॥ सलोक मः १ ॥ पड़ि पड़ि गडी लदीअहि पड़ि पड़ि भरीअहि साथ ॥ पड़ि पड़ि बेड़ी पाईऐ पड़ि पड़ि गडीअहि खात ॥ पड़ीअहि जेते बरस बरस पड़ीअहि जेते मास ॥ पड़ीऐ जेती आरजा पड़ीअहि जेते सास ॥ नानक लेखै इक गल होर हउमै झखणा झाख ॥१॥
॥ मः २ ॥ लिखि लिखि पड़िआ ॥ तेता कड़िआ ॥ बहु तीरथ भविआ ॥ तेतो लविआ ॥ बहु भेख कीआ देही दुखु दीआ ॥ सहु वे जीआ अपणा कीआ ॥ अंनु न खाइआ साद गवाइआ ॥ बहु दुखु पाइआ दूजा भाइआ ॥ बसत्र न पहिरै ॥ अहिनिसि कहरै ॥ मोनि विगूता ॥ किउ जागै गुर बिनु सूता ॥ पग उपेताणा ॥ अपणा कीआ कमाणा ॥ अलु मलु खाई सिरि छाई पाई ॥ मूरखि अंधै पति गवाई ॥ विणु नावै किछु थाइ न पाई ॥ रहै बेबाणी मड़ी मसाणी ॥ अंधु न जाणै फिरि पछुताणी ॥ सतिगुरु भेटे सो सुखु पाए ॥ हरि का नामु मंनि वसाए ॥ नानक नदरि करे सो पाए ॥ आस अंदेसे ते निहकेवलु हउमै सबदि जलाए ॥२॥
गुरु अंगद देव जी का यह सलोक एक portrait है। नानक के “पढ़ना” critique के बाद, अंगद “religious self-mortification” को target कर रहे हैं।
“लिखि लिखि पड़िआ, तेता कड़िआ।” लिख-लिख कर पढ़ा, उतना ही “कड़ा” (कठोर, rigid) हो गया।
यह precise observation है। ज़्यादा पढ़ने वाला आदमी अक्सर rigid हो जाता है। अपनी learning में dogma बन जाती है।
“बहु तीरथ भविआ, तेतो लविआ।” बहुत तीर्थ “भ्रमण” किया, उतना ही “लवा” (बकवादी, talkative) हो गया।
तीर्थयात्रा से शांति की उम्मीद, मगर ज़्यादा बात करने वाला बन गया। पंजाबी फ़ोक wisdom में “लविआ” शब्द है, जो बहुत बोले मगर साथ कुछ ना हो।
“बहु भेख कीआ देही दुखु दीआ।” बहुत “भेख” (वेश, costumes) किए, शरीर को दुख दिया। “सहु वे जीआ अपणा कीआ।” “सह” (झेल) हे जीव, यह तेरा अपना किया है।
गुरु अंगद कह रहे हैं, “तू ख़ुद को कष्ट देता है, तो भी ख़ुद ज़िम्मेदार है। यह कोई spiritual achievement नहीं।”
“अंनु न खाइआ साद गवाइआ।” “अन्न नहीं खाया,” “स्वाद” गँवा दिया। “बहु दुखु पाइआ दूजा भाइआ।” बहुत दुख पाया, “दूजा” (other, hi) “भाया।”
fasting का critique है। नहीं खाने से जो बाक़ी रह जाता है, mind भटक जाता है food के बारे में सोचने में।
“बसत्र न पहिरै, अहिनिसि कहरै।” वस्त्र नहीं पहनता, दिन-रात “क़हर” (कष्ट) झेलता है।
“मोनि विगूता।” मौन रख कर “विगूता” (बर्बाद) हो जाता है। “किउ जागै गुर बिनु सूता।” गुरु बिना सोया हुआ कैसे जागे?
“पग उपेताणा।” पैर “नंगे” (बिना जूते के)। “अपणा कीआ कमाणा।” अपना किया कमा रहा है।
“अलु मलु खाई सिरि छाई पाई।” गंदगी खाता है, सिर पर “राख” डालता है।
गुरु अंगद exhaustive critique कर रहे हैं self-imposed असुविधाओं का। तपस्या के नाम पर जो extreme practices हैं।
“मूरखि अंधै पति गवाई।” मूर्ख अंधे ने “पति” (इज़्ज़त) गँवा दी। “विणु नावै किछु थाइ न पाई।” बिना नाम के कुछ “थाइ” (place, validation) नहीं पाई।
“रहै बेबाणी मड़ी मसाणी।” “बेबाणी” (बीहड़), “मड़ी मसाणी” (कब्रिस्तान, श्मशान) में रहता है। “अंधु न जाणै फिरि पछुताणी।” “अंधा” नहीं जानता, “फिर पछताता” है।
अंतिम पंक्तियाँ solution देती हैं: “सतिगुरु भेटे सो सुखु पाए।” “सतगुरु” मिले, तो सुख पाए। “हरि का नामु मंनि वसाए।” हरि का नाम “मन में वसाए।” “नानक नदरि करे सो पाए।” नानक कहते हैं, “नज़र” (कृपा) करे, तो पाए।
“आस अंदेसे ते निहकेवलु, हउमै सबदि जलाए।” “आस” और “अंदेसे” (hope and fear) से “निहकेवल” (free), अहंकार “शबद से जलाए।”
यह जिस intricate philosophical position पर पहुँच रहे हैं, वो वही है जो Buddha ने कहा था, neither extreme indulgence nor extreme asceticism, middle way। मगर “middle way” कैसा? “गुरु के शबद” से। अकेले balance नहीं रख सकते।
॥ पउड़ी ॥ भगत तेरै मनि भावदे दरि सोहनि कीरति गावदे ॥ नानक करमा बाहरे दरि ढोअ न लहन्ही धावदे ॥ इकि मूलु न बुझनि्ह आपणा अणहोदा आपु गणाइदे ॥ हउ ढाढी का नीच जाति होरि उतम जाति सदाइदे ॥ तिन्ह मंगा जि तुझै धिआइदे ॥७॥
पौड़ी 7 एक intimate self-positioning है।
“भगत तेरै मनि भावदे।” भक्त तेरे “मन” को “भाते” हैं। “दरि सोहनि कीरति गावदे।” “द्वार” पर “सजते” हैं, “कीर्ति गाते।”
यानी भक्त वो हैं जो हरि-दरबार में, उसकी “कीर्ति” गाते हैं। यह उनकी प्रकृति है।
“नानक करमा बाहरे, दरि ढोअ न लहन्ही।” नानक कहते हैं, “कर्म से बाहर” (without genuine deeds), “द्वार पर ढोआ” (entry, खाना) नहीं पाते। “धावदे।” बस “धावते” रहते हैं (दौड़ते रहते हैं)।
फिर एक sharp observation: “इकि मूलु न बुझनि्ह आपणा।” कुछ लोग अपना “मूल” (origin, identity) नहीं समझते। “अणहोदा आपु गणाइदे।” “अणहोदा” (without being) “आप” को “गिनाते” (count करवाते, claim करते) हैं।
यह बहुत precise critique है। ऐसे लोग जिनके पास genuine ज़मीन नहीं, मगर वो ख़ुद को “किसी” position में count करवाते हैं। यह दिल्ली के social-climbing pattern का perfect description है।
फिर एक radical line: “हउ ढाढी का नीच जाति।” मैं “ढाढी” (bard, folk-singer) हूँ, “नीची जाति” का।
नानक ख़ुद को “नीची जाति” कह रहे हैं! वो ख़त्री caste के थे technically, मगर यहाँ identification with the lowest। यह intentional है।
“होरि उतम जाति सदाइदे।” बाक़ी ख़ुद को “उत्तम जाति” “कहलाते” हैं।
और closing: “तिन्ह मंगा जि तुझै धिआइदे।” मैं उनसे “माँगता” हूँ जो तुझे “ध्याते” हैं।
यह बहुत powerful line है। नानक ख़ुद को “ढाढी,” “नीच जाति,” और साथ ही, उनसे “माँगता” है जो genuine भक्त हैं। यानी असली अमीर वो हैं जिनके पास हरि का ध्यान है। नानक उनके सामने भिखारी हैं।
दिल्ली के context में: हम सब अपनी “जाति” (status, family background) पर proud हैं। नानक कह रहे हैं, “जाति” का सोच ही दीन है। मैं ख़ुद को सबसे नीचे रखता हूँ, और उनसे माँगता हूँ जिनके अंदर genuine ध्यान है।
॥ सलोक मः १ ॥ कूड़ु राजा कूड़ु परजा कूड़ु सभु संसारु ॥ कूड़ु मंडप कूड़ु माड़ी कूड़ु बैसणहारु ॥ कूड़ु सुइना कूड़ु रुपा कूड़ु पैन्हणहारु ॥ कूड़ु काइआ कूड़ु कपड़ु कूड़ु रूपु अपारु ॥ कूड़ु मीआ कूड़ु बीबी खपि होए खारु ॥ कूड़ि कूड़ै नेहु लगा विसरिआ करतारु ॥ किसु नालि कीचै दोसती सभु जगु चलणहारु ॥ कूड़ु मिठा कूड़ु माखिओ कूड़ु डोबे पूरु ॥ नानकु वखाणै बेनती तुधु बाझु कूड़ो कूड़ु ॥१॥
यह सलोक नानक का सबसे intense “vanity of vanities” statement है।
“कूड़” शब्द key है। पंजाबी में “कूड़” यानी “झूठ,” “मिथ्या,” “false.”
और नानक एक list बना रहे हैं: “कूड़ु राजा कूड़ु परजा।” राजा झूठा, प्रजा झूठी। “कूड़ु सभु संसारु।” सब संसार झूठा।
“कूड़ु मंडप कूड़ु माड़ी।” “मंडप” (पवेलियन), “माड़ी” (mansion), सब झूठे। “कूड़ु बैसणहारु।” बैठने वाला भी झूठा।
“कूड़ु सुइना कूड़ु रुपा।” “सोना,” “चाँदी,” झूठे। “कूड़ु पैन्हणहारु।” पहनने वाला झूठा।
फिर सबसे painful: “कूड़ु काइआ कूड़ु कपड़ु।” “काया” (शरीर), “कपड़ा,” झूठे। “कूड़ु रूपु अपारु।” “अपार रूप” (अनंत beauty) भी झूठा।
“कूड़ु मीआ कूड़ु बीबी।” “मीआ” (husband), “बीबी” (wife), झूठे। “खपि होए खारु।” “खप कर,” “खारु” (दुखी) हो जाते हैं।
यह घर के सबसे intimate बँधनों को भी “कूड़” कह देना, यह सबसे harsh लगता है।
मगर नानक का meaning यह नहीं कि “रिश्ते छोड़ दो।” बात यह है कि “रिश्ते permanent नहीं हैं।” “खपि होए खारु।”
“कूड़ि कूड़ै नेहु लगा।” “कूड़” को “कूड़” से “नेह” (प्रेम) लगा है। “विसरिआ करतारु।” “करता” (creator) “विसर गया।”
यह real diagnosis है। हम झूठी चीज़ों से प्रेम लगा बैठे हैं, क्योंकि “करता” को भूल गए।
“किसु नालि कीचै दोसती, सभु जगु चलणहारु।” किसके साथ “दोस्ती” करें, सारा जग “चलनहारु” (transient) है।
यह सबसे honest question है। जब सब चला जाएगा, फिर “permanent” connection किसके साथ?
“कूड़ु मिठा कूड़ु माखिओ।” “कूड़” “मिठा” है, “माखिओ” (मक्खन, butter) जैसा है। “कूड़ु डोबे पूरु।” “कूड़” पूरी “नाव” (पूर) “डुबा” देता है।
यह “कूड़” का seductive nature है। यह मीठा है, मक्खन जैसा है। मगर अंत में पूरी नाव डूब जाती है।
दिल्ली के life में हम सब “कूड़” के साथ “नेह” लगा बैठे हैं। career, house, gadgets, relationships, सब “मीठा” है, सब “मक्खन।” मगर अंत में, यह सब “डूबने” वाली नाव है।
और final line: “नानकु वखाणै बेनती, तुधु बाझु कूड़ो कूड़ु।” नानक कहते हैं, यह बेनती है, तेरे बिना सब “कूड़ो कूड़ु” (झूठ ही झूठ) है।
यह सबसे final word है। एक ही है जो “कूड़” नहीं, बाक़ी सब कूड़।
मगर यह nihilism नहीं। यह invitation है, हरि के साथ connect होने का। एक permanent reference frame।
यह सलोक नानक का सबसे sharp critique है पुस्तकीय ज्ञान का। बहुत relevant आज भी।
“पड़ि पड़ि गडी लदीअहि।” पढ़-पढ़ कर “गाड़ी” (vehicles) “लाद ली” जाएँ। “पड़ि पड़ि भरीअहि साथ।” पढ़-पढ़ कर “साथ” (caravans) भरे जाएँ।
यानी कितनी किताबें पढ़ लो, कितनी loaded गाड़ियाँ पुस्तकों की।
“पड़ि पड़ि बेड़ी पाईऐ।” पढ़-पढ़ कर “बेड़ियाँ” (boats) “पाई” जाएँ। “पड़ि पड़ि गडीअहि खात।” पढ़-पढ़ कर “खात” (pits, खाइयाँ, deep holes) में “गाड़” दिए जाएँ।
किताबें इतनी कि एक खाई भर जाए। यह intentionally exaggeration है।
“पड़ीअहि जेते बरस बरस।” “बरस-बरस” (साल-दर-साल) पढ़ते जाएँ। “पड़ीअहि जेते मास।” “महीने-दर-महीने।” “पड़ीऐ जेती आरजा।” “आयु” (lifespan) पूरी “पढ़ने” में जाए। “पड़ीअहि जेते सास।” हर “साँस” पढ़ते-पढ़ते जाए।
यह exhaustive है। हर unit of time पढ़ाई में लगा दो।
और conclusion: “नानक लेखै इक गल, होर हउमै झखणा झाख।” नानक कहते हैं, “लेखे में एक बात।” बाक़ी सब “हउमै” (अहंकार) का “झखणा झाख” (बकवास, useless chatter) है।
यह “एक बात” क्या है? यह नानक स्पष्ट नहीं कर रहे। मगर context से समझ आता है, हरि-स्मरण, सत-नाम।
दिल्ली में हम सब credentialism में फँसे हैं। CV में सबसे ज़्यादा “qualifications” डाल कर हम सोचते हैं, हम better हैं। नानक कह रहे हैं, यह सब “हउमै झखणा झाख” है। एक genuine line of action (हरि-स्मरण) उसके सामने 100 degrees के बराबर है।
यह anti-intellectualism नहीं। नानक ख़ुद बहुत सी traditions, languages, scripts के knower थे। मगर वो कह रहे हैं, “knowing के लिए knowing” का value कम है। transformative knowing चाहिए।