अंग
386
राग आसा
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਸੋ ਨਾਮੁ ਜਪੈ ਜੋ ਜਨੁ ਤੁਧੁ ਭਾਵੈ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਤਨੁ ਮਨੁ ਸੀਤਲੁ ਜਪਿ ਨਾਮੁ ਤੇਰਾ ॥
ਹਰਿ ਹਰਿ ਜਪਤ ਢਹੈ ਦੁਖ ਡੇਰਾ ॥੨॥
ਹੁਕਮੁ ਬੂਝੈ ਸੋਈ ਪਰਵਾਨੁ ॥
ਸਾਚੁ ਸਬਦੁ ਜਾ ਕਾ ਨੀਸਾਨੁ ॥੩॥
ਗੁਰਿ ਪੂਰੈ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਦ੍ਰਿੜਾਇਆ ॥
ਭਨਤਿ ਨਾਨਕੁ ਮੇਰੈ ਮਨਿ ਸੁਖੁ ਪਾਇਆ ॥੪॥੮॥੫੯॥
ਤਨੁ ਮਨੁ ਸੀਤਲੁ ਜਪਿ ਨਾਮੁ ਤੇਰਾ ॥
ਹਰਿ ਹਰਿ ਜਪਤ ਢਹੈ ਦੁਖ ਡੇਰਾ ॥੨॥
ਹੁਕਮੁ ਬੂਝੈ ਸੋਈ ਪਰਵਾਨੁ ॥
ਸਾਚੁ ਸਬਦੁ ਜਾ ਕਾ ਨੀਸਾਨੁ ॥੩॥
ਗੁਰਿ ਪੂਰੈ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਦ੍ਰਿੜਾਇਆ ॥
ਭਨਤਿ ਨਾਨਕੁ ਮੇਰੈ ਮਨਿ ਸੁਖੁ ਪਾਇਆ ॥੪॥੮॥੫੯॥
सो नामु जपै जो जनु तुधु भावै ॥१॥ रहाउ ॥
तनु मनु सीतलु जपि नामु तेरा ॥
हरि हरि जपत ढहै दुख डेरा ॥२॥
हुकमु बूझै सोई परवानु ॥
साचु सबदु जा का नीसानु ॥३॥
गुरि पूरै हरि नामु द्रिड़ाइआ ॥
भनति नानकु मेरै मनि सुखु पाइआ ॥४॥८॥५९॥
तनु मनु सीतलु जपि नामु तेरा ॥
हरि हरि जपत ढहै दुख डेरा ॥२॥
हुकमु बूझै सोई परवानु ॥
साचु सबदु जा का नीसानु ॥३॥
गुरि पूरै हरि नामु द्रिड़ाइआ ॥
भनति नानकु मेरै मनि सुखु पाइआ ॥४॥८॥५९॥
हिन्दी अर्थ: (पर) वही मनुष्य तेरा नाम जपता है जो तुझे प्यारा लगता है (जिस पे तेरी मेहर होती है)। 1।रहाउ। हे प्रभू ! तेरा नाम जप के मन शांत हो जाता है।शरीर (भी।हरेक ज्ञानेन्द्रिय भी) जप के शांत हो जाते हैं। हे भाई ! परमात्मा का नाम जपते हुए दुखों का डेरा ही उठ जाता है। 2। वह मनुष्य (परमात्मा की हजूरी में) कबूल हो जाता है, (जो परमात्मा की) रजा को समझ लेता है (रजा में खुशी से) राजी रहता है और जिस मनुष्य के पास सदा कायम रहने वाले परमात्मा की सिफत सालाह की बाणी की राहदारी है नानक कहता है, (हे भाई ! जब से) पूरे गुरू ने परमात्मा का नाम मेरे हृदय में पक्का कर दिया है (तब से) मेरे मन ने (सदा) सुख ही अनुभव किया है। 4। 8। 59।
ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਜਹਾ ਪਠਾਵਹੁ ਤਹ ਤਹ ਜਾੲਂੀ ॥
ਜੋ ਤੁਮ ਦੇਹੁ ਸੋਈ ਸੁਖੁ ਪਾੲਂੀ ॥੧॥
ਸਦਾ ਚੇਰੇ ਗੋਵਿੰਦ ਗੋਸਾਈ ॥
ਤੁਮੑਰੀ ਕ੍ਰਿਪਾ ਤੇ ਤ੍ਰਿਪਤਿ ਅਘਾੲਂੀ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਤੁਮਰਾ ਦੀਆ ਪੈਨੑਉ ਖਾੲਂੀ ॥
ਤਉ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ਪ੍ਰਭ ਸੁਖੀ ਵਲਾੲਂੀ ॥੨॥
ਮਨ ਤਨ ਅੰਤਰਿ ਤੁਝੈ ਧਿਆੲਂੀ ॥
ਤੁਮੑਰੈ ਲਵੈ ਨ ਕੋਊ ਲਾੲਂੀ ॥੩॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਨਿਤ ਇਵੈ ਧਿਆੲਂੀ ॥
ਗਤਿ ਹੋਵੈ ਸੰਤਹ ਲਗਿ ਪਾੲਂੀ ॥੪॥੯॥੬੦॥
ਜਹਾ ਪਠਾਵਹੁ ਤਹ ਤਹ ਜਾੲਂੀ ॥
ਜੋ ਤੁਮ ਦੇਹੁ ਸੋਈ ਸੁਖੁ ਪਾੲਂੀ ॥੧॥
ਸਦਾ ਚੇਰੇ ਗੋਵਿੰਦ ਗੋਸਾਈ ॥
ਤੁਮੑਰੀ ਕ੍ਰਿਪਾ ਤੇ ਤ੍ਰਿਪਤਿ ਅਘਾੲਂੀ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਤੁਮਰਾ ਦੀਆ ਪੈਨੑਉ ਖਾੲਂੀ ॥
ਤਉ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ਪ੍ਰਭ ਸੁਖੀ ਵਲਾੲਂੀ ॥੨॥
ਮਨ ਤਨ ਅੰਤਰਿ ਤੁਝੈ ਧਿਆੲਂੀ ॥
ਤੁਮੑਰੈ ਲਵੈ ਨ ਕੋਊ ਲਾੲਂੀ ॥੩॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਨਿਤ ਇਵੈ ਧਿਆੲਂੀ ॥
ਗਤਿ ਹੋਵੈ ਸੰਤਹ ਲਗਿ ਪਾੲਂੀ ॥੪॥੯॥੬੦॥
आसा महला ५ ॥
जहा पठावहु तह तह जाइंी ॥
जो तुम देहु सोई सुखु पाइंी ॥१॥
सदा चेरे गोविंद गोसाई ॥
तुम॑री क्रिपा ते त्रिपति अघाइंी ॥१॥ रहाउ ॥
तुमरा दीआ पैन॑उ खाइंी ॥
तउ प्रसादि प्रभ सुखी वलाइंी ॥२॥
मन तन अंतरि तुझै धिआइंी ॥
तुम॑रै लवै न कोऊ लाइंी ॥३॥
कहु नानक नित इवै धिआइंी ॥
गति होवै संतह लगि पाइंी ॥४॥९॥६०॥
जहा पठावहु तह तह जाइंी ॥
जो तुम देहु सोई सुखु पाइंी ॥१॥
सदा चेरे गोविंद गोसाई ॥
तुम॑री क्रिपा ते त्रिपति अघाइंी ॥१॥ रहाउ ॥
तुमरा दीआ पैन॑उ खाइंी ॥
तउ प्रसादि प्रभ सुखी वलाइंी ॥२॥
मन तन अंतरि तुझै धिआइंी ॥
तुम॑रै लवै न कोऊ लाइंी ॥३॥
कहु नानक नित इवै धिआइंी ॥
गति होवै संतह लगि पाइंी ॥४॥९॥६०॥
हिन्दी अर्थ: आसा महला ५ ॥ (हे गोबिंद ! ये तेरी ही मेहर है कि) जिधर तू मुझे भेजता हॅ।मैं उधर उधर ही (खुशी से) जाता हूँ। (सुख हो चाहे दुख हो) जो कुछ तू मुझे देता है।मैं उसको (सिर माथे पे) सुख (जान के) मानता हूँ। 1। हे गोबिंद ! हे गुसाई ! (मेहर कर।मैं) सदा तेरा दास बना रहूँ (क्योंकि) तेरी कृपा से ही मैं माया की तृष्णा से सदा तृप्त रहता हूँ। 1।रहाउ। हे प्रभू ! जो कुछ तू मुझे (पहनने को खाने को) देता है वही मैं (संतोष से) पहनता हूँ और खाता हूँ। तेरी कृपा से मैं (अपना जीवन) सुख आनंद से व्यतीत कर रहा हूँ। 2। हे प्रभू ! मैं अपने मन में अपने हृदय में (सदा) तुझे ही याद करता रहता हूँ। तेरे बराबर का मैं और किसी को नहीं समझता। 3। हे नानक ! (प्रभू दर पर अरदास करता रह और) कह, (हे प्रभू ! मेहर कर) मैं इसी तरह सदा तुझे सिमरता रहूँ। (तेरी मेहर हो तो तेरे) संत जनों के चरणों में लग के मुझे ऊँची आत्मिक अवस्था मिली रहे। 4। 9। 60।
ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਊਠਤ ਬੈਠਤ ਸੋਵਤ ਧਿਆਈਐ ॥
ਮਾਰਗਿ ਚਲਤ ਹਰੇ ਹਰਿ ਗਾਈਐ ॥੧॥
ਸ੍ਰਵਨ ਸੁਨੀਜੈ ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਕਥਾ ॥
ਜਾਸੁ ਸੁਨੀ ਮਨਿ ਹੋਇ ਅਨੰਦਾ ਦੂਖ ਰੋਗ ਮਨ ਸਗਲੇ ਲਥਾ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਕਾਰਜਿ ਕਾਮਿ ਬਾਟ ਘਾਟ ਜਪੀਜੈ ॥
ਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ਹਰਿ ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਪੀਜੈ ॥੨॥
ਦਿਨਸੁ ਰੈਨਿ ਹਰਿ ਕੀਰਤਨੁ ਗਾਈਐ ॥
ਸੋ ਜਨੁ ਜਮ ਕੀ ਵਾਟ ਨ ਪਾਈਐ ॥੩॥
ਆਠ ਪਹਰ ਜਿਸੁ ਵਿਸਰਹਿ ਨਾਹੀ ॥
ਗਤਿ ਹੋਵੈ ਨਾਨਕ ਤਿਸੁ ਲਗਿ ਪਾਈ ॥੪॥੧੦॥੬੧॥
ਊਠਤ ਬੈਠਤ ਸੋਵਤ ਧਿਆਈਐ ॥
ਮਾਰਗਿ ਚਲਤ ਹਰੇ ਹਰਿ ਗਾਈਐ ॥੧॥
ਸ੍ਰਵਨ ਸੁਨੀਜੈ ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਕਥਾ ॥
ਜਾਸੁ ਸੁਨੀ ਮਨਿ ਹੋਇ ਅਨੰਦਾ ਦੂਖ ਰੋਗ ਮਨ ਸਗਲੇ ਲਥਾ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਕਾਰਜਿ ਕਾਮਿ ਬਾਟ ਘਾਟ ਜਪੀਜੈ ॥
ਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ਹਰਿ ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਪੀਜੈ ॥੨॥
ਦਿਨਸੁ ਰੈਨਿ ਹਰਿ ਕੀਰਤਨੁ ਗਾਈਐ ॥
ਸੋ ਜਨੁ ਜਮ ਕੀ ਵਾਟ ਨ ਪਾਈਐ ॥੩॥
ਆਠ ਪਹਰ ਜਿਸੁ ਵਿਸਰਹਿ ਨਾਹੀ ॥
ਗਤਿ ਹੋਵੈ ਨਾਨਕ ਤਿਸੁ ਲਗਿ ਪਾਈ ॥੪॥੧੦॥੬੧॥
आसा महला ५ ॥
ऊठत बैठत सोवत धिआईऐ ॥
मारगि चलत हरे हरि गाईऐ ॥१॥
स्रवन सुनीजै अंम्रित कथा ॥
जासु सुनी मनि होइ अनंदा दूख रोग मन सगले लथा ॥१॥ रहाउ ॥
कारजि कामि बाट घाट जपीजै ॥
गुर प्रसादि हरि अंम्रितु पीजै ॥२॥
दिनसु रैनि हरि कीरतनु गाईऐ ॥
सो जनु जम की वाट न पाईऐ ॥३॥
आठ पहर जिसु विसरहि नाही ॥
गति होवै नानक तिसु लगि पाई ॥४॥१०॥६१॥
ऊठत बैठत सोवत धिआईऐ ॥
मारगि चलत हरे हरि गाईऐ ॥१॥
स्रवन सुनीजै अंम्रित कथा ॥
जासु सुनी मनि होइ अनंदा दूख रोग मन सगले लथा ॥१॥ रहाउ ॥
कारजि कामि बाट घाट जपीजै ॥
गुर प्रसादि हरि अंम्रितु पीजै ॥२॥
दिनसु रैनि हरि कीरतनु गाईऐ ॥
सो जनु जम की वाट न पाईऐ ॥३॥
आठ पहर जिसु विसरहि नाही ॥
गति होवै नानक तिसु लगि पाई ॥४॥१०॥६१॥
हिन्दी अर्थ: आसा महला ५ ॥ (हे भाई !) उठते बैठते सोते (जागते हर वक्त) परमात्मा को याद करते रहना चाहिए। रास्ते में चलते हुए भी सदा परमात्मा की सिफत सालाह करते रहना चाहिए। 1। (हे भाई !) कानों से (परमात्मा की) आत्मिक जीवन देने वाली सिफत सालाह सुनते रहना चाहिए जिसके सुनने से मन में आत्मिक आनंद पैदा होता है और मन के सारे दुख-रोग दूर हो जाते हैं। 1।रहाउ। (हे भाई !) हरेक काम काज करते हुए।रास्ते पर चलते हुए।नदी घाट पार करते हुए परमात्मा का नाम जपते रहना चाहिए और गुरू की कृपा की बरकति से आत्मिक जीवन देने वाला हरि-नाम जल पीते रहना चाहिए। 2। (हे भाई1) दिन-रात परमात्मा के सिफत सालाह के गीत गाते रहना चाहिए (जो ये काम करता रहता है) जिंदगी के सफर में आत्मिक मौत उसके नजदीक नहीं फटकती। 3। हे नानक ! (कह, हे प्रभू !) जिस मनुष्य को आठों पहर किसी (भी वक्त) तू नहीं बिसरता। उसके चरणों में लग के (और मनुष्यों को भी) ऊँची आत्मिक अवस्था मिल जाती है। 4। 10। 61।
ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਜਾ ਕੈ ਸਿਮਰਨਿ ਸੂਖ ਨਿਵਾਸੁ ॥
ਭਈ ਕਲਿਆਣ ਦੁਖ ਹੋਵਤ ਨਾਸੁ ॥੧॥
ਅਨਦੁ ਕਰਹੁ ਪ੍ਰਭ ਕੇ ਗੁਨ ਗਾਵਹੁ ॥
ਸਤਿਗੁਰੁ ਅਪਨਾ ਸਦ ਸਦਾ ਮਨਾਵਹੁ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਸਤਿਗੁਰ ਕਾ ਸਚੁ ਸਬਦੁ ਕਮਾਵਹੁ ॥
ਥਿਰੁ ਘਰਿ ਬੈਠੇ ਪ੍ਰਭੁ ਅਪਨਾ ਪਾਵਹੁ ॥੨॥
ਪਰ ਕਾ ਬੁਰਾ ਨ ਰਾਖਹੁ ਚੀਤ ॥
ਤੁਮ ਕਉ ਦੁਖੁ ਨਹੀ ਭਾਈ ਮੀਤ ॥੩॥
ਹਰਿ ਹਰਿ ਤੰਤੁ ਮੰਤੁ ਗੁਰਿ ਦੀਨੑਾ ॥
ਇਹੁ ਸੁਖੁ ਨਾਨਕ ਅਨਦਿਨੁ ਚੀਨੑਾ ॥੪॥੧੧॥੬੨॥
ਜਾ ਕੈ ਸਿਮਰਨਿ ਸੂਖ ਨਿਵਾਸੁ ॥
ਭਈ ਕਲਿਆਣ ਦੁਖ ਹੋਵਤ ਨਾਸੁ ॥੧॥
ਅਨਦੁ ਕਰਹੁ ਪ੍ਰਭ ਕੇ ਗੁਨ ਗਾਵਹੁ ॥
ਸਤਿਗੁਰੁ ਅਪਨਾ ਸਦ ਸਦਾ ਮਨਾਵਹੁ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਸਤਿਗੁਰ ਕਾ ਸਚੁ ਸਬਦੁ ਕਮਾਵਹੁ ॥
ਥਿਰੁ ਘਰਿ ਬੈਠੇ ਪ੍ਰਭੁ ਅਪਨਾ ਪਾਵਹੁ ॥੨॥
ਪਰ ਕਾ ਬੁਰਾ ਨ ਰਾਖਹੁ ਚੀਤ ॥
ਤੁਮ ਕਉ ਦੁਖੁ ਨਹੀ ਭਾਈ ਮੀਤ ॥੩॥
ਹਰਿ ਹਰਿ ਤੰਤੁ ਮੰਤੁ ਗੁਰਿ ਦੀਨੑਾ ॥
ਇਹੁ ਸੁਖੁ ਨਾਨਕ ਅਨਦਿਨੁ ਚੀਨੑਾ ॥੪॥੧੧॥੬੨॥
आसा महला ५ ॥
जा कै सिमरनि सूख निवासु ॥
भई कलिआण दुख होवत नासु ॥१॥
अनदु करहु प्रभ के गुन गावहु ॥
सतिगुरु अपना सद सदा मनावहु ॥१॥ रहाउ ॥
सतिगुर का सचु सबदु कमावहु ॥
थिरु घरि बैठे प्रभु अपना पावहु ॥२॥
पर का बुरा न राखहु चीत ॥
तुम कउ दुखु नही भाई मीत ॥३॥
हरि हरि तंतु मंतु गुरि दीन॑ा ॥
इहु सुखु नानक अनदिनु चीन॑ा ॥४॥११॥६२॥
जा कै सिमरनि सूख निवासु ॥
भई कलिआण दुख होवत नासु ॥१॥
अनदु करहु प्रभ के गुन गावहु ॥
सतिगुरु अपना सद सदा मनावहु ॥१॥ रहाउ ॥
सतिगुर का सचु सबदु कमावहु ॥
थिरु घरि बैठे प्रभु अपना पावहु ॥२॥
पर का बुरा न राखहु चीत ॥
तुम कउ दुखु नही भाई मीत ॥३॥
हरि हरि तंतु मंतु गुरि दीन॑ा ॥
इहु सुखु नानक अनदिनु चीन॑ा ॥४॥११॥६२॥
हिन्दी अर्थ: आसा महला ५ ॥ (हे भाई ! गुरू के कहे अनुसार उस परमात्मा का सिमरन करते रहो) जिसके सिमरन की बरकति से (मन में) सुख का वासा हो जाता है। सदा सुख-शांति बनी रहती है और दुखों का नाश हो जाता है। 1। (गुरू के हुकम अनुसार) परमात्मा की सिफत सालाह करते रहा करो (इसका नतीजा ये होगा कि सदा) आत्मिक आनंद पाते रहोगे। (हे भाई ! अपने गुरू के उपदेश के अनुसार चल के) सदा ही गुरू की प्रसन्नता प्राप्त करते रहो 1।रहाउ। (हे भाई !) सदा स्थिर परमात्मा की सिफत सालाह वाले गुर-शबद को हर समय हृदय में रखो (शबद अनुसार अपना जीवन घड़ते रहो। इस शबद की बरकति से अपने) हृदय-घर में अडोल टिके रहोगे (भटकना खत्म हो जाएगी) और परमात्मा को अपने अंदर ही पा लोगे। 2। हे भाई ! हे मित्र ! कभी किसी का बुरा ना चितवा करो (कभी मन में ये इच्छा ना पैदा होने दो कि किसी का नुकसान हो। इसका नतीजा ये होगा कि) तुम्हें भी कोई दुख नहीं व्यापेगा। 3। हे नानक ! जिस मनुष्य को गुरू ने परमात्मा के नाम का ही तंत्र मन्त्र (टोना टोटका ) दिया है।परमात्मा के नाम का ही मंत्र दिया है (वह मंत्र-टूणों द्वारा दूसरों का बुरा चितवने की जगह। अपने अंदर) हर समय (परमात्मा के नाम से पैदा हुआ) आत्मिक आनंद बसा पहचान लेता है। 4। 11। 62।
ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਜਿਸੁ ਨੀਚ ਕਉ ਕੋਈ ਨ ਜਾਨੈ ॥
ਨਾਮੁ ਜਪਤ ਉਹੁ ਚਹੁ ਕੁੰਟ ਮਾਨੈ ॥੧॥
ਦਰਸਨੁ ਮਾਗਉ ਦੇਹਿ ਪਿਆਰੇ ॥
ਤੁਮਰੀ ਸੇਵਾ ਕਉਨ ਕਉਨ ਨ ਤਾਰੇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਜਾ ਕੈ ਨਿਕਟਿ ਨ ਆਵੈ ਕੋਈ ॥
ਸਗਲ ਸ੍ਰਿਸਟਿ ਉਆ ਕੇ ਚਰਨ ਮਲਿ ਧੋਈ ॥੨॥
ਜੋ ਪ੍ਰਾਨੀ ਕਾਹੂ ਨ ਆਵਤ ਕਾਮ ॥
ਸੰਤ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ਤਾ ਕੋ ਜਪੀਐ ਨਾਮ ॥੩॥
ਸਾਧਸੰਗਿ ਮਨ ਸੋਵਤ ਜਾਗੇ ॥
ਤਬ ਪ੍ਰਭ ਨਾਨਕ ਮੀਠੇ ਲਾਗੇ ॥੪॥੧੨॥੬੩॥
ਜਿਸੁ ਨੀਚ ਕਉ ਕੋਈ ਨ ਜਾਨੈ ॥
ਨਾਮੁ ਜਪਤ ਉਹੁ ਚਹੁ ਕੁੰਟ ਮਾਨੈ ॥੧॥
ਦਰਸਨੁ ਮਾਗਉ ਦੇਹਿ ਪਿਆਰੇ ॥
ਤੁਮਰੀ ਸੇਵਾ ਕਉਨ ਕਉਨ ਨ ਤਾਰੇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਜਾ ਕੈ ਨਿਕਟਿ ਨ ਆਵੈ ਕੋਈ ॥
ਸਗਲ ਸ੍ਰਿਸਟਿ ਉਆ ਕੇ ਚਰਨ ਮਲਿ ਧੋਈ ॥੨॥
ਜੋ ਪ੍ਰਾਨੀ ਕਾਹੂ ਨ ਆਵਤ ਕਾਮ ॥
ਸੰਤ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ਤਾ ਕੋ ਜਪੀਐ ਨਾਮ ॥੩॥
ਸਾਧਸੰਗਿ ਮਨ ਸੋਵਤ ਜਾਗੇ ॥
ਤਬ ਪ੍ਰਭ ਨਾਨਕ ਮੀਠੇ ਲਾਗੇ ॥੪॥੧੨॥੬੩॥
आसा महला ५ ॥
जिसु नीच कउ कोई न जानै ॥
नामु जपत उहु चहु कुंट मानै ॥१॥
दरसनु मागउ देहि पिआरे ॥
तुमरी सेवा कउन कउन न तारे ॥१॥ रहाउ ॥
जा कै निकटि न आवै कोई ॥
सगल स्रिसटि उआ के चरन मलि धोई ॥२॥
जो प्रानी काहू न आवत काम ॥
संत प्रसादि ता को जपीऐ नाम ॥३॥
साधसंगि मन सोवत जागे ॥
तब प्रभ नानक मीठे लागे ॥४॥१२॥६३॥
जिसु नीच कउ कोई न जानै ॥
नामु जपत उहु चहु कुंट मानै ॥१॥
दरसनु मागउ देहि पिआरे ॥
तुमरी सेवा कउन कउन न तारे ॥१॥ रहाउ ॥
जा कै निकटि न आवै कोई ॥
सगल स्रिसटि उआ के चरन मलि धोई ॥२॥
जो प्रानी काहू न आवत काम ॥
संत प्रसादि ता को जपीऐ नाम ॥३॥
साधसंगि मन सोवत जागे ॥
तब प्रभ नानक मीठे लागे ॥४॥१२॥६३॥
हिन्दी अर्थ: आसा महला ५ ॥ हे प्रभू ! जिस मनुष्य को नीच जाति का समझ के कोई जानता-पहचानता भी नहीं तेरा नाम जपने की बरकति से सारे जगत में उसका आदर-मान होने लगता है।1। हे प्यारे प्रभू ! मैं तेरा दर्शन मांगता हूँ (मुझे अपने दर्शनों की दाति) दे। जिसने तेरी सेवा-भक्ति की उस उस को (तूने अपने दर्शन दे के) संसार-समुंद्र से पार लंघा दिया। 1।रहाउ। हे प्रभू ! (कंगाल जान के) जिस मनुष्य के पास भी कोई नहीं फटकता (तेरा नाम जपने की बरकति से फिर) सारी लुकाई उसके पैर मल-मल के धोने लग पड़ती है। हे प्रभू ! जो मनुष्य (पहले) किसी का कोई काम सँवारने के काबिल नहीं था (अब) गुरू की कृपा से (तेरा नाम जपने के कारण) उसे हर जगह याद किया जाता है। 3। हे नानक ! (कह,) हे मन ! साध-संगति में आ के (माया के मोह की नींद में) सोए हुए लोग जाग पड़ते हैं (आत्मिक जीवन की सूझ प्राप्त कर लेते हैं। और) तब उन्हें प्रभू जी प्यारे लगने लग पड़ते हैं। 4। 12। 63।
ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਏਕੋ ਏਕੀ ਨੈਨ ਨਿਹਾਰਉ ॥
ਸਦਾ ਸਦਾ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਸਮੑਾਰਉ ॥੧॥
ਏਕੋ ਏਕੀ ਨੈਨ ਨਿਹਾਰਉ ॥
ਸਦਾ ਸਦਾ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਸਮੑਾਰਉ ॥੧॥
आसा महला ५ ॥
एको एकी नैन निहारउ ॥
सदा सदा हरि नामु सम॑ारउ ॥१॥
एको एकी नैन निहारउ ॥
सदा सदा हरि नामु सम॑ारउ ॥१॥
हिन्दी अर्थ: आसा महला ५ ॥ (हे भाई ! गुरू के प्रताप के सदके ही) मैं परमातमा को हर जगह ही बसता अपनी आँखों से देखता हूँ। और सदा ही परमात्मा का नाम अपने दिल में टिकाए रखता हूँ। 1।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 386 है, राग आसा का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।
M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।
Lohri की रात अगियारी के पास, गाने और तिल-गुड़।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 54 पंक्तियों का है, 6 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 386” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: आसा राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 387 →, पीछे का: ← अंग 385।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।