॥ सलोक मः १ ॥ मुसलमाना सिफति सरीअति पड़ि पड़ि करहि बीचारु ॥ बंदे से जि पवहि विचि बंदी वेखण कउ दीदारु ॥ हिंदू सालाही सालाहनि दरसनि रूपि अपारु ॥ तीरथि नावहि अरचा पूजा अगर वासु बहकारु ॥ जोगी सुंनि धिआवन्हि जेते अलख नामु करतारु ॥ सूखम मूरति नामु निरंजन काइआ का आकारु ॥ सतीआ मनि संतोखु उपजै देणै कै वीचारि ॥ दे दे मंगहि सहसा गूणा सोभ करे संसारु ॥ चोरा जारा तै कूड़िआरा खाराबा वेकार ॥ इकि होदा खाइ चलहि ऐथाऊ तिना भि काई कार ॥ जली न पाई जली नाहीं इकि कमाइदा हरि गोवारु ॥ सभु को आखै बहुतु बहुतु घटि न आखै कोइ ॥ कीमति किनै न पाईआ कहणि न वडा होइ ॥ साचा साहबु साचु नाइ भाखिआ भाउ अपारु ॥ आखहि तुधु बिनु दूसरा सो आखि न पाए ॥ रते सेई जि मुखु न मोड़न्ही जिन्ही सिञाता साई ॥ दासनि दासा होइ कै जिन्ही विचहु आपु गवाइआ ॥ ओहि अंदरहु बाहरहु निरमले सचे सचि समाइआ ॥ नानक आए से परवाणु जिन्ही हरि वुठा चिति आइआ ॥१॥
॥ पउड़ी ॥ सिव सकति आपि उपाइ कै करता आपे हुकमु वरताए ॥ हुकमु वरताए आपि वेखै गुरमुखि किसै बुझाए ॥ तोड़े बंधन होवै मुकतु सबदु मंनि वसाए ॥ गुरमुखि जिस नो आपि करे सु होवै एकस सिउ लिव लाए ॥ कहै नानकु आपि करता आपे हुकमु बुझाए ॥२४॥१॥सुधु॥
पौड़ी 24, आसा की वार का closing।
“सिव सकति आपि उपाइ कै।” “शिव-शक्ति आप उपजा कर।” यानी हरि ने ही “शिव” और “शक्ति” (consciousness और energy) दोनों बनाए।
यह tantra-philosophy का acknowledgment है। शिव-शक्ति का concept हिन्दू-तंत्र-योग में foundational है। नानक उसी को pick up कर रहे हैं।
“करता आपे हुकमु वरताए।” “करता आप ही हुकम ‘वर्ताता’ (फैलाता) है।”
पूरा cosmos हुकम पर चलता है।
“हुकमु वरताए आपि वेखै।” “हुकम चला कर, ख़ुद देखता है।” “गुरमुखि किसै बुझाए।” “गुरमुख (किसी एक) को बुझाता (समझाता)।”
सब हुकम में हैं, मगर सिर्फ़ “गुरमुख” को यह बात “बूझ” में आती है।
“तोड़े बंधन होवै मुकतु, सबदु मंनि वसाए।” “बँधन तोड़ कर मुक्त होता है, शबद मन में वसाता है।”
मुक्ति का mechanism: बँधन तोड़ना + शबद को मन में स्थापित करना।
“गुरमुखि जिस नो आपि करे।” “गुरमुख जिसको ख़ुद बनाता है।” “सु होवै एकस सिउ लिव लाए।” “वो ‘एक के साथ’ लिव लगाता है।”
closing: “कहै नानकु आपि करता आपे हुकमु बुझाए।” नानक कहते हैं, “करता आप, ख़ुद ही हुकम बुझाता है।”
पूरी वार का summary यह है: सब हरि की मर्ज़ी से होता है। समझ भी उसी से। मुक्ति भी उसी से। हम बस उसके instruments हैं।
पूरी आसा की वार बस यही drumbeat थी, “एक है, बाक़ी सब नज़ारा।” 24 पौड़ियों में, हर तरह से, नानक ने यह पंक्ति कहा। काम, क्रोध, माया, ritualism, hypocrisy, gender, food purity, सब कुछ touch किया, और हर बार वही conclusion।
और लगता है, “सब हुकम में हैं” से बेहतर closing क्या हो सकता है। नानक की पूरी journey, उनकी पूरी philosophy, इस एक idea में simplify हो जाती है। तुम कुछ नहीं हो, वो सब है। मगर वो सब के रूप में तुम भी हो।
closing word: “सुधु।” यह scribal note है, “शुद्ध (कापी)।” यानी “verified, complete।” हर वार के बाद यह नोट आता है, signal करता है कि composition पूरी हुई, copyist ने verify किया।
दिल्ली में हर सुबह कितने gurdwara में यह वार recite हो रही है। और हर recitation एक छोटी सी revolution है, क्योंकि नानक ने जो बातें यहाँ कहीं, वो आज भी सत्ता-संरचना को challenge करती हैं। gender equality, ritual के against, caste के against, hypocrisy के against, religious-administrative duplicity के against। यह सब आज भी relevant है।
यह वार का सबसे expansive सलोक है। नानक हर traditions को एक frame में place करते हैं।
“मुसलमाना सिफति सरीअति।” “मुसलमान ‘सिफत’ (qualities) और ‘शरीअत’ (Islamic law) पढ़ते हैं।” “पड़ि पड़ि करहि बीचारु।” “पढ़ कर विचार करते हैं।”
“बंदे से जि पवहि विचि बंदी।” “बंदे (devotees) वो हैं जो ‘बंदी’ (devotional service, या willing servitude) में रहते हैं।” “वेखण कउ दीदारु।” “दीदार (vision) देखने के लिए।”
यह मुस्लिम spirituality का सटीक description है। शरीअत, बंदगी, दीदार, सब अरबी-फ़ारसी terms।
“हिंदू सालाही सालाहनि।” “हिन्दू ‘सलाही’ (प्रशंसा) करते हैं, प्रशंसकगण।” “दरसनि रूपि अपारु।” “‘दर्शन’ और ‘अपार रूप’ के।”
हिन्दू spirituality: दर्शन-शास्त्र, मूर्ति-पूजा (अपार रूप), आरती।
“तीरथि नावहि अरचा पूजा अगर वासु बहकारु।” “तीर्थ नहाते हैं, ‘अर्चा’ (worship), ‘पूजा,’ ‘अगर’ (अगरबत्ती), ‘वासु’ (fragrance), ‘बहकारु’ (incense)।”
हिन्दू rituals का comprehensive list।
“जोगी सुंनि धिआवन्हि।” “योगी ‘सून’ (शून्यता, void) में ध्यान करते हैं।” “जेते अलख नामु करतारु।” “जिसे ‘अलख’ (अदृश्य) नाम और ‘करतार’ कहते हैं।”
योगी tradition: शून्य-ध्यान, अलख-निरंजन।
फिर नानक एक neutral observation करते हैं: “सतीआ मनि संतोखु उपजै, देणै कै वीचारि।” “‘सती’ (good people) के मन में संतोष उपजता है, ‘देने’ के विचार से।”
good people बाँटने में ख़ुश होते हैं।
“दे दे मंगहि सहसा गूणा।” “दे-दे कर हज़ार गुणा माँगते हैं।” यानी देने में भी “transactional” approach।
फिर dark side: “चोरा जारा तै कूड़िआरा, खाराबा वेकार।” “चोर, ‘जार’ (व्यभिचारी), ‘कूड़िआर’ (झूठे), ‘खराब’ (corrupt), ‘विकार’ (vice-ridden)।”
“इकि होदा खाइ चलहि ऐथाऊ, तिना भि काई कार।” “एक (अमीर) होते हुए, यहाँ खा कर चले जाते हैं, उनको भी कोई काम है।”
यानी हर category का अपना role है ब्रह्मांड में, even negative actors।
“सभु को आखै बहुतु बहुतु।” “सब कहते हैं, बहुत बहुत।” “घटि न आखै कोइ।” “घट (कम) कोई नहीं कहता।”
यानी सब हरि को “बहुत” बड़ा कहते हैं। कोई “कम” नहीं कहता।
“कीमति किनै न पाईआ।” “कीमत किसी ने नहीं पाई।” “कहणि न वडा होइ।” “कहने से बड़ा नहीं होता।”
हरि बड़ा है, मगर हमारे कहने से नहीं। वो automatically बड़ा है।
closing: “साचा साहबु साचु नाइ, भाखिआ भाउ अपारु।” “सच्चा साहिब, सच्चा नाम, बोल ‘अपार भाव’ का।”
“रते सेई जि मुखु न मोड़न्ही, जिन्ही सिञाता साई।” “वो ‘रंगे’ हैं जो ‘मुख नहीं मोड़ते’ (नहीं फिरते), जिन्होंने ‘सईं’ को पहचाना।”
“दासनि दासा होइ कै, जिन्ही विचहु आपु गवाइआ।” “दासों के दास हो कर, जिन्होंने ‘अपना’ गँवाया।”
“ओहि अंदरहु बाहरहु निरमले, सचे सचि समाइआ।” “वो अंदर-बाहर निर्मल, सच में समा गए।”
“नानक आए से परवाणु, जिन्ही हरि वुठा चिति आइआ।” नानक कहते हैं, “वो आए हुए ‘परवाण’ (acceptable, valid) हैं, जिनके चित्त में हरि ‘वुठा’ (settled) हो गया।”
closing line वार का सबसे important statement है। तुम सब religions follow करो, सब practices करो, मगर असली judgment यह है, “क्या तुम्हारे चित्त में हरि आ गया?” अगर हाँ, तो तुम “आए हुए” valid हो। अगर नहीं, तो आना ही “useless।”
दिल्ली के context में: हम सब अलग-अलग spiritual paths follow करते हैं, कोई yoga, कोई meditation, कोई जप, कोई service। नानक का summary: “test एक ही है, चित्त में हरि बसा?” बाक़ी सब means हैं।