अंग 398

अंग
398
राग आसा
राग: आसा · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਜਿਸ ਨੋ ਮੰਨੇ ਆਪਿ ਸੋਈ ਮਾਨੀਐ ॥
ਪ੍ਰਗਟ ਪੁਰਖੁ ਪਰਵਾਣੁ ਸਭ ਠਾਈ ਜਾਨੀਐ ॥੩॥
ਦਿਨਸੁ ਰੈਣਿ ਆਰਾਧਿ ਸਮੑਾਲੇ ਸਾਹ ਸਾਹ ॥
ਨਾਨਕ ਕੀ ਲੋਚਾ ਪੂਰਿ ਸਚੇ ਪਾਤਿਸਾਹ ॥੪॥੬॥੧੦੮॥
जिस नो मंने आपि सोई मानीऐ ॥
प्रगट पुरखु परवाणु सभ ठाई जानीऐ ॥३॥
दिनसु रैणि आराधि सम॑ाले साह साह ॥
नानक की लोचा पूरि सचे पातिसाह ॥४॥६॥१०८॥

हिन्दी अर्थ: (हे भाई !) जिस मनुष्य को परमात्मा स्वयं आदर देता है वह (हर जगह) आदर पाता है। वह मनुष्य (लोक-परलोक में) सब जगह प्रसिद्ध हो जाता है।वह मशहूर हो चुका हर जगह जाना-माना जाता है। 3। दिन-रात तेरी आराधना करके तुझे स्वास-स्वास (अपने) हृदय में बसाए रखे। हे (मेरे) सदा कायम रहने वाले पातशाह ! (मेरी) नानक की ये तमन्ना पूरी कर4। 6। 108।
ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਪੂਰਿ ਰਹਿਆ ਸ੍ਰਬ ਠਾਇ ਹਮਾਰਾ ਖਸਮੁ ਸੋਇ ॥
ਏਕੁ ਸਾਹਿਬੁ ਸਿਰਿ ਛਤੁ ਦੂਜਾ ਨਾਹਿ ਕੋਇ ॥੧॥
ਜਿਉ ਭਾਵੈ ਤਿਉ ਰਾਖੁ ਰਾਖਣਹਾਰਿਆ ॥
ਤੁਝ ਬਿਨੁ ਅਵਰੁ ਨ ਕੋਇ ਨਦਰਿ ਨਿਹਾਰਿਆ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਪ੍ਰਤਿਪਾਲੇ ਪ੍ਰਭੁ ਆਪਿ ਘਟਿ ਘਟਿ ਸਾਰੀਐ ॥
ਜਿਸੁ ਮਨਿ ਵੁਠਾ ਆਪਿ ਤਿਸੁ ਨ ਵਿਸਾਰੀਐ ॥੨॥
ਜੋ ਕਿਛੁ ਕਰੇ ਸੁ ਆਪਿ ਆਪਣ ਭਾਣਿਆ ॥
ਭਗਤਾ ਕਾ ਸਹਾਈ ਜੁਗਿ ਜੁਗਿ ਜਾਣਿਆ ॥੩॥
ਜਪਿ ਜਪਿ ਹਰਿ ਕਾ ਨਾਮੁ ਕਦੇ ਨ ਝੂਰੀਐ ॥
ਨਾਨਕ ਦਰਸ ਪਿਆਸ ਲੋਚਾ ਪੂਰੀਐ ॥੪॥੭॥੧੦੯॥
आसा महला ५ ॥
पूरि रहिआ स्रब ठाइ हमारा खसमु सोइ ॥
एकु साहिबु सिरि छतु दूजा नाहि कोइ ॥१॥
जिउ भावै तिउ राखु राखणहारिआ ॥
तुझ बिनु अवरु न कोइ नदरि निहारिआ ॥१॥ रहाउ ॥
प्रतिपाले प्रभु आपि घटि घटि सारीऐ ॥
जिसु मनि वुठा आपि तिसु न विसारीऐ ॥२॥
जो किछु करे सु आपि आपण भाणिआ ॥
भगता का सहाई जुगि जुगि जाणिआ ॥३॥
जपि जपि हरि का नामु कदे न झूरीऐ ॥
नानक दरस पिआस लोचा पूरीऐ ॥४॥७॥१०९॥

हिन्दी अर्थ: आसा महला ५ ॥ (हे भाई !) हमारा वह खसम-सांई हरेक जगह व्यापक है। (सब जीवों का वह) एक ही मालिक है (सारी सृष्टि की बादशाहियत का) छत्र (उसके) सिर पर है।उसके बराबर और कोई नहीं। 1। हे सब जीवों की रक्षा करने में समर्थ प्रभू ! जैसे तुझे ठीक लगे।उसी तरह मेरी रक्षा कर। मैंने तेरे बिना अभी तक कोई अपनी आँखो से नहीं देखा जो तेरे जैसा हो। 1।रहाउ। (हे भाई !) हरेक शरीर में बैठा प्रभू हरेक की सार लेता है।हरेक की पालना करता है। जिस मनुष्य के मन में वह प्रभू स्वयं बसता है।उसे कभी फिर भुलाता नहीं। 2। (हे भाई ! जगत में) जो कुछ कर रहा है परमात्मा स्वयं ही अपनी रजा अनुसार कर रहा है। (जगत में) ये बात प्रसिद्ध है कि हरेक युग में परमात्मा अपने भक्तों की सहायता करता आ रहा है। 3। (हे भाई !) परमात्मा का नाम जप-जप के फिर कभी किसी किस्म की कोई चिंता नहीं करनी पड़ती। (हे प्रभू ! तेरे दास) नानक को तेरे दर्शन की प्यास है (नानक की ये) चाहत पूरी कर। 4। 7। 109।
ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਕਿਆ ਸੋਵਹਿ ਨਾਮੁ ਵਿਸਾਰਿ ਗਾਫਲ ਗਹਿਲਿਆ ॥
ਕਿਤਂੀ ਇਤੁ ਦਰੀਆਇ ਵੰਞਨਿੑ ਵਹਦਿਆ ॥੧॥
ਬੋਹਿਥੜਾ ਹਰਿ ਚਰਣ ਮਨ ਚੜਿ ਲੰਘੀਐ ॥
ਆਠ ਪਹਰ ਗੁਣ ਗਾਇ ਸਾਧੂ ਸੰਗੀਐ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਭੋਗਹਿ ਭੋਗ ਅਨੇਕ ਵਿਣੁ ਨਾਵੈ ਸੁੰਞਿਆ ॥
ਹਰਿ ਕੀ ਭਗਤਿ ਬਿਨਾ ਮਰਿ ਮਰਿ ਰੁੰਨਿਆ ॥੨॥
ਕਪੜ ਭੋਗ ਸੁਗੰਧ ਤਨਿ ਮਰਦਨ ਮਾਲਣਾ ॥
ਬਿਨੁ ਸਿਮਰਨ ਤਨੁ ਛਾਰੁ ਸਰਪਰ ਚਾਲਣਾ ॥੩॥
ਮਹਾ ਬਿਖਮੁ ਸੰਸਾਰੁ ਵਿਰਲੈ ਪੇਖਿਆ ॥
ਛੂਟਨੁ ਹਰਿ ਕੀ ਸਰਣਿ ਲੇਖੁ ਨਾਨਕ ਲੇਖਿਆ ॥੪॥੮॥੧੧੦॥
आसा महला ५ ॥
किआ सोवहि नामु विसारि गाफल गहिलिआ ॥
कितंी इतु दरीआइ वंञनि॑ वहदिआ ॥१॥
बोहिथड़ा हरि चरण मन चड़ि लंघीऐ ॥
आठ पहर गुण गाइ साधू संगीऐ ॥१॥ रहाउ ॥
भोगहि भोग अनेक विणु नावै सुंञिआ ॥
हरि की भगति बिना मरि मरि रुंनिआ ॥२॥
कपड़ भोग सुगंध तनि मरदन मालणा ॥
बिनु सिमरन तनु छारु सरपर चालणा ॥३॥
महा बिखमु संसारु विरलै पेखिआ ॥
छूटनु हरि की सरणि लेखु नानक लेखिआ ॥४॥८॥११०॥

हिन्दी अर्थ: आसा महला ५ ॥ हे गाफ़ल मन ! हे बेपरवाह मन ! परमात्मा का नाम भुला के क्यूँ (माया के मोह की नींद में) सो रहा है। (देख नाम बिसार के) अनेकों ही जीव इस (संसार-) नदी में बहते जा रहे हैं। 1। हे (मेरे) मन ! परमात्मा के चरण एक सुंदर सा जहाज हैं; (इस जहाज में) चढ़ के (संसार समुंद्र से पार) लांघ जाते हैं (इस वास्ते।हे मन !) गुरू की संगति में रहके आठों पहर प्रमात्मा के गुण गाता रहा कर। 1।रहाउ। (हे मन ! मोह की नींद में सोए हुए जीव दुनिया के) अनेकों भोग भोगते रहते हैं। पर परमात्मा के नाम के बिना आत्मिक जीवन से खाली ही रह जाते हैं।परमात्मा की भक्ति के बिना (ऐसे जीव) सदा आत्मिक मौत पा पा के दुखी होते रहते हैं। 2। (हे मन !) देख।जीव (सुंदर-सुंदर) कपड़े पहनते हैं।स्वादिष्ट पदार्थ खाते हैं।शरीर पर सुगंधि वाले वटने आदि मलते हैं। पर परमात्मा के नाम-सिमरन के बिना उनका ये शरीर राख (के समान ही रहता) है।इस शरीर ने तो आखिर जरुर नाश हो जाना है। 3। हे नानक ! (कह,) किसी विरले (भाग्यशाली) ने देखा है कि यह संसार- (समंद्र) बड़ा भयानक है। परमात्मा की शरण पड़ने पर ही इस में से बचाव होता है।(वही बचता है जिसके माथे पर प्रभू-नाम के सिमरन का) लेख लिखा हुआ है। 4। 8। 110।
ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਕੋਇ ਨ ਕਿਸ ਹੀ ਸੰਗਿ ਕਾਹੇ ਗਰਬੀਐ ॥
ਏਕੁ ਨਾਮੁ ਆਧਾਰੁ ਭਉਜਲੁ ਤਰਬੀਐ ॥੧॥
ਮੈ ਗਰੀਬ ਸਚੁ ਟੇਕ ਤੂੰ ਮੇਰੇ ਸਤਿਗੁਰ ਪੂਰੇ ॥
ਦੇਖਿ ਤੁਮੑਾਰਾ ਦਰਸਨੋ ਮੇਰਾ ਮਨੁ ਧੀਰੇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਰਾਜੁ ਮਾਲੁ ਜੰਜਾਲੁ ਕਾਜਿ ਨ ਕਿਤੈ ਗਨੋੁ ॥
ਹਰਿ ਕੀਰਤਨੁ ਆਧਾਰੁ ਨਿਹਚਲੁ ਏਹੁ ਧਨੋੁ ॥੨॥
ਜੇਤੇ ਮਾਇਆ ਰੰਗ ਤੇਤ ਪਛਾਵਿਆ ॥
ਸੁਖ ਕਾ ਨਾਮੁ ਨਿਧਾਨੁ ਗੁਰਮੁਖਿ ਗਾਵਿਆ ॥੩॥
ਸਚਾ ਗੁਣੀ ਨਿਧਾਨੁ ਤੂੰ ਪ੍ਰਭ ਗਹਿਰ ਗੰਭੀਰੇ ॥
ਆਸ ਭਰੋਸਾ ਖਸਮ ਕਾ ਨਾਨਕ ਕੇ ਜੀਅਰੇ ॥੪॥੯॥੧੧੧॥
आसा महला ५ ॥
कोइ न किस ही संगि काहे गरबीऐ ॥
एकु नामु आधारु भउजलु तरबीऐ ॥१॥
मै गरीब सचु टेक तूं मेरे सतिगुर पूरे ॥
देखि तुम॑ारा दरसनो मेरा मनु धीरे ॥१॥ रहाउ ॥
राजु मालु जंजालु काजि न कितै गनोु ॥
हरि कीरतनु आधारु निहचलु एहु धनोु ॥२॥
जेते माइआ रंग तेत पछाविआ ॥
सुख का नामु निधानु गुरमुखि गाविआ ॥३॥
सचा गुणी निधानु तूं प्रभ गहिर गंभीरे ॥
आस भरोसा खसम का नानक के जीअरे ॥४॥९॥१११॥

हिन्दी अर्थ: आसा महला ५ ॥ (हे मेरी जिंदे !) कोई मनुष्य सदा किसी के साथ नहीं निभता (इस वास्ते संबंधी आदि का) का कोई गुमान नहीं करना चाहिए। सिर्फ परमात्मा का नाम ही (असल) आसरा है (नाम के आसरे ही) संसार-समुंद्र से पार लांघ सकते हैं। 1। हे मेरे पूरे सतिगुरू (प्रभू) ! तू सदा कायम रहने वाला है मुझ गरीब का तू ही सहारा है। तेरे दर्शन करके मेरा मन (इस संसार-समुंद्र से पार लांघ सकने के लिए) धैर्य पकड़ता है। 1।रहाउ। (हे जिंदे !) दुनिया की पातशाही और धन-पदार्थ मन को मोहे रखते हैं।(इस राज-माल को आखिर) किसी काम आता ना समझ। परमात्मा की सिफत सालाह ही जिंद का असल आसरा है।यही सदा कायम रहने वाला धन है। 2। (हे जिंदे !) माया के जितने भी रंग-तमाशे हैं।वे सारे परछाई की तरह ढल जाने वाले हैं। परमात्मा का नाम ही सारे सुखों का खजाना है।ये नाम गुरू की शरण पड़ के ही सराहा जा सकता है। 3। हे प्रभू ! तू गहरा है।तू बड़े जिगरे वाला है।तू सदा कायम रहने वाला है।तू सारे गुणों का खजाना है। हे नानक की जिंदे ! इस पति-प्रभू की ही (अंत तक निभने वाले साथ की) आस रख।पति-प्रभू का ही भरोसा रख। 4। 9। 111।
ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਜਿਸੁ ਸਿਮਰਤ ਦੁਖੁ ਜਾਇ ਸਹਜ ਸੁਖੁ ਪਾਈਐ ॥
ਰੈਣਿ ਦਿਨਸੁ ਕਰ ਜੋੜਿ ਹਰਿ ਹਰਿ ਧਿਆਈਐ ॥੧॥
ਨਾਨਕ ਕਾ ਪ੍ਰਭੁ ਸੋਇ ਜਿਸ ਕਾ ਸਭੁ ਕੋਇ ॥
ਸਰਬ ਰਹਿਆ ਭਰਪੂਰਿ ਸਚਾ ਸਚੁ ਸੋਇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਅੰਤਰਿ ਬਾਹਰਿ ਸੰਗਿ ਸਹਾਈ ਗਿਆਨ ਜੋਗੁ ॥
ਤਿਸਹਿ ਅਰਾਧਿ ਮਨਾ ਬਿਨਾਸੈ ਸਗਲ ਰੋਗੁ ॥੨॥
ਰਾਖਨਹਾਰੁ ਅਪਾਰੁ ਰਾਖੈ ਅਗਨਿ ਮਾਹਿ ॥
आसा महला ५ ॥
जिसु सिमरत दुखु जाइ सहज सुखु पाईऐ ॥
रैणि दिनसु कर जोड़ि हरि हरि धिआईऐ ॥१॥
नानक का प्रभु सोइ जिस का सभु कोइ ॥
सरब रहिआ भरपूरि सचा सचु सोइ ॥१॥ रहाउ ॥
अंतरि बाहरि संगि सहाई गिआन जोगु ॥
तिसहि अराधि मना बिनासै सगल रोगु ॥२॥
राखनहारु अपारु राखै अगनि माहि ॥

हिन्दी अर्थ: आसा महला ५ ॥ (हे भाई !) जिस परमात्मा का सिमरन करने से हरेक दुख दूर हो जाता है और आत्मिक अडोलता का आनंद मिलता है उसके आगे दोनों हाथ जोड़ के सदा उसका ध्यान धरना चाहिए। 1। रात-दिन हाथ जोड़ कर उस हरि-प्रभु का ही ध्यान करना चाहिए॥ १॥ (हे भाई !) नानक का पति-प्रभू वह है जिसका पैदा किया हुआ हरेक जीव है। वह प्रभू सब जीवों में व्यापक है।वह सदा कायम रहने वाला है।सिर्फ वही सदा कायम रहने वाला है। 1।रहाउ। हे मेरे मन ! उस परमात्मा की आरधना किया कर जो सबके अंदर बस रहा है।जो सारे संसार में बस रहा है।जो सबके साथ रहता है।जो सबकी सहायता करता है। जिससे गहरी जान-पहिचान डालनी बहुत जरूरी है (हे मन ! उसका सिमरन करने से) हरेक रोग का नाश हो जाता है। 2। हे भाई ! सबकी रक्षा करने की समर्था वाला बेअंत परमात्मा (माँ के पेट की) आग में (हरेक जीव की) रक्षा करता है।

संदर्भ: यह अंग 398 है, राग आसा का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।

M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।

मानसून की पहली बारिश, दिल्ली के पुराने मोहल्ले में।

ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।

यह अंग कुल 45 पंक्तियों का है, 5 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 398” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।

राग के context में: आसा राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।

पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।

अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।

“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।

नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।

अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।

तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।

हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।

ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।

दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।

“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।

हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।

अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।

आगे का अंग: अंग 399 →, पीछे का: ← अंग 397

हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।

(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)

शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।

संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।

शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।

संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।

एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।

अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।

स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।