अंग
389
राग आसा
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ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਤੂ ਮੇਰਾ ਤਰੰਗੁ ਹਮ ਮੀਨ ਤੁਮਾਰੇ ॥
ਤੂ ਮੇਰਾ ਠਾਕੁਰੁ ਹਮ ਤੇਰੈ ਦੁਆਰੇ ॥੧॥
ਤੂੰ ਮੇਰਾ ਕਰਤਾ ਹਉ ਸੇਵਕੁ ਤੇਰਾ ॥
ਸਰਣਿ ਗਹੀ ਪ੍ਰਭ ਗੁਨੀ ਗਹੇਰਾ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਤੂ ਮੇਰਾ ਜੀਵਨੁ ਤੂ ਆਧਾਰੁ ॥
ਤੁਝਹਿ ਪੇਖਿ ਬਿਗਸੈ ਕਉਲਾਰੁ ॥੨॥
ਤੂ ਮੇਰੀ ਗਤਿ ਪਤਿ ਤੂ ਪਰਵਾਨੁ ॥
ਤੂ ਸਮਰਥੁ ਮੈ ਤੇਰਾ ਤਾਣੁ ॥੩॥
ਅਨਦਿਨੁ ਜਪਉ ਨਾਮ ਗੁਣਤਾਸਿ ॥
ਨਾਨਕ ਕੀ ਪ੍ਰਭ ਪਹਿ ਅਰਦਾਸਿ ॥੪॥੨੩॥੭੪॥
ਤੂ ਮੇਰਾ ਤਰੰਗੁ ਹਮ ਮੀਨ ਤੁਮਾਰੇ ॥
ਤੂ ਮੇਰਾ ਠਾਕੁਰੁ ਹਮ ਤੇਰੈ ਦੁਆਰੇ ॥੧॥
ਤੂੰ ਮੇਰਾ ਕਰਤਾ ਹਉ ਸੇਵਕੁ ਤੇਰਾ ॥
ਸਰਣਿ ਗਹੀ ਪ੍ਰਭ ਗੁਨੀ ਗਹੇਰਾ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਤੂ ਮੇਰਾ ਜੀਵਨੁ ਤੂ ਆਧਾਰੁ ॥
ਤੁਝਹਿ ਪੇਖਿ ਬਿਗਸੈ ਕਉਲਾਰੁ ॥੨॥
ਤੂ ਮੇਰੀ ਗਤਿ ਪਤਿ ਤੂ ਪਰਵਾਨੁ ॥
ਤੂ ਸਮਰਥੁ ਮੈ ਤੇਰਾ ਤਾਣੁ ॥੩॥
ਅਨਦਿਨੁ ਜਪਉ ਨਾਮ ਗੁਣਤਾਸਿ ॥
ਨਾਨਕ ਕੀ ਪ੍ਰਭ ਪਹਿ ਅਰਦਾਸਿ ॥੪॥੨੩॥੭੪॥
आसा महला ५ ॥
तू मेरा तरंगु हम मीन तुमारे ॥
तू मेरा ठाकुरु हम तेरै दुआरे ॥१॥
तूं मेरा करता हउ सेवकु तेरा ॥
सरणि गही प्रभ गुनी गहेरा ॥१॥ रहाउ ॥
तू मेरा जीवनु तू आधारु ॥
तुझहि पेखि बिगसै कउलारु ॥२॥
तू मेरी गति पति तू परवानु ॥
तू समरथु मै तेरा ताणु ॥३॥
अनदिनु जपउ नाम गुणतासि ॥
नानक की प्रभ पहि अरदासि ॥४॥२३॥७४॥
तू मेरा तरंगु हम मीन तुमारे ॥
तू मेरा ठाकुरु हम तेरै दुआरे ॥१॥
तूं मेरा करता हउ सेवकु तेरा ॥
सरणि गही प्रभ गुनी गहेरा ॥१॥ रहाउ ॥
तू मेरा जीवनु तू आधारु ॥
तुझहि पेखि बिगसै कउलारु ॥२॥
तू मेरी गति पति तू परवानु ॥
तू समरथु मै तेरा ताणु ॥३॥
अनदिनु जपउ नाम गुणतासि ॥
नानक की प्रभ पहि अरदासि ॥४॥२३॥७४॥
हिन्दी अर्थ: आसा महला ५ ॥ हे मालिक प्रभू ! तू मेरा दरिया है।मैं तेरी मछली हूँ (मछली की तरह मैं जब तक तेरे में टिका रहता हूँ तब तक मुझे आत्मिक जीवन मिला रहता है)। हे प्रभू ! तू मेरा मालिक है।मैं तेरे दर पे आ गिरा हूँ। 1। हे प्रभू ! तू मेरा पैदा करने वाला है।मैं तेरा दास हूँ। हे सारे गुणों के गहरे समुंद्र प्रभू ! मैंने तेरी शरण पकड़ी है। 1।रहाउ। हे प्रभू ! तू ही मेरी जिंदगी (का मूल) है तू ही मेरा आसरा है। तुझे देख के (मेरा हृदय ऐसे) खिलता है (जैसे) कमल फूल (सूरज को देख के खिलता है)। 2। हे प्रभू ! तू ही मेरी ऊँची आत्मिक अवस्था और (लोक-परलोक की) इज्जत (का रखवाला) है।(जो कुछ) तू (करता है वह) मैं खुशी से मानता हूँ। तू हरेक ताकत का मालिक है।मुझे तेरा ही सहारा है। 3। मैं सदा हर समय तेरा ही नाम जपता रहूँ- हे प्रभू ! हे गुणों के खजाने ! नानक की तेरे पास ये विनती है4। 23। 74।
ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਰੋਵਨਹਾਰੈ ਝੂਠੁ ਕਮਾਨਾ ॥
ਹਸਿ ਹਸਿ ਸੋਗੁ ਕਰਤ ਬੇਗਾਨਾ ॥੧॥
ਕੋ ਮੂਆ ਕਾ ਕੈ ਘਰਿ ਗਾਵਨੁ ॥
ਕੋ ਰੋਵੈ ਕੋ ਹਸਿ ਹਸਿ ਪਾਵਨੁ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਬਾਲ ਬਿਵਸਥਾ ਤੇ ਬਿਰਧਾਨਾ ॥
ਪਹੁਚਿ ਨ ਮੂਕਾ ਫਿਰਿ ਪਛੁਤਾਨਾ ॥੨॥
ਤ੍ਰਿਹੁ ਗੁਣ ਮਹਿ ਵਰਤੈ ਸੰਸਾਰਾ ॥
ਨਰਕ ਸੁਰਗ ਫਿਰਿ ਫਿਰਿ ਅਉਤਾਰਾ ॥੩॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਜੋ ਲਾਇਆ ਨਾਮ ॥
ਸਫਲ ਜਨਮੁ ਤਾ ਕਾ ਪਰਵਾਨ ॥੪॥੨੪॥੭੫॥
ਰੋਵਨਹਾਰੈ ਝੂਠੁ ਕਮਾਨਾ ॥
ਹਸਿ ਹਸਿ ਸੋਗੁ ਕਰਤ ਬੇਗਾਨਾ ॥੧॥
ਕੋ ਮੂਆ ਕਾ ਕੈ ਘਰਿ ਗਾਵਨੁ ॥
ਕੋ ਰੋਵੈ ਕੋ ਹਸਿ ਹਸਿ ਪਾਵਨੁ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਬਾਲ ਬਿਵਸਥਾ ਤੇ ਬਿਰਧਾਨਾ ॥
ਪਹੁਚਿ ਨ ਮੂਕਾ ਫਿਰਿ ਪਛੁਤਾਨਾ ॥੨॥
ਤ੍ਰਿਹੁ ਗੁਣ ਮਹਿ ਵਰਤੈ ਸੰਸਾਰਾ ॥
ਨਰਕ ਸੁਰਗ ਫਿਰਿ ਫਿਰਿ ਅਉਤਾਰਾ ॥੩॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਜੋ ਲਾਇਆ ਨਾਮ ॥
ਸਫਲ ਜਨਮੁ ਤਾ ਕਾ ਪਰਵਾਨ ॥੪॥੨੪॥੭੫॥
आसा महला ५ ॥
रोवनहारै झूठु कमाना ॥
हसि हसि सोगु करत बेगाना ॥१॥
को मूआ का कै घरि गावनु ॥
को रोवै को हसि हसि पावनु ॥१॥ रहाउ ॥
बाल बिवसथा ते बिरधाना ॥
पहुचि न मूका फिरि पछुताना ॥२॥
त्रिहु गुण महि वरतै संसारा ॥
नरक सुरग फिरि फिरि अउतारा ॥३॥
कहु नानक जो लाइआ नाम ॥
सफल जनमु ता का परवान ॥४॥२४॥७५॥
रोवनहारै झूठु कमाना ॥
हसि हसि सोगु करत बेगाना ॥१॥
को मूआ का कै घरि गावनु ॥
को रोवै को हसि हसि पावनु ॥१॥ रहाउ ॥
बाल बिवसथा ते बिरधाना ॥
पहुचि न मूका फिरि पछुताना ॥२॥
त्रिहु गुण महि वरतै संसारा ॥
नरक सुरग फिरि फिरि अउतारा ॥३॥
कहु नानक जो लाइआ नाम ॥
सफल जनमु ता का परवान ॥४॥२४॥७५॥
हिन्दी अर्थ: आसा महला ५ ॥ (हे भाई ! जहाँ कोई मरता है तो उसे कोई संबंधी रोता है वह) रोने वाला भी (अपने दुखों को रोता है और इस तरह) झूठा रोना ही रोता है। अगर कोई बेगाना मनुष्य (उसके मरने पे अफ़सोस करने आता है वह) हॅस-हॅस के अफ़सोस करता है। 1। (हे भाई !)जहाँ कोई मरता है (वहाँ रोना-धोना हो रहा है)।और किसी के घर में (किसी खुशी आदि के कारण) गाना-बजाना हो रहा है। कोई रोता है कोई हॅस-हॅस पड़ता है (जगत में सुख-दुख का चक्कर चलता ही रहता है। )। 1।रहाउ। बाल उम्र से ले के बुढे होने तक (मनुष्य आगे-आगे वाली उम्र में सुख की आस धारता है। पर अगली अवस्था पर) मुश्किल से पहुँचता ही है (कि वहाँ भी दुख देख के सुख की आस त्याग देता है।और) फिर पछताता है (कि ऐसे ही आशाएं बनाता रहा)। 2। (हे भाई !) जगत माया के तीन गुणों के प्रभाव में ही दौड़-भाग कर रहा है और बार-बार (कभी) नर्कों (दुखों) में (कभी) स्वर्गों (सुखों) में पड़ता है (कभी सुख पाता है कभी दुख भोगता है)। 3। हे नानक ! कह,जिस मनुष्य को परमात्मा अपने नाम में जोड़ता है उसका मानस जनम कामयाब हो जाता है। (वह परमात्मा की नजरों में) कबूल हो जाता है। 4। 24। 75।
ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਸੋਇ ਰਹੀ ਪ੍ਰਭ ਖਬਰਿ ਨ ਜਾਨੀ ॥
ਭੋਰੁ ਭਇਆ ਬਹੁਰਿ ਪਛੁਤਾਨੀ ॥੧॥
ਪ੍ਰਿਅ ਪ੍ਰੇਮ ਸਹਜਿ ਮਨਿ ਅਨਦੁ ਧਰਉ ਰੀ ॥
ਪ੍ਰਭ ਮਿਲਬੇ ਕੀ ਲਾਲਸਾ ਤਾ ਤੇ ਆਲਸੁ ਕਹਾ ਕਰਉ ਰੀ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਕਰ ਮਹਿ ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਆਣਿ ਨਿਸਾਰਿਓ ॥
ਖਿਸਰਿ ਗਇਓ ਭੂਮ ਪਰਿ ਡਾਰਿਓ ॥੨॥
ਸਾਦਿ ਮੋਹਿ ਲਾਦੀ ਅਹੰਕਾਰੇ ॥
ਦੋਸੁ ਨਾਹੀ ਪ੍ਰਭ ਕਰਣੈਹਾਰੇ ॥੩॥
ਸਾਧਸੰਗਿ ਮਿਟੇ ਭਰਮ ਅੰਧਾਰੇ ॥
ਨਾਨਕ ਮੇਲੀ ਸਿਰਜਣਹਾਰੇ ॥੪॥੨੫॥੭੬॥
ਸੋਇ ਰਹੀ ਪ੍ਰਭ ਖਬਰਿ ਨ ਜਾਨੀ ॥
ਭੋਰੁ ਭਇਆ ਬਹੁਰਿ ਪਛੁਤਾਨੀ ॥੧॥
ਪ੍ਰਿਅ ਪ੍ਰੇਮ ਸਹਜਿ ਮਨਿ ਅਨਦੁ ਧਰਉ ਰੀ ॥
ਪ੍ਰਭ ਮਿਲਬੇ ਕੀ ਲਾਲਸਾ ਤਾ ਤੇ ਆਲਸੁ ਕਹਾ ਕਰਉ ਰੀ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਕਰ ਮਹਿ ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਆਣਿ ਨਿਸਾਰਿਓ ॥
ਖਿਸਰਿ ਗਇਓ ਭੂਮ ਪਰਿ ਡਾਰਿਓ ॥੨॥
ਸਾਦਿ ਮੋਹਿ ਲਾਦੀ ਅਹੰਕਾਰੇ ॥
ਦੋਸੁ ਨਾਹੀ ਪ੍ਰਭ ਕਰਣੈਹਾਰੇ ॥੩॥
ਸਾਧਸੰਗਿ ਮਿਟੇ ਭਰਮ ਅੰਧਾਰੇ ॥
ਨਾਨਕ ਮੇਲੀ ਸਿਰਜਣਹਾਰੇ ॥੪॥੨੫॥੭੬॥
आसा महला ५ ॥
सोइ रही प्रभ खबरि न जानी ॥
भोरु भइआ बहुरि पछुतानी ॥१॥
प्रिअ प्रेम सहजि मनि अनदु धरउ री ॥
प्रभ मिलबे की लालसा ता ते आलसु कहा करउ री ॥१॥ रहाउ ॥
कर महि अंम्रितु आणि निसारिओ ॥
खिसरि गइओ भूम परि डारिओ ॥२॥
सादि मोहि लादी अहंकारे ॥
दोसु नाही प्रभ करणैहारे ॥३॥
साधसंगि मिटे भरम अंधारे ॥
नानक मेली सिरजणहारे ॥४॥२५॥७६॥
सोइ रही प्रभ खबरि न जानी ॥
भोरु भइआ बहुरि पछुतानी ॥१॥
प्रिअ प्रेम सहजि मनि अनदु धरउ री ॥
प्रभ मिलबे की लालसा ता ते आलसु कहा करउ री ॥१॥ रहाउ ॥
कर महि अंम्रितु आणि निसारिओ ॥
खिसरि गइओ भूम परि डारिओ ॥२॥
सादि मोहि लादी अहंकारे ॥
दोसु नाही प्रभ करणैहारे ॥३॥
साधसंगि मिटे भरम अंधारे ॥
नानक मेली सिरजणहारे ॥४॥२५॥७६॥
हिन्दी अर्थ: आसा महला ५ ॥ हे सखी ! (जो जीव-स्त्री माया के मोह की नींद में) सोई रहती है (आत्मिक जीवन की ओर से बेपरवाह टिकी रहती है) वह प्रभू (के मिलाप) की किसी शिक्षा को नहीं समझती। पर जब दिन चढ़ आता है (जिंदगी की रात समाप्त हो के मौत का समय आ जाता है) तबवह पछताती है। 1। हे सखी ! प्यारे (प्रभू) के प्रेम की बरकति से आत्मिक अडोलता में टिक के मैं अपने मन में (उसके दर्शनों की तांघ का) आनंद टिकाए रखती हूँ। हे सखी ! (मेरे अंदर हर वक्त) प्रभू के मिलाप की तमन्ना बनी रहती है।इस वास्ते (उसे याद रखने में) मैं कभी भी आलस नहीं कर सकती। 1।रहाउ। हे सखी ! (मानस जनम दे के परमात्मा ने) हमारे हाथों में आत्मिक जीवन देने वाला नाम-जल ला के डाला था (हमें नाम-अंमृत पीने का मौका दिया था।पर जो जीव-स्त्री सारी उम्र मोह की नींद में सोई रहती है।उसके हाथों में से वह अमृत) बह जाता है और मिट्टी में जा मिलता है। 2। (जीव-स्त्री स्वयं ही) पदार्थों के स्वाद मेंमाया के मोह में अहंकार में दबी रहती है। हे सखी ! (जीव-स्त्री के इस दुर्भाग्य के बारे में) सृजनहार प्रभू को कोई दोष नहीं दिया जा सकता। 3। हे नानक ! साध-संगति में आ के (जिस जीव-स्त्री के अंदर से) माया की भटकना के अंधेरे मिट जाते हैं। सृजनहार प्रभू (उसे अपने चरणों में) जोड़ लेता है। 4। 25। 76।
ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਚਰਨ ਕਮਲ ਕੀ ਆਸ ਪਿਆਰੇ ॥
ਜਮਕੰਕਰ ਨਸਿ ਗਏ ਵਿਚਾਰੇ ॥੧॥
ਤੂ ਚਿਤਿ ਆਵਹਿ ਤੇਰੀ ਮਇਆ ॥
ਸਿਮਰਤ ਨਾਮ ਸਗਲ ਰੋਗ ਖਇਆ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਅਨਿਕ ਦੂਖ ਦੇਵਹਿ ਅਵਰਾ ਕਉ ॥
ਪਹੁਚਿ ਨ ਸਾਕਹਿ ਜਨ ਤੇਰੇ ਕਉ ॥੨॥
ਦਰਸ ਤੇਰੇ ਕੀ ਪਿਆਸ ਮਨਿ ਲਾਗੀ ॥
ਸਹਜ ਅਨੰਦ ਬਸੈ ਬੈਰਾਗੀ ॥੩॥
ਨਾਨਕ ਕੀ ਅਰਦਾਸਿ ਸੁਣੀਜੈ ॥
ਕੇਵਲ ਨਾਮੁ ਰਿਦੇ ਮਹਿ ਦੀਜੈ ॥੪॥੨੬॥੭੭॥
ਚਰਨ ਕਮਲ ਕੀ ਆਸ ਪਿਆਰੇ ॥
ਜਮਕੰਕਰ ਨਸਿ ਗਏ ਵਿਚਾਰੇ ॥੧॥
ਤੂ ਚਿਤਿ ਆਵਹਿ ਤੇਰੀ ਮਇਆ ॥
ਸਿਮਰਤ ਨਾਮ ਸਗਲ ਰੋਗ ਖਇਆ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਅਨਿਕ ਦੂਖ ਦੇਵਹਿ ਅਵਰਾ ਕਉ ॥
ਪਹੁਚਿ ਨ ਸਾਕਹਿ ਜਨ ਤੇਰੇ ਕਉ ॥੨॥
ਦਰਸ ਤੇਰੇ ਕੀ ਪਿਆਸ ਮਨਿ ਲਾਗੀ ॥
ਸਹਜ ਅਨੰਦ ਬਸੈ ਬੈਰਾਗੀ ॥੩॥
ਨਾਨਕ ਕੀ ਅਰਦਾਸਿ ਸੁਣੀਜੈ ॥
ਕੇਵਲ ਨਾਮੁ ਰਿਦੇ ਮਹਿ ਦੀਜੈ ॥੪॥੨੬॥੭੭॥
आसा महला ५ ॥
चरन कमल की आस पिआरे ॥
जमकंकर नसि गए विचारे ॥१॥
तू चिति आवहि तेरी मइआ ॥
सिमरत नाम सगल रोग खइआ ॥१॥ रहाउ ॥
अनिक दूख देवहि अवरा कउ ॥
पहुचि न साकहि जन तेरे कउ ॥२॥
दरस तेरे की पिआस मनि लागी ॥
सहज अनंद बसै बैरागी ॥३॥
नानक की अरदासि सुणीजै ॥
केवल नामु रिदे महि दीजै ॥४॥२६॥७७॥
चरन कमल की आस पिआरे ॥
जमकंकर नसि गए विचारे ॥१॥
तू चिति आवहि तेरी मइआ ॥
सिमरत नाम सगल रोग खइआ ॥१॥ रहाउ ॥
अनिक दूख देवहि अवरा कउ ॥
पहुचि न साकहि जन तेरे कउ ॥२॥
दरस तेरे की पिआस मनि लागी ॥
सहज अनंद बसै बैरागी ॥३॥
नानक की अरदासि सुणीजै ॥
केवल नामु रिदे महि दीजै ॥४॥२६॥७७॥
हिन्दी अर्थ: आसा महला ५ ॥ हे प्यारे प्रभू ! जिस मनुष्य के हृदय में तेरे सुंदर चरणों से जुड़ने की आस पैदा हो जाती है। जम-दूत भी उस पर अपना जोर ना पड़ता देख के उससे दूर भाग जाते हैं। 1। हे प्रभू ! जिस मनुष्य पे तेरी मेहर होती है उसके चित्त में तू आ बसता है। तेरा नाम सिमरने से उसके सारे रोग नाश हो जाते हैं। 1।रहाउ। हे प्रभू ! औरों को तो (ये जम-दूत) अनेकों किस्म के दुख देते हैं। पर सेवक कें ये नजदीक भी नहीं फटक सकते। 2। हे प्रभू ! जिस मनुष्य के मन में तेरे दर्शन की तमन्ना पैदा होती है वह माया की ओर से वैरागवान हो के आत्मिक अडोलता के आनंद में टिका रहता है। 3। हे प्रभू ! (अपने सेवक) नानक की भी आरजू सुन। (नानक को अपना) सिर्फ नाम हृदय में (बसाने के लिए) दे। 4। 26। 77।
ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਮਨੁ ਤ੍ਰਿਪਤਾਨੋ ਮਿਟੇ ਜੰਜਾਲ ॥
ਪ੍ਰਭੁ ਅਪੁਨਾ ਹੋਇਆ ਕਿਰਪਾਲ ॥੧॥
ਸੰਤ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ਭਲੀ ਬਨੀ ॥
ਜਾ ਕੈ ਗ੍ਰਿਹਿ ਸਭੁ ਕਿਛੁ ਹੈ ਪੂਰਨੁ ਸੋ ਭੇਟਿਆ ਨਿਰਭੈ ਧਨੀ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਨਾਮੁ ਦ੍ਰਿੜਾਇਆ ਸਾਧ ਕ੍ਰਿਪਾਲ ॥
ਮਿਟਿ ਗਈ ਭੂਖ ਮਹਾ ਬਿਕਰਾਲ ॥੨॥
ਠਾਕੁਰਿ ਅਪੁਨੈ ਕੀਨੀ ਦਾਤਿ ॥
ਜਲਨਿ ਬੁਝੀ ਮਨਿ ਹੋਈ ਸਾਂਤਿ ॥੩॥
ਮਿਟਿ ਗਈ ਭਾਲ ਮਨੁ ਸਹਜਿ ਸਮਾਨਾ ॥
ਮਨੁ ਤ੍ਰਿਪਤਾਨੋ ਮਿਟੇ ਜੰਜਾਲ ॥
ਪ੍ਰਭੁ ਅਪੁਨਾ ਹੋਇਆ ਕਿਰਪਾਲ ॥੧॥
ਸੰਤ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ਭਲੀ ਬਨੀ ॥
ਜਾ ਕੈ ਗ੍ਰਿਹਿ ਸਭੁ ਕਿਛੁ ਹੈ ਪੂਰਨੁ ਸੋ ਭੇਟਿਆ ਨਿਰਭੈ ਧਨੀ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਨਾਮੁ ਦ੍ਰਿੜਾਇਆ ਸਾਧ ਕ੍ਰਿਪਾਲ ॥
ਮਿਟਿ ਗਈ ਭੂਖ ਮਹਾ ਬਿਕਰਾਲ ॥੨॥
ਠਾਕੁਰਿ ਅਪੁਨੈ ਕੀਨੀ ਦਾਤਿ ॥
ਜਲਨਿ ਬੁਝੀ ਮਨਿ ਹੋਈ ਸਾਂਤਿ ॥੩॥
ਮਿਟਿ ਗਈ ਭਾਲ ਮਨੁ ਸਹਜਿ ਸਮਾਨਾ ॥
आसा महला ५ ॥
मनु त्रिपतानो मिटे जंजाल ॥
प्रभु अपुना होइआ किरपाल ॥१॥
संत प्रसादि भली बनी ॥
जा कै ग्रिहि सभु किछु है पूरनु सो भेटिआ निरभै धनी ॥१॥ रहाउ ॥
नामु द्रिड़ाइआ साध क्रिपाल ॥
मिटि गई भूख महा बिकराल ॥२॥
ठाकुरि अपुनै कीनी दाति ॥
जलनि बुझी मनि होई सांति ॥३॥
मिटि गई भाल मनु सहजि समाना ॥
मनु त्रिपतानो मिटे जंजाल ॥
प्रभु अपुना होइआ किरपाल ॥१॥
संत प्रसादि भली बनी ॥
जा कै ग्रिहि सभु किछु है पूरनु सो भेटिआ निरभै धनी ॥१॥ रहाउ ॥
नामु द्रिड़ाइआ साध क्रिपाल ॥
मिटि गई भूख महा बिकराल ॥२॥
ठाकुरि अपुनै कीनी दाति ॥
जलनि बुझी मनि होई सांति ॥३॥
मिटि गई भाल मनु सहजि समाना ॥
हिन्दी अर्थ: आसा महला ५ ॥ उसका मन माया की तृष्णा की ओर से तृप्त हो जाता है उसके माया के मोह के सारे बंधन टूट जाते हैं। (हे भाई ! जिस मनुष्य पर) प्यारा प्रभू दयावान हो जाता है 1। (हे भाई !) गुरू की कृपा से मेरे भाग्य जाग पड़े हैं मुझे वह मालिक मिल गया है जिसे किसी से कोई डर नहीं और जिसके घर में हरेक चीज ना समाप्त होने वाली है। 1।रहाउ। (हे भाई !) दया-स्वरूप गुरू ने (जिस मनुष्य के हृदय में) नाम पक्का कर दिया (उसके अंदर से) बड़ी डरावनी (माया की) भूख दूर हो गई। 2। (हे भाई !) ठाकुर प्रभू ने जिसको अपने नाम की दाति बख्शी (उसके मन में से तृष्णा की) जलन बुझ गई उसके मन में ठंड पड़ गई। 3। उसकी तलाश दूर हो गई, उसका मन आत्मिक अडोलता में टिक गया
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 389 है, राग आसा का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।
M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।
CBSE board-exam का दिन सुबह, बच्चा pencil-box check कर रहा, माँ चुप।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 54 पंक्तियों का है, 5 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 389” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: आसा राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 390 →, पीछे का: ← अंग 388।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।