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अंग 362

अंग
362
राग आसा
राग: आसा · रचयिता: Guru Amar Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
जो मनि राते हरि रंगु लाइ ॥
तिन का जनम मरण दुखु लाथा ते हरि दरगह मिले सुभाइ ॥1॥ रहाउ ॥
सबदु चाखै साचा सादु पाए ॥
हरि का नामु मंनि वसाए ॥
हरि प्रभु सदा रहिआ भरपूरि ॥
आपे नेड़ै आपे दूरि ॥2॥
आखणि आखै बकै सभु कोइ ॥
आपे बखसि मिलाए सोइ ॥
कहणै कथनि न पाइआ जाइ ॥
गुर परसादि वसै मनि आइ ॥3॥
गुरमुखि विचहु आपु गवाइ ॥
हरि रंगि राते मोहु चुकाइ ॥
अति निरमलु गुर सबद वीचार ॥
नानक नामि सवारणहार ॥4॥4॥43॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: (हे भाई !) जो मनुष्य परमात्मा का प्रेम-रंग इस्तेमाल कर करके अपने मन में (प्रेम रंग से) रंगे जाते हैं। उन मनुष्यों का जनम-मरण का चक्कर का दुख दूर हो जाता है। प्रेम की बरकति से वह मनुष्य परमात्मा की हजूरी में टिके रहते हैं। 1। रहाउ। (हे भाई !) जो मनुष्य गुरू के शबद का रस चखता है उसे सच्चा स्वाद आ जाता है और परमात्मा का नाम उसके ह्रदय में बस जाता है (उसे फिर प्रत्यक्ष यूँ दिखता है कि) परमात्मा सदा हर जगह व्याप रहा है। वह खुद ही (हरेक जीव के) अंग-संग है और खुद ही दूर (अपहुँच) भी है। 2। (हे भाई !) रिवाजी तौर पर (कहने को तो) हरेक मनुष्य कहता है। सुनाता है कि (परमात्मा) हरेक के नजदीक बसता है। पर जिस किसी को वह अपने चरणों में मिलाता है। वह खुद ही मेहर करके मिलाता है। ज़ुबानी कहने अथवा बातें करने से परमात्मा नहीं मिलता। गुरू की किरपा से मन में आ बसता है। 3। गुरू के सन्मुख रहने वाला मनुष्य अपने अंदर से स्वै-भाव दूर कर लेता है। और परमात्मा के प्रेम रंग में रंग के (अपने अंदर से माया का) मोह समाप्त कर लेता है। हे नानक ! गुरू के शबद की विचार मनुष्य को बहुत पवित्र जीवन वाला बना देती है। प्रभू नाम में जुड़ के मनुष्य औरों का जीवन सँवारने के लायक भी हो जाता है। 4। 4। 43।
आसा महला 3 ॥
दूजै भाइ लगे दुखु पाइआ ॥
बिनु सबदै बिरथा जनमु गवाइआ ॥
सतिगुरु सेवै सोझी होइ ॥
दूजै भाइ न लागै कोइ ॥1॥
मूलि लागे से जन परवाणु ॥
अनदिनु राम नामु जपि हिरदै गुर सबदी हरि एको जाणु ॥1॥ रहाउ ॥
डाली लागै निहफलु जाइ ॥
अंधंी कंमी अंध सजाइ ॥
मनमुखु अंधा ठउर न पाइ ॥
बिसटा का कीड़ा बिसटा माहि पचाइ ॥2॥
गुर की सेवा सदा सुखु पाए ॥
संतसंगति मिलि हरि गुण गाए ॥
नामे नामि करे वीचारु ॥
आपि तरै कुल उधरणहारु ॥3॥
गुर की बाणी नामि वजाए ॥
नानक महलु सबदि घरु पाए ॥
गुरमति सत सरि हरि जलि नाइआ ॥
दुरमति मैलु सभु दुरतु गवाइआ ॥4॥5॥44॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: आसा महला 3 ॥ (जो मनुष्य परमात्मा को छोड़ के) किसी और के प्यार में मस्त रहते हैं उन्होंने दुख ही दुख सहा। गुरू के शबद से वंचित रहके उन्होंने अपनी जिंदगी व्यर्थ गवा ली। जो कोई मनुष्य गुरू के बताए राह पर चलता है उसे (सही जीवन की) समझ आ जाती है। वह फिर माया के प्यार में नहीं लगता। 1। (हे भाई ! जो मनुष्य) जगत के रचयता परमात्मा (की याद) में जुड़ते हैं वह मनुष्य (परमात्मा की नजरों में) कबूल हो जाते हैं। परमात्मा का नाम हर समय अपने हृदय में जपके गुरू के शबद की बरकति से मनुष्य एक परमात्मा के साथ गहरी सांझ डाल लेता है। 1। रहाउ। (जो मनुष्य जगत के मूल-प्रभू-वृक्ष को छोड़ के उसकी रची हुई माया रूपी) टहनियों से चिपका रहता है वह निष्फल ही जाता है (जीवन-फल प्राप्त नहीं कर सकता)। बे-समझी के कामों पड़ के सजा भुगतता है (माया के मोह में) अंधा हुआ मनुष्य (माया की भटकनों से बचने का) ठिकाना तलाश नहीं सकता (वह मनुष्य माया के मोह में ऐसे) दुखी होता है (जैसे) गंदगी का कीड़ा गंद में। 2। जो मनुष्य गुरू की बताई हुई सेवा करता है वह सदा आत्मिक आनंद पाता है (क्योंकि) साध-संगति में मिल के वह परमात्मा के गुण गाता रहता है (सिफत सालाह करता रहता है)। वह सदा परमात्मा के नाम में जुड़ के (परमात्मा के गुणों की) विचार करता है। (इस तरह) वह स्वयं (संसार समुंद्र से) पार लांघ जाता है और अपने कुलों को भी पार लंघाने के काबिल हो जाता है। 3। परमात्मा के नाम में जुड़ के जो मनुष्य सतिगुरू की बाणी (का बाजा) बजाता है (अपने अंदर गुरू की बाणी का पूर्ण प्रभाव डाले रखता है)। हे नानक ! गुरू के शबद की बरकति से वह मनुष्य परमात्मा के चरणों में घर महल हासिल कर लेता है। गुरू की मति ले के जिस मनुष्य ने सत्संग-सरोवर में परमात्मा के नाम-जल से स्नान किया। उसने बुरी खोटी मति की मैल धो ली। उसने (अपने अंदर से) सारे पाप दूर कर लिए। 4। 5। 44।
आसा महला 3 ॥
मनमुख मरहि मरि मरणु विगाड़हि ॥
दूजै भाइ आतम संघारहि ॥
मेरा मेरा करि करि विगूता ॥
आतमु न चीन॑ै भरमै विचि सूता ॥1॥
मरु मुइआ सबदे मरि जाइ ॥
उसतति निंदा गुरि सम जाणाई इसु जुग महि लाहा हरि जपि लै जाइ ॥1॥ रहाउ ॥
नाम विहूण गरभ गलि जाइ ॥
बिरथा जनमु दूजै लोभाइ ॥
नाम बिहूणी दुखि जलै सबाई ॥
सतिगुरि पूरै बूझ बुझाई ॥2॥
मनु चंचलु बहु चोटा खाइ ॥
एथहु छुड़किआ ठउर न पाइ ॥
गरभ जोनि विसटा का वासु ॥
तितु घरि मनमुखु करे निवासु ॥3॥
अपुने सतिगुर कउ सदा बलि जाई ॥
गुरमुखि जोती जोति मिलाई ॥
निरमल बाणी निज घरि वासा ॥
नानक हउमै मारे सदा उदासा ॥4॥6॥45॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: आसा महला 3 ॥ अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्य (आत्मिक मौत) मरते हैं (इस तरह) मर के वह अपनी मौत ख़राब करते हैं। क्योंकि माया के मोह में पड़ के वे अपना आत्मिक जीवन तबाह कर लेते हैं। अपने मन के पीछे चलने वाला मनुष्य (ये धन) मेरा है (ये परिवार) मेरा है, नित्य यही कह,कह के दुखी होता रहता है। कभी अपने आत्मिक जीवन को नहीं पड़तालता। माया की भटकना में पड़ कर (आत्मिक जीवन) की ओर से गाफ़िल हुआ रहता है। 1। वह मनुष्य (माया के मोह की और से) बेदाग़ मौत मरता है। गुरू के शबद के द्वारा (मोह से) वह अछूता रहता है। कोई भला कहे या बुरा कहे। इसे एक जैसा ही सहना- गुरू ने जिस मनुष्य को ये सूझ बख्श दी है। वह मनुष्य इस जीवन में परमात्मा का नाम जप के (जगत से) कमाई कर के जाता है। 1। रहाउ। नाम से वंचित रहके मनुष्य जनम-मरन के चक्करों में आत्मिक जीवन नाश कर लेता है। वह सदा माया के मोह में फसा रहता है (इस वास्ते) उसकी जिंदगी व्यर्थ चली जाती है। नाम से जुदा रह के सारी दुनिया दुख में जलती रहती है। पर ये समझ पूरे गुरू ने (किसी विरले को) बख्शी है। 2। जिस मनुष्य का मन हर समय माया के मोह में भटकता है वह मोह की चोटें खाता रहता है। इस मानस जीवन में (सिमरन से) खोया हुआ फिर आत्मिक आनंद की जगह नहीं प्राप्त कर सकता। जनम-मरण का चक्र (मानो) गंदगी का घर है। इस घर में उस मनुष्य का निवास बना रहता है जो अपने मन के पीछे चलता है। 3। (हे भाई !) मैं अपने सतिगुरू पर से सदा सदके जाता हूँ। गुरू की शरण पड़ने वाले मनुष्य की सुरति को गुरू परमात्मा की ज्योति में मिला देता है। हे नानक ! गुरू की पवित्र बाणी की बरकति से अपने असल घर में (प्रभू-चरणों में) ठिकाना मिल जाता है। (गुरू की मेहर से मनुष्य) अहंकार को खत्म कर लेता है और (माया के मोह की ओर से) सदा उपराम रहता है। 4। 6। 45।
आसा महला 3 ॥
लालै आपणी जाति गवाई ॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: आसा महला 3 ॥ सेवक ने अपनी (अलग) हस्ती मिटा ली होती है।

आसा राग सुबह की पहली रोशनी का है, उम्मीद से भरा, चलने को तैयार। आसा का अर्थ ही ‘आशा’ है। ‘आसा दी वार’ सिख परम्परा की सुबह-कीर्तन का केन्द्र-स्तम्भ रही है, चार-पाँच सदियों से। आसा राग का क्षेत्र है। ‘आसा दी वार’ की रचना गुरु नानक की है, बाद में गुरु अंगद और गुरु अर्जन के साथ संगठित हुई।

अमरदास जी ने एक ऐसी उम्र में गुरु-गद्दी पायी जब अधिकांश लोग रिटायर हो जाते हैं। उनकी रचनाओं में एक बड़े आदमी की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध उनका सीधा रुख़ बाद की सिख-परम्परा का foundational-वाक्य बना।

इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(हे भाई !) जो मनुष्य परमात्मा का प्रेम-रंग इस्तेमाल कर करके अपने मन में (प्रेम रंग से) रंगे जाते हैं।”

पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।