अंग 470, आसा की वार (जनेऊ critique)

SGGS, Ang
470
आसा की वार, पौड़ी 14 और 15
राग: राग आसा · रचयिता: गुरु नानक देव जी · महला 1
पढ़ने का समय: लगभग 3 मिनट
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॥ सलोक मः १ ॥ दइआ कपाह संतोखु सूतु जतु गंढी सतु वटु ॥ एहु जनेऊ जीअ का हई त पाडे घतु ॥ ना एहु तुटै न मलु लगै ना एहु जलै न जाइ ॥ धंनु सु माणस नानका जो गलि चले पाइ ॥ चउकड़ि मुलि अणाइआ बहि चउकै पाइआ ॥ सिखा कंनि चड़ाईआ गुरु ब्राहमणु थिआ ॥ ओहु मुआ ओहु झड़ि पइआ वेतगा गइआ ॥१॥

यह सलोक नानक की सबसे famous radical action का record है, जनेऊ की कथा।

background: हिन्दू tradition में लड़कों को 9-13 साल की उम्र में “जनेऊ” (sacred thread) पहनाया जाता है। यह “द्विज” (twice-born) बनने का ritual है, ख़ास कर ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य के लिए।

नानक 9 साल के थे जब उनके घर पर यह ritual हो रहा था। पंडित जनेऊ ले कर आया। नानक ने पूछा, “यह जनेऊ क्या करता है?” पंडित ने explanation दी। नानक ने refuse किया।

यह उनका refusal था, और साथ में, alternative proposal।

“दइआ कपाह संतोखु सूतु।” “दया” “कपास” है, “संतोष” “सूत” है। “जतु गंढी सतु वटु।” “जत” (self-discipline) “गाँठ” है, “सत” (truth) “बटना” (twist) है।

यानी एक नया जनेऊ proposed है: दया, संतोष, जत, सत के resources से बना।

“एहु जनेऊ जीअ का।” यह “जीव का जनेऊ” है। “हई त पाडे घतु।” “अगर है तो पंडित जी घटाओ” (पहनाओ, या यदि नहीं तो मुझे माफ़ करो)।

यानी “अगर यह असली जनेऊ है तो पहनाओ, बाहर वाला नहीं।”

फिर properties: “ना एहु तुटै, न मलु लगै, ना एहु जलै, न जाइ।” “न यह टूटता, न इस पर मैल लगती, न यह जलता, न यह जाता।”

यानी inner virtues वाला जनेऊ permanent है। बाहर का जनेऊ टूट जाता है, मैला होता है, जलता है, और मरने पर साथ नहीं जाता।

“धंनु सु माणस नानका, जो गलि चले पाइ।” नानक कहते हैं, “धन्य वो आदमी, जो गले में यह डाल कर चले।”

फिर scene continues: “चउकड़ि मुलि अणाइआ।” “चार पैसे की” “क़ीमत” से “मँगाया।” “बहि चउकै पाइआ।” “चौकी पर बैठ कर पहनाया।”

यानी पंडित जो जनेऊ लाया, वो “चार पैसे” का था, और sanctimony से पहनाया गया।

“सिखा कंनि चड़ाईआ, गुरु ब्राहमणु थिआ।” “शिखा” (बच्चे) के “कान” में “चढ़ाई” (whisper), “गुरु ब्राह्मण” “थिर” (positioned) हुआ।

यानी एक ब्राह्मण आ कर गुरु बन गया, बच्चे के कान में फुसफुसा कर।

फिर पंच line: “ओहु मुआ ओहु झड़ि पइआ, वेतगा गइआ।” “वो (आदमी) मरा,” “वो (जनेऊ) झड़ कर गिर गया।” “वेतगा गइआ।” “बिना जनेऊ चला गया।”

पूरी थियेटर का anticlimactic ending। आदमी मरा, जनेऊ शरीर से गिर गया (शरीर के साथ जला), और आत्मा “बिना जनेऊ” चली गई।

तो “जनेऊ” का ritual क्या काम आया?

दिल्ली के context में: हम सब कुछ न कुछ external markers carry करते हैं, status symbols, certifications, brand names। नानक का question, “यह मरने के बाद साथ जाता है?” अगर नहीं, तो असली value क्या?

और एक deeper point: नानक 9 साल के थे जब यह incident हुआ। उन्होंने एक generations-old ritual को बच्चे की सादगी से challenge किया। यह सबसे inspiring है। हम सब “growing up” का मतलब “rituals को accept करना” समझते हैं। नानक exactly opposite किया।

देखें: गीता 17.14-16, “शारीरिक, वाचिक, मानसिक तप” (genuine austerities) · मुंडक उपनिषद् 1.2.7, “प्लवा ह्येते अदृढ़ा यज्ञ-रूपा” (rituals are unstable)
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॥ मः १ ॥ लख चोरीआ लख जारीआ लख कूड़ीआ लख गालि ॥ लख ठगीआ पहिनामीआ रात दिनसु जीअ नालि ॥ तगु कपाहहु कतीऐ बामण्ण वटे आइ ॥ कुहि बकरा रिंनि्ह खाइआ सभु को आखै पाइ ॥ होइ पुराणा सुटीऐ भी फिरि पाईऐ होरु ॥ नानक तगु न तुटई जे तगि होवै जोरु ॥२॥

दूसरा सलोक भी जनेऊ पर है। नानक continue critique।

“लख चोरीआ लख जारीआ।” “लाख चोरियाँ, लाख जारियाँ (व्यभिचार)।” “लख कूड़ीआ लख गालि।” “लाख झूठ, लाख गालियाँ।” “लख ठगीआ पहिनामीआ।” “लाख ठगियाँ, बदनामियाँ।” “रात दिनसु जीअ नालि।” “रात-दिन जीव के साथ।”

जो आदमी ये सब करता है, उसके बारे में बात हो रही है।

“तगु कपाहहु कतीऐ।” “धागा कपास से काता जाता है।” “बामण्ण वटे आइ।” “ब्राह्मण आ कर बटता” है।

यानी एक ritual में, पंडित बैठ कर जनेऊ बनाता है, सूत से।

“कुहि बकरा रिंनि्ह खाइआ।” “बकरा काट कर पकाया जाता है।” “सभु को आखै पाइ।” “सब कहते हैं, पहन लो।”

विडंबना: एक side पर जनेऊ “pure” है ritual में, दूसरे side पर बकरा कट रहा है दावत के लिए। यह hypocrisy है।

“होइ पुराणा सुटीऐ, भी फिरि पाईऐ होरु।” “पुराना” होने पर “फेंक” दिया, “फिर दूसरा पहन लिया।”

यानी जनेऊ replaceable है। टूट गया, नया ले लो। यह permanence नहीं है।

“नानक तगु न तुटई, जे तगि होवै जोरु।” नानक कहते हैं, “धागा नहीं टूटता, अगर धागे में जोर हो।”

final ज़ोर: असली धागा (inner virtue) टूटता नहीं। बाक़ी सब टूटता है।

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॥ पउड़ी ॥ सचा साहिबु एकु तूं जिनि सचो सचु वरताइआ ॥ जिसु तूं देहि तिसु मिलै सचु ता तिनी सचु कमाइआ ॥ सतिगुरि मिलिऐ सचु पाइआ जिन्ह कै हिरदै सचु वसाइआ ॥ मूरख सचु न जाणन्ही मनमुखी जनमु गवाइआ ॥ विचि दुनीआ काहे आइआ ॥१४॥

पौड़ी 14 एक central question पर है, ज़िंदगी का purpose क्या है?

“सचा साहिबु एकु तूं।” “सच्चा साहिब एक तू।” “जिनि सचो सचु वरताइआ।” जिसने “सच्चा सच” “फैलाया।”

opening एक familiar refrain है, एक सच, एक साहिब।

“जिसु तूं देहि तिसु मिलै सचु।” जिसको तू देता है, उसको “सच” मिलता है। “ता तिनी सचु कमाइआ।” तब उसने “सच कमाया।”

यानी सच पाना भी कृपा से होता है, और कृपा मिलने पर ही “सच कमाया” जाता है।

“सतिगुरि मिलिऐ सचु पाइआ।” “सतगुरु मिलने पर” “सच पाया।” “जिन्ह कै हिरदै सचु वसाइआ।” “जिनके हृदय में सच वसाया।”

मार्ग साफ़ है, सतगुरु → सच → हृदय में स्थापन।

“मूरख सचु न जाणन्ही, मनमुखी जनमु गवाइआ।” “मूर्ख सच नहीं जानते, मनमुखी (अपनी मर्ज़ी पर चलने वाले) जन्म गँवाते हैं।”

opposite path: सतगुरु को छोड़ कर अपनी मर्ज़ी से चलना, यह “जनम गँवाना” है।

closing: “विचि दुनीआ काहे आइआ।” “दुनिया में क्यों आए”?

यह सबसे direct existential question है। यदि तू सच नहीं पा रहा, गुरु से नहीं जुड़ रहा, हृदय में नहीं वसा रहा, तो “क्यों आया दुनिया में”?

दिल्ली में हम सब बहुत busy हैं ज़िंदगी “जीने” में। मगर “क्यों आए” यह सवाल क्या कभी रुक कर पूछते हैं? नानक कह रहे हैं, यही पहला सवाल है।