के नाम का; दूसरा सुच की सच्ची परिभाषा।
पहला सलोक एक तीखी बात कहता है। अगर कोई पराया घर ठग कर वह माल पितरों के नाम दे, तो आगे वह माल पहचान लिया जाता है और जीव अपने पितरों को भी चोर बना देता है। गुरु नानक कहते हैं, आगे तो मनुष्य को वही मिलता है जो वह ख़ुद कमाता और हाथों से देता है।
सलोकु मः 1 ॥
जे मोहाका घरु मुहै घरु मुहि पितरी देइ ॥
अगै वसतु सिञाणीऐ पितरी चोर करेइ ॥
वढीअहि हथ दलाल के मुसफी एह करेइ ॥
नानक अगै सो मिलै जि खटे घाले देइ ॥1॥
दूसरा सलोक सुच को नए सिरे से समझाता है। जैसे झूठे मनुष्य के मुँह में सदा झूठ बसता है, वैसे ही सिर्फ़ शरीर धो कर बैठ जाने वाले सुच्चे नहीं कहलाते। गुरु नानक कहते हैं, सुच्चे वही हैं जिनके मन में वह बसता है।
मः 1 ॥
जिउ जोरू सिरनावणी आवै वारो वार ॥
जूठे जूठा मुखि वसै नित नित होइ खुआरु ॥
सूचे एहि न आखीअहि बहनि जि पिंडा धोइ ॥
सूचे सेई नानका जिन मनि वसिआ सोइ ॥2॥
सत्रहवीं पउड़ी उस घमंड को आईना दिखाती है जो ठाठ में डूबा है। हवा जैसे तेज़ घोड़े, सजे हुए महल, मन-भाते रंग-तमाशे; पर जो हरि को नहीं पहचानते, वे मनुष्य-जन्म हार बैठते हैं। हुकम चला कर खाते हैं, महल देख कर मौत भुला देते हैं, और जवानी के नशे में रहते-रहते बुढ़ापा आ दबोचता है।
पउड़ी ॥
तुरे पलाणे पउण वेग हर रंगी हरम सवारिआ ॥
कोठे मंडप माड़ीआ लाइ बैठे करि पासारिआ ॥
चीज करनि मनि भावदे हरि बुझनि नाही हारिआ ॥
करि फुरमाइसि खाइआ वेखि महलति मरणु विसारिआ ॥
जरु आई जोबनि हारिआ ॥17॥
पउड़ी 18
अठारहवीं पउड़ी से पहले तीन सलोक हैं, और तीनों सूतक के भरम को खोलते हैं।
पहला सलोक सूतक के भरम की पोल खोलता है। अगर सूतक माना जाए तो वह तो हर जगह है, गोबर-लकड़ी में कीड़े, हर दाने में जीव, पानी ख़ुद जीव; रसोई में भी सूतक बना रहता है। गुरु नानक कहते हैं, इस तरह सूतक मन से नहीं उतरता, इसे तो ज्ञान ही धो कर उतारता है।
सलोकु मः 1 ॥
जे करि सूतकु मंनीऐ सभ तै सूतकु होइ ॥
गोहे अतै लकड़ी अंदरि कीड़ा होइ ॥
जेते दाणे अंन के जीआ बाझु न कोइ ॥
पहिला पाणी जीउ है जितु हरिआ सभु कोइ ॥
सूतकु किउ करि रखीऐ सूतकु पवै रसोइ ॥
नानक सूतकु एव न उतरै गिआनु उतारे धोइ ॥1॥
दूसरा सलोक सूतक को भीतर ले आता है। मन का सूतक लोभ है, जीभ का सूतक झूठ, आँख का सूतक पराया धन और पराया रूप देखना, कान का सूतक चुग़ली सुनना। गुरु नानक कहते हैं, ऐसे मनुष्य देखने में हंस जैसे सुंदर हों तो भी बँधे हुए जाते हैं।
मः 1 ॥
मन का सूतकु लोभु है जिहवा सूतकु कूड़ु ॥
अखी सूतकु वेखणा पर त्रिअ पर धन रूपु ॥
कंनी सूतकु कंनि पै लाइतबारी खाहि ॥
नानक हंसा आदमी बधे जम पुरि जाहि ॥2॥
तीसरा सलोक भरम को साफ़ कर देता है। सारा सूतक निरा भरम है, जो दूजे-भाव से आ लगता है। जन्म-मरण हुकम है, खाना-पीना भी पवित्र है क्योंकि रिज़क उसी का दिया है। जिन्होंने गुरमुख हो कर यह समझा, उन्हें सूतक नहीं लगता।
मः 1 ॥
सभो सूतकु भरमु है दूजै लगै जाइ ॥
जंमणु मरणा हुकमु है भाणै आवै जाइ ॥
खाणा पीणा पवित्रु है दितोनु रिजकु संबाहि ॥
नानक जिन॑ी गुरमुखि बुझिआ तिन॑ा सूतकु नाहि ॥3॥
अठारहवीं पउड़ी सतिगुरु की बड़ाई गाती है। गुरु को बड़ा कह कर सराहना चाहिए, क्योंकि उसमें बड़े गुण हैं। जिन्हें मालिक ने गुरु से मिलाया, उन्हें वे गुण दिखते हैं; और जब उसे भाए, उनके मन में बस भी जाते हैं। वह माथे पर हाथ रख कर भीतर की बुराइयाँ निकाल देता है, और प्रसन्न हो तो नौ निधियाँ मिल जाती हैं।
पउड़ी ॥
सतिगुरु वडा करि सालाहीऐ जिसु विचि वडीआ वडिआईआ ॥
सहि मेले ता नदरी आईआ ॥
जा तिसु भाणा ता मनि वसाईआ ॥
करि हुकमु मसतकि हथु धरि विचहु मारि कढीआ बुरिआईआ ॥
सहि तुठै नउ निधि पाईआ ॥18॥
पउड़ी 19
उन्नीसवीं पउड़ी से पहले दो सलोक हैं। पहला पवित्र भोजन और संगत की बात; दूसरा स्त्री-जाति का आदर, जो इस वार की सबसे रोशन लाइनों में है।
पहला सलोक पवित्रता को भीतर ले आता है। ब्राह्मण सुच्चा हो कर चौके में बैठता है, पवित्र भोजन खाता है, फिर सलोक पढ़ता है; पर वही भोजन पेट में जाता है। अन्न, पानी, आग, नमक, घी, सब पवित्र; पर जिस मुँह से नाम न उच्चरे, गुरु नानक कहते हैं, उस मुँह पर भी धिक्कार पड़ती है।
सलोकु मः 1 ॥
पहिला सुचा आपि होइ सुचै बैठा आइ ॥
सुचे अगै रखिओनु कोइ न भिटिओ जाइ ॥
सुचा होइ कै जेविआ लगा पड़णि सलोकु ॥
कुहथी जाई सटिआ किसु एहु लगा दोखु ॥
अंनु देवता पाणी देवता बैसंतरु देवता लूणु पंजवा पाइआ घिरतु ॥
ता होआ पाकु पवितु ॥
पापी सिउ तनु गडिआ थुका पईआ तितु ॥
जितु मुखि नामु न ऊचरहि बिनु नावै रस खाहि ॥
नानक एवै जाणीऐ तितु मुखि थुका पाहि ॥1॥
दूसरा सलोक स्त्री को आदर देता है। स्त्री से जन्म, स्त्री में देह बनती है, स्त्री से ही मँगनी-विवाह और रिश्ते चलते हैं। जिससे राजा तक पैदा होते हैं, उसे बुरा कहना ठीक नहीं। एक सच्चा परमात्मा ही है जो स्त्री से नहीं जन्मा; और जो मुँह सदा उसकी सिफ़त करे, वही दरबार में उजला है।
मः 1 ॥
भंडि जंमीऐ भंडि निंमीऐ भंडि मंगणु वीआहु ॥
भंडहु होवै दोसती भंडहु चलै राहु ॥
भंडु मुआ भंडु भालीऐ भंडि होवै बंधानु ॥
सो किउ मंदा आखीऐ जितु जंमहि राजान ॥
भंडहु ही भंडु ऊपजै भंडै बाझु न कोइ ॥
नानक भंडै बाहरा एको सचा सोइ ॥
जितु मुखि सदा सालाहीऐ भागा रती चारि ॥
नानक ते मुख ऊजले तितु सचै दरबारि ॥2॥
उन्नीसवीं पउड़ी ममता और अहंकार की बात कहती है। हर कोई अपनी ममता में बँधा है; बिरला ही है जिसे ममता नहीं। अपने किए का लेखा ख़ुद भरना पड़ता है। जब यहाँ रहना ही नहीं, तो अहंकार में क्यों खपें? एक सीख याद रखें, किसी को बुरा न कहें, और मूर्ख से न उलझें।
पउड़ी ॥
सभु को आखै आपणा जिसु नाही सो चुणि कढीऐ ॥
कीता आपो आपणा आपे ही लेखा संढीऐ ॥
जा रहणा नाही ऐतु जगि ता काइतु गारबि हंढीऐ ॥
मंदा किसै न आखीऐ पड़ि अखरु एहो बुझीऐ ॥
मूरखै नालि न लुझीऐ ॥19॥
पउड़ी 20
बीसवीं पउड़ी से पहले दो सलोक हैं। पहला रूखे बोल की चोट; दूसरा भीतर-बाहर के फ़र्क़ और पीसे जाने का रूपक।
पहला सलोक बोली की बात करता है। गुरु नानक कहते हैं, रूखा बोलने से तन और मन दोनों रूखे हो जाते हैं; ऐसा मनुष्य लोगों में भी रूखा मशहूर होता है, दरगाह में रद्द होता है, और मूर्ख कहलाता है।
सलोकु मः 1 ॥
नानक फिकै बोलिऐ तनु मनु फिका होइ ॥
फिको फिका सदीऐ फिके फिकी सोइ ॥
फिका दरगह सटीऐ मुहि थुका फिके पाइ ॥
फिका मूरखु आखीऐ पाणा लहै सजाइ ॥1॥
दूसरा सलोक भीतर और बाहर का अंतर दिखाता है। जो भीतर से झूठे और बाहर इज़्ज़तदार बने हैं, उनकी मैल अड़सठ तीर्थ भी नहीं धोते। जिनके भीतर पट और बाहर गुदड़ है, वे ही नेक हैं; उनका रॅब से नेह लगा है। और अंत में, सबका लेखा वही एक माँगता है, और बुरों को तेल की तरह पीड़ता है।
मः 1 ॥
अंदरहु झूठे पैज बाहरि दुनीआ अंदरि फैलु ॥
अठसठि तीरथ जे नावहि उतरै नाही मैलु ॥
जिन॑ पटु अंदरि बाहरि गुदड़ु ते भले संसारि ॥
तिन॑ नेहु लगा रब सेती देखन॑े वीचारि ॥
रंगि हसहि रंगि रोवहि चुप भी करि जाहि ॥
परवाह नाही किसै केरी बाझु सचे नाह ॥
दरि वाट उपरि खरचु मंगा जबै देइ त खाहि ॥
दीबानु एको कलम एका हमा तुम॑ा मेलु ॥
दरि लए लेखा पीड़ि छुटै नानका जिउ तेलु ॥2॥
बीसवीं पउड़ी मनुष्य-जन्म को सँवारने की बात कहती है। आपने ही यह सृष्टि रची और इसमें सत्ता डाली; अच्छे-बुरे रच कर ख़ुद संभाल रहे हैं। जो आया वह जाएगा, सबकी बारी आएगी। जिसके दिए तन और प्राण हैं, उस मालिक को मन से कभी न भुलाएँ, और अपने हाथों अपना काम आप ही सँवारें।
पउड़ी ॥
आपे ही करणा कीओ कल आपे ही तै धारीऐ ॥
देखहि कीता आपणा धरि कची पकी सारीऐ ॥
जो आइआ सो चलसी सभु कोई आई वारीऐ ॥
जिस के जीअ पराण हहि किउ साहिबु मनहु विसारीऐ ॥
आपण हथी आपणा आपे ही काजु सवारीऐ ॥20॥
पउड़ी 21
इक्कीसवीं पउड़ी से पहले दो सलोक हैं, और दोनों सच्चे आशिक की कसौटी रखते हैं। ये गुरु अंगद के सलोक हैं।
पहला सलोक सच्चे इश्क़ की परख देता है। जो अपने प्यारे को छोड़ किसी और में चित्त जोड़ ले, उसका इश्क़ सच्चा नहीं; सच्चा आशिक वही जो सदा उसी की याद में डूबा रहे। और जो सुख को हँस कर ले पर दुख को देख घबरा जाए, वह भी सच्चा आशिक नहीं, क्योंकि वह प्यार को लेखे गिन-गिन कर करता है।
सलोकु महला 2 ॥
एह किनेही आसकी दूजै लगै जाइ ॥
नानक आसकु कांढीऐ सद ही रहै समाइ ॥
चंगै चंगा करि मंने मंदै मंदा होइ ॥
आसकु एहु न आखीऐ जि लेखै वरतै सोइ ॥1॥
दूसरा सलोक छोटा और सीधा है। जो कभी सिर झुकाए और कभी मालिक के किए पर एतराज़ करे, उसका झुकना और एतराज़ दोनों झूठे हैं, और दोनों में से कुछ भी दर पर कबूल नहीं होता।
महला 2 ॥
सलामु जबाबु दोवै करे मुंढहु घुथा जाइ ॥
नानक दोवै कूड़ीआ थाइ न काई पाइ ॥2॥
इक्कीसवीं पउड़ी कमाई को नफ़े की ओर मोड़ती है। जिस मालिक के सिमरन से सुख मिले, उसे सदा याद रखो। जब अपने किए का फल आप ही भोगना है, तो बुरी कमाई क्यों करें? बुरा काम भूल कर भी न करें, लंबी नज़र से देख कर ही चलें; ऐसा पासा ढालें कि मालिक के साथ बाज़ी न हारें, और कुछ नफ़े वाली मेहनत ही करें।
पउड़ी ॥
जितु सेविऐ सुखु पाईऐ सो साहिबु सदा सम॑ालीऐ ॥
जितु कीता पाईऐ आपणा सा घाल बुरी किउ घालीऐ ॥
मंदा मूलि न कीचई दे लंमी नदरि निहालीऐ ॥
जिउ साहिब नालि न हारीऐ तेवेहा पासा ढालीऐ ॥
किछु लाहे उपरि घालीऐ ॥21॥
पउड़ी 22
बाईसवीं पउड़ी से पहले पाँच सलोक हैं, और सब गुरु अंगद के हैं। यह वार में सलोकों की सबसे लंबी क़तार है, और सबकी एक ही धुरी है, मालिक के आगे अदब और अरज़, हुकम नहीं।
पहला सलोक एक नौकर की मिसाल देता है। जो मालिक की चाकरी भी करे और साथ अकड़ भी, वह मालिक की ख़ुशी नहीं पाता। अपना आपा मिटा कर सेवा करे, तभी आदर मिलता है; और वही मालिक से मिलता है जो उसकी सेवा में सच्चा लगा है।
सलोकु महला 2 ॥
चाकरु लगै चाकरी नाले गारबु वादु ॥
गला करे घणेरीआ खसम न पाए सादु ॥
आपु गवाइ सेवा करे ता किछु पाए मानु ॥
नानक जिस नो लगा तिसु मिलै लगा सो परवानु ॥1॥
दूसरा सलोक छोटा है। जो मन में हो वही उगता है, मुँह का कहा हवा है। कैसा अचरज, मनुष्य बीजता ज़हर है और माँगता अमृत है।
महला 2 ॥
जो जीइ होइ सु उगवै मुह का कहिआ वाउ ॥
बीजे बिखु मंगै अंम्रितु वेखहु एहु निआउ ॥2॥
तीसरा सलोक अंजान से दोस्ती की बात करता है। नादान से मित्रता कभी सिरे नहीं चढ़ती, क्योंकि वह अपनी समझ के मुताबिक़ ही बरतता है। किसी बर्तन में नई चीज़ तभी समाए जब पहली निकल जाए; और मालिक के आगे हुकम नहीं, अरज़ ही फबती है।
महला 2 ॥
नालि इआणे दोसती कदे न आवै रासि ॥
जेहा जाणै तेहो वरतै वेखहु को निरजासि ॥
वसतू अंदरि वसतु समावै दूजी होवै पासि ॥
साहिब सेती हुकमु न चलै कही बणै अरदासि ॥
कूड़ि कमाणै कूड़ो होवै नानक सिफति विगासि ॥3॥
चौथा सलोक दो लकीरें खींचता है। नादान से दोस्ती और अपने से बड़े से प्रीत, ये पानी की लकीर जैसी हैं, जिनका कोई निशान नहीं रहता।
महला 2 ॥
नालि इआणे दोसती वडारू सिउ नेहु ॥
पाणी अंदरि लीक जिउ तिस दा थाउ न थेहु ॥4॥
पाँचवाँ सलोक भी छोटा है। नादान जो काम करे वह सिरे नहीं चढ़ता; एक-आध ठीक कर भी ले तो दूसरा बिगाड़ देता है।
महला 2 ॥
होइ इआणा करे कंमु आणि न सकै रासि ॥
जे इक अध चंगी करे दूजी भी वेरासि ॥5॥
बाईसवीं पउड़ी सेवा और अरज़ पर मुहर लगाती है। जो नौकर मालिक की मर्ज़ी से चले, वही सच्ची चाकरी करता है; उसे आदर भी मिलता है और दूनी तनख़्वाह भी। पर जो मालिक की बराबरी करे, वह शर्मिंदगी उठाता है और जूतियाँ खाता है। गुरु नानक कहते हैं, जिसके दिए को खाएँ उसकी सदा सराहना करें; मालिक पर हुकम नहीं चलता, उसके आगे अरज़ ही चलती है।
पउड़ी ॥
चाकरु लगै चाकरी जे चलै खसमै भाइ ॥
हुरमति तिस नो अगली ओहु वजहु भि दूणा खाइ ॥
खसमै करे बराबरी फिरि गैरति अंदरि पाइ ॥
वजहु गवाए अगला मुहे मुहि पाणा खाइ ॥
जिस दा दिता खावणा तिसु कहीऐ साबासि ॥
नानक हुकमु न चलई नालि खसम चलै अरदासि ॥22॥
पउड़ी 23
तेईसवीं पउड़ी से पहले दो सलोक हैं। पहला अपने प्रयास के घमंड को बख़्शिश से अलग करता है; दूसरा सच्चे सेवक को परिभाषित करता है।
पहला सलोक गुरु अंगद का है। अगर कोई कहे कि मैंने अपने ज़ोर से यह पाया, तो वह बख़्शिश नहीं कहलाती। गुरु नानक के घर का सिद्धांत यही है, बख़्शिश वही है जो मालिक के प्रसन्न होने पर मिले।
सलोकु महला 2 ॥
एह किनेही दाति आपस ते जो पाईऐ ॥
नानक सा करमाति साहिब तुठै जो मिलै ॥1॥
दूसरा सलोक भी गुरु अंगद का। जिस सेवा से मालिक का अदब-डर मन से न जाए, वह असली सेवा नहीं; सच्चा सेवक वही कहलाता है जो अपने मालिक के साथ एक-रूप हो जाए।
महला 2 ॥
एह किनेही चाकरी जितु भउ खसम न जाइ ॥
नानक सेवकु काढीऐ जि सेती खसम समाइ ॥2॥
तेईसवीं पउड़ी उस बेअंत की बात कहती है। उसके आर-पार के किनारों का अंत नहीं; वही पैदा करता है, वही मारता है। किसी के गले ज़ंजीरें हैं, कोई घोड़ों पर सवार माया की मौज में है। यह सब वही ख़ुद करता-कराता है; फिर किसके आगे पुकार करें? जिसने रचा, संभाल भी उसी की है।
पउड़ी ॥
नानक अंत न जापन॑ी हरि ता के पारावार ॥
आपि कराए साखती फिरि आपि कराए मार ॥
इकन॑ा गली जंजीरीआ इकि तुरी चड़हि बिसीआर ॥
आपि कराए करे आपि हउ कै सिउ करी पुकार ॥
नानक करणा जिनि कीआ फिरि तिस ही करणी सार ॥23॥
पउड़ी 24
आख़िरी, चौबीसवीं पउड़ी से पहले दो सलोक हैं। पहला बर्तनों का सुंदर रूपक; दूसरा गुरु अंगद का समापन-भाव, सब कुछ वही आप ही है।
पहला सलोक बर्तनों की तस्वीर देता है। परमात्मा ने ये देह-रूपी बर्तन ख़ुद बनाए, और भर भी ख़ुद देता है। किसी में दूध पड़ा है, कोई चूल्हे पर तपता है; कोई गद्दों पर बेफ़िक्र सोता है, कोई खड़ा सेवा करता है। गुरु नानक कहते हैं, जिन पर मेहर की नज़र हो, उन्हें ही वह सँवारता है।
सलोकु मः 1 ॥
आपे भांडे साजिअनु आपे पूरणु देइ ॥
इकन॑ी दुधु समाईऐ इकि चुल॑ै रहनि॑ चड़े ॥
इकि निहाली पै सवनि॑ इकि उपरि रहनि खड़े ॥
तिन॑ा सवारे नानका जिन॑ कउ नदरि करे ॥1॥
दूसरा सलोक गुरु अंगद का है, और सब कुछ उसी एक पर मोड़ देता है। वही रचता है, वही सजाता है, वही संभालता है; जीव रच कर ख़ुद थापता और उथापता है। गुरु नानक कहते हैं, किसके आगे कहें, सब कुछ वही आप ही है।
महला 2 ॥
आपे साजे करे आपि जाई भि रखै आपि ॥
तिसु विचि जंत उपाइ कै देखै थापि उथापि ॥
किस नो कहीऐ नानका सभु किछु आपे आपि ॥2॥
और अब वार की आख़िरी पउड़ी, जो पूरी रचना को समेट देती है। उस बड़े की बड़ाइयाँ कही नहीं जा सकतीं। वही करता है, वही कादिर, वही करीम; वही जीवों को रिज़क पहुँचाता है। हर जीव वही कार करता है जो उसने धुर से उसके भाग्य में डाली। गुरु नानक कहते हैं, एक उसकी टेक के बिना और कोई जगह नहीं; जो उसकी रज़ा है, वही होता है। यहीं पर, सलोकों और पउड़ियों की यह सीढ़ी, अपनी आख़िरी पाँत पर आकर ठहर जाती है।
पउड़ी ॥
वडे कीआ वडिआईआ किछु कहणा कहणु न जाइ ॥
सो करता कादर करीमु दे जीआ रिजकु संबाहि ॥
साई कार कमावणी धुरि छोडी तिंनै पाइ ॥
नानक एकी बाहरी होर दूजी नाही जाइ ॥
सो करे जि तिसै रजाइ ॥24॥1॥ सुधु
पढ़ कर आगे क्या
इसी site पर: जपुजी साहिब, गुरु नानक की वह सुबह वाली प्रार्थना जिससे गुरु ग्रंथ साहिब शुरू होता है। आसा दी वार और जपुजी एक ही आवाज़ के दो रूप हैं, एक संगत में गाई जाती सीढ़ी, दूसरी एकांत में बैठा एक लंबा सवाल। दोनों साथ पढ़िए।
और एक बात जेब में रखिए, जो पूरी वार में लौटती है: मालिक के आगे हुकम नहीं, अरज़ चलती है। आज एक छोटा सा मौक़ा देखिए जहाँ अपनी मनवाने के बजाय रज़ा में बह जाना, और अपने आप को थोड़ा छोटा कहलवा लेना, ज़्यादा सच्चा रास्ता था।
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