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अंग 413

अंग
413
राग आसा
राग: आसा · रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
सुखु मानै भेटै गुर पीरु ॥
एको साहिबु एकु वजीरु ॥5॥
जगु बंदी मुकते हउ मारी ॥
जगि गिआनी विरला आचारी ॥
जगि पंडितु विरला वीचारी ॥
बिनु सतिगुरु भेटे सभ फिरै अहंकारी ॥6॥
जगु दुखीआ सुखीआ जनु कोइ ॥
जगु रोगी भोगी गुण रोइ ॥
जगु उपजै बिनसै पति खोइ ॥
गुरमुखि होवै बूझै सोइ ॥7॥
महघो मोलि भारि अफारु ॥
अटल अछलु गुरमती धारु ॥
भाइ मिलै भावै भइकारु ॥
नानकु नीचु कहै बीचारु ॥8॥3॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।

हिन्दी अर्थ: जिस मनुष्य को (आपकी मेहर से) गुरू-पीर मिल जाता है।वह (आपके मिलाप का आत्मिक) आनंद पाता है। आप खुद ही खुद बादशाह है और स्वयं ही अपना (सलाहकार) मंत्री है। 5। (हे भाई ! उस सदा स्थिर प्रभू को विसार के) जगत (अहंकार की) कैद में है।इस कैद में से आजाद वही हैं (जिन्होंने गुरू की शरण पड़ के इस) अहंकार को मारा है। जगत में ज्ञानवान कोई विरला वही है।जिसका नित्य आचरण उस ज्ञान के अनुसार है। जगत में पण्डित भी कोई विरला ही है जो (विद्या के अनुसार ही) विचारवान भी है। (पर) ये ऊँचा आचरण और ऊँचे विचार गुरू से ही मिलते हैं।गुरू को मिले बिना सारी सृष्टि अहंकार में भटकती फिरती है। 6। (हे भाई ! उस सदा स्थिर प्रभू को विसार के) जगत दुखी हो रहा है।कोई विरला मनुष्य ही सुखी है। जगत (विकारों के कारण आत्मिक तौर पर) रोगी हो रहा है।भोगों में प्रर्वित है और आत्मिक गुणों के लिए तरसता है। (प्रभू को भुला के) जगत इज्जत गवा के पैदा होता है मरता है।मरता है पैदा होता है। जो मनुष्य गुरू की शरण में आता है।वह इस भेद को समझता है। 7। यदि कोई मूल्य दे कर परमात्मा को प्राप्त करना हो तो वह मूल्य बहुत ही ज्यादा है (दिया नहीं जा सकता) अगर उसके बराबर की कोई चीज दे के उसे हासिल करना हो तो कोई चीज उसके बराबर की नहीं।(हे भाई !) गुरू की मति ले के उसको (अपने हृदय में) संभाल के रख। (गुरू की मति ये है कि) वह प्रभू प्रेम से (प्रेम के मूल्य) मिलता है।जीव का उसके डर-अदब में रहना उसको अच्छा लगता है। 8। 3। (हे भाई ! गरीब नानक आपको ये विचार की बात बताता है कि)
आसा महला 1 ॥
एकु मरै पंचे मिलि रोवहि ॥
हउमै जाइ सबदि मलु धोवहि ॥
समझि सूझि सहज घरि होवहि ॥
बिनु बूझे सगली पति खोवहि ॥1॥
कउणु मरै कउणु रोवै ओही ॥
करण कारण सभसै सिरि तोही ॥1॥ रहाउ ॥
मूए कउ रोवै दुखु कोइ ॥
सो रोवै जिसु बेदन होइ ॥
जिसु बीती जाणै प्रभ सोइ ॥
आपे करता करे सु होइ ॥2॥
जीवत मरणा तारे तरणा ॥
जै जगदीस परम गति सरणा ॥
हउ बलिहारी सतिगुर चरणा ॥
गुरु बोहिथु सबदि भै तरणा ॥3॥
निरभउ आपि निरंतरि जोति ॥
बिनु नावै सूतकु जगि छोति ॥
दुरमति बिनसै किआ कहि रोति ॥
जनमि मूए बिनु भगति सरोति ॥4॥
मूए कउ सचु रोवहि मीत ॥
त्रै गुण रोवहि नीता नीत ॥
दुखु सुखु परहरि सहजि सुचीत ॥
तनु मनु सउपउ क्रिसन परीति ॥5॥
भीतरि एकु अनेक असंख ॥
करम धरम बहु संख असंख ॥
बिनु भै भगती जनमु बिरंथ ॥
हरि गुण गावहि मिलि परमारंथ ॥6॥
आपि मरै मारे भी आपि ॥
आपि उपाए थापि उथापि ॥
स्रिसटि उपाई जोती तू जाति ॥
सबदु वीचारि मिलणु नही भ्राति ॥7॥
सूतकु अगनि भखै जगु खाइ ॥
सूतकु जलि थलि सभ ही थाइ ॥
नानक सूतकि जनमि मरीजै ॥
गुर परसादी हरि रसु पीजै ॥8॥4॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।

हिन्दी अर्थ: आसा महला 1 ॥ वे इस समझ में (कि सब में प्रभू की ही ज्योति है।किसी संबंधी के शरीर के नाश होने पर) अडोल अवस्था में टिके रहते हैं। पर जो मनुष्य गुरू के शबद में जुड़ के मोह की मैल अपने मन से धो लेते हैं।उनका अहंकार दूर हो जाता है। एक (प्राणी) मरता है उसके साक-संबंधी मिल के रोते हैं।ये भूल के (कि परमात्मा के बिना कोई बेगाना है ही नहीं। रोने वाले उस परमातमा की नजर में अपनी) सारी इज्जत गवा लेते हैं। 1। ना कोई मरता है और ना ही कोई (मरे को) ‘वह वह’ कह के रोता है। (जिसका शरीर बिनसता है वह भी आप स्वयं ही है और रोने वाला भी आप खुद ही है) हे प्रभू ! हे सारे जगत के करतार ! हरेक जीव के सिर पर आप स्वयं ही है। 1।रहाउ। जो कोई मरे हुए को रोता है वह (असल में अपना) दुख-मुश्किलें फरोलता है। वह ही रोता है जिसे (किसी के मरने पर कोई) बिपता आ वापरती है। पर जिस जीव पर (मौत की घटना) वरतती है। वह प्रभू की ये रजा समझ लेता है कि वही कुछ हो रहा है जो करतार स्वयं करता है। 2। (दरअसल। जीने की तमन्ना मनुष्य को संसार के मोह में फसाती है) जीने की लालसा से मन का मर जाना (मोह-सागर से) तैरने के लिए।मानो बेड़ी है। ये ऊँची आत्मिक अवस्था जगत के मालिक प्रभू की शरण पड़ने से प्राप्त होती है। (प्रभू की शरण गुरू के द्वारा ही प्राप्त होती है) मैं गुरू के चरनों से सदके हूँ। गुरू मानो जहाज है।गुरू के शबद में जुड़ के भव-सागर से पार लांघ सकते हैं। 3। परमात्मा को कोई डर छू नहीं सकता।वह स्वयं एक-रस हरेक के अंदर अपनी ज्योति का प्रकाश कर रहा है। पर उसके नाम से टूटने के कारण जगत में कहीं सूतक (का भ्रम) है तो कहीं छूत है। दुर्मिर्त के कारण जगत आत्मिक मौत मर रहा है।(इस बारे) क्या कह के कोई रोए। परमात्मा की भक्ति के बिना।प्रभू की सिफत सालाह सुने बिना।जीव जनम-मरण के चक्कर में पड़ रहे हैं। 4। स्वै भाव से मरे हुए को सचमुच उसके (पहले) मित्र रोते हैं माया के तीनों गुण नित्य रोते हैं (कि हमारा साथ छोड़ गया है)। क्योंकि वह दुख-सुख (का अहसास) त्याग के अडोल अवस्था में सचेत हो गया है। और उसने अपना तन और मन परमात्मा की प्रीति पर भेटा कर दिया है। 5। सबके अंदर एक परमात्मा बस रहा है।वह अनेकों असंखो रूपों में दिखाई दे रहा है। (पर जीवों ने उसको बिसार के) और ही बेअंत धर्म-कर्म रच लिए हैं। परमात्मा के डर-अदब में रहने के बिना।प्रभू की भक्ति के बिना।जीवों का मानस जनम व्यर्थ जाता है। जो मिल के हरी के गुण गाते हैं।वे मानस जनम का मनोरथ हासिल कर लेते हैं। 6। (जीवों का रचनहार करतार सब जीवों के अंदर आप मौजूद है।सो।जब कोई जीव मरता है तो) परमात्मा (उसमें बैठा खुद ही।मानो) मरता है। उस जीव को मारता भी खुद ही है।प्रभू स्वयं ही पैदा करता है।पैदा करके स्वयं ही नाश करता है। हे ज्योति-रूपी प्रभू ! तूने स्वयं ही सृष्टि पैदा करी है।तूने खुद ही अनेकों जातियां पैदा कर दी हैं। परमात्मा की सिफत सालाह की बाणी को विचार के (मन में टिका के) जीव का उससे मिलाप हो जाता है।जीव को (सूतक-छूत आदि की कोई) भटकना नहीं रहती। 7। (परमात्मा स्वयं ही सब जीवों में व्यापक हो के पैदा होता है मरता है।सर्व-व्यापक प्रभू से विछुड़ों को सूतक का भ्रम दुखी करता है।सूतक का भ्रम कहाँ-कहाँ किया जाएगा।) आग में भी (फिर) सूतक है जो भड़कती है और जगत (के जीवों) को भस्म कर जाती है। सूतक पानी में है।सूतक धरती में है।सूतक हर जगह ही है (क्योंकि।हर जगह जीव पैदा होते मरते हैं)। हे नानक ! सूतक (के भ्रम) में पड़ के (परमात्मा के अस्तित्व से टूट के) जगत जनम-मरण के चक्कर में पड़ रहा है। (सही रास्ता ये है कि गुरू की शरण पड़ के) गुरू की मेहर प्राप्त करके परमात्मा के नाम का अमृत-रस पीना चाहिए। 8। 4।
रागु आसा महला 1 ॥
आपु वीचारै सु परखे हीरा ॥
एक द्रिसटि तारे गुर पूरा ॥
गुरु मानै मन ते मनु धीरा ॥1॥
ऐसा साहु सराफी करै ॥
साची नदरि एक लिव तरै ॥1॥ रहाउ ॥
पूंजी नामु निरंजन सारु ॥
निरमलु साचि रता पैकारु ॥
सिफति सहज घरि गुरु करतारु ॥2॥
आसा मनसा सबदि जलाए ॥
राम नराइणु कहै कहाए ॥
गुर ते वाट महलु घरु पाए ॥3॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।

हिन्दी अर्थ: रागु आसा महला 1 ॥ वह अपने आप को (अपने जीवन को) विचारता और परमात्मा के श्रेष्ठ नाम की कद्र पहचानता है। जिस मनुष्य को पूरा गुरू एक (मेहर की) निगाह से (मोह के समुंद्र से) पार लंघाता है। जो मनुष्य सच्चे दिल से गुरू पर श्रद्धा रखता है।उसका मन (माया के मोह में) डोलता नहीं। 1। गुरू ऐसा शाह (सर्राफ) है।और ऐसी सर्राफी करता है (कि वह जीवों को तुरंत परख लेता है। और) उसकी कभी गलती ना खाने वाली मेहर की निगाह से जीव एक परमात्मा में सुरति जोड़ के (मोह के समुंद्र से) पार लांघ जाता है। 1।रहाउ। (गुरू की कृपा से) जो मनुष्य निरंजन प्रभू के श्रेष्ठ नाम को (अपने आत्मिक जीवन की) राशि-पूँजी बनाता है। जो सदा-स्थिर प्रभू (के नाम-रंग) में रंगा रहता है वह पवित्र (जीवन वाला) हो जाता है।वह नियारिए की तरह पारखू बन जाता है। सिफत सालाह की बरकति से वह गुरू करतार को अपने अडोल हृदय-घर में बसाता है। 2। वह गुरू के शबद द्वारा (अपने अंदर से) मायावी आशाएं और मायावी फुरने जला देता है। वह स्वयं परमात्मा का भजन करता है और औरों को भी इसी तरफ प्रेरित करता है। जो मनुष्य गुरू से (जिंदगी का सही) रास्ता ढूँढ लेता है।परमात्मा का महल-घर पा लेता है।3।

आसा राग में एक भोर की हलकी ताज़गी है। आसा दी वार इसी राग में बँधी, और सिख-संगीत के परिदृश्य को आकार दिया। हर सुबह, अमृतसर के हरमंदिर साहिब में, यही राग खुलता है। आसा राग का क्षेत्र है। ‘आसा दी वार’ की रचना गुरु नानक की है, बाद में गुरु अंगद और गुरु अर्जन के साथ संगठित हुई।

गुरु नानक की वाणी का अपना मिज़ाज है, सीधा-सादा, बिना अलंकार के, मगर हर पंक्ति में एक ठहराव। 1469 में तलवण्डी में जन्म, सुलतानपुर के बहीखाते में कुछ साल काम, फिर तीस की उम्र के क़रीब वो लम्बी पैदल यात्रा जो काबुल, बग़दाद, मक्का, जगन्नाथ-पुरी, तिब्बत की सरहद तक उन्हें ले गयी। उनके शबद इन्हीं यात्राओं की वाणी हैं।

इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “जिस मनुष्य को (आपकी मेहर से) गुरू-पीर मिल जाता है।”

एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
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