अंग
377
राग आसा
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਪੂਰਾ ਗੁਰੁ ਪੂਰੀ ਬਣਤ ਬਣਾਈ ॥
ਨਾਨਕ ਭਗਤ ਮਿਲੀ ਵਡਿਆਈ ॥੪॥੨੪॥
ਨਾਨਕ ਭਗਤ ਮਿਲੀ ਵਡਿਆਈ ॥੪॥੨੪॥
पूरा गुरु पूरी बणत बणाई ॥
नानक भगत मिली वडिआई ॥४॥२४॥
नानक भगत मिली वडिआई ॥४॥२४॥
हिन्दी अर्थ: हे नानक ! परमात्मा सबसे बड़ा है उसमें कोई कमी नहीं है उसकी बनाई हुई रचना भी कमी-रहित है। परमात्मा की भक्ति करने वालों को (लोक-परलोक में) आदर मिलता है। 4। 24।
ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਗੁਰ ਕੈ ਸਬਦਿ ਬਨਾਵਹੁ ਇਹੁ ਮਨੁ ॥
ਗੁਰ ਕਾ ਦਰਸਨੁ ਸੰਚਹੁ ਹਰਿ ਧਨੁ ॥੧॥
ਊਤਮ ਮਤਿ ਮੇਰੈ ਰਿਦੈ ਤੂੰ ਆਉ ॥
ਧਿਆਵਉ ਗਾਵਉ ਗੁਣ ਗੋਵਿੰਦਾ ਅਤਿ ਪ੍ਰੀਤਮ ਮੋਹਿ ਲਾਗੈ ਨਾਉ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਤ੍ਰਿਪਤਿ ਅਘਾਵਨੁ ਸਾਚੈ ਨਾਇ ॥
ਅਠਸਠਿ ਮਜਨੁ ਸੰਤ ਧੂਰਾਇ ॥੨॥
ਸਭ ਮਹਿ ਜਾਨਉ ਕਰਤਾ ਏਕ ॥
ਸਾਧਸੰਗਤਿ ਮਿਲਿ ਬੁਧਿ ਬਿਬੇਕ ॥੩॥
ਦਾਸੁ ਸਗਲ ਕਾ ਛੋਡਿ ਅਭਿਮਾਨੁ ॥
ਨਾਨਕ ਕਉ ਗੁਰਿ ਦੀਨੋ ਦਾਨੁ ॥੪॥੨੫॥
ਗੁਰ ਕੈ ਸਬਦਿ ਬਨਾਵਹੁ ਇਹੁ ਮਨੁ ॥
ਗੁਰ ਕਾ ਦਰਸਨੁ ਸੰਚਹੁ ਹਰਿ ਧਨੁ ॥੧॥
ਊਤਮ ਮਤਿ ਮੇਰੈ ਰਿਦੈ ਤੂੰ ਆਉ ॥
ਧਿਆਵਉ ਗਾਵਉ ਗੁਣ ਗੋਵਿੰਦਾ ਅਤਿ ਪ੍ਰੀਤਮ ਮੋਹਿ ਲਾਗੈ ਨਾਉ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਤ੍ਰਿਪਤਿ ਅਘਾਵਨੁ ਸਾਚੈ ਨਾਇ ॥
ਅਠਸਠਿ ਮਜਨੁ ਸੰਤ ਧੂਰਾਇ ॥੨॥
ਸਭ ਮਹਿ ਜਾਨਉ ਕਰਤਾ ਏਕ ॥
ਸਾਧਸੰਗਤਿ ਮਿਲਿ ਬੁਧਿ ਬਿਬੇਕ ॥੩॥
ਦਾਸੁ ਸਗਲ ਕਾ ਛੋਡਿ ਅਭਿਮਾਨੁ ॥
ਨਾਨਕ ਕਉ ਗੁਰਿ ਦੀਨੋ ਦਾਨੁ ॥੪॥੨੫॥
आसा महला ५ ॥
गुर कै सबदि बनावहु इहु मनु ॥
गुर का दरसनु संचहु हरि धनु ॥१॥
ऊतम मति मेरै रिदै तूं आउ ॥
धिआवउ गावउ गुण गोविंदा अति प्रीतम मोहि लागै नाउ ॥१॥ रहाउ ॥
त्रिपति अघावनु साचै नाइ ॥
अठसठि मजनु संत धूराइ ॥२॥
सभ महि जानउ करता एक ॥
साधसंगति मिलि बुधि बिबेक ॥३॥
दासु सगल का छोडि अभिमानु ॥
नानक कउ गुरि दीनो दानु ॥४॥२५॥
गुर कै सबदि बनावहु इहु मनु ॥
गुर का दरसनु संचहु हरि धनु ॥१॥
ऊतम मति मेरै रिदै तूं आउ ॥
धिआवउ गावउ गुण गोविंदा अति प्रीतम मोहि लागै नाउ ॥१॥ रहाउ ॥
त्रिपति अघावनु साचै नाइ ॥
अठसठि मजनु संत धूराइ ॥२॥
सभ महि जानउ करता एक ॥
साधसंगति मिलि बुधि बिबेक ॥३॥
दासु सगल का छोडि अभिमानु ॥
नानक कउ गुरि दीनो दानु ॥४॥२५॥
हिन्दी अर्थ: आसा महला ५ ॥ (हे भाई !) गुरू के शबद में जुड़ के (अपने) इस मन को नए सिरे से घड़ो। (गुरू का शबद ही) गुरू का दीदार है (इस शबद की बरकति से) परमात्मा का नाम-धन इकट्ठा करो। 1। हे श्रेष्ठ मति ! (अगर गुरू मेहर करे तो) तू मेरे अंदर आ के बस ता कि मैं परमात्मा के गुण गाऊँ परमात्मा का ध्यान धरूँ और परमात्मा का नाम मुझे बहुत प्यारा लगने लगे। 1।रहाउ। (गुरू के द्वारा) सदा कायम रहने वाले परमात्मा के नाम में जुड़ने से तृष्णा खत्म हो जाती है।मन की भूख मिट जाती है। (हे भाई !) गुरू के चरणों की धूड़ अढ़सठ तीर्थों का स्नान है। 2। (हे भाई !)मैं अब सभी में एक करतार को ही बसता पहचानता हूँ। गुरू की संगति में मिल के मैंने अच्छे-बुरे की परख करने वाली बुद्धि प्राप्त कर ली है 3। मैं अहंकार त्याग के सभी का दास बन गया हूँ। (हे भाई ! मुझे) नानक को गुरू ने (बिबेक बुद्धि की ऐसी) दाति बख्शी है 4। 25।
ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਬੁਧਿ ਪ੍ਰਗਾਸ ਭਈ ਮਤਿ ਪੂਰੀ ॥
ਤਾ ਤੇ ਬਿਨਸੀ ਦੁਰਮਤਿ ਦੂਰੀ ॥੧॥
ਐਸੀ ਗੁਰਮਤਿ ਪਾਈਅਲੇ ॥
ਬੂਡਤ ਘੋਰ ਅੰਧ ਕੂਪ ਮਹਿ ਨਿਕਸਿਓ ਮੇਰੇ ਭਾਈ ਰੇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਮਹਾ ਅਗਾਹ ਅਗਨਿ ਕਾ ਸਾਗਰੁ ॥ ਗੁਰੁ ਬੋਹਿਥੁ ਤਾਰੇ ਰਤਨਾਗਰੁ ॥੨॥
ਦੁਤਰ ਅੰਧ ਬਿਖਮ ਇਹ ਮਾਇਆ ॥
ਗੁਰਿ ਪੂਰੈ ਪਰਗਟੁ ਮਾਰਗੁ ਦਿਖਾਇਆ ॥੩॥
ਜਾਪ ਤਾਪ ਕਛੁ ਉਕਤਿ ਨ ਮੋਰੀ ॥
ਗੁਰ ਨਾਨਕ ਸਰਣਾਗਤਿ ਤੋਰੀ ॥੪॥੨੬॥
ਬੁਧਿ ਪ੍ਰਗਾਸ ਭਈ ਮਤਿ ਪੂਰੀ ॥
ਤਾ ਤੇ ਬਿਨਸੀ ਦੁਰਮਤਿ ਦੂਰੀ ॥੧॥
ਐਸੀ ਗੁਰਮਤਿ ਪਾਈਅਲੇ ॥
ਬੂਡਤ ਘੋਰ ਅੰਧ ਕੂਪ ਮਹਿ ਨਿਕਸਿਓ ਮੇਰੇ ਭਾਈ ਰੇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਮਹਾ ਅਗਾਹ ਅਗਨਿ ਕਾ ਸਾਗਰੁ ॥ ਗੁਰੁ ਬੋਹਿਥੁ ਤਾਰੇ ਰਤਨਾਗਰੁ ॥੨॥
ਦੁਤਰ ਅੰਧ ਬਿਖਮ ਇਹ ਮਾਇਆ ॥
ਗੁਰਿ ਪੂਰੈ ਪਰਗਟੁ ਮਾਰਗੁ ਦਿਖਾਇਆ ॥੩॥
ਜਾਪ ਤਾਪ ਕਛੁ ਉਕਤਿ ਨ ਮੋਰੀ ॥
ਗੁਰ ਨਾਨਕ ਸਰਣਾਗਤਿ ਤੋਰੀ ॥੪॥੨੬॥
आसा महला ५ ॥
बुधि प्रगास भई मति पूरी ॥
ता ते बिनसी दुरमति दूरी ॥१॥
ऐसी गुरमति पाईअले ॥
बूडत घोर अंध कूप महि निकसिओ मेरे भाई रे ॥१॥ रहाउ ॥
महा अगाह अगनि का सागरु ॥ गुरु बोहिथु तारे रतनागरु ॥२॥
दुतर अंध बिखम इह माइआ ॥
गुरि पूरै परगटु मारगु दिखाइआ ॥३॥
जाप ताप कछु उकति न मोरी ॥
गुर नानक सरणागति तोरी ॥४॥२६॥
बुधि प्रगास भई मति पूरी ॥
ता ते बिनसी दुरमति दूरी ॥१॥
ऐसी गुरमति पाईअले ॥
बूडत घोर अंध कूप महि निकसिओ मेरे भाई रे ॥१॥ रहाउ ॥
महा अगाह अगनि का सागरु ॥ गुरु बोहिथु तारे रतनागरु ॥२॥
दुतर अंध बिखम इह माइआ ॥
गुरि पूरै परगटु मारगु दिखाइआ ॥३॥
जाप ताप कछु उकति न मोरी ॥
गुर नानक सरणागति तोरी ॥४॥२६॥
हिन्दी अर्थ: आसा महला ५ ॥ (हे भाई ! गुरू की कृपा से मेरी) बुद्धि में (आत्मिक जीवन का) प्रकाश हो गया है मेरी अक्ल कमी-रहित हो गई है। इसकी सहायता से मेरी बुरी मति का नाश हो गया है।मेरी परमात्मा से दूरी मिट गई है। 1। हे मेरे भाई ! मैंने गुरू से ऐसी बुद्धि प्राप्त कर ली है जिसकी मदद से मैं माया के घुप अंधेरे कूँऐ से डूबता-डूबता बच निकला हूँ। 1।रहाउ। (हे भाई ! ये संसार की तृष्णा की) आग एक बड़ा अथाह समुंद्र है। रत्नों की खान गुरू (मानो) जहाज है जो (इस समुंद्र में से) पार लंघा लेता है। 2। (हे भाई !) यह माया (मानो।एक समुंद्र है जिस में से) पार लांघना मुश्किल है जिस में घोर अंधेरा ही अंधेरा है (इस में से पार लांघने के लिए) पूरे गुरू ने मुझे साफ रास्ता दिखा दिया है। 3। हे नानक ! (कह,) हे गुरू ! मेरे पास कोई जप नहीं कोई तप नहीं कोई सियानप नहीं। मैं तो तेरी ही शरण आया हूँ (मुझे इस घोर अंधकार में से निकाल ले)। 4। 26।
ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੫ ਤਿਪਦੇ ੨ ॥
ਹਰਿ ਰਸੁ ਪੀਵਤ ਸਦ ਹੀ ਰਾਤਾ ॥
ਆਨ ਰਸਾ ਖਿਨ ਮਹਿ ਲਹਿ ਜਾਤਾ ॥
ਹਰਿ ਰਸ ਕੇ ਮਾਤੇ ਮਨਿ ਸਦਾ ਅਨੰਦ ॥
ਆਨ ਰਸਾ ਮਹਿ ਵਿਆਪੈ ਚਿੰਦ ॥੧॥
ਹਰਿ ਰਸੁ ਪੀਵੈ ਅਲਮਸਤੁ ਮਤਵਾਰਾ ॥
ਆਨ ਰਸਾ ਸਭਿ ਹੋਛੇ ਰੇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਹਰਿ ਰਸ ਕੀ ਕੀਮਤਿ ਕਹੀ ਨ ਜਾਇ ॥
ਹਰਿ ਰਸੁ ਸਾਧੂ ਹਾਟਿ ਸਮਾਇ ॥
ਲਾਖ ਕਰੋਰੀ ਮਿਲੈ ਨ ਕੇਹ ॥
ਜਿਸਹਿ ਪਰਾਪਤਿ ਤਿਸ ਹੀ ਦੇਹਿ ॥੨॥
ਨਾਨਕ ਚਾਖਿ ਭਏ ਬਿਸਮਾਦੁ ॥
ਨਾਨਕ ਗੁਰ ਤੇ ਆਇਆ ਸਾਦੁ ॥
ਈਤ ਊਤ ਕਤ ਛੋਡਿ ਨ ਜਾਇ ॥
ਨਾਨਕ ਗੀਧਾ ਹਰਿ ਰਸ ਮਾਹਿ ॥੩॥੨੭॥
ਹਰਿ ਰਸੁ ਪੀਵਤ ਸਦ ਹੀ ਰਾਤਾ ॥
ਆਨ ਰਸਾ ਖਿਨ ਮਹਿ ਲਹਿ ਜਾਤਾ ॥
ਹਰਿ ਰਸ ਕੇ ਮਾਤੇ ਮਨਿ ਸਦਾ ਅਨੰਦ ॥
ਆਨ ਰਸਾ ਮਹਿ ਵਿਆਪੈ ਚਿੰਦ ॥੧॥
ਹਰਿ ਰਸੁ ਪੀਵੈ ਅਲਮਸਤੁ ਮਤਵਾਰਾ ॥
ਆਨ ਰਸਾ ਸਭਿ ਹੋਛੇ ਰੇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਹਰਿ ਰਸ ਕੀ ਕੀਮਤਿ ਕਹੀ ਨ ਜਾਇ ॥
ਹਰਿ ਰਸੁ ਸਾਧੂ ਹਾਟਿ ਸਮਾਇ ॥
ਲਾਖ ਕਰੋਰੀ ਮਿਲੈ ਨ ਕੇਹ ॥
ਜਿਸਹਿ ਪਰਾਪਤਿ ਤਿਸ ਹੀ ਦੇਹਿ ॥੨॥
ਨਾਨਕ ਚਾਖਿ ਭਏ ਬਿਸਮਾਦੁ ॥
ਨਾਨਕ ਗੁਰ ਤੇ ਆਇਆ ਸਾਦੁ ॥
ਈਤ ਊਤ ਕਤ ਛੋਡਿ ਨ ਜਾਇ ॥
ਨਾਨਕ ਗੀਧਾ ਹਰਿ ਰਸ ਮਾਹਿ ॥੩॥੨੭॥
आसा महला ५ तिपदे २ ॥
हरि रसु पीवत सद ही राता ॥
आन रसा खिन महि लहि जाता ॥
हरि रस के माते मनि सदा अनंद ॥
आन रसा महि विआपै चिंद ॥१॥
हरि रसु पीवै अलमसतु मतवारा ॥
आन रसा सभि होछे रे ॥१॥ रहाउ ॥
हरि रस की कीमति कही न जाइ ॥
हरि रसु साधू हाटि समाइ ॥
लाख करोरी मिलै न केह ॥
जिसहि परापति तिस ही देहि ॥२॥
नानक चाखि भए बिसमादु ॥
नानक गुर ते आइआ सादु ॥
ईत ऊत कत छोडि न जाइ ॥
नानक गीधा हरि रस माहि ॥३॥२७॥
हरि रसु पीवत सद ही राता ॥
आन रसा खिन महि लहि जाता ॥
हरि रस के माते मनि सदा अनंद ॥
आन रसा महि विआपै चिंद ॥१॥
हरि रसु पीवै अलमसतु मतवारा ॥
आन रसा सभि होछे रे ॥१॥ रहाउ ॥
हरि रस की कीमति कही न जाइ ॥
हरि रसु साधू हाटि समाइ ॥
लाख करोरी मिलै न केह ॥
जिसहि परापति तिस ही देहि ॥२॥
नानक चाखि भए बिसमादु ॥
नानक गुर ते आइआ सादु ॥
ईत ऊत कत छोडि न जाइ ॥
नानक गीधा हरि रस माहि ॥३॥२७॥
हिन्दी अर्थ: आसा महला ५ तिपदे २ ॥ (हे भाई !) परमात्मा का नाम-अमृत पीने वाला मनुष्य (नाम-रंग में) सदा रंगा रहता है (क्योंकि नाम-रस का असर कभी दूर नहीं होता। इसके अलावा दुनिया के पदार्थों के) अन्य रसों का असर एक पल में उतर जाता है। परमात्मा के नाम-रस के मतवाले मनुष्य के मन में सदा आनंद टिका रहता है। पर दुनिया के पदार्थों के स्वादों में पड़े को चिंता आ दबाती है। (हे भाई !) जो मनुष्य परमात्मा का नाम अमृत पीता है वह उस रस में पूरी तौर से मस्त रहता है वह उस नाम रस का आशिक बन जाता है। उसे दुनिया के और सारे रस (नाम-रस के मुकाबले) फीके प्रतीत होते हैं। 1।रहाउ। (हे भाई ! हरि-नाम-रस दुनिया के धन-पदार्थों के बदले में नहीं मिल सकता) परमात्मा के नाम-रस का मूल्य (धन-पदार्थ के रूप में) बयान नहीं किया जा सकता। ये नाम-रस गुरू के हाट में (गुरू की संगति में) सदा टिका रहता है। लाखों-करोड़ों रुपए दे के भी ये किसी को नहीं मिल सकता। हे प्रभू ! जिस मनुष्य के भाग्यों में तूने इसकी प्राप्ति लिखी है उसी को तू स्वयं देता है। 2। (ये नाम-रस) चख के (कोई इसका स्वाद बयान नहीं कर सकता।यदि कोई यत्न करे तो) हैरान सा होता है (क्योंकि वह अपने आप को इस रस के असर को बयान करने में अस्मर्थ पाता है)। इस हरि-नाम-रस का आनंद गुरू से ही प्राप्त होता है (जिसे एक बार इसकी प्राप्ति हो गई वह) इस लोक और परलोक में (किसी भी और पदार्थ की खातिर) इस नाम-रस को छोड़ के नहीं जाता। हे नानक ! वह सदा हरि-नाम-रस में ही मस्त रहता है। 3। 27।
ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਕਾਮੁ ਕ੍ਰੋਧੁ ਲੋਭੁ ਮੋਹੁ ਮਿਟਾਵੈ ਛੁਟਕੈ ਦੁਰਮਤਿ ਅਪੁਨੀ ਧਾਰੀ ॥
ਹੋਇ ਨਿਮਾਣੀ ਸੇਵ ਕਮਾਵਹਿ ਤਾ ਪ੍ਰੀਤਮ ਹੋਵਹਿ ਮਨਿ ਪਿਆਰੀ ॥੧॥
ਸੁਣਿ ਸੁੰਦਰਿ ਸਾਧੂ ਬਚਨ ਉਧਾਰੀ ॥
ਦੂਖ ਭੂਖ ਮਿਟੈ ਤੇਰੋ ਸਹਸਾ ਸੁਖ ਪਾਵਹਿ ਤੂੰ ਸੁਖਮਨਿ ਨਾਰੀ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਚਰਣ ਪਖਾਰਿ ਕਰਉ ਗੁਰ ਸੇਵਾ ਆਤਮ ਸੁਧੁ ਬਿਖੁ ਤਿਆਸ ਨਿਵਾਰੀ ॥
ਦਾਸਨ ਕੀ ਹੋਇ ਦਾਸਿ ਦਾਸਰੀ ਤਾ ਪਾਵਹਿ ਸੋਭਾ ਹਰਿ ਦੁਆਰੀ ॥੨॥
ਇਹੀ ਅਚਾਰ ਇਹੀ ਬਿਉਹਾਰਾ ਆਗਿਆ ਮਾਨਿ ਭਗਤਿ ਹੋਇ ਤੁਮੑਾਰੀ ॥
ਜੋ ਇਹੁ ਮੰਤ੍ਰੁ ਕਮਾਵੈ ਨਾਨਕ ਸੋ ਭਉਜਲੁ ਪਾਰਿ ਉਤਾਰੀ ॥੩॥੨੮॥
ਕਾਮੁ ਕ੍ਰੋਧੁ ਲੋਭੁ ਮੋਹੁ ਮਿਟਾਵੈ ਛੁਟਕੈ ਦੁਰਮਤਿ ਅਪੁਨੀ ਧਾਰੀ ॥
ਹੋਇ ਨਿਮਾਣੀ ਸੇਵ ਕਮਾਵਹਿ ਤਾ ਪ੍ਰੀਤਮ ਹੋਵਹਿ ਮਨਿ ਪਿਆਰੀ ॥੧॥
ਸੁਣਿ ਸੁੰਦਰਿ ਸਾਧੂ ਬਚਨ ਉਧਾਰੀ ॥
ਦੂਖ ਭੂਖ ਮਿਟੈ ਤੇਰੋ ਸਹਸਾ ਸੁਖ ਪਾਵਹਿ ਤੂੰ ਸੁਖਮਨਿ ਨਾਰੀ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਚਰਣ ਪਖਾਰਿ ਕਰਉ ਗੁਰ ਸੇਵਾ ਆਤਮ ਸੁਧੁ ਬਿਖੁ ਤਿਆਸ ਨਿਵਾਰੀ ॥
ਦਾਸਨ ਕੀ ਹੋਇ ਦਾਸਿ ਦਾਸਰੀ ਤਾ ਪਾਵਹਿ ਸੋਭਾ ਹਰਿ ਦੁਆਰੀ ॥੨॥
ਇਹੀ ਅਚਾਰ ਇਹੀ ਬਿਉਹਾਰਾ ਆਗਿਆ ਮਾਨਿ ਭਗਤਿ ਹੋਇ ਤੁਮੑਾਰੀ ॥
ਜੋ ਇਹੁ ਮੰਤ੍ਰੁ ਕਮਾਵੈ ਨਾਨਕ ਸੋ ਭਉਜਲੁ ਪਾਰਿ ਉਤਾਰੀ ॥੩॥੨੮॥
आसा महला ५ ॥
कामु क्रोधु लोभु मोहु मिटावै छुटकै दुरमति अपुनी धारी ॥
होइ निमाणी सेव कमावहि ता प्रीतम होवहि मनि पिआरी ॥१॥
सुणि सुंदरि साधू बचन उधारी ॥
दूख भूख मिटै तेरो सहसा सुख पावहि तूं सुखमनि नारी ॥१॥ रहाउ ॥
चरण पखारि करउ गुर सेवा आतम सुधु बिखु तिआस निवारी ॥
दासन की होइ दासि दासरी ता पावहि सोभा हरि दुआरी ॥२॥
इही अचार इही बिउहारा आगिआ मानि भगति होइ तुम॑ारी ॥
जो इहु मंत्रु कमावै नानक सो भउजलु पारि उतारी ॥३॥२८॥
कामु क्रोधु लोभु मोहु मिटावै छुटकै दुरमति अपुनी धारी ॥
होइ निमाणी सेव कमावहि ता प्रीतम होवहि मनि पिआरी ॥१॥
सुणि सुंदरि साधू बचन उधारी ॥
दूख भूख मिटै तेरो सहसा सुख पावहि तूं सुखमनि नारी ॥१॥ रहाउ ॥
चरण पखारि करउ गुर सेवा आतम सुधु बिखु तिआस निवारी ॥
दासन की होइ दासि दासरी ता पावहि सोभा हरि दुआरी ॥२॥
इही अचार इही बिउहारा आगिआ मानि भगति होइ तुम॑ारी ॥
जो इहु मंत्रु कमावै नानक सो भउजलु पारि उतारी ॥३॥२८॥
हिन्दी अर्थ: आसा महला ५ ॥ (गुरू का उपदेश तेरे अंदर से) काम-क्रोध-लोभ-मोह को मिटा देगा।तेरी अपनी ही पैदा की हुई कुमति (तेरे अंदर से) मिट जाएगी। हे सुंदरी ! अगर तू गुमान त्याग के प्रभू की सेवा भक्ति करेगी तो प्रभू-प्रीतम के मन को प्यारी लगेगी। 1। हे सुंदरी ! हे अपने मन में आत्मिक आनंद टिकाए रखने की चाहवान जीव-स्त्री ! गुरू के बचन सुन के (अपने आप को संसार समुंद्र में डूबने से) बचा। (गुरू की बाणी की बरकति से) तेरा दुख मिट जाएगा तेरी माया की भूख मिट जाएगी तू आत्मिक आनंद पाएगी। 1।रहाउ। हे सुंदरी ! गुरू के चरण धो के गुरू की (बताई) सेवा करा कर।तेरी आत्मा पवित्र हो जाएगी (ये सेवा तेरे अंदर से आत्मिक जीवन को समाप्त कर देने वाले माया-मोह के) जहर को दूर कर देगी।माया की तृष्णा को मिटा दो। (हे सुंदरी !) अगर तू परमात्मा के सेवकों की दासी बन जाए।निमाणी सी दासी बन जाए।तो तू परमात्मा की हजूरी में शोभा-आदर हासिल करेगी। 2। (हे सुंदरी !) यही कुछ तेरे वास्ते धार्मिक रस्मों के करने योग्य है यही तेरा नित्य का व्यवहार होना चाहिए।परमात्मा की रजा को सिर-माथे मान (इस तरह की हुई) तेरी प्रभू-भक्ति (प्रभू दर पर) प्रवान हो जाएगी। हे नानक ! जो भी मनुष्य इस उपदेश को कमाता है (अपने जीवन में उपयोग करता है) वह संसार समुंद्र से पार लांघ जाता है। 3। 28।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 377 है, राग आसा का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।
M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।
Punjabi Bagh के gurdwara में अरदास के बाद का calm।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 47 पंक्तियों का है, 5 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 377” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: आसा राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 378 →, पीछे का: ← अंग 376।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।