अंग
430
राग आसा
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਭਗਤਿ ਨਿਰਾਲੀ ਅਲਾਹ ਦੀ ਜਾਪੈ ਗੁਰ ਵੀਚਾਰਿ ॥
ਨਾਨਕ ਨਾਮੁ ਹਿਰਦੈ ਵਸੈ ਭੈ ਭਗਤੀ ਨਾਮਿ ਸਵਾਰਿ ॥੯॥੧੪॥੩੬॥
ਨਾਨਕ ਨਾਮੁ ਹਿਰਦੈ ਵਸੈ ਭੈ ਭਗਤੀ ਨਾਮਿ ਸਵਾਰਿ ॥੯॥੧੪॥੩੬॥
भगति निराली अलाह दी जापै गुर वीचारि ॥
नानक नामु हिरदै वसै भै भगती नामि सवारि ॥९॥१४॥३६॥
नानक नामु हिरदै वसै भै भगती नामि सवारि ॥९॥१४॥३६॥
हिन्दी अर्थ: गुरू के शबद के विचार की बरकति से ये समझ आ जाती है कि परमात्मा की भक्ति अनोखी ही बरकति देने वाली है। हे नानक ! जिस मनुष्य के हृदय में प्रभू का नाम आ बसता है।प्रभू की भक्ति उसको प्रभू के डर-अदब में रख के प्रभू के नाम में जोड़े रख के उसके आत्मिक जीवन को सुंदर बना देती है। 9। 14। 36।
ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੩ ॥
ਅਨ ਰਸ ਮਹਿ ਭੋਲਾਇਆ ਬਿਨੁ ਨਾਮੈ ਦੁਖ ਪਾਇ ॥
ਸਤਿਗੁਰੁ ਪੁਰਖੁ ਨ ਭੇਟਿਓ ਜਿ ਸਚੀ ਬੂਝ ਬੁਝਾਇ ॥੧॥
ਏ ਮਨ ਮੇਰੇ ਬਾਵਲੇ ਹਰਿ ਰਸੁ ਚਖਿ ਸਾਦੁ ਪਾਇ ॥
ਅਨ ਰਸਿ ਲਾਗਾ ਤੂੰ ਫਿਰਹਿ ਬਿਰਥਾ ਜਨਮੁ ਗਵਾਇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਇਸੁ ਜੁਗ ਮਹਿ ਗੁਰਮੁਖ ਨਿਰਮਲੇ ਸਚਿ ਨਾਮਿ ਰਹਹਿ ਲਿਵ ਲਾਇ ॥
ਵਿਣੁ ਕਰਮਾ ਕਿਛੁ ਪਾਈਐ ਨਹੀ ਕਿਆ ਕਰਿ ਕਹਿਆ ਜਾਇ ॥੨॥
ਆਪੁ ਪਛਾਣਹਿ ਸਬਦਿ ਮਰਹਿ ਮਨਹੁ ਤਜਿ ਵਿਕਾਰ ॥
ਗੁਰ ਸਰਣਾਈ ਭਜਿ ਪਏ ਬਖਸੇ ਬਖਸਣਹਾਰ ॥੩॥
ਬਿਨੁ ਨਾਵੈ ਸੁਖੁ ਨ ਪਾਈਐ ਨਾ ਦੁਖੁ ਵਿਚਹੁ ਜਾਇ ॥
ਇਹੁ ਜਗੁ ਮਾਇਆ ਮੋਹਿ ਵਿਆਪਿਆ ਦੂਜੈ ਭਰਮਿ ਭੁਲਾਇ ॥੪॥
ਦੋਹਾਗਣੀ ਪਿਰ ਕੀ ਸਾਰ ਨ ਜਾਣਹੀ ਕਿਆ ਕਰਿ ਕਰਹਿ ਸੀਗਾਰੁ ॥
ਅਨਦਿਨੁ ਸਦਾ ਜਲਦੀਆ ਫਿਰਹਿ ਸੇਜੈ ਰਵੈ ਨ ਭਤਾਰੁ ॥੫॥
ਸੋਹਾਗਣੀ ਮਹਲੁ ਪਾਇਆ ਵਿਚਹੁ ਆਪੁ ਗਵਾਇ ॥
ਗੁਰ ਸਬਦੀ ਸੀਗਾਰੀਆ ਅਪਣੇ ਸਹਿ ਲਈਆ ਮਿਲਾਇ ॥੬॥
ਮਰਣਾ ਮਨਹੁ ਵਿਸਾਰਿਆ ਮਾਇਆ ਮੋਹੁ ਗੁਬਾਰੁ ॥
ਮਨਮੁਖ ਮਰਿ ਮਰਿ ਜੰਮਹਿ ਭੀ ਮਰਹਿ ਜਮ ਦਰਿ ਹੋਹਿ ਖੁਆਰੁ ॥੭॥
ਆਪਿ ਮਿਲਾਇਅਨੁ ਸੇ ਮਿਲੇ ਗੁਰ ਸਬਦਿ ਵੀਚਾਰਿ ॥
ਨਾਨਕ ਨਾਮਿ ਸਮਾਣੇ ਮੁਖ ਉਜਲੇ ਤਿਤੁ ਸਚੈ ਦਰਬਾਰਿ ॥੮॥੨੨॥੧੫॥੩੭॥
ਅਨ ਰਸ ਮਹਿ ਭੋਲਾਇਆ ਬਿਨੁ ਨਾਮੈ ਦੁਖ ਪਾਇ ॥
ਸਤਿਗੁਰੁ ਪੁਰਖੁ ਨ ਭੇਟਿਓ ਜਿ ਸਚੀ ਬੂਝ ਬੁਝਾਇ ॥੧॥
ਏ ਮਨ ਮੇਰੇ ਬਾਵਲੇ ਹਰਿ ਰਸੁ ਚਖਿ ਸਾਦੁ ਪਾਇ ॥
ਅਨ ਰਸਿ ਲਾਗਾ ਤੂੰ ਫਿਰਹਿ ਬਿਰਥਾ ਜਨਮੁ ਗਵਾਇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਇਸੁ ਜੁਗ ਮਹਿ ਗੁਰਮੁਖ ਨਿਰਮਲੇ ਸਚਿ ਨਾਮਿ ਰਹਹਿ ਲਿਵ ਲਾਇ ॥
ਵਿਣੁ ਕਰਮਾ ਕਿਛੁ ਪਾਈਐ ਨਹੀ ਕਿਆ ਕਰਿ ਕਹਿਆ ਜਾਇ ॥੨॥
ਆਪੁ ਪਛਾਣਹਿ ਸਬਦਿ ਮਰਹਿ ਮਨਹੁ ਤਜਿ ਵਿਕਾਰ ॥
ਗੁਰ ਸਰਣਾਈ ਭਜਿ ਪਏ ਬਖਸੇ ਬਖਸਣਹਾਰ ॥੩॥
ਬਿਨੁ ਨਾਵੈ ਸੁਖੁ ਨ ਪਾਈਐ ਨਾ ਦੁਖੁ ਵਿਚਹੁ ਜਾਇ ॥
ਇਹੁ ਜਗੁ ਮਾਇਆ ਮੋਹਿ ਵਿਆਪਿਆ ਦੂਜੈ ਭਰਮਿ ਭੁਲਾਇ ॥੪॥
ਦੋਹਾਗਣੀ ਪਿਰ ਕੀ ਸਾਰ ਨ ਜਾਣਹੀ ਕਿਆ ਕਰਿ ਕਰਹਿ ਸੀਗਾਰੁ ॥
ਅਨਦਿਨੁ ਸਦਾ ਜਲਦੀਆ ਫਿਰਹਿ ਸੇਜੈ ਰਵੈ ਨ ਭਤਾਰੁ ॥੫॥
ਸੋਹਾਗਣੀ ਮਹਲੁ ਪਾਇਆ ਵਿਚਹੁ ਆਪੁ ਗਵਾਇ ॥
ਗੁਰ ਸਬਦੀ ਸੀਗਾਰੀਆ ਅਪਣੇ ਸਹਿ ਲਈਆ ਮਿਲਾਇ ॥੬॥
ਮਰਣਾ ਮਨਹੁ ਵਿਸਾਰਿਆ ਮਾਇਆ ਮੋਹੁ ਗੁਬਾਰੁ ॥
ਮਨਮੁਖ ਮਰਿ ਮਰਿ ਜੰਮਹਿ ਭੀ ਮਰਹਿ ਜਮ ਦਰਿ ਹੋਹਿ ਖੁਆਰੁ ॥੭॥
ਆਪਿ ਮਿਲਾਇਅਨੁ ਸੇ ਮਿਲੇ ਗੁਰ ਸਬਦਿ ਵੀਚਾਰਿ ॥
ਨਾਨਕ ਨਾਮਿ ਸਮਾਣੇ ਮੁਖ ਉਜਲੇ ਤਿਤੁ ਸਚੈ ਦਰਬਾਰਿ ॥੮॥੨੨॥੧੫॥੩੭॥
आसा महला ३ ॥
अन रस महि भोलाइआ बिनु नामै दुख पाइ ॥
सतिगुरु पुरखु न भेटिओ जि सची बूझ बुझाइ ॥१॥
ए मन मेरे बावले हरि रसु चखि सादु पाइ ॥
अन रसि लागा तूं फिरहि बिरथा जनमु गवाइ ॥१॥ रहाउ ॥
इसु जुग महि गुरमुख निरमले सचि नामि रहहि लिव लाइ ॥
विणु करमा किछु पाईऐ नही किआ करि कहिआ जाइ ॥२॥
आपु पछाणहि सबदि मरहि मनहु तजि विकार ॥
गुर सरणाई भजि पए बखसे बखसणहार ॥३॥
बिनु नावै सुखु न पाईऐ ना दुखु विचहु जाइ ॥
इहु जगु माइआ मोहि विआपिआ दूजै भरमि भुलाइ ॥४॥
दोहागणी पिर की सार न जाणही किआ करि करहि सीगारु ॥
अनदिनु सदा जलदीआ फिरहि सेजै रवै न भतारु ॥५॥
सोहागणी महलु पाइआ विचहु आपु गवाइ ॥
गुर सबदी सीगारीआ अपणे सहि लईआ मिलाइ ॥६॥
मरणा मनहु विसारिआ माइआ मोहु गुबारु ॥
मनमुख मरि मरि जंमहि भी मरहि जम दरि होहि खुआरु ॥७॥
आपि मिलाइअनु से मिले गुर सबदि वीचारि ॥
नानक नामि समाणे मुख उजले तितु सचै दरबारि ॥८॥२२॥१५॥३७॥
अन रस महि भोलाइआ बिनु नामै दुख पाइ ॥
सतिगुरु पुरखु न भेटिओ जि सची बूझ बुझाइ ॥१॥
ए मन मेरे बावले हरि रसु चखि सादु पाइ ॥
अन रसि लागा तूं फिरहि बिरथा जनमु गवाइ ॥१॥ रहाउ ॥
इसु जुग महि गुरमुख निरमले सचि नामि रहहि लिव लाइ ॥
विणु करमा किछु पाईऐ नही किआ करि कहिआ जाइ ॥२॥
आपु पछाणहि सबदि मरहि मनहु तजि विकार ॥
गुर सरणाई भजि पए बखसे बखसणहार ॥३॥
बिनु नावै सुखु न पाईऐ ना दुखु विचहु जाइ ॥
इहु जगु माइआ मोहि विआपिआ दूजै भरमि भुलाइ ॥४॥
दोहागणी पिर की सार न जाणही किआ करि करहि सीगारु ॥
अनदिनु सदा जलदीआ फिरहि सेजै रवै न भतारु ॥५॥
सोहागणी महलु पाइआ विचहु आपु गवाइ ॥
गुर सबदी सीगारीआ अपणे सहि लईआ मिलाइ ॥६॥
मरणा मनहु विसारिआ माइआ मोहु गुबारु ॥
मनमुख मरि मरि जंमहि भी मरहि जम दरि होहि खुआरु ॥७॥
आपि मिलाइअनु से मिले गुर सबदि वीचारि ॥
नानक नामि समाणे मुख उजले तितु सचै दरबारि ॥८॥२२॥१५॥३७॥
हिन्दी अर्थ: आसा महला ३ ॥ मनुष्य अन्य पदार्थों के स्वादों में फस के गलत राह पर पड़ा रहता है।नाम से टूट के दुख सहता रहता है। उसे महापुरुख गुरू नहीं मिलता जो उसे सदा-स्थिर प्रभू की सिफत सालाह की समझ दे। 1। हे मेरे पगले मन ! परमात्मा के नाम का रस चख।परमात्मा के नाम का स्वाद ले। तू अपना जीवन व्यर्थ गवा-गवा के अन्य पदार्थों कें स्वाद में फंसा हुआ भटक रहा है। 1।रहाउ। (हे भाई !) दुनिया में वही मनुष्य पवित्र जीवन वाले होते हैं जो गुरू की शरण पड़े रहते हैं।उस सदा स्थिर हरी में सुरति जोड़ के उसके नाम में लीन रहते हैं। पर क्या कहा जाय।प्रभू की बख्शिश के बिना कुछ नहीं मिलता। 2। (जिनपे बख्शिश होती है वह) अपना जीवन खोजते हैं।गुरू शबद के द्वारा मन में से विकार दूर कर के अन-रसों से निर्लिप हो जाते हैं। वे गुरू की शरण ही पड़े रहते हैं।बख्शिशें करने वाला बख्शिंद हरी उनपे बख्शिश करता है। 3। (हे भाई !) हरि-नाम के बिना सुख नहीं मिलता।अंदर से दुख-कलेश दूर नहीं होता। पर ये जगत माया के मोह में फसा रहता है (नाम भूल के) माया की भटकना में पड़ के गलत रास्ते पर पड़ा रहता है। 4। (नाम-हीन जीव-सि्त्रयां ऐसे ही हैं जैसे) छुटॅड़ें अपने पति के मिलाप की कद्र नहीं जानतीं।व्यर्थ ही शारि रिक श्रृंगार करती हैं। हर वक्त सदा ही (अंदर-अंदर से) जलती फिरती हैं।पति कभी सेज पर आता ही नहीं। 5। भाग्यशाली जीव-सि्त्रयां (अपने) अंदर से स्वै भाव दूर करके प्रभू पति के चरणों में जगह ढूँढ लेती हैं। गुरू के शबद की बरकति से वे अपना जीवन सुंदर बनाती हैं।पति प्रभू ने उनको अपने साथ मिला लिया है। 6। हे भाई ! माया का मोह घोर अंधकार है (इसमें फस के) अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्य मौत को मन से भुला देते हैं। आत्मिक मौत मर के पैदा होने-मरने के चक्कर में पड़े रहते हैं।जम के दरवाजे पर ख्वार होते हैं। 7। जिनको परमात्मा ने स्वयं अपने चरणों में जोड़ लिया वे गुरू के शबद के माध्यम से प्रभू के गुणों की विचार करके प्रभू-चरणों में लीन हो गए। हे नानक ! जो मनुष्य हरि-नाम में रमे रहते हैं वह सदा-स्थिर परमात्मा के दरबार में सुर्खरूह हो जाते हैं। 8। 22। 15। 37।
ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੫ ਅਸਟਪਦੀਆ ਘਰੁ ੨
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ਪੰਚ ਮਨਾਏ ਪੰਚ ਰੁਸਾਏ ॥ ਪੰਚ ਵਸਾਏ ਪੰਚ ਗਵਾਏ ॥੧॥
ਇਨੑ ਬਿਧਿ ਨਗਰੁ ਵੁਠਾ ਮੇਰੇ ਭਾਈ ॥
ਦੁਰਤੁ ਗਇਆ ਗੁਰਿ ਗਿਆਨੁ ਦ੍ਰਿੜਾਈ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਸਾਚ ਧਰਮ ਕੀ ਕਰਿ ਦੀਨੀ ਵਾਰਿ ॥
ਫਰਹੇ ਮੁਹਕਮ ਗੁਰ ਗਿਆਨੁ ਬੀਚਾਰਿ ॥੨॥
ਨਾਮੁ ਖੇਤੀ ਬੀਜਹੁ ਭਾਈ ਮੀਤ ॥
ਸਉਦਾ ਕਰਹੁ ਗੁਰੁ ਸੇਵਹੁ ਨੀਤ ॥੩॥
ਸਾਂਤਿ ਸਹਜ ਸੁਖ ਕੇ ਸਭਿ ਹਾਟ ॥
ਸਾਹ ਵਾਪਾਰੀ ਏਕੈ ਥਾਟ ॥੪॥
ਜੇਜੀਆ ਡੰਨੁ ਕੋ ਲਏ ਨ ਜਗਾਤਿ ॥
ਸਤਿਗੁਰਿ ਕਰਿ ਦੀਨੀ ਧੁਰ ਕੀ ਛਾਪ ॥੫॥
ਵਖਰੁ ਨਾਮੁ ਲਦਿ ਖੇਪ ਚਲਾਵਹੁ ॥
ਲੈ ਲਾਹਾ ਗੁਰਮੁਖਿ ਘਰਿ ਆਵਹੁ ॥੬॥
ਸਤਿਗੁਰੁ ਸਾਹੁ ਸਿਖ ਵਣਜਾਰੇ ॥
ਪੂੰਜੀ ਨਾਮੁ ਲੇਖਾ ਸਾਚੁ ਸਮ੍ਹਾਰੇ ॥੭॥
ਸੋ ਵਸੈ ਇਤੁ ਘਰਿ ਜਿਸੁ ਗੁਰੁ ਪੂਰਾ ਸੇਵ ॥
ਅਬਿਚਲ ਨਗਰੀ ਨਾਨਕ ਦੇਵ ॥੮॥੧॥
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ਪੰਚ ਮਨਾਏ ਪੰਚ ਰੁਸਾਏ ॥ ਪੰਚ ਵਸਾਏ ਪੰਚ ਗਵਾਏ ॥੧॥
ਇਨੑ ਬਿਧਿ ਨਗਰੁ ਵੁਠਾ ਮੇਰੇ ਭਾਈ ॥
ਦੁਰਤੁ ਗਇਆ ਗੁਰਿ ਗਿਆਨੁ ਦ੍ਰਿੜਾਈ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਸਾਚ ਧਰਮ ਕੀ ਕਰਿ ਦੀਨੀ ਵਾਰਿ ॥
ਫਰਹੇ ਮੁਹਕਮ ਗੁਰ ਗਿਆਨੁ ਬੀਚਾਰਿ ॥੨॥
ਨਾਮੁ ਖੇਤੀ ਬੀਜਹੁ ਭਾਈ ਮੀਤ ॥
ਸਉਦਾ ਕਰਹੁ ਗੁਰੁ ਸੇਵਹੁ ਨੀਤ ॥੩॥
ਸਾਂਤਿ ਸਹਜ ਸੁਖ ਕੇ ਸਭਿ ਹਾਟ ॥
ਸਾਹ ਵਾਪਾਰੀ ਏਕੈ ਥਾਟ ॥੪॥
ਜੇਜੀਆ ਡੰਨੁ ਕੋ ਲਏ ਨ ਜਗਾਤਿ ॥
ਸਤਿਗੁਰਿ ਕਰਿ ਦੀਨੀ ਧੁਰ ਕੀ ਛਾਪ ॥੫॥
ਵਖਰੁ ਨਾਮੁ ਲਦਿ ਖੇਪ ਚਲਾਵਹੁ ॥
ਲੈ ਲਾਹਾ ਗੁਰਮੁਖਿ ਘਰਿ ਆਵਹੁ ॥੬॥
ਸਤਿਗੁਰੁ ਸਾਹੁ ਸਿਖ ਵਣਜਾਰੇ ॥
ਪੂੰਜੀ ਨਾਮੁ ਲੇਖਾ ਸਾਚੁ ਸਮ੍ਹਾਰੇ ॥੭॥
ਸੋ ਵਸੈ ਇਤੁ ਘਰਿ ਜਿਸੁ ਗੁਰੁ ਪੂਰਾ ਸੇਵ ॥
ਅਬਿਚਲ ਨਗਰੀ ਨਾਨਕ ਦੇਵ ॥੮॥੧॥
आसा महला ५ असटपदीआ घरु २
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
पंच मनाए पंच रुसाए ॥ पंच वसाए पंच गवाए ॥१॥
इन॑ बिधि नगरु वुठा मेरे भाई ॥
दुरतु गइआ गुरि गिआनु द्रिड़ाई ॥१॥ रहाउ ॥
साच धरम की करि दीनी वारि ॥
फरहे मुहकम गुर गिआनु बीचारि ॥२॥
नामु खेती बीजहु भाई मीत ॥
सउदा करहु गुरु सेवहु नीत ॥३॥
सांति सहज सुख के सभि हाट ॥
साह वापारी एकै थाट ॥४॥
जेजीआ डंनु को लए न जगाति ॥
सतिगुरि करि दीनी धुर की छाप ॥५॥
वखरु नामु लदि खेप चलावहु ॥
लै लाहा गुरमुखि घरि आवहु ॥६॥
सतिगुरु साहु सिख वणजारे ॥
पूंजी नामु लेखा साचु सम्हारे ॥७॥
सो वसै इतु घरि जिसु गुरु पूरा सेव ॥
अबिचल नगरी नानक देव ॥८॥१॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
पंच मनाए पंच रुसाए ॥ पंच वसाए पंच गवाए ॥१॥
इन॑ बिधि नगरु वुठा मेरे भाई ॥
दुरतु गइआ गुरि गिआनु द्रिड़ाई ॥१॥ रहाउ ॥
साच धरम की करि दीनी वारि ॥
फरहे मुहकम गुर गिआनु बीचारि ॥२॥
नामु खेती बीजहु भाई मीत ॥
सउदा करहु गुरु सेवहु नीत ॥३॥
सांति सहज सुख के सभि हाट ॥
साह वापारी एकै थाट ॥४॥
जेजीआ डंनु को लए न जगाति ॥
सतिगुरि करि दीनी धुर की छाप ॥५॥
वखरु नामु लदि खेप चलावहु ॥
लै लाहा गुरमुखि घरि आवहु ॥६॥
सतिगुरु साहु सिख वणजारे ॥
पूंजी नामु लेखा साचु सम्हारे ॥७॥
सो वसै इतु घरि जिसु गुरु पूरा सेव ॥
अबिचल नगरी नानक देव ॥८॥१॥
हिन्दी अर्थ: आसा महला ५ असटपदीआ घरु २ ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। (हे भाई ! जिस मनुष्य को गुरू ने ज्ञान की दाति दी उस मनुष्य ने अपने शरीर-नगर में सत-संतोष-दया-धर्म-धैर्य -ये) पाँचों प्रफुल्लित कर लिए।और कामादिक (विकार) पाँचों नाराज कर लिए। (सत्य-संतोष आदि) पाँचों (अपने शरीर रूपी नगर में) बसा लिए।और कामादिक पाँचों (नगर में से) निकाल बाहर किए। 1। हे मेरे भाई ! इस तरह उस मनुष्य का शरीर-नगर बस गयाऔर गुरू ने (जिस मनुष्य को) आत्मिक जीवन की सूझ पक्की तरह से दे दी (उसके अंदर से) विकार-पाप दूर हो गए। । 1।रहाउ। (हे भाई ! जिस गुरू ने ज्ञान बख्शा।उसने अपने शरीर नगरी की रक्षा के लिए) सदा-स्थिर प्रभू के नित्य की सिमरन की वाड़ दे ली। गुरू के दिए ज्ञान को सोच-मण्डल में टिका के उसने अपनी खिडकियां (ज्ञानेन्द्रियां) पक्की कर लीं। 2। हे मेरे मित्र ! हे मेरे भाई ! शरीर-खेती में परमात्मा का नाम बीजा करो। तुम भी सदा गुरू की शरण लो।शरीर नगर में परमात्मा के नाम का सौदा करते रहो। 3। उनकी सारे हाट (दुकानें।ज्ञानेन्द्रियां) शांति।आत्मिक अडोलता और आत्मिक आनंद के हाट बन जाते हैं। हे भाई ! जो (सिख-) वणजारे (गुरू-) शाह के साथ एक रूप हो जाते हैं4। कोई (पाप-विकार उनके हरि-नाम के सौदे पर) जजीआ दण्ड महिसूल नहीं लगा सकता (कोई विकार उनके आत्मिक जीवन में कोई खराबी पैदा नहीं कर सकता) (हे भाई ! जिन्हें गुरू ने ज्ञान की दाति दी उनके शरीर-नगर के वास्ते) गुरू के प्रभू-दर से परवान हुई माफी की मोहर की मोहर बख्श दी।। 5। हे मेरे मित्र ! हे मेरे भाई ! गुरू की शरण पड़ के तुम भी हरि-नाम सिमरन का सौदा लाद के (आत्मिक जीवन का) व्यापार करो। (ऊँचे आत्मिक जीवन का) लाभ कमाओ और प्रभू के चरणों में ठिकाना प्राप्त करो। 6। (हे भाई ! नाम का सरमाया गुरू के पास है) गुरू (ही इस सरमाए का) शाहूकार है (जिस से आत्मिक जीवन का) व्यापार करने वाले सिखहरि-नाम का सरमाया हासिल करते हैं (जिस सिख को गुरू ने ज्ञान की दाति दी है वह) सदा-स्थिर प्रभू को अपने हृदय में संभाल के रखता है (यही है) लेखा-हिसाब (जो वह नाम-वणज में करता रहता है)। 7। हे नानक ! (कह, हे भाई !) पूरा गुरू जिस मनुष्य को प्रभू की सेवा-भक्ति की दाति बख्शता है वह इस (ऐसे हृदय-) घर में बसता रहता है जो परमात्मा के रहने के लिए (विकारों में) कभी ना डोलने वाली नगरी बन जाता है। 8। 1।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 430 है, राग आसा का हिस्सा। मुख्य रचयिता: Guru Amar Daas Ji।
New Friends Colony के पाँच-मंज़िला flat की terrace पर रात की हवा।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 40 पंक्तियों का है, 3 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 430” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: आसा राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 431 →, पीछे का: ← अंग 429।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।