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अंग 486

अंग
486
राग आसा
राग: आसा · रचयिता: Bhagat Ravi Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
राम रसाइन पीउ रे दगरा ॥3॥4॥
भगत रविदास चमार जाति के थे, बनारस से, पंद्रहवीं सदी के मध्य के। उनकी वाणी में बराबरी, श्रम, और एक तरह की शांत आत्म-स्वीकृति है। आज भी ‘रविदासी’ परम्परा एक बड़े समुदाय की पहचान है।

हिन्दी अर्थ: हे कठोर चित्त मनुष्य ! परमात्मा के नाम का अमृत पी (और पाखण्ड छोड़)। 3। 4।
आसा ॥
पारब्रहमु जि चीन॑सी आसा ते न भावसी ॥
रामा भगतह चेतीअले अचिंत मनु राखसी ॥1॥
कैसे मन तरहिगा रे संसारु सागरु बिखै को बना ॥
झूठी माइआ देखि कै भूला रे मना ॥1॥ रहाउ ॥
छीपे के घरि जनमु दैला गुर उपदेसु भैला ॥
संतह कै परसादि नामा हरि भेटुला ॥2॥5॥
रविदास जी का जीवन और वाणी एक ही धागे से बुने हुए हैं। चमड़े का काम करते-करते उन्होंने काशी के पंडितों के साथ एक तरह की समानांतर परम्परा खड़ी की।

हिन्दी अर्थ: आसा ॥ जो मनुष्य परमात्मा के साथ जान-पहिचान बना लेते हैं।उन्हें और-और आशाएं अच्छी नहीं लगती। जिन संत-जनों ने प्रभू को सिमरा है।प्रभू उनके मन को चिंता से बचाए रखता है। 1। हे (मेरे) मन ! संसार-समुंद्र से कैसे पार उतरेगा।इस (संसार समुंद्र) में विकारों का पानी (भरा पड़ा) है। हे मन ! ये नाशवान मायावी पदार्थ देख के आप (परमात्मा की तरफ से) टूट गया है। 1।रहाउ। मुझ नामदेव को (चाहे जैसे भी) धोबी के घर जनम दिया।पर (उसकी मेहर से) मुझे सतिगुरू का उपदेश मिल गया; अब संत जनों की कृपा से मुझे (नामदेव) को ईश्वर मिल गया है। 2। 5।
आसा बाणी स्री रविदास जीउ की
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
म्रिग मीन भ्रिंग पतंग कुंचर एक दोख बिनास ॥
पंच दोख असाध जा महि ता की केतक आस ॥1॥
माधो अबिदिआ हित कीन ॥
बिबेक दीप मलीन ॥1॥ रहाउ ॥
त्रिगद जोनि अचेत संभव पुंन पाप असोच ॥
मानुखा अवतार दुलभ तिही संगति पोच ॥2॥
जीअ जंत जहा जहा लगु करम के बसि जाइ ॥
काल फास अबध लागे कछु न चलै उपाइ ॥3॥
रविदास दास उदास तजु भ्रमु तपन तपु गुर गिआन ॥
भगत जन भै हरन परमानंद करहु निदान ॥4॥1॥
भगत रविदास चमार जाति के थे, बनारस से, पंद्रहवीं सदी के मध्य के। उनकी वाणी में बराबरी, श्रम, और एक तरह की शांत आत्म-स्वीकृति है। आज भी ‘रविदासी’ परम्परा एक बड़े समुदाय की पहचान है।

हिन्दी अर्थ: आसा बाणी श्री रविदास जीउ की ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। हिरन।मछली।भौरा।पतंगा। हाथी- एक एक ऐब के कारण इनका नाश हो जाता है। पर इस मनुष्य में ये पाँचों असाध रोग हैं।इसे बचने की कब तक उम्मीद की जा सकती है। 1। हे प्रभू जीव अज्ञानता से प्यार कर रहे हैं। इस वास्ते इनके विवेक का दीपक धुंधला हो गया है (भाव।परख-हीन हो रहे हैं।भले बुरे की पहचान नहीं करते)। 1।रहाउ। पशु आदि टेढ़े चलने वालों की जूनों के जीव विचार-हीन हैं।उनका पाप-पुंन की ओर से बेपरवाह रहना कुदरती है; पर मनुष्य को ये जनम मुश्किल से मिला है।इसकी संगति भी नीच विकारों के साथ ही है (इसे तो सोचना चाहिए था)। 2। किए कर्मों के अधीन जनम ले के जीव जहाँ-जहाँ भी हैं। सारे जीव-जंतुओं को काल की (आत्मिक मौत की) ऐसी फाही पड़ी हुई है जो काटी नहीं जा सकती।इनकी कुछ पेश नहीं चलती। 3। हे रविदास ! हे प्रभू के दास रविदास ! आप तो विकारों के मोह में से निकल; ये भटकना छोड़ दे।सतिगुरू का ज्ञान कमा।यही तपों का तप है। भक्त जनों के भय दूर करने वाले हे प्रभू ! आखिर मुझ रविदास को भी (अपने प्यार का) परम-आनंद बख्शो (मैं आपकी शरण आया हूँ)। 4। 1।
आसा ॥
संत तुझी तनु संगति प्रान ॥
सतिगुर गिआन जानै संत देवा देव ॥1॥
संत ची संगति संत कथा रसु ॥ संत प्रेम माझै दीजै देवा देव ॥1॥ रहाउ ॥
संत आचरण संत चो मारगु संत च ओल्हग ओल्हगणी ॥2॥
अउर इक मागउ भगति चिंतामणि ॥
जणी लखावहु असंत पापी सणि ॥3॥
रविदासु भणै जो जाणै सो जाणु ॥
संत अनंतहि अंतरु नाही ॥4॥2॥
रविदास जी का जीवन और वाणी एक ही धागे से बुने हुए हैं। चमड़े का काम करते-करते उन्होंने काशी के पंडितों के साथ एक तरह की समानांतर परम्परा खड़ी की।

हिन्दी अर्थ: आसा ॥ संतों की संगति आपकी जिंद-जान है। हे देवों के देव प्रभू ! सतिगुरू की मति ले के संतों (की उपमा) को (मनुष्य) समझ लेता है कि संत आपका ही रूप हैं। 1। हे देवताओं के देवते प्रभू ! मुझे संतों की संगति बख्श।मेहर कर।मैं संतों की प्रभू-कथा का रस ले सकूँ; मुझे संतों का (भाव।संतों से) प्रेम (करने की दाति) दे। 1।रहाउ। हे प्रभू ! मुझे संतों वाली करणी।संतों का रास्ता।संतों के दासों की सेवा बख्श। 2। मैं आपसे एक और (दाति भी) मांगता हूँ।मुझे अपनी भक्ति दे।जो मन-चिंदे फल देने वाली मणि है; मुझे विकारियों और पापियों के दर्शन ना कराना। 3। रविदास कहता है,असल में समझदार वह मनुष्य है जो यह जानता है कि संतों और बेअंत प्रभू में कोई अंतर नहीं। 4। 2।
आसा ॥
तुम चंदन हम इरंड बापुरे संगि तुमारे बासा ॥
नीच रूख ते ऊच भए है गंध सुगंध निवासा ॥1॥
माधउ सतसंगति सरनि तुम॑ारी ॥
हम अउगन तुम॑ उपकारी ॥1॥ रहाउ ॥
तुम मखतूल सुपेद सपीअल हम बपुरे जस कीरा ॥
सतसंगति मिलि रहीऐ माधउ जैसे मधुप मखीरा ॥2॥
जाती ओछा पाती ओछा ओछा जनमु हमारा ॥
राजा राम की सेव न कीनी कहि रविदास चमारा ॥3॥3॥
भगत रविदास चमार जाति के थे, बनारस से, पंद्रहवीं सदी के मध्य के। उनकी वाणी में बराबरी, श्रम, और एक तरह की शांत आत्म-स्वीकृति है। आज भी ‘रविदासी’ परम्परा एक बड़े समुदाय की पहचान है।

हिन्दी अर्थ: आसा ॥ हे माधो ! आप चंदन का पौधा है।मैं निमाणा सा हरिण्ड हूँ (पर आपकी मेहर से) मुझे आपके (चरणों) में रहने के लिए जगह मिल गई है। आपकी सुंदर मीठी वासना मेरे अंदर बस गई है।अब मैं नीचे पौधे से ऊँचा बन गया हूँ। 1। हे माधो ! मैंने आपकी साध-संगति की ओट पकड़ी है (मुझे यहाँ से विछुड़ने ना देना)। मैं बुरे कामों वाला हूँ (आपका सत्संग छोड़ के दुबारा बुरी तरफ चल पड़ता हूँ।पर) आप मेहर करने वाला है (और फिर जोड़ लेता है)। 1।रहाउ। हे माधो ! आप सफेद पीला (सुंदर सा) रेशम है।मैं निमाणा (उस) कीड़े की तरह हूँ (जो रेशम को छोड़ के बाहर निकल जाता है और मर जाता है)। माधो ! (मेहर कर) मैं आपकी साध-संगति में जुड़ा रहूँ।जैसे शहिद की मक्खियां शहद के छत्ते में (टिकी रहती हैं)। 2। रविदास चमार कहता है, (लोगों की नजरों में) मेरी जाति नीच।मेरा कुल नीच।मेरा जनम नीच (पर। हे माधव ! मेरी जाति।जनम और कुल सचमुच नीच ही रह जाएंगे) अगर मैंने।हे मेरे मालिक प्रभू ! आपकी भक्ति ना की। 3। 3।
आसा ॥
कहा भइओ जउ तनु भइओ छिनु छिनु ॥
प्रेमु जाइ तउ डरपै तेरो जनु ॥1॥
तुझहि चरन अरबिंद भवन मनु ॥
पान करत पाइओ पाइओ रामईआ धनु ॥1॥ रहाउ ॥
संपति बिपति पटल माइआ धनु ॥
रविदास जी का जीवन और वाणी एक ही धागे से बुने हुए हैं। चमड़े का काम करते-करते उन्होंने काशी के पंडितों के साथ एक तरह की समानांतर परम्परा खड़ी की।

हिन्दी अर्थ: आसा ॥ (ये नाम-धन ढूँढ के अब) अगर मेरा शरीर नाश भी हो जाए तो भी मुझे कोई परवाह नहीं। हे राम ! आपका सेवक तभी घबराएगा अगर (इसके मन में से आपके चरणों का) प्यार दूर होंगे। 1। (हे सुंदर राम !) मेरा मन कमल फूल जैसे सुंदर आपके चरणों को अपने रहने की जगह बना चुका है; (आपके चरण-कमलों में नाम-रस) पीते-पीते मैंने पा लिया है मैंने पा लिया है आपका नाम-धन। 1।रहाउ। सुख।बिपता। धन- ये माया के पर्दे हैं (जो मनुष्य की बुद्धि पर पड़े रहते हैं);

आसा राग सुबह की पहली रोशनी का है, उम्मीद से भरा, चलने को तैयार। आसा का अर्थ ही ‘आशा’ है। ‘आसा दी वार’ सिख परम्परा की सुबह-कीर्तन का केन्द्र-स्तम्भ रही है, चार-पाँच सदियों से। आसा राग का क्षेत्र है। ‘आसा दी वार’ की रचना गुरु नानक की है, बाद में गुरु अंगद और गुरु अर्जन के साथ संगठित हुई।

रविदास जी का जीवन और वाणी एक ही धागे से बुने हुए हैं। चमड़े का काम करते-करते उन्होंने काशी के पंडितों के साथ एक तरह की समानांतर परम्परा खड़ी की, जिसने सामाजिक संरचना को अंदर से चुनौती दी।

इस अंग पर 6 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे कठोर चित्त मनुष्य ! परमात्मा के नाम का अमृत पी (और पाखण्ड छोड़)।”

पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।