अंग
400
राग आसा
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ਗੁਰ ਸੇਵਾ ਮਹਲੁ ਪਾਈਐ ਜਗੁ ਦੁਤਰੁ ਤਰੀਐ ॥੨॥
ਦ੍ਰਿਸਟਿ ਤੇਰੀ ਸੁਖੁ ਪਾਈਐ ਮਨ ਮਾਹਿ ਨਿਧਾਨਾ ॥
ਜਾ ਕਉ ਤੁਮ ਕਿਰਪਾਲ ਭਏ ਸੇਵਕ ਸੇ ਪਰਵਾਨਾ ॥੩॥
ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਰਸੁ ਹਰਿ ਕੀਰਤਨੋ ਕੋ ਵਿਰਲਾ ਪੀਵੈ ॥
ਵਜਹੁ ਨਾਨਕ ਮਿਲੈ ਏਕੁ ਨਾਮੁ ਰਿਦ ਜਪਿ ਜਪਿ ਜੀਵੈ ॥੪॥੧੪॥੧੧੬॥
ਦ੍ਰਿਸਟਿ ਤੇਰੀ ਸੁਖੁ ਪਾਈਐ ਮਨ ਮਾਹਿ ਨਿਧਾਨਾ ॥
ਜਾ ਕਉ ਤੁਮ ਕਿਰਪਾਲ ਭਏ ਸੇਵਕ ਸੇ ਪਰਵਾਨਾ ॥੩॥
ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਰਸੁ ਹਰਿ ਕੀਰਤਨੋ ਕੋ ਵਿਰਲਾ ਪੀਵੈ ॥
ਵਜਹੁ ਨਾਨਕ ਮਿਲੈ ਏਕੁ ਨਾਮੁ ਰਿਦ ਜਪਿ ਜਪਿ ਜੀਵੈ ॥੪॥੧੪॥੧੧੬॥
गुर सेवा महलु पाईऐ जगु दुतरु तरीऐ ॥२॥
द्रिसटि तेरी सुखु पाईऐ मन माहि निधाना ॥
जा कउ तुम किरपाल भए सेवक से परवाना ॥३॥
अंम्रित रसु हरि कीरतनो को विरला पीवै ॥
वजहु नानक मिलै एकु नामु रिद जपि जपि जीवै ॥४॥१४॥११६॥
द्रिसटि तेरी सुखु पाईऐ मन माहि निधाना ॥
जा कउ तुम किरपाल भए सेवक से परवाना ॥३॥
अंम्रित रसु हरि कीरतनो को विरला पीवै ॥
वजहु नानक मिलै एकु नामु रिद जपि जपि जीवै ॥४॥१४॥११६॥
हिन्दी अर्थ: (हे भाई !) गुरू की बताई सेवा करने से (परमात्मा के चरणों में) ठिकाना मिल जाता है।और इस संसार (-समुंद्र) से पार लांघ जाते हैं जिससे (वैसे) पार लांघना बहुत ही मुश्किल है। 2। हे प्रभू ! तेरी मेहर की नजर से सुख मिलता है (जिनपे तेरी मेहर हो उनके) मन में (तेरा नाम-) खजाना आ बसता है। हे प्रभू ! जिन पे तू दयावान होता है वह तेरे सेवक तेरे दर पर कबूल होते हैं। 3। हे भाई ! परमात्माकी सिफत सालाह आत्मिक जीवन देने वाला रस है।कोई विरला (भाग्यशाली) मनुष्य ये (अमृत रस) पीता है। हे नानक ! (कह, जिस नौकर को) परमात्मा का नाम-वजीफा मिल जाता है वह अपने हृदय में ये नाम सदा जप के आत्मिक जीवन हासिल कर लेता है। 4। 14। 116।
ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਜਾ ਪ੍ਰਭ ਕੀ ਹਉ ਚੇਰੁਲੀ ਸੋ ਸਭ ਤੇ ਊਚਾ ॥
ਸਭੁ ਕਿਛੁ ਤਾ ਕਾ ਕਾਂਢੀਐ ਥੋਰਾ ਅਰੁ ਮੂਚਾ ॥੧॥
ਜੀਅ ਪ੍ਰਾਨ ਮੇਰਾ ਧਨੋ ਸਾਹਿਬ ਕੀ ਮਨੀਆ ॥
ਨਾਮਿ ਜਿਸੈ ਕੈ ਊਜਲੀ ਤਿਸੁ ਦਾਸੀ ਗਨੀਆ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਵੇਪਰਵਾਹੁ ਅਨੰਦ ਮੈ ਨਾਉ ਮਾਣਕ ਹੀਰਾ ॥
ਰਜੀ ਧਾਈ ਸਦਾ ਸੁਖੁ ਜਾ ਕਾ ਤੂੰ ਮੀਰਾ ॥੨॥
ਸਖੀ ਸਹੇਰੀ ਸੰਗ ਕੀ ਸੁਮਤਿ ਦ੍ਰਿੜਾਵਉ ॥
ਸੇਵਹੁ ਸਾਧੂ ਭਾਉ ਕਰਿ ਤਉ ਨਿਧਿ ਹਰਿ ਪਾਵਉ ॥੩॥
ਸਗਲੀ ਦਾਸੀ ਠਾਕੁਰੈ ਸਭ ਕਹਤੀ ਮੇਰਾ ॥
ਜਿਸਹਿ ਸੀਗਾਰੇ ਨਾਨਕਾ ਤਿਸੁ ਸੁਖਹਿ ਬਸੇਰਾ ॥੪॥੧੫॥੧੧੭॥
ਜਾ ਪ੍ਰਭ ਕੀ ਹਉ ਚੇਰੁਲੀ ਸੋ ਸਭ ਤੇ ਊਚਾ ॥
ਸਭੁ ਕਿਛੁ ਤਾ ਕਾ ਕਾਂਢੀਐ ਥੋਰਾ ਅਰੁ ਮੂਚਾ ॥੧॥
ਜੀਅ ਪ੍ਰਾਨ ਮੇਰਾ ਧਨੋ ਸਾਹਿਬ ਕੀ ਮਨੀਆ ॥
ਨਾਮਿ ਜਿਸੈ ਕੈ ਊਜਲੀ ਤਿਸੁ ਦਾਸੀ ਗਨੀਆ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਵੇਪਰਵਾਹੁ ਅਨੰਦ ਮੈ ਨਾਉ ਮਾਣਕ ਹੀਰਾ ॥
ਰਜੀ ਧਾਈ ਸਦਾ ਸੁਖੁ ਜਾ ਕਾ ਤੂੰ ਮੀਰਾ ॥੨॥
ਸਖੀ ਸਹੇਰੀ ਸੰਗ ਕੀ ਸੁਮਤਿ ਦ੍ਰਿੜਾਵਉ ॥
ਸੇਵਹੁ ਸਾਧੂ ਭਾਉ ਕਰਿ ਤਉ ਨਿਧਿ ਹਰਿ ਪਾਵਉ ॥੩॥
ਸਗਲੀ ਦਾਸੀ ਠਾਕੁਰੈ ਸਭ ਕਹਤੀ ਮੇਰਾ ॥
ਜਿਸਹਿ ਸੀਗਾਰੇ ਨਾਨਕਾ ਤਿਸੁ ਸੁਖਹਿ ਬਸੇਰਾ ॥੪॥੧੫॥੧੧੭॥
आसा महला ५ ॥
जा प्रभ की हउ चेरुली सो सभ ते ऊचा ॥
सभु किछु ता का कांढीऐ थोरा अरु मूचा ॥१॥
जीअ प्रान मेरा धनो साहिब की मनीआ ॥
नामि जिसै कै ऊजली तिसु दासी गनीआ ॥१॥ रहाउ ॥
वेपरवाहु अनंद मै नाउ माणक हीरा ॥
रजी धाई सदा सुखु जा का तूं मीरा ॥२॥
सखी सहेरी संग की सुमति द्रिड़ावउ ॥
सेवहु साधू भाउ करि तउ निधि हरि पावउ ॥३॥
सगली दासी ठाकुरै सभ कहती मेरा ॥
जिसहि सीगारे नानका तिसु सुखहि बसेरा ॥४॥१५॥११७॥
जा प्रभ की हउ चेरुली सो सभ ते ऊचा ॥
सभु किछु ता का कांढीऐ थोरा अरु मूचा ॥१॥
जीअ प्रान मेरा धनो साहिब की मनीआ ॥
नामि जिसै कै ऊजली तिसु दासी गनीआ ॥१॥ रहाउ ॥
वेपरवाहु अनंद मै नाउ माणक हीरा ॥
रजी धाई सदा सुखु जा का तूं मीरा ॥२॥
सखी सहेरी संग की सुमति द्रिड़ावउ ॥
सेवहु साधू भाउ करि तउ निधि हरि पावउ ॥३॥
सगली दासी ठाकुरै सभ कहती मेरा ॥
जिसहि सीगारे नानका तिसु सुखहि बसेरा ॥४॥१५॥११७॥
हिन्दी अर्थ: आसा महला ५ ॥ हे सहेलियो ! मैं जिस प्रभू की निमाणी सी दासी हूँ मेरा वह मालिक प्रभू सबसे ऊँचा है। मेरे पास जो कुछ भी छोटी-बड़ी चीज है उस मालिक की ही कहलाती है। 1। हे सहेलियो ! मेरी जिंद।मेरे प्राण।मेरा धन-पदार्थ – ये सब कुछ मैं अपने मालिक प्रभू की दी हुई दाति मानती हूँ। जिस मालिक-प्रभू के नाम की बरकति से मैं इज्जत वाली हो गई हूँ मैं अपने आप को उसकी दासी गिनती हूँ। 1।रहाउ। (हे मेरे मालिक प्रभू !) तूझे किसी की मुहताजी नहीं।तू सदा आनंद-स्वरूप है।तेरा नाम मेरे वास्ते मोती है हीरा है। हे प्रभू ! जिस जीव-स्त्री का (जिस जीव स्त्री के सिर पर) तू पातशाह (बनता) है वह (माया की ओर से) तृप्त रहती है।संतुष्ट रहती है वह सदा आनंद पाती है। 2। हे मेरे साथ की सहेलियो ! मैं तुम्हें ये भली सलाह बारंबार याद करवाती हूँ (जो मुझे गुरू से मिली हुई है)। तुम श्रद्धा व प्रेम धारण करके गुरू की शरण पड़ो। (मैं जब से गुरू की शरण में आई हूँ) तब से मैं परमात्मा का नाम-खजाना हासिल कर रही हूँ। 3। हे मेरी सहेलियो ! हरेक जीव-स्त्री ही मालिक प्रभू की दासी है।हरेक जीव-स्त्री कहती है कि परमात्मा मेरा मालिक है।पर। हे नानक ! (कह, हे सहेलियो !) जिस जीव-स्त्री (के जीवन) को (मालिक प्रभू स्वयं) सुंदर बनाता है उसका निवास सुख आनंद में बना रहता है। 4। 15। 117।
ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਸੰਤਾ ਕੀ ਹੋਇ ਦਾਸਰੀ ਏਹੁ ਅਚਾਰਾ ਸਿਖੁ ਰੀ ॥
ਸਗਲ ਗੁਣਾ ਗੁਣ ਊਤਮੋ ਭਰਤਾ ਦੂਰਿ ਨ ਪਿਖੁ ਰੀ ॥੧॥
ਇਹੁ ਮਨੁ ਸੁੰਦਰਿ ਆਪਣਾ ਹਰਿ ਨਾਮਿ ਮਜੀਠੈ ਰੰਗਿ ਰੀ ॥
ਤਿਆਗਿ ਸਿਆਣਪ ਚਾਤੁਰੀ ਤੂੰ ਜਾਣੁ ਗੁਪਾਲਹਿ ਸੰਗਿ ਰੀ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਭਰਤਾ ਕਹੈ ਸੁ ਮਾਨੀਐ ਏਹੁ ਸੀਗਾਰੁ ਬਣਾਇ ਰੀ ॥
ਦੂਜਾ ਭਾਉ ਵਿਸਾਰੀਐ ਏਹੁ ਤੰਬੋਲਾ ਖਾਇ ਰੀ ॥੨॥
ਗੁਰ ਕਾ ਸਬਦੁ ਕਰਿ ਦੀਪਕੋ ਇਹ ਸਤ ਕੀ ਸੇਜ ਬਿਛਾਇ ਰੀ ॥
ਆਠ ਪਹਰ ਕਰ ਜੋੜਿ ਰਹੁ ਤਉ ਭੇਟੈ ਹਰਿ ਰਾਇ ਰੀ ॥੩॥
ਤਿਸ ਹੀ ਚਜੁ ਸੀਗਾਰੁ ਸਭੁ ਸਾਈ ਰੂਪਿ ਅਪਾਰਿ ਰੀ ॥
ਸਾਈ ਸੋੁਹਾਗਣਿ ਨਾਨਕਾ ਜੋ ਭਾਣੀ ਕਰਤਾਰਿ ਰੀ ॥੪॥੧੬॥੧੧੮॥
ਸੰਤਾ ਕੀ ਹੋਇ ਦਾਸਰੀ ਏਹੁ ਅਚਾਰਾ ਸਿਖੁ ਰੀ ॥
ਸਗਲ ਗੁਣਾ ਗੁਣ ਊਤਮੋ ਭਰਤਾ ਦੂਰਿ ਨ ਪਿਖੁ ਰੀ ॥੧॥
ਇਹੁ ਮਨੁ ਸੁੰਦਰਿ ਆਪਣਾ ਹਰਿ ਨਾਮਿ ਮਜੀਠੈ ਰੰਗਿ ਰੀ ॥
ਤਿਆਗਿ ਸਿਆਣਪ ਚਾਤੁਰੀ ਤੂੰ ਜਾਣੁ ਗੁਪਾਲਹਿ ਸੰਗਿ ਰੀ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਭਰਤਾ ਕਹੈ ਸੁ ਮਾਨੀਐ ਏਹੁ ਸੀਗਾਰੁ ਬਣਾਇ ਰੀ ॥
ਦੂਜਾ ਭਾਉ ਵਿਸਾਰੀਐ ਏਹੁ ਤੰਬੋਲਾ ਖਾਇ ਰੀ ॥੨॥
ਗੁਰ ਕਾ ਸਬਦੁ ਕਰਿ ਦੀਪਕੋ ਇਹ ਸਤ ਕੀ ਸੇਜ ਬਿਛਾਇ ਰੀ ॥
ਆਠ ਪਹਰ ਕਰ ਜੋੜਿ ਰਹੁ ਤਉ ਭੇਟੈ ਹਰਿ ਰਾਇ ਰੀ ॥੩॥
ਤਿਸ ਹੀ ਚਜੁ ਸੀਗਾਰੁ ਸਭੁ ਸਾਈ ਰੂਪਿ ਅਪਾਰਿ ਰੀ ॥
ਸਾਈ ਸੋੁਹਾਗਣਿ ਨਾਨਕਾ ਜੋ ਭਾਣੀ ਕਰਤਾਰਿ ਰੀ ॥੪॥੧੬॥੧੧੮॥
आसा महला ५ ॥
संता की होइ दासरी एहु अचारा सिखु री ॥
सगल गुणा गुण ऊतमो भरता दूरि न पिखु री ॥१॥
इहु मनु सुंदरि आपणा हरि नामि मजीठै रंगि री ॥
तिआगि सिआणप चातुरी तूं जाणु गुपालहि संगि री ॥१॥ रहाउ ॥
भरता कहै सु मानीऐ एहु सीगारु बणाइ री ॥
दूजा भाउ विसारीऐ एहु तंबोला खाइ री ॥२॥
गुर का सबदु करि दीपको इह सत की सेज बिछाइ री ॥
आठ पहर कर जोड़ि रहु तउ भेटै हरि राइ री ॥३॥
तिस ही चजु सीगारु सभु साई रूपि अपारि री ॥
साई सोुहागणि नानका जो भाणी करतारि री ॥४॥१६॥११८॥
संता की होइ दासरी एहु अचारा सिखु री ॥
सगल गुणा गुण ऊतमो भरता दूरि न पिखु री ॥१॥
इहु मनु सुंदरि आपणा हरि नामि मजीठै रंगि री ॥
तिआगि सिआणप चातुरी तूं जाणु गुपालहि संगि री ॥१॥ रहाउ ॥
भरता कहै सु मानीऐ एहु सीगारु बणाइ री ॥
दूजा भाउ विसारीऐ एहु तंबोला खाइ री ॥२॥
गुर का सबदु करि दीपको इह सत की सेज बिछाइ री ॥
आठ पहर कर जोड़ि रहु तउ भेटै हरि राइ री ॥३॥
तिस ही चजु सीगारु सभु साई रूपि अपारि री ॥
साई सोुहागणि नानका जो भाणी करतारि री ॥४॥१६॥११८॥
हिन्दी अर्थ: आसा महला ५ ॥ हे मेरी सोहनी जिंदे ! तू सत्संगियों की निमाणी दासी बनी रह- बस ! ये कर्तव्य सीख।और। हे जिंदे ! उस पति-प्रभू को कहीं दूर बसता ना समझ जो सारे गुणों का मालिक है जो अपने गुणों के कारण सबसे श्रेष्ठ है। 1। हे (मेरी) सोहणी जिंदे ! तू अपने इस मन को मजीठ (जैसे पक्के) परमात्मा के नाम रंग से रंग ले। अपने अंदर की सियानप और चतुराई छोड के (ये गुमान छोड़ कि तू बड़ी सियानी है और चतुर है)।हे जिंदे ! सृष्टि के मालिक प्रभू को अपने साथ बसता समझती रह। 1।रहाउ। हे मेरी सोहणी जिंदे ! पति-प्रभू जो हुकम करता है वह (मीठा करके) मानना चाहिए- बस ! इस बात को (अपने जीवन का) श्रृंगार बनाए रख। परमात्मा के बिना और (माया आदि का) प्यार भुला देना चाहिए- (ये नियम आत्मिक जीवन वास्ते।जैसे।पान का बीड़ा है) हे जिंदे ! ये पान खाया कर। 2। हे मेरी सोहणी जिंदे ! सतिगुरू के शबद को दीपक बना (जो तेरे अंदर आत्मिक जीवन का प्रकाश पैदा करे) और उस आत्मिक जीवन की (अपने हृदय में) सेज बिछा। हे सोहणी जिंदे ! (अपने अंतरात्मे) आठों पहर (दोनों) हाथ जोड़ के (प्रभू चरणों में) टिकी रह।तब ही प्रभू-पातशाह (आ के) मिलता है। 3। वह जीव स्त्री सुंदर रूप वाली समझी जाती है जो बेअंत परमात्मा (के चरणों) में लीन रहती है।हे जिंदे ! वही जीव-स्त्री सुहाग-भाग वाली है जो (करतार को) प्यारी लगती है जो करतार (की याद) में लीन रहती है। हे नानक ! (कह,) हे मेरी सोहणी जिंदे ! उसी जीव स्त्री को सलीके वाली (सुचॅजी) माना जाता है उसी जीव-स्त्री का (आत्मिक) श्रृंगार परवान होता है।4। 16। 118।
ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਡੀਗਨ ਡੋਲਾ ਤਊ ਲਉ ਜਉ ਮਨ ਕੇ ਭਰਮਾ ॥
ਭ੍ਰਮ ਕਾਟੇ ਗੁਰਿ ਆਪਣੈ ਪਾਏ ਬਿਸਰਾਮਾ ॥੧॥
ਓਇ ਬਿਖਾਦੀ ਦੋਖੀਆ ਤੇ ਗੁਰ ਤੇ ਹੂਟੇ ॥
ਹਮ ਛੂਟੇ ਅਬ ਉਨੑਾ ਤੇ ਓਇ ਹਮ ਤੇ ਛੂਟੇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਮੇਰਾ ਤੇਰਾ ਜਾਨਤਾ ਤਬ ਹੀ ਤੇ ਬੰਧਾ ॥
ਗੁਰਿ ਕਾਟੀ ਅਗਿਆਨਤਾ ਤਬ ਛੁਟਕੇ ਫੰਧਾ ॥੨॥
ਜਬ ਲਗੁ ਹੁਕਮੁ ਨ ਬੂਝਤਾ ਤਬ ਹੀ ਲਉ ਦੁਖੀਆ ॥
ਗੁਰ ਮਿਲਿ ਹੁਕਮੁ ਪਛਾਣਿਆ ਤਬ ਹੀ ਤੇ ਸੁਖੀਆ ॥੩॥
ਨਾ ਕੋ ਦੁਸਮਨੁ ਦੋਖੀਆ ਨਾਹੀ ਕੋ ਮੰਦਾ ॥
ਗੁਰ ਕੀ ਸੇਵਾ ਸੇਵਕੋ ਨਾਨਕ ਖਸਮੈ ਬੰਦਾ ॥੪॥੧੭॥੧੧੯॥
ਡੀਗਨ ਡੋਲਾ ਤਊ ਲਉ ਜਉ ਮਨ ਕੇ ਭਰਮਾ ॥
ਭ੍ਰਮ ਕਾਟੇ ਗੁਰਿ ਆਪਣੈ ਪਾਏ ਬਿਸਰਾਮਾ ॥੧॥
ਓਇ ਬਿਖਾਦੀ ਦੋਖੀਆ ਤੇ ਗੁਰ ਤੇ ਹੂਟੇ ॥
ਹਮ ਛੂਟੇ ਅਬ ਉਨੑਾ ਤੇ ਓਇ ਹਮ ਤੇ ਛੂਟੇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਮੇਰਾ ਤੇਰਾ ਜਾਨਤਾ ਤਬ ਹੀ ਤੇ ਬੰਧਾ ॥
ਗੁਰਿ ਕਾਟੀ ਅਗਿਆਨਤਾ ਤਬ ਛੁਟਕੇ ਫੰਧਾ ॥੨॥
ਜਬ ਲਗੁ ਹੁਕਮੁ ਨ ਬੂਝਤਾ ਤਬ ਹੀ ਲਉ ਦੁਖੀਆ ॥
ਗੁਰ ਮਿਲਿ ਹੁਕਮੁ ਪਛਾਣਿਆ ਤਬ ਹੀ ਤੇ ਸੁਖੀਆ ॥੩॥
ਨਾ ਕੋ ਦੁਸਮਨੁ ਦੋਖੀਆ ਨਾਹੀ ਕੋ ਮੰਦਾ ॥
ਗੁਰ ਕੀ ਸੇਵਾ ਸੇਵਕੋ ਨਾਨਕ ਖਸਮੈ ਬੰਦਾ ॥੪॥੧੭॥੧੧੯॥
आसा महला ५ ॥
डीगन डोला तऊ लउ जउ मन के भरमा ॥
भ्रम काटे गुरि आपणै पाए बिसरामा ॥१॥
ओइ बिखादी दोखीआ ते गुर ते हूटे ॥
हम छूटे अब उन॑ा ते ओइ हम ते छूटे ॥१॥ रहाउ ॥
मेरा तेरा जानता तब ही ते बंधा ॥
गुरि काटी अगिआनता तब छुटके फंधा ॥२॥
जब लगु हुकमु न बूझता तब ही लउ दुखीआ ॥
गुर मिलि हुकमु पछाणिआ तब ही ते सुखीआ ॥३॥
ना को दुसमनु दोखीआ नाही को मंदा ॥
गुर की सेवा सेवको नानक खसमै बंदा ॥४॥१७॥११९॥
डीगन डोला तऊ लउ जउ मन के भरमा ॥
भ्रम काटे गुरि आपणै पाए बिसरामा ॥१॥
ओइ बिखादी दोखीआ ते गुर ते हूटे ॥
हम छूटे अब उन॑ा ते ओइ हम ते छूटे ॥१॥ रहाउ ॥
मेरा तेरा जानता तब ही ते बंधा ॥
गुरि काटी अगिआनता तब छुटके फंधा ॥२॥
जब लगु हुकमु न बूझता तब ही लउ दुखीआ ॥
गुर मिलि हुकमु पछाणिआ तब ही ते सुखीआ ॥३॥
ना को दुसमनु दोखीआ नाही को मंदा ॥
गुर की सेवा सेवको नानक खसमै बंदा ॥४॥१७॥११९॥
हिन्दी अर्थ: आसा महला ५ ॥ हे भाई ! विकारों में गिरने और मोह में फंसने का सबब तब तक बना रहता है जब तक मनुष्य के मन की (माया की खातिर) दौड़-भाग टिकी रहती हैं। पर प्यारे गुरू ने जिस मनुष्य की भटकनें दूर कर दीं उसने मानसिक टिकाव प्राप्त कर लिया। 1। (हे भाई !) ये जितने भी कामादिक झगड़ालू वैरी हैं गुरू की शरण पड़ने से ये सारे ही थक गए है (हमें दुखी करने से बाज आ गए)। अब उनसे हमें निजात मिल गई है।उन सभी ने हमारा पीछा छोड़ दिया है। 1।रहाउ। जब से मनुष्य मेर-तेर (वितकरे) करता चला आ रहा है तब से ही इसे माया के मोह के बंधन पड़े हुए हैं।पर। जब गुरू ने अज्ञानता दूर कर दी तब मोह के फंदों से खलासी मिल गई। 2। हे भाई ! जब तक मनुष्य परमात्मा की रजा को नहीं समझता उतने समय तक ही दुखी रहता है। पर जिसने गुरू की शरण पड़ के परमात्मा की रजा को समझ लिया वह उसी समय से सुखी हो गया। 3। उसे कोई मनुष्य अपना दुश्मन नहीं दिखता। कोई वैरी नहीं प्रतीत होता।कोई उसे बुरा नहीं लगता। हे नानक ! जो मनुष्य गुरू की सेवा करके परमात्मा का सेवक बन जाता है पति-प्रभू का गुलाम बन जाता है।4। 17। 119।
ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਸੂਖ ਸਹਜ ਆਨਦੁ ਘਣਾ ਹਰਿ ਕੀਰਤਨੁ ਗਾਉ ॥
ਗਰਹ ਨਿਵਾਰੇ ਸਤਿਗੁਰੂ ਦੇ ਅਪਣਾ ਨਾਉ ॥੧॥
ਬਲਿਹਾਰੀ ਗੁਰ ਆਪਣੇ ਸਦ ਸਦ ਬਲਿ ਜਾਉ ॥
ਸੂਖ ਸਹਜ ਆਨਦੁ ਘਣਾ ਹਰਿ ਕੀਰਤਨੁ ਗਾਉ ॥
ਗਰਹ ਨਿਵਾਰੇ ਸਤਿਗੁਰੂ ਦੇ ਅਪਣਾ ਨਾਉ ॥੧॥
ਬਲਿਹਾਰੀ ਗੁਰ ਆਪਣੇ ਸਦ ਸਦ ਬਲਿ ਜਾਉ ॥
आसा महला ५ ॥
सूख सहज आनदु घणा हरि कीरतनु गाउ ॥
गरह निवारे सतिगुरू दे अपणा नाउ ॥१॥
बलिहारी गुर आपणे सद सद बलि जाउ ॥
सूख सहज आनदु घणा हरि कीरतनु गाउ ॥
गरह निवारे सतिगुरू दे अपणा नाउ ॥१॥
बलिहारी गुर आपणे सद सद बलि जाउ ॥
हिन्दी अर्थ: आसा महला ५ ॥ मैं परमात्मा के सिफत सालाह के गीत गाता रहता हूँ।और (मेरे अंदर) आत्मिक अडोलता का बड़ा सुख-आनंद बना रहता है। (हे भाई !) गुरू ने मुझे वह हरि-नाम दे के जो नाम वह स्वयं जपता है।ने मेरे पर से (जैसे) नौवों (9) ग्रहों की मुसीबतें दूर कर दी हों। 1। (हे भाई !) मैं अपने गुरू से कुर्बान जाता हूँ।सदा ही सदके जाता हूँ।मैं गुरू से वारने जाता हूँ।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 400 है, राग आसा का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।
M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।
दिल्ली के सुबह 5 बजे के gurdwara में जब रागी पहली पंक्ति गाता है, हवा में एक specific quietness आती है।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 42 पंक्तियों का है, 5 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 400” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: आसा राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 401 →, पीछे का: ← अंग 399।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।