अंग 413

अंग
413
राग आसा
राग: आसा · रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਸੁਖੁ ਮਾਨੈ ਭੇਟੈ ਗੁਰ ਪੀਰੁ ॥
ਏਕੋ ਸਾਹਿਬੁ ਏਕੁ ਵਜੀਰੁ ॥੫॥
ਜਗੁ ਬੰਦੀ ਮੁਕਤੇ ਹਉ ਮਾਰੀ ॥
ਜਗਿ ਗਿਆਨੀ ਵਿਰਲਾ ਆਚਾਰੀ ॥
ਜਗਿ ਪੰਡਿਤੁ ਵਿਰਲਾ ਵੀਚਾਰੀ ॥
ਬਿਨੁ ਸਤਿਗੁਰੁ ਭੇਟੇ ਸਭ ਫਿਰੈ ਅਹੰਕਾਰੀ ॥੬॥
ਜਗੁ ਦੁਖੀਆ ਸੁਖੀਆ ਜਨੁ ਕੋਇ ॥
ਜਗੁ ਰੋਗੀ ਭੋਗੀ ਗੁਣ ਰੋਇ ॥
ਜਗੁ ਉਪਜੈ ਬਿਨਸੈ ਪਤਿ ਖੋਇ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਹੋਵੈ ਬੂਝੈ ਸੋਇ ॥੭॥
ਮਹਘੋ ਮੋਲਿ ਭਾਰਿ ਅਫਾਰੁ ॥
ਅਟਲ ਅਛਲੁ ਗੁਰਮਤੀ ਧਾਰੁ ॥
ਭਾਇ ਮਿਲੈ ਭਾਵੈ ਭਇਕਾਰੁ ॥
ਨਾਨਕੁ ਨੀਚੁ ਕਹੈ ਬੀਚਾਰੁ ॥੮॥੩॥
सुखु मानै भेटै गुर पीरु ॥
एको साहिबु एकु वजीरु ॥५॥
जगु बंदी मुकते हउ मारी ॥
जगि गिआनी विरला आचारी ॥
जगि पंडितु विरला वीचारी ॥
बिनु सतिगुरु भेटे सभ फिरै अहंकारी ॥६॥
जगु दुखीआ सुखीआ जनु कोइ ॥
जगु रोगी भोगी गुण रोइ ॥
जगु उपजै बिनसै पति खोइ ॥
गुरमुखि होवै बूझै सोइ ॥७॥
महघो मोलि भारि अफारु ॥
अटल अछलु गुरमती धारु ॥
भाइ मिलै भावै भइकारु ॥
नानकु नीचु कहै बीचारु ॥८॥३॥

हिन्दी अर्थ: जिस मनुष्य को (तेरी मेहर से) गुरू-पीर मिल जाता है।वह (तेरे मिलाप का आत्मिक) आनंद पाता है। तू खुद ही खुद बादशाह है और स्वयं ही अपना (सलाहकार) मंत्री है। 5। (हे भाई ! उस सदा स्थिर प्रभू को विसार के) जगत (अहंकार की) कैद में है।इस कैद में से आजाद वही हैं (जिन्होंने गुरू की शरण पड़ के इस) अहंकार को मारा है। जगत में ज्ञानवान कोई विरला वही है।जिसका नित्य आचरण उस ज्ञान के अनुसार है। जगत में पण्डित भी कोई विरला ही है जो (विद्या के अनुसार ही) विचारवान भी है। (पर) ये ऊँचा आचरण और ऊँचे विचार गुरू से ही मिलते हैं।गुरू को मिले बिना सारी सृष्टि अहंकार में भटकती फिरती है। 6। (हे भाई ! उस सदा स्थिर प्रभू को विसार के) जगत दुखी हो रहा है।कोई विरला मनुष्य ही सुखी है। जगत (विकारों के कारण आत्मिक तौर पर) रोगी हो रहा है।भोगों में प्रर्वित है और आत्मिक गुणों के लिए तरसता है। (प्रभू को भुला के) जगत इज्जत गवा के पैदा होता है मरता है।मरता है पैदा होता है। जो मनुष्य गुरू की शरण में आता है।वह इस भेद को समझता है। 7। यदि कोई मूल्य दे कर परमात्मा को प्राप्त करना हो तो वह मूल्य बहुत ही ज्यादा है (दिया नहीं जा सकता) अगर उसके बराबर की कोई चीज दे के उसे हासिल करना हो तो कोई चीज उसके बराबर की नहीं।(हे भाई !) गुरू की मति ले के उसको (अपने हृदय में) संभाल के रख। (गुरू की मति ये है कि) वह प्रभू प्रेम से (प्रेम के मूल्य) मिलता है।जीव का उसके डर-अदब में रहना उसको अच्छा लगता है। 8। 3। (हे भाई ! गरीब नानक तुझे ये विचार की बात बताता है कि)
ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੧ ॥
ਏਕੁ ਮਰੈ ਪੰਚੇ ਮਿਲਿ ਰੋਵਹਿ ॥
ਹਉਮੈ ਜਾਇ ਸਬਦਿ ਮਲੁ ਧੋਵਹਿ ॥
ਸਮਝਿ ਸੂਝਿ ਸਹਜ ਘਰਿ ਹੋਵਹਿ ॥
ਬਿਨੁ ਬੂਝੇ ਸਗਲੀ ਪਤਿ ਖੋਵਹਿ ॥੧॥
ਕਉਣੁ ਮਰੈ ਕਉਣੁ ਰੋਵੈ ਓਹੀ ॥
ਕਰਣ ਕਾਰਣ ਸਭਸੈ ਸਿਰਿ ਤੋਹੀ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਮੂਏ ਕਉ ਰੋਵੈ ਦੁਖੁ ਕੋਇ ॥
ਸੋ ਰੋਵੈ ਜਿਸੁ ਬੇਦਨ ਹੋਇ ॥
ਜਿਸੁ ਬੀਤੀ ਜਾਣੈ ਪ੍ਰਭ ਸੋਇ ॥
ਆਪੇ ਕਰਤਾ ਕਰੇ ਸੁ ਹੋਇ ॥੨॥
ਜੀਵਤ ਮਰਣਾ ਤਾਰੇ ਤਰਣਾ ॥
ਜੈ ਜਗਦੀਸ ਪਰਮ ਗਤਿ ਸਰਣਾ ॥
ਹਉ ਬਲਿਹਾਰੀ ਸਤਿਗੁਰ ਚਰਣਾ ॥
ਗੁਰੁ ਬੋਹਿਥੁ ਸਬਦਿ ਭੈ ਤਰਣਾ ॥੩॥
ਨਿਰਭਉ ਆਪਿ ਨਿਰੰਤਰਿ ਜੋਤਿ ॥
ਬਿਨੁ ਨਾਵੈ ਸੂਤਕੁ ਜਗਿ ਛੋਤਿ ॥
ਦੁਰਮਤਿ ਬਿਨਸੈ ਕਿਆ ਕਹਿ ਰੋਤਿ ॥
ਜਨਮਿ ਮੂਏ ਬਿਨੁ ਭਗਤਿ ਸਰੋਤਿ ॥੪॥
ਮੂਏ ਕਉ ਸਚੁ ਰੋਵਹਿ ਮੀਤ ॥
ਤ੍ਰੈ ਗੁਣ ਰੋਵਹਿ ਨੀਤਾ ਨੀਤ ॥
ਦੁਖੁ ਸੁਖੁ ਪਰਹਰਿ ਸਹਜਿ ਸੁਚੀਤ ॥
ਤਨੁ ਮਨੁ ਸਉਪਉ ਕ੍ਰਿਸਨ ਪਰੀਤਿ ॥੫॥
ਭੀਤਰਿ ਏਕੁ ਅਨੇਕ ਅਸੰਖ ॥
ਕਰਮ ਧਰਮ ਬਹੁ ਸੰਖ ਅਸੰਖ ॥
ਬਿਨੁ ਭੈ ਭਗਤੀ ਜਨਮੁ ਬਿਰੰਥ ॥
ਹਰਿ ਗੁਣ ਗਾਵਹਿ ਮਿਲਿ ਪਰਮਾਰੰਥ ॥੬॥
ਆਪਿ ਮਰੈ ਮਾਰੇ ਭੀ ਆਪਿ ॥
ਆਪਿ ਉਪਾਏ ਥਾਪਿ ਉਥਾਪਿ ॥
ਸ੍ਰਿਸਟਿ ਉਪਾਈ ਜੋਤੀ ਤੂ ਜਾਤਿ ॥
ਸਬਦੁ ਵੀਚਾਰਿ ਮਿਲਣੁ ਨਹੀ ਭ੍ਰਾਤਿ ॥੭॥
ਸੂਤਕੁ ਅਗਨਿ ਭਖੈ ਜਗੁ ਖਾਇ ॥
ਸੂਤਕੁ ਜਲਿ ਥਲਿ ਸਭ ਹੀ ਥਾਇ ॥
ਨਾਨਕ ਸੂਤਕਿ ਜਨਮਿ ਮਰੀਜੈ ॥
ਗੁਰ ਪਰਸਾਦੀ ਹਰਿ ਰਸੁ ਪੀਜੈ ॥੮॥੪॥
आसा महला १ ॥
एकु मरै पंचे मिलि रोवहि ॥
हउमै जाइ सबदि मलु धोवहि ॥
समझि सूझि सहज घरि होवहि ॥
बिनु बूझे सगली पति खोवहि ॥१॥
कउणु मरै कउणु रोवै ओही ॥
करण कारण सभसै सिरि तोही ॥१॥ रहाउ ॥
मूए कउ रोवै दुखु कोइ ॥
सो रोवै जिसु बेदन होइ ॥
जिसु बीती जाणै प्रभ सोइ ॥
आपे करता करे सु होइ ॥२॥
जीवत मरणा तारे तरणा ॥
जै जगदीस परम गति सरणा ॥
हउ बलिहारी सतिगुर चरणा ॥
गुरु बोहिथु सबदि भै तरणा ॥३॥
निरभउ आपि निरंतरि जोति ॥
बिनु नावै सूतकु जगि छोति ॥
दुरमति बिनसै किआ कहि रोति ॥
जनमि मूए बिनु भगति सरोति ॥४॥
मूए कउ सचु रोवहि मीत ॥
त्रै गुण रोवहि नीता नीत ॥
दुखु सुखु परहरि सहजि सुचीत ॥
तनु मनु सउपउ क्रिसन परीति ॥५॥
भीतरि एकु अनेक असंख ॥
करम धरम बहु संख असंख ॥
बिनु भै भगती जनमु बिरंथ ॥
हरि गुण गावहि मिलि परमारंथ ॥६॥
आपि मरै मारे भी आपि ॥
आपि उपाए थापि उथापि ॥
स्रिसटि उपाई जोती तू जाति ॥
सबदु वीचारि मिलणु नही भ्राति ॥७॥
सूतकु अगनि भखै जगु खाइ ॥
सूतकु जलि थलि सभ ही थाइ ॥
नानक सूतकि जनमि मरीजै ॥
गुर परसादी हरि रसु पीजै ॥८॥४॥

हिन्दी अर्थ: आसा महला १ ॥ वे इस समझ में (कि सब में प्रभू की ही ज्योति है।किसी संबंधी के शरीर के नाश होने पर) अडोल अवस्था में टिके रहते हैं। पर जो मनुष्य गुरू के शबद में जुड़ के मोह की मैल अपने मन से धो लेते हैं।उनका अहंकार दूर हो जाता है। एक (प्राणी) मरता है उसके साक-संबंधी मिल के रोते हैं।ये भूल के (कि परमात्मा के बिना कोई बेगाना है ही नहीं। रोने वाले उस परमातमा की नजर में अपनी) सारी इज्जत गवा लेते हैं। 1। ना कोई मरता है और ना ही कोई (मरे को) ‘वह वह’ कह के रोता है। (जिसका शरीर बिनसता है वह भी तू स्वयं ही है और रोने वाला भी तू खुद ही है) हे प्रभू ! हे सारे जगत के करतार ! हरेक जीव के सिर पर तू स्वयं ही है।। 1।रहाउ। जो कोई मरे हुए को रोता है वह (असल में अपना) दुख-मुश्किलें फरोलता है। वह ही रोता है जिसे (किसी के मरने पर कोई) बिपता आ वापरती है। पर जिस जीव पर (मौत की घटना) वरतती है। वह प्रभू की ये रजा समझ लेता है कि वही कुछ हो रहा है जो करतार स्वयं करता है। 2। (दरअसल। जीने की तमन्ना मनुष्य को संसार के मोह में फसाती है) जीने की लालसा से मन का मर जाना (मोह-सागर से) तैरने के लिए।मानो बेड़ी है। ये ऊँची आत्मिक अवस्था जगत के मालिक प्रभू की शरण पड़ने से प्राप्त होती है। (प्रभू की शरण गुरू के द्वारा ही प्राप्त होती है) मैं गुरू के चरनों से सदके हूँ। गुरू मानो जहाज है।गुरू के शबद में जुड़ के भव-सागर से पार लांघ सकते हैं। 3। परमात्मा को कोई डर छू नहीं सकता।वह स्वयं एक-रस हरेक के अंदर अपनी ज्योति का प्रकाश कर रहा है। पर उसके नाम से टूटने के कारण जगत में कहीं सूतक (का भ्रम) है तो कहीं छूत है। दुर्मिर्त के कारण जगत आत्मिक मौत मर रहा है।(इस बारे) क्या कह के कोई रोए। परमात्मा की भक्ति के बिना।प्रभू की सिफत सालाह सुने बिना।जीव जनम-मरण के चक्कर में पड़ रहे हैं। 4। स्वै भाव से मरे हुए को सचमुच उसके (पहले) मित्र रोते हैं माया के तीनों गुण नित्य रोते हैं (कि हमारा साथ छोड़ गया है)। क्योंकि वह दुख-सुख (का अहसास) त्याग के अडोल अवस्था में सचेत हो गया है। और उसने अपना तन और मन परमात्मा की प्रीति पर भेटा कर दिया है। 5। सबके अंदर एक परमात्मा बस रहा है।वह अनेकों असंखो रूपों में दिखाई दे रहा है। (पर जीवों ने उसको बिसार के) और ही बेअंत धर्म-कर्म रच लिए हैं। परमात्मा के डर-अदब में रहने के बिना।प्रभू की भक्ति के बिना।जीवों का मानस जनम व्यर्थ जाता है। जो मिल के हरी के गुण गाते हैं।वे मानस जनम का मनोरथ हासिल कर लेते हैं। 6। (जीवों का रचनहार करतार सब जीवों के अंदर आप मौजूद है।सो।जब कोई जीव मरता है तो) परमात्मा (उसमें बैठा खुद ही।मानो) मरता है। उस जीव को मारता भी खुद ही है।प्रभू स्वयं ही पैदा करता है।पैदा करके स्वयं ही नाश करता है। हे ज्योति-रूपी प्रभू ! तूने स्वयं ही सृष्टि पैदा करी है।तूने खुद ही अनेकों जातियां पैदा कर दी हैं। परमात्मा की सिफत सालाह की बाणी को विचार के (मन में टिका के) जीव का उससे मिलाप हो जाता है।जीव को (सूतक-छूत आदि की कोई) भटकना नहीं रहती। 7। (परमात्मा स्वयं ही सब जीवों में व्यापक हो के पैदा होता है मरता है।सर्व-व्यापक प्रभू से विछुड़ों को सूतक का भ्रम दुखी करता है।सूतक का भ्रम कहाँ-कहाँ किया जाएगा। ) आग में भी (फिर) सूतक है जो भड़कती है और जगत (के जीवों) को भस्म कर जाती है। सूतक पानी में है।सूतक धरती में है।सूतक हर जगह ही है (क्योंकि।हर जगह जीव पैदा होते मरते हैं)। हे नानक ! सूतक (के भ्रम) में पड़ के (परमात्मा के अस्तित्व से टूट के) जगत जनम-मरण के चक्कर में पड़ रहा है। (सही रास्ता ये है कि गुरू की शरण पड़ के) गुरू की मेहर प्राप्त करके परमात्मा के नाम का अमृत-रस पीना चाहिए। 8। 4।
ਰਾਗੁ ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੧ ॥
ਆਪੁ ਵੀਚਾਰੈ ਸੁ ਪਰਖੇ ਹੀਰਾ ॥
ਏਕ ਦ੍ਰਿਸਟਿ ਤਾਰੇ ਗੁਰ ਪੂਰਾ ॥
ਗੁਰੁ ਮਾਨੈ ਮਨ ਤੇ ਮਨੁ ਧੀਰਾ ॥੧॥
ਐਸਾ ਸਾਹੁ ਸਰਾਫੀ ਕਰੈ ॥
ਸਾਚੀ ਨਦਰਿ ਏਕ ਲਿਵ ਤਰੈ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਪੂੰਜੀ ਨਾਮੁ ਨਿਰੰਜਨ ਸਾਰੁ ॥
ਨਿਰਮਲੁ ਸਾਚਿ ਰਤਾ ਪੈਕਾਰੁ ॥
ਸਿਫਤਿ ਸਹਜ ਘਰਿ ਗੁਰੁ ਕਰਤਾਰੁ ॥੨॥
ਆਸਾ ਮਨਸਾ ਸਬਦਿ ਜਲਾਏ ॥
ਰਾਮ ਨਰਾਇਣੁ ਕਹੈ ਕਹਾਏ ॥
ਗੁਰ ਤੇ ਵਾਟ ਮਹਲੁ ਘਰੁ ਪਾਏ ॥੩॥
रागु आसा महला १ ॥
आपु वीचारै सु परखे हीरा ॥
एक द्रिसटि तारे गुर पूरा ॥
गुरु मानै मन ते मनु धीरा ॥१॥
ऐसा साहु सराफी करै ॥
साची नदरि एक लिव तरै ॥१॥ रहाउ ॥
पूंजी नामु निरंजन सारु ॥
निरमलु साचि रता पैकारु ॥
सिफति सहज घरि गुरु करतारु ॥२॥
आसा मनसा सबदि जलाए ॥
राम नराइणु कहै कहाए ॥
गुर ते वाट महलु घरु पाए ॥३॥

हिन्दी अर्थ: रागु आसा महला १ ॥ वह अपने आप को (अपने जीवन को) विचारता और परमात्मा के श्रेष्ठ नाम की कद्र पहचानता है। जिस मनुष्य को पूरा गुरू एक (मेहर की) निगाह से (मोह के समुंद्र से) पार लंघाता है। जो मनुष्य सच्चे दिल से गुरू पर श्रद्धा रखता है।उसका मन (माया के मोह में) डोलता नहीं। 1। गुरू ऐसा शाह (सर्राफ) है।और ऐसी सर्राफी करता है (कि वह जीवों को तुरंत परख लेता है। और) उसकी कभी गलती ना खाने वाली मेहर की निगाह से जीव एक परमात्मा में सुरति जोड़ के (मोह के समुंद्र से) पार लांघ जाता है। 1।रहाउ। (गुरू की कृपा से) जो मनुष्य निरंजन प्रभू के श्रेष्ठ नाम को (अपने आत्मिक जीवन की) राशि-पूँजी बनाता है। जो सदा-स्थिर प्रभू (के नाम-रंग) में रंगा रहता है वह पवित्र (जीवन वाला) हो जाता है।वह नियारिए की तरह पारखू बन जाता है। सिफत सालाह की बरकति से वह गुरू करतार को अपने अडोल हृदय-घर में बसाता है। 2। वह गुरू के शबद द्वारा (अपने अंदर से) मायावी आशाएं और मायावी फुरने जला देता है। वह स्वयं परमात्मा का भजन करता है और औरों को भी इसी तरफ प्रेरित करता है। जो मनुष्य गुरू से (जिंदगी का सही) रास्ता ढूँढ लेता है।परमात्मा का महल-घर पा लेता है।3।

संदर्भ: यह अंग 413 है, राग आसा का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)।

गुरु नानक की वाणी, observational, direct, बिना ornament।

Hauz Khas Village के lake के पास बैठ कर पानी देखना।

ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।

यह अंग कुल 61 पंक्तियों का है, 3 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 413” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।

राग के context में: आसा राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।

पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।

अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।

“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।

नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।

अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।

तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।

हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।

ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।

दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।

“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।

हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।

अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।

आगे का अंग: अंग 414 →, पीछे का: ← अंग 412

हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।

(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)

शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।

संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।

शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।

संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।

एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।

अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।

स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।