अंग
426
राग आसा
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੩ ॥
ਆਪੈ ਆਪੁ ਪਛਾਣਿਆ ਸਾਦੁ ਮੀਠਾ ਭਾਈ ॥
ਹਰਿ ਰਸਿ ਚਾਖਿਐ ਮੁਕਤੁ ਭਏ ਜਿਨੑਾ ਸਾਚੋ ਭਾਈ ॥੧॥
ਹਰਿ ਜੀਉ ਨਿਰਮਲ ਨਿਰਮਲਾ ਨਿਰਮਲ ਮਨਿ ਵਾਸਾ ॥
ਗੁਰਮਤੀ ਸਾਲਾਹੀਐ ਬਿਖਿਆ ਮਾਹਿ ਉਦਾਸਾ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਬਿਨੁ ਸਬਦੈ ਆਪੁ ਨ ਜਾਪਈ ਸਭ ਅੰਧੀ ਭਾਈ ॥
ਗੁਰਮਤੀ ਘਟਿ ਚਾਨਣਾ ਨਾਮੁ ਅੰਤਿ ਸਖਾਈ ॥੨॥
ਨਾਮੇ ਹੀ ਨਾਮਿ ਵਰਤਦੇ ਨਾਮੇ ਵਰਤਾਰਾ ॥
ਅੰਤਰਿ ਨਾਮੁ ਮੁਖਿ ਨਾਮੁ ਹੈ ਨਾਮੇ ਸਬਦਿ ਵੀਚਾਰਾ ॥੩॥
ਨਾਮੁ ਸੁਣੀਐ ਨਾਮੁ ਮੰਨੀਐ ਨਾਮੇ ਵਡਿਆਈ ॥
ਨਾਮੁ ਸਲਾਹੇ ਸਦਾ ਸਦਾ ਨਾਮੇ ਮਹਲੁ ਪਾਈ ॥੪॥
ਨਾਮੇ ਹੀ ਘਟਿ ਚਾਨਣਾ ਨਾਮੇ ਸੋਭਾ ਪਾਈ ॥
ਨਾਮੇ ਹੀ ਸੁਖੁ ਊਪਜੈ ਨਾਮੇ ਸਰਣਾਈ ॥੫॥
ਬਿਨੁ ਨਾਵੈ ਕੋਇ ਨ ਮੰਨੀਐ ਮਨਮੁਖਿ ਪਤਿ ਗਵਾਈ ॥
ਜਮ ਪੁਰਿ ਬਾਧੇ ਮਾਰੀਅਹਿ ਬਿਰਥਾ ਜਨਮੁ ਗਵਾਈ ॥੬॥
ਨਾਮੈ ਕੀ ਸਭ ਸੇਵਾ ਕਰੈ ਗੁਰਮੁਖਿ ਨਾਮੁ ਬੁਝਾਈ ॥
ਨਾਮਹੁ ਹੀ ਨਾਮੁ ਮੰਨੀਐ ਨਾਮੇ ਵਡਿਆਈ ॥੭॥
ਜਿਸ ਨੋ ਦੇਵੈ ਤਿਸੁ ਮਿਲੈ ਗੁਰਮਤੀ ਨਾਮੁ ਬੁਝਾਈ ॥
ਨਾਨਕ ਸਭ ਕਿਛੁ ਨਾਵੈ ਕੈ ਵਸਿ ਹੈ ਪੂਰੈ ਭਾਗਿ ਕੋ ਪਾਈ ॥੮॥੭॥੨੯॥
ਆਪੈ ਆਪੁ ਪਛਾਣਿਆ ਸਾਦੁ ਮੀਠਾ ਭਾਈ ॥
ਹਰਿ ਰਸਿ ਚਾਖਿਐ ਮੁਕਤੁ ਭਏ ਜਿਨੑਾ ਸਾਚੋ ਭਾਈ ॥੧॥
ਹਰਿ ਜੀਉ ਨਿਰਮਲ ਨਿਰਮਲਾ ਨਿਰਮਲ ਮਨਿ ਵਾਸਾ ॥
ਗੁਰਮਤੀ ਸਾਲਾਹੀਐ ਬਿਖਿਆ ਮਾਹਿ ਉਦਾਸਾ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਬਿਨੁ ਸਬਦੈ ਆਪੁ ਨ ਜਾਪਈ ਸਭ ਅੰਧੀ ਭਾਈ ॥
ਗੁਰਮਤੀ ਘਟਿ ਚਾਨਣਾ ਨਾਮੁ ਅੰਤਿ ਸਖਾਈ ॥੨॥
ਨਾਮੇ ਹੀ ਨਾਮਿ ਵਰਤਦੇ ਨਾਮੇ ਵਰਤਾਰਾ ॥
ਅੰਤਰਿ ਨਾਮੁ ਮੁਖਿ ਨਾਮੁ ਹੈ ਨਾਮੇ ਸਬਦਿ ਵੀਚਾਰਾ ॥੩॥
ਨਾਮੁ ਸੁਣੀਐ ਨਾਮੁ ਮੰਨੀਐ ਨਾਮੇ ਵਡਿਆਈ ॥
ਨਾਮੁ ਸਲਾਹੇ ਸਦਾ ਸਦਾ ਨਾਮੇ ਮਹਲੁ ਪਾਈ ॥੪॥
ਨਾਮੇ ਹੀ ਘਟਿ ਚਾਨਣਾ ਨਾਮੇ ਸੋਭਾ ਪਾਈ ॥
ਨਾਮੇ ਹੀ ਸੁਖੁ ਊਪਜੈ ਨਾਮੇ ਸਰਣਾਈ ॥੫॥
ਬਿਨੁ ਨਾਵੈ ਕੋਇ ਨ ਮੰਨੀਐ ਮਨਮੁਖਿ ਪਤਿ ਗਵਾਈ ॥
ਜਮ ਪੁਰਿ ਬਾਧੇ ਮਾਰੀਅਹਿ ਬਿਰਥਾ ਜਨਮੁ ਗਵਾਈ ॥੬॥
ਨਾਮੈ ਕੀ ਸਭ ਸੇਵਾ ਕਰੈ ਗੁਰਮੁਖਿ ਨਾਮੁ ਬੁਝਾਈ ॥
ਨਾਮਹੁ ਹੀ ਨਾਮੁ ਮੰਨੀਐ ਨਾਮੇ ਵਡਿਆਈ ॥੭॥
ਜਿਸ ਨੋ ਦੇਵੈ ਤਿਸੁ ਮਿਲੈ ਗੁਰਮਤੀ ਨਾਮੁ ਬੁਝਾਈ ॥
ਨਾਨਕ ਸਭ ਕਿਛੁ ਨਾਵੈ ਕੈ ਵਸਿ ਹੈ ਪੂਰੈ ਭਾਗਿ ਕੋ ਪਾਈ ॥੮॥੭॥੨੯॥
आसा महला ३ ॥
आपै आपु पछाणिआ सादु मीठा भाई ॥
हरि रसि चाखिऐ मुकतु भए जिन॑ा साचो भाई ॥१॥
हरि जीउ निरमल निरमला निरमल मनि वासा ॥
गुरमती सालाहीऐ बिखिआ माहि उदासा ॥१॥ रहाउ ॥
बिनु सबदै आपु न जापई सभ अंधी भाई ॥
गुरमती घटि चानणा नामु अंति सखाई ॥२॥
नामे ही नामि वरतदे नामे वरतारा ॥
अंतरि नामु मुखि नामु है नामे सबदि वीचारा ॥३॥
नामु सुणीऐ नामु मंनीऐ नामे वडिआई ॥
नामु सलाहे सदा सदा नामे महलु पाई ॥४॥
नामे ही घटि चानणा नामे सोभा पाई ॥
नामे ही सुखु ऊपजै नामे सरणाई ॥५॥
बिनु नावै कोइ न मंनीऐ मनमुखि पति गवाई ॥
जम पुरि बाधे मारीअहि बिरथा जनमु गवाई ॥६॥
नामै की सभ सेवा करै गुरमुखि नामु बुझाई ॥
नामहु ही नामु मंनीऐ नामे वडिआई ॥७॥
जिस नो देवै तिसु मिलै गुरमती नामु बुझाई ॥
नानक सभ किछु नावै कै वसि है पूरै भागि को पाई ॥८॥७॥२९॥
आपै आपु पछाणिआ सादु मीठा भाई ॥
हरि रसि चाखिऐ मुकतु भए जिन॑ा साचो भाई ॥१॥
हरि जीउ निरमल निरमला निरमल मनि वासा ॥
गुरमती सालाहीऐ बिखिआ माहि उदासा ॥१॥ रहाउ ॥
बिनु सबदै आपु न जापई सभ अंधी भाई ॥
गुरमती घटि चानणा नामु अंति सखाई ॥२॥
नामे ही नामि वरतदे नामे वरतारा ॥
अंतरि नामु मुखि नामु है नामे सबदि वीचारा ॥३॥
नामु सुणीऐ नामु मंनीऐ नामे वडिआई ॥
नामु सलाहे सदा सदा नामे महलु पाई ॥४॥
नामे ही घटि चानणा नामे सोभा पाई ॥
नामे ही सुखु ऊपजै नामे सरणाई ॥५॥
बिनु नावै कोइ न मंनीऐ मनमुखि पति गवाई ॥
जम पुरि बाधे मारीअहि बिरथा जनमु गवाई ॥६॥
नामै की सभ सेवा करै गुरमुखि नामु बुझाई ॥
नामहु ही नामु मंनीऐ नामे वडिआई ॥७॥
जिस नो देवै तिसु मिलै गुरमती नामु बुझाई ॥
नानक सभ किछु नावै कै वसि है पूरै भागि को पाई ॥८॥७॥२९॥
हिन्दी अर्थ: आसा महला ३ ॥ हे भाई ! परमात्मा का नाम-रस चखने से मनुष्य अपने ही आत्मिक जीवन को खोजने लग जाता है और इस तरह नाम-रस का स्वाद मीठा आने लग पड़ता है। (नाम-रस की बरकति से) जिनको सदा-स्थिर रहने वाला परमात्मा प्यारा लगने लग पड़ता है वे माया के मोह से आजाद हो जाते हैं। 1। हे भाई ! परमात्मा निरोल पवित्र है।उसका निवास पवित्र मन में ही हो सकता है। अगर गुरू की मति पर चल के परमात्मा की सिफत सालाह करते रहें तो माया में रहते हुए ही माया से निर्लिप हो सकते हैं। 1।रहाउ। हे भाई ! गुरू के शबद के बिना अपने आत्मिक जीवन को परखा नहीं जा सकता (शबद के बिना) सारी दुनिया (माया के मोह में) अंधी हुई रहती है। गुरू की मति से हृदय में (बसाया हुआ नाम आत्मिक जीवन के लिए) रौशनी देता है।आखिरी समय भी हरि-नाम ही साथी बनता है। 2। (हे भाई ! जो मनुष्य गुरू की मति पर चलते हैं वह) सदा हरि-नाम में ही लीन रहते हैं।नाम में लीन ही वे दुनिया के काम-काज करते हैं। उनके हृदय में नाम टिका रहता है।उनके मुंह में नाम बसता है।वह गुरू-शबद के द्वारा हरि-नाम का विचार करते रहते हैं। 3। हे भाई ! हर समय हरि-नाम सुनना चाहिए।हरि-नाम में मन लगाना चाहिए।हरि-नाम की बरकति से (लोक-परलोक में) आदर मिलता है। जो मनुष्य सदा हर वक्त हरी की सिफत सालाह करता है वह हरी नाम के द्वारा हरी-चरणों में ठिकाना ढूँढ लेता है। 4। हे भाई ! हरी-नाम से हृदय में (आत्मिक जीवन के लिए) प्रकाश पैदा होता है।(हर जगह) शोभा मिलती है। आत्मिक आनंद प्राप्त होता है।हरी की ही शरण पड़े रहते हैं। 5। हे भाई ! नाम सिमरन के बिना किसी भी मनुष्य को दरगाह में आदर नहीं मिलता।अपने मन के पीछे चलने वाला मनुष्य (दरगाह में) इज्जत गवा बैठता है। ऐसे मनुष्य जम की पुरी में बंधे हुए मार खाते हैं।वह अपना मानस जनम व्यर्थ गवा जाते हैं। 6। हे भाई ! सारी दुनिया हरि-नाम (जपने वाले) की सेवा करती है।नाम जपने की समझ गुरू बख्शता है। (हे भाई ! हर जगह) नाम (जपने वाले) को ही आदर मिलता है।नाम की बरकति से ही (लोक-परलोक में) इज्जत मिलती है। 7। पर हे भाई ! हरि-नाम सिर्फ उसी को ही मिलता है जिसे हरी स्वयं देता है।जिसे गुरू की मति पर चला के नाम (सिमरन की) समझ बख्शता है। हे नानक ! हरेक (आदर मान) हरि-नाम के वश में है।कोई दुर्लभ मनुष्य ही बड़ी किस्मत से हरि-नाम प्राप्त करता है। 8। 7। 29।
ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੩ ॥
ਦੋਹਾਗਣੀ ਮਹਲੁ ਨ ਪਾਇਨੑੀ ਨ ਜਾਣਨਿ ਪਿਰ ਕਾ ਸੁਆਉ ॥
ਫਿਕਾ ਬੋਲਹਿ ਨਾ ਨਿਵਹਿ ਦੂਜਾ ਭਾਉ ਸੁਆਉ ॥੧॥
ਇਹੁ ਮਨੂਆ ਕਿਉ ਕਰਿ ਵਸਿ ਆਵੈ ॥
ਗੁਰ ਪਰਸਾਦੀ ਠਾਕੀਐ ਗਿਆਨ ਮਤੀ ਘਰਿ ਆਵੈ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਸੋਹਾਗਣੀ ਆਪਿ ਸਵਾਰੀਓਨੁ ਲਾਇ ਪ੍ਰੇਮ ਪਿਆਰੁ ॥
ਸਤਿਗੁਰ ਕੈ ਭਾਣੈ ਚਲਦੀਆ ਨਾਮੇ ਸਹਜਿ ਸੀਗਾਰੁ ॥੨॥
ਸਦਾ ਰਾਵਹਿ ਪਿਰੁ ਆਪਣਾ ਸਚੀ ਸੇਜ ਸੁਭਾਇ ॥
ਪਿਰ ਕੈ ਪ੍ਰੇਮਿ ਮੋਹੀਆ ਮਿਲਿ ਪ੍ਰੀਤਮ ਸੁਖੁ ਪਾਇ ॥੩॥
ਗਿਆਨ ਅਪਾਰੁ ਸੀਗਾਰੁ ਹੈ ਸੋਭਾਵੰਤੀ ਨਾਰਿ ॥
ਸਾ ਸਭਰਾਈ ਸੁੰਦਰੀ ਪਿਰ ਕੈ ਹੇਤਿ ਪਿਆਰਿ ॥੪॥
ਸੋਹਾਗਣੀ ਵਿਚਿ ਰੰਗੁ ਰਖਿਓਨੁ ਸਚੈ ਅਲਖਿ ਅਪਾਰਿ ॥
ਸਤਿਗੁਰੁ ਸੇਵਨਿ ਆਪਣਾ ਸਚੈ ਭਾਇ ਪਿਆਰਿ ॥੫॥
ਸੋਹਾਗਣੀ ਸੀਗਾਰੁ ਬਣਾਇਆ ਗੁਣ ਕਾ ਗਲਿ ਹਾਰੁ ॥
ਪ੍ਰੇਮ ਪਿਰਮਲੁ ਤਨਿ ਲਾਵਣਾ ਅੰਤਰਿ ਰਤਨੁ ਵੀਚਾਰੁ ॥੬॥
ਭਗਤਿ ਰਤੇ ਸੇ ਊਤਮਾ ਜਤਿ ਪਤਿ ਸਬਦੇ ਹੋਇ ॥
ਬਿਨੁ ਨਾਵੈ ਸਭ ਨੀਚ ਜਾਤਿ ਹੈ ਬਿਸਟਾ ਕਾ ਕੀੜਾ ਹੋਇ ॥੭॥
ਹਉ ਹਉ ਕਰਦੀ ਸਭ ਫਿਰੈ ਬਿਨੁ ਸਬਦੈ ਹਉ ਨ ਜਾਇ ॥
ਨਾਨਕ ਨਾਮਿ ਰਤੇ ਤਿਨ ਹਉਮੈ ਗਈ ਸਚੈ ਰਹੇ ਸਮਾਇ ॥੮॥੮॥੩੦॥
ਦੋਹਾਗਣੀ ਮਹਲੁ ਨ ਪਾਇਨੑੀ ਨ ਜਾਣਨਿ ਪਿਰ ਕਾ ਸੁਆਉ ॥
ਫਿਕਾ ਬੋਲਹਿ ਨਾ ਨਿਵਹਿ ਦੂਜਾ ਭਾਉ ਸੁਆਉ ॥੧॥
ਇਹੁ ਮਨੂਆ ਕਿਉ ਕਰਿ ਵਸਿ ਆਵੈ ॥
ਗੁਰ ਪਰਸਾਦੀ ਠਾਕੀਐ ਗਿਆਨ ਮਤੀ ਘਰਿ ਆਵੈ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਸੋਹਾਗਣੀ ਆਪਿ ਸਵਾਰੀਓਨੁ ਲਾਇ ਪ੍ਰੇਮ ਪਿਆਰੁ ॥
ਸਤਿਗੁਰ ਕੈ ਭਾਣੈ ਚਲਦੀਆ ਨਾਮੇ ਸਹਜਿ ਸੀਗਾਰੁ ॥੨॥
ਸਦਾ ਰਾਵਹਿ ਪਿਰੁ ਆਪਣਾ ਸਚੀ ਸੇਜ ਸੁਭਾਇ ॥
ਪਿਰ ਕੈ ਪ੍ਰੇਮਿ ਮੋਹੀਆ ਮਿਲਿ ਪ੍ਰੀਤਮ ਸੁਖੁ ਪਾਇ ॥੩॥
ਗਿਆਨ ਅਪਾਰੁ ਸੀਗਾਰੁ ਹੈ ਸੋਭਾਵੰਤੀ ਨਾਰਿ ॥
ਸਾ ਸਭਰਾਈ ਸੁੰਦਰੀ ਪਿਰ ਕੈ ਹੇਤਿ ਪਿਆਰਿ ॥੪॥
ਸੋਹਾਗਣੀ ਵਿਚਿ ਰੰਗੁ ਰਖਿਓਨੁ ਸਚੈ ਅਲਖਿ ਅਪਾਰਿ ॥
ਸਤਿਗੁਰੁ ਸੇਵਨਿ ਆਪਣਾ ਸਚੈ ਭਾਇ ਪਿਆਰਿ ॥੫॥
ਸੋਹਾਗਣੀ ਸੀਗਾਰੁ ਬਣਾਇਆ ਗੁਣ ਕਾ ਗਲਿ ਹਾਰੁ ॥
ਪ੍ਰੇਮ ਪਿਰਮਲੁ ਤਨਿ ਲਾਵਣਾ ਅੰਤਰਿ ਰਤਨੁ ਵੀਚਾਰੁ ॥੬॥
ਭਗਤਿ ਰਤੇ ਸੇ ਊਤਮਾ ਜਤਿ ਪਤਿ ਸਬਦੇ ਹੋਇ ॥
ਬਿਨੁ ਨਾਵੈ ਸਭ ਨੀਚ ਜਾਤਿ ਹੈ ਬਿਸਟਾ ਕਾ ਕੀੜਾ ਹੋਇ ॥੭॥
ਹਉ ਹਉ ਕਰਦੀ ਸਭ ਫਿਰੈ ਬਿਨੁ ਸਬਦੈ ਹਉ ਨ ਜਾਇ ॥
ਨਾਨਕ ਨਾਮਿ ਰਤੇ ਤਿਨ ਹਉਮੈ ਗਈ ਸਚੈ ਰਹੇ ਸਮਾਇ ॥੮॥੮॥੩੦॥
आसा महला ३ ॥
दोहागणी महलु न पाइन॑ी न जाणनि पिर का सुआउ ॥
फिका बोलहि ना निवहि दूजा भाउ सुआउ ॥१॥
इहु मनूआ किउ करि वसि आवै ॥
गुर परसादी ठाकीऐ गिआन मती घरि आवै ॥१॥ रहाउ ॥
सोहागणी आपि सवारीओनु लाइ प्रेम पिआरु ॥
सतिगुर कै भाणै चलदीआ नामे सहजि सीगारु ॥२॥
सदा रावहि पिरु आपणा सची सेज सुभाइ ॥
पिर कै प्रेमि मोहीआ मिलि प्रीतम सुखु पाइ ॥३॥
गिआन अपारु सीगारु है सोभावंती नारि ॥
सा सभराई सुंदरी पिर कै हेति पिआरि ॥४॥
सोहागणी विचि रंगु रखिओनु सचै अलखि अपारि ॥
सतिगुरु सेवनि आपणा सचै भाइ पिआरि ॥५॥
सोहागणी सीगारु बणाइआ गुण का गलि हारु ॥
प्रेम पिरमलु तनि लावणा अंतरि रतनु वीचारु ॥६॥
भगति रते से ऊतमा जति पति सबदे होइ ॥
बिनु नावै सभ नीच जाति है बिसटा का कीड़ा होइ ॥७॥
हउ हउ करदी सभ फिरै बिनु सबदै हउ न जाइ ॥
नानक नामि रते तिन हउमै गई सचै रहे समाइ ॥८॥८॥३०॥
दोहागणी महलु न पाइन॑ी न जाणनि पिर का सुआउ ॥
फिका बोलहि ना निवहि दूजा भाउ सुआउ ॥१॥
इहु मनूआ किउ करि वसि आवै ॥
गुर परसादी ठाकीऐ गिआन मती घरि आवै ॥१॥ रहाउ ॥
सोहागणी आपि सवारीओनु लाइ प्रेम पिआरु ॥
सतिगुर कै भाणै चलदीआ नामे सहजि सीगारु ॥२॥
सदा रावहि पिरु आपणा सची सेज सुभाइ ॥
पिर कै प्रेमि मोहीआ मिलि प्रीतम सुखु पाइ ॥३॥
गिआन अपारु सीगारु है सोभावंती नारि ॥
सा सभराई सुंदरी पिर कै हेति पिआरि ॥४॥
सोहागणी विचि रंगु रखिओनु सचै अलखि अपारि ॥
सतिगुरु सेवनि आपणा सचै भाइ पिआरि ॥५॥
सोहागणी सीगारु बणाइआ गुण का गलि हारु ॥
प्रेम पिरमलु तनि लावणा अंतरि रतनु वीचारु ॥६॥
भगति रते से ऊतमा जति पति सबदे होइ ॥
बिनु नावै सभ नीच जाति है बिसटा का कीड़ा होइ ॥७॥
हउ हउ करदी सभ फिरै बिनु सबदै हउ न जाइ ॥
नानक नामि रते तिन हउमै गई सचै रहे समाइ ॥८॥८॥३०॥
हिन्दी अर्थ: आसा महला ३ ॥ दुर्भाग्यशाली जीव-सि्त्रयां प्रभू-पति का ठिकाना नहीं ढूँढ सकतीं।वे प्रभू-पति के मिलाप का आनंद नहीं जान सकती। वे कटु वचन बोलती हैं।झुकना नहीं जानती।माया का प्यार ही उनकी जिंदगी का प्यार बना रहता है। 1। (हे भाई ! क्या तुझे पता है कि) ये मन किस तरह काबू में आता है।(देख। इस मन को) गुरू की कृपा से ही (विकारों से इसे) रोका जा सकता है (गुरू के बख्शे हुए) ज्ञान की मति के आसरे (ये मन) अंतरात्मे आ टिकता है। 1।रहाउ। (हे भाई !) सौभाग्यपूर्ण वालियों को अपने प्रेम-प्यार की दाति दे के परमात्मा ने अपने सुंदर जीवन वाली बना दिया है। वे सदा गुरू की रजा में जीवन बिताती हैं।नाम में आत्मिक अडोलता में टिके रहना उनके आत्मिक जीवन का श्रृंगार है। 2। वह जीव-सि्त्रयां सदा अपने पति-प्रभू को हृदय में बसाए रखती हैं।प्रेम की बरकति से (उनका हृदय प्रभू-पति के लिए) सदा टिकी रहने वाली अटल सेज बना रहता है। (इस तरह) आत्मिक आनंद प्राप्त करके प्रीतम प्रभू को मिल के वह प्रभू-पति के प्रेम में मस्त रहती हैं। 3। (हे भाई ! जिस जीव-स्त्री को प्रभू-पति ने स्वयं सवार दिया) वह जीव-स्त्री शोभा कमाती है।गुरू का बख्शा हुआ उसके पास कभी ना खत्म होने वाला (आत्मिक) श्रृंगार है। प्रभू-पति के प्रेम-प्यार की बरकति से वह सुंदर जीवन वाली बन जाती है वह प्रभू-पातशाह की पटरानी बन जाती है। 4। (हे भाई !) सदा-स्थिर अलख और अपार प्रभू ने सोहागन (जीव-सि्त्रयों के हृदय) में अपना प्यार खुद टिका के रखा है। वह गुरू की बताई सेवा करती रहती हैं और सदा-स्थिर रहने वाले परमात्मा के प्रेम में प्यार में (मस्त रहती हैं)। 5। हे भाई ! जिन जीव-सि्त्रयों के सिर पर पति-प्रभू का हाथ है उन्होंने पति-प्रभू के गुणों को अपने जीवन का गहना बनाया हुआ है।प्रभू के गुणों का हार बना के अपने गले में डाला हुआ है। वह प्रभू-पति के प्यार की सुगंधि को अपने शरीर पर लगाती हैं।वह अपने दिल में प्रभू के गुणों के विचार का रत्न संभाल के रखती हैं। 6। हे भाई ! जो मनुष्य प्रभू की भक्ति के रंग में रंगे जाते हैं वह ऊँची जाति वाले हैं।गुरू के शबद में जुड़ने से ही ऊँची जाति बनती है ऊँची कुल बनती है।प्रभू के नाम से वंचित सारी दुनिया ही नीच जाति की है। (नाम से टूट के दुनियों विकारों की गंदगी में टिकी रहती है।जैसे) विष्ठा का कीड़ा विष्ठा में ही मगन रहता है। 7। (हे भाई ! प्रभू के नाम से टूट के) सारी दुनिया अहम् अहंकार में आफरी फिरती है।गुरू के शबद के बिना ये अहम् दूर नहीं हो सकता। हे नानक ! जो लोग परमात्मा के नाम-रंग में रंगे जाते हैं उनका अहंकार दूर हो जाता है वह सदा स्थिर रहने वाले परमात्मा (की याद) में लीन रहते हैं। 8। 8। 30।
ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੩ ॥
ਸਚੇ ਰਤੇ ਸੇ ਨਿਰਮਲੇ ਸਦਾ ਸਚੀ ਸੋਇ ॥
ਐਥੈ ਘਰਿ ਘਰਿ ਜਾਪਦੇ ਆਗੈ ਜੁਗਿ ਜੁਗਿ ਪਰਗਟੁ ਹੋਇ ॥੧॥
ਸਚੇ ਰਤੇ ਸੇ ਨਿਰਮਲੇ ਸਦਾ ਸਚੀ ਸੋਇ ॥
ਐਥੈ ਘਰਿ ਘਰਿ ਜਾਪਦੇ ਆਗੈ ਜੁਗਿ ਜੁਗਿ ਪਰਗਟੁ ਹੋਇ ॥੧॥
आसा महला ३ ॥
सचे रते से निरमले सदा सची सोइ ॥
ऐथै घरि घरि जापदे आगै जुगि जुगि परगटु होइ ॥१॥
सचे रते से निरमले सदा सची सोइ ॥
ऐथै घरि घरि जापदे आगै जुगि जुगि परगटु होइ ॥१॥
हिन्दी अर्थ: आसा महला ३ ॥ हे भाई ! जो मनुष्य सदा-स्थिर प्रभू (के नाम रंग) में रंगे जाते हैं वे पवित्र जीवन वाले हो जाते हैं उन्हें सदा कायम रहने वाली शोभा मिलती है। इस दुनिया में वह हरेक घर में प्रमुख हो जाते हैं।आगे परलोक में भी उनकी शोभा हमेशा के लिए उजागर हो जाती है। 1।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 426 है, राग आसा का हिस्सा। मुख्य रचयिता: Guru Amar Daas Ji।
Chittaranjan Park के Bengali-दुर्गा-puja के बीच पंडाल में किसी quiet pause में।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 41 पंक्तियों का है, 3 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 426” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: आसा राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 427 →, पीछे का: ← अंग 425।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।