अंग 399

अंग
399
राग आसा
राग: आसा · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਸੀਤਲੁ ਹਰਿ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਸਿਮਰਤ ਤਪਤਿ ਜਾਇ ॥੩॥
ਸੂਖ ਸਹਜ ਆਨੰਦ ਘਣਾ ਨਾਨਕ ਜਨ ਧੂਰਾ ॥
ਕਾਰਜ ਸਗਲੇ ਸਿਧਿ ਭਏ ਭੇਟਿਆ ਗੁਰੁ ਪੂਰਾ ॥੪॥੧੦॥੧੧੨॥
सीतलु हरि हरि नामु सिमरत तपति जाइ ॥३॥
सूख सहज आनंद घणा नानक जन धूरा ॥
कारज सगले सिधि भए भेटिआ गुरु पूरा ॥४॥१०॥११२॥

हिन्दी अर्थ: उस परमात्मा का नाम (मन में) ठंड डालने वाला है।उसका नाम सिमरने से (मन में से तृष्णा की) तपश बुझ जाती है। 3। जो मनुष्य संत-जनों के चरणों की धूड़ में टिका रहता है उसे आत्मिक अडोलता के बहुत सुख-आनंद प्राप्त हुए रहते हैं। हे नानक ! (कह,) जिस मनुष्य को पूरा गुरू मिल जाता है।उसे सारे काम-काजों में सफलता मिलती है। 4। 10। 1112।
ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਗੋਬਿੰਦੁ ਗੁਣੀ ਨਿਧਾਨੁ ਗੁਰਮੁਖਿ ਜਾਣੀਐ ॥
ਹੋਇ ਕ੍ਰਿਪਾਲੁ ਦਇਆਲੁ ਹਰਿ ਰੰਗੁ ਮਾਣੀਐ ॥੧॥
ਆਵਹੁ ਸੰਤ ਮਿਲਾਹ ਹਰਿ ਕਥਾ ਕਹਾਣੀਆ ॥
ਅਨਦਿਨੁ ਸਿਮਰਹ ਨਾਮੁ ਤਜਿ ਲਾਜ ਲੋਕਾਣੀਆ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਜਪਿ ਜਪਿ ਜੀਵਾ ਨਾਮੁ ਹੋਵੈ ਅਨਦੁ ਘਣਾ ॥
ਮਿਥਿਆ ਮੋਹੁ ਸੰਸਾਰੁ ਝੂਠਾ ਵਿਣਸਣਾ ॥੨॥
ਚਰਣ ਕਮਲ ਸੰਗਿ ਨੇਹੁ ਕਿਨੈ ਵਿਰਲੈ ਲਾਇਆ ॥
ਧੰਨੁ ਸੁਹਾਵਾ ਮੁਖੁ ਜਿਨਿ ਹਰਿ ਧਿਆਇਆ ॥੩॥
ਜਨਮ ਮਰਣ ਦੁਖ ਕਾਲ ਸਿਮਰਤ ਮਿਟਿ ਜਾਵਈ ॥
ਨਾਨਕ ਕੈ ਸੁਖੁ ਸੋਇ ਜੋ ਪ੍ਰਭ ਭਾਵਈ ॥੪॥੧੧॥੧੧੩॥
आसा महला ५ ॥
गोबिंदु गुणी निधानु गुरमुखि जाणीऐ ॥
होइ क्रिपालु दइआलु हरि रंगु माणीऐ ॥१॥
आवहु संत मिलाह हरि कथा कहाणीआ ॥
अनदिनु सिमरह नामु तजि लाज लोकाणीआ ॥१॥ रहाउ ॥
जपि जपि जीवा नामु होवै अनदु घणा ॥
मिथिआ मोहु संसारु झूठा विणसणा ॥२॥
चरण कमल संगि नेहु किनै विरलै लाइआ ॥
धंनु सुहावा मुखु जिनि हरि धिआइआ ॥३॥
जनम मरण दुख काल सिमरत मिटि जावई ॥
नानक कै सुखु सोइ जो प्रभ भावई ॥४॥११॥११३॥

हिन्दी अर्थ: आसा महला ५ ॥ (हे संत जनो !) परमात्मा सारे गुणों का खजाना है।गुरू की शरण पड़ के ही उसके साथ गहरी सांझ डाली जा सकती है। अगर वह प्रभू दयावान हो प्रसन्न हो जाए तो उसका प्रेम (-आनंद) पाया जा सकता है। 1। हे संत जनो ! आओ।हम इकट्ठे बैठें और परमात्मा की सिफत सालाह की बातें करें। लोक-लाज छोड़ के हर वक्त उसका नाम सिमरते रहें। 1।रहाउ। (हे संत जनो !) मैं तो ज्यों-ज्यों (परमातमा का) नाम जपता हूँ मेरे अंदर आत्मिक जीवन पैदा होता है मेरे अंदर बड़ा आनंद पैदा होता है (उस वक्त मुझे प्रत्यक्ष अनुभव होता है कि) संसार (का मोह) व्यर्थ मोह है। संसार सदा कायम रहने वाला नहीं।संसार तो नाश हो जाने वाला है (इसके मोह में से सुख-आनंद कैसे मिले। )। 2। (पर हे संत जनों !) किसी विरले (भाग्यशाली) मनुष्य ने परमात्मा के सुंदर कोमल चरणों से प्यार डाला है जिस ने (जिसने ये प्यार डाला है) परमात्मा का नाम सिमरा है उसका मुखड़ा भाग्यशाली है। उसका मुंह सुहाना लगता है। 3। (हे संत जनो !) परमात्मा का नाम सिमरने से जनम-मरण (के चक्करों) का दुख मिट जाता है। (हे संत जनो !) जो कुछ प्रभू को अच्छा लगता है (वही ठीक है।ये निश्चय जो सिमरन की बरकति से पैदा होता है) नानक के हृदय में आनंद (पैदा किए रखता है)। 4। 11। 113।
ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਆਵਹੁ ਮੀਤ ਇਕਤ੍ਰ ਹੋਇ ਰਸ ਕਸ ਸਭਿ ਭੁੰਚਹ ॥
ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਨਾਮੁ ਹਰਿ ਹਰਿ ਜਪਹ ਮਿਲਿ ਪਾਪਾ ਮੁੰਚਹ ॥੧॥
ਤਤੁ ਵੀਚਾਰਹੁ ਸੰਤ ਜਨਹੁ ਤਾ ਤੇ ਬਿਘਨੁ ਨ ਲਾਗੈ ॥
ਖੀਨ ਭਏ ਸਭਿ ਤਸਕਰਾ ਗੁਰਮੁਖਿ ਜਨੁ ਜਾਗੈ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਬੁਧਿ ਗਰੀਬੀ ਖਰਚੁ ਲੈਹੁ ਹਉਮੈ ਬਿਖੁ ਜਾਰਹੁ ॥
ਸਾਚਾ ਹਟੁ ਪੂਰਾ ਸਉਦਾ ਵਖਰੁ ਨਾਮੁ ਵਾਪਾਰਹੁ ॥੨॥
ਜੀਉ ਪਿੰਡੁ ਧਨੁ ਅਰਪਿਆ ਸੇਈ ਪਤਿਵੰਤੇ ॥
ਆਪਨੜੇ ਪ੍ਰਭ ਭਾਣਿਆ ਨਿਤ ਕੇਲ ਕਰੰਤੇ ॥੩॥
ਦੁਰਮਤਿ ਮਦੁ ਜੋ ਪੀਵਤੇ ਬਿਖਲੀ ਪਤਿ ਕਮਲੀ ॥
ਰਾਮ ਰਸਾਇਣਿ ਜੋ ਰਤੇ ਨਾਨਕ ਸਚ ਅਮਲੀ ॥੪॥੧੨॥੧੧੪॥
आसा महला ५ ॥
आवहु मीत इकत्र होइ रस कस सभि भुंचह ॥
अंम्रित नामु हरि हरि जपह मिलि पापा मुंचह ॥१॥
ततु वीचारहु संत जनहु ता ते बिघनु न लागै ॥
खीन भए सभि तसकरा गुरमुखि जनु जागै ॥१॥ रहाउ ॥
बुधि गरीबी खरचु लैहु हउमै बिखु जारहु ॥
साचा हटु पूरा सउदा वखरु नामु वापारहु ॥२॥
जीउ पिंडु धनु अरपिआ सेई पतिवंते ॥
आपनड़े प्रभ भाणिआ नित केल करंते ॥३॥
दुरमति मदु जो पीवते बिखली पति कमली ॥
राम रसाइणि जो रते नानक सच अमली ॥४॥१२॥११४॥

हिन्दी अर्थ: आसा महला ५ ॥ हे मित्र ! आओ।मिल के आत्मिक जीवन देने वाला हरि-नाम जपें (और नाम की बरकति से अपने सारे) पाप नाश कर लें- यही धन जैसे सारे स्वादिष्ट पदार्थ आओये सारे स्वादिष्ट व्यंजन खाएं। 1। हे संत जनो ! ये सोचा करो कि मनुष्य जीवन का असल मनोरथ क्या है।इस प्रयास से (जीवन यात्रा में) कोई रुकावट नहीं पडती। कामादिक सारे चोर नाश हो जाते हैं (क्योंकि) गुरू की शरण पड़ने से मनुष्य (इन चोरों के हमलों से) सुचेत रहता है। 1।रहाउ। हे संत जनो ! विनम्रता वाली बुद्धि धारण करो- ये जीवन-यात्रा का खर्च पल्ले बाँधो।(नाम की बरकति से अपने अंदर से) अहंकार को जला दो (जो आत्मिक जीवन को समाप्त कर देने वाला) जहर (है)। (हे संत जनो ! हरि-नाम गुरू से मिलता है।गुरू का घर ही) सदा कायम रहने वाली दुकान है (गुरू-दर से ही हरि नाम का) पूरा सौदा मिलता है (गुरू दर से) नाम-सौदा खरीदो। 2। (हे संत जनो ! जिन मनुष्यों ने हरी-नाम-धन खरीदने के लिए) अपनी जिंद।अपना शरीर।अपना दुनियावी धन भेटा कर दिया वह मनुष्य (लोक-परलोक में) आदरणीय हो गए। वे अपने परमात्मा को प्यारे लगने लग पड़े।वे सदा आत्मिक आनंद पाने लग गए। 3। (हे संत जनो !) खोटी मति (जैसे) शराब है जो मनुष्य ये शराब पीने लग जाते हैं (जो गुरू का आसरा छोड़ के खोटी मति के पीछे चलने लग जाते हैं) वे दुराचारी हो जाते हैं वे (विकारों में) पागल हो जाते हैं।पर। हे नानक ! जो मनुष्य परमात्मा के नाम के श्रेष्ठ रस में मस्त रहते हैं उनको सदा-स्थिर रहने वाले परमात्मा के नाम का अमल लग जाता है। 4। 12। 114।
ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਉਦਮੁ ਕੀਆ ਕਰਾਇਆ ਆਰੰਭੁ ਰਚਾਇਆ ॥
ਨਾਮੁ ਜਪੇ ਜਪਿ ਜੀਵਣਾ ਗੁਰਿ ਮੰਤ੍ਰੁ ਦ੍ਰਿੜਾਇਆ ॥੧॥
ਪਾਇ ਪਰਹ ਸਤਿਗੁਰੂ ਕੈ ਜਿਨਿ ਭਰਮੁ ਬਿਦਾਰਿਆ ॥
ਕਰਿ ਕਿਰਪਾ ਪ੍ਰਭਿ ਆਪਣੀ ਸਚੁ ਸਾਜਿ ਸਵਾਰਿਆ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਕਰੁ ਗਹਿ ਲੀਨੇ ਆਪਣੇ ਸਚੁ ਹੁਕਮਿ ਰਜਾਈ ॥
ਜੋ ਪ੍ਰਭਿ ਦਿਤੀ ਦਾਤਿ ਸਾ ਪੂਰਨ ਵਡਿਆਈ ॥੨॥
ਸਦਾ ਸਦਾ ਗੁਣ ਗਾਈਅਹਿ ਜਪਿ ਨਾਮੁ ਮੁਰਾਰੀ ॥
ਨੇਮੁ ਨਿਬਾਹਿਓ ਸਤਿਗੁਰੂ ਪ੍ਰਭਿ ਕਿਰਪਾ ਧਾਰੀ ॥੩॥
ਨਾਮੁ ਧਨੁ ਗੁਣ ਗਾਉ ਲਾਭੁ ਪੂਰੈ ਗੁਰਿ ਦਿਤਾ ॥
ਵਣਜਾਰੇ ਸੰਤ ਨਾਨਕਾ ਪ੍ਰਭੁ ਸਾਹੁ ਅਮਿਤਾ ॥੪॥੧੩॥੧੧੫॥
आसा महला ५ ॥
उदमु कीआ कराइआ आरंभु रचाइआ ॥
नामु जपे जपि जीवणा गुरि मंत्रु द्रिड़ाइआ ॥१॥
पाइ परह सतिगुरू कै जिनि भरमु बिदारिआ ॥
करि किरपा प्रभि आपणी सचु साजि सवारिआ ॥१॥ रहाउ ॥
करु गहि लीने आपणे सचु हुकमि रजाई ॥
जो प्रभि दिती दाति सा पूरन वडिआई ॥२॥
सदा सदा गुण गाईअहि जपि नामु मुरारी ॥
नेमु निबाहिओ सतिगुरू प्रभि किरपा धारी ॥३॥
नामु धनु गुण गाउ लाभु पूरै गुरि दिता ॥
वणजारे संत नानका प्रभु साहु अमिता ॥४॥१३॥११५॥

हिन्दी अर्थ: आसा महला ५ ॥ (हे भाई !) जैसे गुरू ने उद्यम करने की प्रेरणा की है वैसे ही मैंने उद्यम किया है और परमात्मा का नाम जपने के उद्यम का आरम्भ मैंने कर दिया है। गुरू ने मेरे हृदय में नाम-मंत्र पक्का करके टिका दिया है।अब नाम जप-जपके मुझे आत्मिक जीवन मिल गया है। 1। (हे भाई ! आओ) उस गुरू के चरणों में ढह पड़ें जिसने हमारे मन की भटकना नाश कर दी है। (गुरू की बरकति के साथ ही) परमात्मा ने अपनी कृपा करके (अपना) सदा-स्थिर नाम (जपने का रास्ता) चला के हमारा जीवन सुंदर बना दिया है। 1।रहाउ। (हे भाई !) वह रजा का मालिक परमात्मा सदा कायम रहने वाला है उसने अपने हुकम में मेरा हाथ पकड़ के मुझे अपने चरणों में लीन कर लिया है। (अपने नाम की) जो दाति मुझे दी है वही मेरे वास्ते सबसे बड़ा आदर-मान है। 2। (हे भाई ! अब मेरे दिल में) सदा ही परमात्मा के गुण गाए जा रहे हैं।मैं सदा परमात्मा का नाम जपता रहता हूँ। प्रभू ने मेहर की है।गुरू मेरा (नाम जपने का) नियम सफल कर रहा है। 3। (हे भाई ! अब) परमात्मा का नाम ही (मेरा) धन है।मैं सदा परमात्मा के गुण गाता रहता हूँ पूरे गुरू ने मुझे (मानस जनम में किए जाने वाले वणज का ये) लाभ दिया है। हे नानक ! (कह, हे भाई ! नाम-रस का) शाहूकार परमात्मा बेअंत ताकत का मालिक है उसके संत-जन (उसकी मेहर से ही उसके नाम के) बंजारे हैं (मानस जनम का लाभ हासिल करने के लिए संत-जनों की शरण पड़ना चाहिए)। 4। 13। 115।
ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਜਾ ਕਾ ਠਾਕੁਰੁ ਤੁਹੀ ਪ੍ਰਭ ਤਾ ਕੇ ਵਡਭਾਗਾ ॥
ਓਹੁ ਸੁਹੇਲਾ ਸਦ ਸੁਖੀ ਸਭੁ ਭ੍ਰਮੁ ਭਉ ਭਾਗਾ ॥੧॥
ਹਮ ਚਾਕਰ ਗੋਬਿੰਦ ਕੇ ਠਾਕੁਰੁ ਮੇਰਾ ਭਾਰਾ ॥
ਕਰਨ ਕਰਾਵਨ ਸਗਲ ਬਿਧਿ ਸੋ ਸਤਿਗੁਰੂ ਹਮਾਰਾ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਦੂਜਾ ਨਾਹੀ ਅਉਰੁ ਕੋ ਤਾ ਕਾ ਭਉ ਕਰੀਐ ॥
आसा महला ५ ॥
जा का ठाकुरु तुही प्रभ ता के वडभागा ॥
ओहु सुहेला सद सुखी सभु भ्रमु भउ भागा ॥१॥
हम चाकर गोबिंद के ठाकुरु मेरा भारा ॥
करन करावन सगल बिधि सो सतिगुरू हमारा ॥१॥ रहाउ ॥
दूजा नाही अउरु को ता का भउ करीऐ ॥

हिन्दी अर्थ: आसा महला ५ ॥ हे प्रभू ! तू खुद ही जिस मनुष्य के सिर पर मालिक है उसके बड़े भाग्य (समझने चाहिए)। वह सदा आसान (जीवन व्यतीत करता) है वह सदा सुखी (रहता) है उसका हरेक किस्म का डर और भरम दूर हो जाता है। 1। (हे भाई !) मैं उस गोबिंद का सेवक हूँ मेरा वह मालिक है जो सबसे बड़ा है जो (सब जीवों में व्यापक हो के स्वयं ही) सारे तरीकों से (सब कुछ) करने वाला है।और (जीवों से) कराने वाला है।वही मेरा गुरू है (मेरे जीवन राह में रौशनी देने वाला है)। 1।रहाउ। (हे भाई ! जगत में) परमात्मा के बराबर का और कोई नहीं है जिसका डर माना जाए।

संदर्भ: यह अंग 399 है, राग आसा का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।

M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।

Vasant-Panchami की सुबह, सरस्वती-pooja, बच्चों का पीला कुर्ता।

ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।

यह अंग कुल 42 पंक्तियों का है, 5 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 399” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।

राग के context में: आसा राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।

पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।

अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।

“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।

नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।

अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।

तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।

हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।

ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।

दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।

“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।

हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।

अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।

आगे का अंग: अंग 400 →, पीछे का: ← अंग 398

हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।

(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)

शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।

संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।

शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।

संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।

एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।

अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।

स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।