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अंग 383

अंग
383
राग आसा
राग: आसा · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
आसा महला 5 ॥
आगै ही ते सभु किछु हूआ अवरु कि जाणै गिआना ॥
भूल चूक अपना बारिकु बखसिआ पारब्रहम भगवाना ॥1॥
सतिगुरु मेरा सदा दइआला मोहि दीन कउ राखि लीआ ॥
काटिआ रोगु महा सुखु पाइआ हरि अंम्रितु मुखि नामु दीआ ॥1॥ रहाउ ॥
अनिक पाप मेरे परहरिआ बंधन काटे मुकत भए ॥
अंध कूप महा घोर ते बाह पकरि गुरि काढि लीए ॥2॥
निरभउ भए सगल भउ मिटिआ राखे राखनहारे ॥
ऐसी दाति तेरी प्रभ मेरे कारज सगल सवारे ॥3॥
गुण निधान साहिब मनि मेला ॥
सरणि पइआ नानक सोुहेला ॥4॥9॥48॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: आसा महला 5 ॥ जो बख्शिश मेरे ऊपर हुई है धुर से ही हुई है, इसके बिना जीव और क्या ज्ञान समझ सकता है। मेरी अनेकों भूलें-चूकें देख के भी पारब्रहम भगवान ने मुझे अपने बालक को बख्श लिया है। 1। (हे भाई !) मेरा सतिगुरू सदा ही दयावान रहता है उसने मुझे (आत्मिक जीवन के सरमाए से) कंगाल को (आत्मिक मौत लाने वाले रोग से) बचा लिया। (सतिगुरू ने) मेरे मुंह में परमात्मा का आत्मिक जीवन देने वाला नाम-जल डाला (मेरा विकारों का) रोग काटा गया।मुझे बड़ा आत्मिक आनंद प्राप्त हुआ। 1।रहाउ। (हे भाई !) गुरू ने मेरे अनेकों पाप दूर कर दिए हैं।मेरे (माया के मोह के) बंधन काट दिए हैं।मैं (मोह के बंधनों से) स्वतंत्र हो गया हूँ। गुरू ने मेरी बाँह पकड़ के मुझे (माया के मोह के) घोर अंधकार में से निकाल लिया है। 2। (हे भाई ! विकारों से) बचा सकने की ताकत रखने वाले परमात्मा ने (मुझे विकारों से) बचा लिया है।अब (माया के हमलों से) बे-फिक्र हूँ। (इस ओर से) मेरा हरेक किस्म का डर-खतरा समाप्त हो गया है। हे मेरे प्रभू ! आपकी ऐसी बख्शिश मेरे ऊपर हुई है कि मेरे (आत्मिक जीवन के) सारे ही कारज सफल हैं गए हैं। 3। हे नानक ! (कह, हे भाई !) गुणों के खजाने मालिक-प्रभू का मेरे मन में मिलाप हो गया है (जब का गुरू की कृपा से) मैं (उसकी) शरण पड़ा हूँ मैं निष्चिंत हो गया हूँ। 4। 9। 48।
आसा महला 5 ॥
तूं विसरहि तां सभु को लागू चीति आवहि तां सेवा ॥
अवरु न कोऊ दूजा सूझै साचे अलख अभेवा ॥1॥
चीति आवै तां सदा दइआला लोगन किआ वेचारे ॥
बुरा भला कहु किस नो कहीऐ सगले जीअ तुम॑ारे ॥1॥ रहाउ ॥
तेरी टेक तेरा आधारा हाथ देइ तूं राखहि ॥
जिसु जन ऊपरि तेरी किरपा तिस कउ बिपु न कोऊ भाखै ॥2॥
ओहो सुखु ओहा वडिआई जो प्रभ जी मनि भाणी ॥
तूं दाना तूं सद मिहरवाना नामु मिलै रंगु माणी ॥3॥
तुधु आगै अरदासि हमारी जीउ पिंडु सभु तेरा ॥
कहु नानक सभ तेरी वडिआई कोई नाउ न जाणै मेरा ॥4॥10॥49॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: आसा महला 5 ॥ हे प्रभू ! यदि आप मेरे मन में से बिसर जाए तो हरेक जीव मुझे वैरी प्रतीत होता है।पर अगर आप मेरे चित्त में आ बसे तो हर कोई मेरा आदर-सत्कार करता है। हे सदा कायम रहने वाले ! हे अलख ! हे अभेव प्रभू ! मुझे (जगत में) आपके बराबर का और कोई नहीं दिखता। 1। हे भाई ! जिस मनुष्य के मन में परमात्मा की याद टिकी रहती है उस पर परमात्मा सदा दयावान रहता है।दुनिया के बिचारे लोग उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकते। हे प्रभू ! सारे जीव आपके पैदा किए हुए हैं।फिर बता।किसको ठीक कहा जा सकता है और किसे बुरा कहा जा सकता है।(भाव।परमातमा की याद मन में बसाने वाले मनुष्य को सब जीव परमात्मा के पैदा किए हुए दिखते हैं।वह किसी को बुरा नहीं समझता)। 1।रहाउ। हे प्रभू ! मुझे आपकी ही ओट है।आपका ही आसरा है।आप अपना हाथ दे के स्वयं (हमारी) रक्षा करता है। जिस मनुष्य पे आपकी (मेहर की) नजर हैं उसे कोई मनुष्य बुरे वचन नहीं कहता। 2। हे प्रभू जी !जो बात आपको अपने मन में अच्छी लगती है वही मेरे वास्ते सुख है।वही मेरे वास्ते आदर-सत्कार है। आप सबके दिल की जानने वाला है।आप सदा सब जीवों पे दयावान रहता है।मैं तभी आनंद ले सकता हूँ जब मुझे आपका नाम मिला रहे। 3। हे प्रभू ! आपके आगे मेरी अरदास है, मेरे ये प्राण ये शरीर सब कुछ आपका ही दिया हुआ है। हे नानक ! कह, (अगर कोई मेरा आदर-सत्कार करता है तो) ये आपकी ही बख्शी हुई वडिआई है।(यदि मैं आपको भुला बैठूँ तो) कोई जीव मेरा नाम पता करने की भी परवाह ना करे। 4। 10। 49।
आसा महला 5 ॥
करि किरपा प्रभ अंतरजामी साधसंगि हरि पाईऐ ॥
खोलि किवार दिखाले दरसनु पुनरपि जनमि न आईऐ ॥1॥
मिलउ परीतम सुआमी अपुने सगले दूख हरउ रे ॥
पारब्रहमु जिनि॑ रिदै अराधिआ ता कै संगि तरउ रे ॥1॥ रहाउ ॥
महा उदिआन पावक सागर भए हरख सोग महि बसना ॥
सतिगुरु भेटि भइआ मनु निरमलु जपि अंम्रितु हरि रसना ॥2॥
तनु धनु थापि कीओ सभु अपना कोमल बंधन बांधिआ ॥
गुर परसादि भए जन मुकते हरि हरि नामु अराधिआ ॥3॥
राखि लीए प्रभि राखनहारै जो प्रभ अपुने भाणे ॥
जीउ पिंडु सभु तुम॑रा दाते नानक सद कुरबाणे ॥4॥11॥50॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: आसा महला 5 ॥ हे सबके दिल की जानने वाले प्रभू ! मेहर कर (और मुझे गुरू की संगति मिला)।(हे भाई !) गुरू की संगति में रहने से परमात्मा मिल जाता है। हमारे (माया के मोह के बंद पड़े) किवाड़ खोल के अपने दर्शन करवाता है।और दुबारा (हम) जन्मों के चक्करों में नहीं पड़ते। 1। हे भाई ! (यदि मेरे ऊपर प्रभू की कृपा हो जाए तो) मैं अपने प्यारे पति-प्रभू को मिल जाऊँ और अपने सारे दुख दूर कर लूँ। हे भाई ! जिस मनुष्य ने परमात्मा प्रभू को अपने हृदय में सिमरा है।मैं भी उसकी संगति में रहके संसार-समुंद्र से पार लांघ जाऊँ। 1।रहाउ। (हे भाई ! प्रभू से विछुड़ के ये जगत मनुष्य के वास्ते) एक बड़ा जंगल बन जाता है (जिसमें मनुष्य भटकता फिरता है) आग का समुंद्र बन जाता है (जिसमें मनुष्य जलता रहता है) कभी खुशी में बसता है।कभी ग़मीं में। जिस मनुष्य को गुरू मिल जाता है।आत्मिक जीवन देने वाला हरी-नाम जीभ से जप के उस मनुष्य का मन पवित्र हो जाता है। 2। (हे भाई !) इस शरीर को अपना समझ के।इस धन को अपना मान के जीव (माया के मोह के) मीठे-मीठे बंधनों से बंधे रहते हैं। पर जिन मनुष्यों ने परमात्मा के नाम की आराधना की वे गुरू की कृपा से (इन कोमल बंधनों से) आजाद हो जाते हैं। 3। (हे भाई !) जो मनुष्य।प्यारे प्रभू को अच्छे लगने लग पड़ते हैं।उन्हें (माया के कोमल बंधनों से) बचाने की शक्ति वाले प्रभू ने बचा लिया। हे नानक ! (कह) हे दातार ! ये प्राण और ये शरीर सब कुछ आपका ही दिया हुआ है (मेहर कर।मैं इन्हें अपना ही ना समझता रहूँ)।हे दातार ! मैं आप पे कुर्बान जाता हूँ। 4। 11। 50।
आसा महला 5 ॥
मोह मलन नीद ते छुटकी कउनु अनुग्रहु भइओ री ॥
महा मोहनी तुधु न विआपै तेरा आलसु कहा गइओ री ॥1॥ रहाउ ॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: आसा महला 5 ॥ हे सहेली ! आप मन को मैला करने वाली मोह की नींद से बच गई है।आपके ऊपर कौन सी कृपा हुई है। (जीवों के मन को) मोह लेने वाली बली माया भी आपके पर जोर नहीं डाल सकती।आपका आलस भी सदा के लिए समाप्त हैं गया है। 1।रहाउ।

आसा राग में एक भोर की हलकी ताज़गी है। आसा दी वार इसी राग में बँधी, और सिख-संगीत के परिदृश्य को आकार दिया। हर सुबह, अमृतसर के हरमंदिर साहिब में, यही राग खुलता है। आसा राग का क्षेत्र है। ‘आसा दी वार’ की रचना गुरु नानक की है, बाद में गुरु अंगद और गुरु अर्जन के साथ संगठित हुई।

गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।

इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “आसा महला 5 ॥ जो बख्शिश मेरे ऊपर हुई है धुर से ही हुई है, इसके बिना जीव और क्या ज्ञान समझ सकता है।”

बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।