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अंग 475

अंग
475
राग आसा
राग: आसा · रचयिता: गुरु अंगद देव जी (महला 2)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
आसा-दी-वार का हिस्सा। पूरी 24 पउड़ियों की commentary /asa-di-vaar/ पर है।
नानक सा करमाति साहिब तुठै जो मिलै ॥1॥
अंगद जी की वाणी कम है, मगर हर एक रचना में एक संयम झलकता है। 1552 तक उनके गुरु-काल में लिपि-व्यवस्था और संगठन का काम सबसे अधिक हुआ।

हिन्दी अर्थ: हे नानक ! बख्शिश वही हैजो मालिक के प्रसन्न होने से मिले। 1।
महला 2 ॥
एह किनेही चाकरी जितु भउ खसम न जाइ ॥
नानक सेवकु काढीऐ जि सेती खसम समाइ ॥2॥
गुरु अंगद देव जी की शिक्षक-वाली शान्त-दृष्टि यहाँ काम कर रही है। 1539 में गुरु-गद्दी पर बैठने के बाद, उन्होंने गुरमुखी लिपि को व्यवस्थित किया, जिससे आगे की वाणी संग्रहित हो सकी।

हिन्दी अर्थ: महला 2॥ जिस सेवा के करने से (सेवक के दिल में से) अपने मालिक का डर दूर ना हो।वह सेवा असली सेवा नहीं। हे नानक ! (सच्चा) सेवक वही कहलवाता है जो अपने मालिक के साथ एक-रूप हो जाता है। 2।
पउड़ी ॥
नानक अंत न जापन॑ी हरि ता के पारावार ॥
आपि कराए साखती फिरि आपि कराए मार ॥
इकन॑ा गली जंजीरीआ इकि तुरी चड़हि बिसीआर ॥
आपि कराए करे आपि हउ कै सिउ करी पुकार ॥
नानक करणा जिनि कीआ फिरि तिस ही करणी सार ॥23॥
अंगद जी की वाणी कम है, मगर हर एक रचना में एक संयम झलकता है। 1552 तक उनके गुरु-काल में लिपि-व्यवस्था और संगठन का काम सबसे अधिक हुआ।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ हे नानक ! उस प्रभू के उस पार इस पार के किनारों का अंत नहीं पाया जा सकता। वह खुद ही जीवों की पैदायश करता है और खुद ही उनको मार देता है। कई जीवों के गले में जंजीरें पड़ी हुई हैं (भाव।कई कैद गुलामी आदि के कष्ट सह रहे हैं)।और बेशुमार जीव घोड़ सवारी कर रहे हैं (अर्थात।माया की मौजें ले रहे हैं)। (ये सारे खेल तमाशे) वह प्रभू खुद ही कर रहा है।(उसके बिना और कोई दूसरा नहीं है) मैं किस के आगे इसकी फरियाद कर सकता हूँ। हे नानक ! जिस करतार ने सृष्टि रची है।फिर वही उसकी संभाल कर रहा है। 23।
सलोकु मः 1 ॥
आपे भांडे साजिअनु आपे पूरणु देइ ॥
इकन॑ी दुधु समाईऐ इकि चुल॑ै रहनि॑ चड़े ॥
इकि निहाली पै सवनि॑ इकि उपरि रहनि खड़े ॥
तिन॑ा सवारे नानका जिन॑ कउ नदरि करे ॥1॥
गुरु अंगद देव जी की शिक्षक-वाली शान्त-दृष्टि यहाँ काम कर रही है। 1539 में गुरु-गद्दी पर बैठने के बाद, उन्होंने गुरमुखी लिपि को व्यवस्थित किया, जिससे आगे की वाणी संग्रहित हो सकी।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 1॥ प्रभू ने (जीवों के शरीर रूपी) बर्तन खुद ही बनाए हैं।और वह जो कुछ इनमें डालता है।(भाव।जो दुख-सुख इनकी किस्मत में देता है)। कई बर्तनों में दूध पड़ा रहता है और कई बिचारे चूल्हे पर ही तपते रहते हैं (अर्थात।कई जीवों के भाग्यों में सुख और बढ़िया-बढ़िया पदार्थ हैं।और कई जीव सदा कष्ट ही सहते हैं)। कई (भाग्यशाली) गद्दों पे बेफिक्र हो के सोते हैं।कई बिचारे (उनकी रक्षा आदि सेवा के लिए) उनकी हजूरी में खड़े रहते हैं।पर। हे नानक ! जिन पे मेहर की नजर करता है।उनको सँवारता है (भाव।उनका जीवन सुधारता है)। 1।
महला 2 ॥
आपे साजे करे आपि जाई भि रखै आपि ॥
तिसु विचि जंत उपाइ कै देखै थापि उथापि ॥
किस नो कहीऐ नानका सभु किछु आपे आपि ॥2॥
अंगद जी की वाणी कम है, मगर हर एक रचना में एक संयम झलकता है। 1552 तक उनके गुरु-काल में लिपि-व्यवस्था और संगठन का काम सबसे अधिक हुआ।

हिन्दी अर्थ: महला 2॥ प्रभू स्वयं ही सृष्टि को पैदा करता है।स्वयं ही इसे सजाता है।सृष्टि की संभाल भी खुद ही करता है। इस सृष्टि में जीवों को पैदा करके देखता है।खुद ही टिकाता है खुद ही गिराता है। हे नानक ! (उसके बिना) किसी और के आगे फरियाद नहीं हो सकती।वह खुद सब कुछ करने के समर्थ है। 2।
पउड़ी ॥
वडे कीआ वडिआईआ किछु कहणा कहणु न जाइ ॥
सो करता कादर करीमु दे जीआ रिजकु संबाहि ॥
साई कार कमावणी धुरि छोडी तिंनै पाइ ॥
नानक एकी बाहरी होर दूजी नाही जाइ ॥
सो करे जि तिसै रजाइ ॥24॥1॥ सुधु
गुरु अंगद देव जी की शिक्षक-वाली शान्त-दृष्टि यहाँ काम कर रही है। 1539 में गुरु-गद्दी पर बैठने के बाद, उन्होंने गुरमुखी लिपि को व्यवस्थित किया, जिससे आगे की वाणी संग्रहित हो सकी।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ प्रभू के गुणों के संबंध में कोई बात कही नहीं जा सकती।(भाव।गुणों का अंत नहीं पाया जा सकता)। वह खुद ही सृजनहार है।खुद ही कुदरत का मालिक है।खुद ही बख्शिशें करने वाला है और खुद ही जीवों को रिजक पहुँचाता है। सारे जीव वही करते हैं जो उस प्रभू ने खुद ही (उनके भाग्यों में) डाल दिया है। हे नानक ! एक प्रभू की टेक के बिना और कोई जगह नहीं। जो कुछ उसकी मर्जी है वही करता है। 24। 1।सुध।
ੴ सतिनामु करता पुरखु निरभउ निरवैरु अकाल मूरति अजूनी सैभं गुरप्रसादि ॥
रागु आसा बाणी भगता की ॥
कबीर जीउ नामदेउ जीउ रविदास जीउ ॥
आसा स्री कबीर जीउ ॥
गुर चरण लागि हम बिनवता पूछत कह जीउ पाइआ ॥
कवन काजि जगु उपजै बिनसै कहहु मोहि समझाइआ ॥1॥
देव करहु दइआ मोहि मारगि लावहु जितु भै बंधन तूटै ॥
जनम मरन दुख फेड़ करम सुख जीअ जनम ते छूटै ॥1॥ रहाउ ॥
माइआ फास बंध नही फारै अरु मन सुंनि न लूके ॥
आपा पदु निरबाणु न चीनि॑आ इन बिधि अभिउ न चूके ॥2॥
कही न उपजै उपजी जाणै भाव अभाव बिहूणा ॥
उदै असत की मन बुधि नासी तउ सदा सहजि लिव लीणा ॥3॥
जिउ प्रतिबिंबु बिंब कउ मिली है उदक कुंभु बिगराना ॥
कहु कबीर ऐसा गुण भ्रमु भागा तउ मनु सुंनि समानां ॥4॥1॥
अंगद जी की वाणी कम है, मगर हर एक रचना में एक संयम झलकता है। 1552 तक उनके गुरु-काल में लिपि-व्यवस्था और संगठन का काम सबसे अधिक हुआ।

हिन्दी अर्थ: ईश्वर एक है, उसका नाम सत्य है, वह सृष्टि की रचना करने वाला है। वह सर्वशक्तिमान है, वह भय से रहित है,वस्तुतः सब पर उसकी समान दृष्टि है, वह कालातीत ब्रह्म मूर्ति अमर है, वह जन्म-मरण के चक्र से मुक्त है, वह स्वयं प्रकाशमान हुआ है, गुरु-कृपा से प्राप्त होता है। रागु आसा बाणी भगता की ॥ कबीर जी नामदेउ जी रविदास जी ॥ आसा श्री कबीर जी ॥ मैं अपने गुरू के चरणों में लग के विनती करता हूँ और पूछता हूँ- हे गुरू ! मुझे ये बात समझा के बता कि जीव किस लिए पैदा किया जाता है। और किस कारण जगत पैदा होता मरता रहता है (भाव।जीव को मानस-जनम की सूझ गुरू से ही पड़ सकती है)। 1। हे गुरदेव ! मेरे पर मेहर कर।मुझे (जिंदगी के सही) रास्ते पर डाल।जिस राह पर चलने से मेरे दुनिया वाले सहम और माया वाली जंजीरें टूट जाएं। मेरे पिछले किए कर्मों के अनुसार मेरी जिंद के सारी उम्र के जंजाल बिल्कुल ही समाप्त हो जाएं। 1।रहाउ। हे मेरे गुरदेव ! मेरा मन (अपने गले से) माया की जंजीरों के बंधन तोड़ता नहीं।ना ही यह (माया के प्रभाव से बचने के लिए) सुंन प्रभू में जुड़ता है। मेरे इस मन ने अपने वासना-रहित असल की पहचान नहीं की।और इन बातों से इसका कोरा-पन दूर नहीं हुआ। 2। हे गुरदेव ! मेरा मन ! जो अच्छे-बुरे ख्यालों की परख करने के अस्मर्थ था।इस जगत को-जो किसी हालत में भी प्रभू से लग टिक नहीं सकता-उससे अलग हस्ती वाला समझता रहा है। (पर आपकी मेहर से जब से) मेरे मन की वह मति नाश हैं गई है।जो जनम-मरण के चक्कर में डालती थी।तब से (ये मन) सदा अडोल अवस्था में टिका रहता है। 3। हे कबीर ! अब कह, (हे गुरदेव !) जैसे।जब पानी से भरा हुआ घड़ा टूट जाता है तब (उस पानी में पड़ने वाला) प्रतिबिंब पानी के साथ ही मिल जाता है (अर्थात।जैसे पानी और प्रतिबिंब की हस्ती उस घड़े में से समाप्त हो जाती है)। वैसे ही आपकी मेहर से रस्सी (और साँप) वाला भुलेखा मिट गया है (ये भुलेखा नहीं रहा कि ये दिखता जगत परमात्मा से कोई अलग हस्ती है)।और मेरा मन सुंन प्रभू में टिक गया है। 4। 1।

आसा राग में एक भोर की हलकी ताज़गी है। आसा दी वार इसी राग में बँधी, और सिख-संगीत के परिदृश्य को आकार दिया। हर सुबह, अमृतसर के हरमंदिर साहिब में, यही राग खुलता है। आसा राग का क्षेत्र है। ‘आसा दी वार’ की रचना गुरु नानक की है, बाद में गुरु अंगद और गुरु अर्जन के साथ संगठित हुई।

गुरु अंगद देव जी ने गुरमुखी लिपि को व्यवस्थित किया। 1539 में गुरु-गद्दी पर बैठे, 1552 तक रहे। उनकी अपनी वाणी की मात्रा कम है, मगर हर एक रचना में एक शिक्षक का ठहराव है, और उसी ठहराव से आगे की गुरु-परम्परा को व्यवस्था मिली।

इस अंग पर 7 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे नानक ! बख्शिश वही हैजो मालिक के प्रसन्न होने से मिले।”

बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।