अंग
416
राग आसा
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੧ ॥
ਤਨੁ ਬਿਨਸੈ ਧਨੁ ਕਾ ਕੋ ਕਹੀਐ ॥
ਬਿਨੁ ਗੁਰ ਰਾਮ ਨਾਮੁ ਕਤ ਲਹੀਐ ॥
ਰਾਮ ਨਾਮ ਧਨੁ ਸੰਗਿ ਸਖਾਈ ॥
ਅਹਿਨਿਸਿ ਨਿਰਮਲੁ ਹਰਿ ਲਿਵ ਲਾਈ ॥੧॥
ਰਾਮ ਨਾਮ ਬਿਨੁ ਕਵਨੁ ਹਮਾਰਾ ॥
ਸੁਖ ਦੁਖ ਸਮ ਕਰਿ ਨਾਮੁ ਨ ਛੋਡਉ ਆਪੇ ਬਖਸਿ ਮਿਲਾਵਣਹਾਰਾ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਕਨਿਕ ਕਾਮਨੀ ਹੇਤੁ ਗਵਾਰਾ ॥
ਦੁਬਿਧਾ ਲਾਗੇ ਨਾਮੁ ਵਿਸਾਰਾ ॥
ਜਿਸੁ ਤੂੰ ਬਖਸਹਿ ਨਾਮੁ ਜਪਾਇ ॥
ਦੂਤੁ ਨ ਲਾਗਿ ਸਕੈ ਗੁਨ ਗਾਇ ॥੨॥
ਹਰਿ ਗੁਰੁ ਦਾਤਾ ਰਾਮ ਗੁਪਾਲਾ ॥
ਜਿਉ ਭਾਵੈ ਤਿਉ ਰਾਖੁ ਦਇਆਲਾ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਰਾਮੁ ਮੇਰੈ ਮਨਿ ਭਾਇਆ ॥
ਰੋਗ ਮਿਟੇ ਦੁਖੁ ਠਾਕਿ ਰਹਾਇਆ ॥੩॥
ਅਵਰੁ ਨ ਅਉਖਧੁ ਤੰਤ ਨ ਮੰਤਾ ॥
ਹਰਿ ਹਰਿ ਸਿਮਰਣੁ ਕਿਲਵਿਖ ਹੰਤਾ ॥
ਤੂੰ ਆਪਿ ਭੁਲਾਵਹਿ ਨਾਮੁ ਵਿਸਾਰਿ ॥
ਤੂੰ ਆਪੇ ਰਾਖਹਿ ਕਿਰਪਾ ਧਾਰਿ ॥੪॥
ਰੋਗੁ ਭਰਮੁ ਭੇਦੁ ਮਨਿ ਦੂਜਾ ॥
ਗੁਰ ਬਿਨੁ ਭਰਮਿ ਜਪਹਿ ਜਪੁ ਦੂਜਾ ॥
ਆਦਿ ਪੁਰਖ ਗੁਰ ਦਰਸ ਨ ਦੇਖਹਿ ॥
ਵਿਣੁ ਗੁਰ ਸਬਦੈ ਜਨਮੁ ਕਿ ਲੇਖਹਿ ॥੫॥
ਦੇਖਿ ਅਚਰਜੁ ਰਹੇ ਬਿਸਮਾਦਿ ॥
ਘਟਿ ਘਟਿ ਸੁਰ ਨਰ ਸਹਜ ਸਮਾਧਿ ॥
ਭਰਿਪੁਰਿ ਧਾਰਿ ਰਹੇ ਮਨ ਮਾਹੀ ॥
ਤੁਮ ਸਮਸਰਿ ਅਵਰੁ ਕੋ ਨਾਹੀ ॥੬॥
ਜਾ ਕੀ ਭਗਤਿ ਹੇਤੁ ਮੁਖਿ ਨਾਮੁ ॥
ਸੰਤ ਭਗਤ ਕੀ ਸੰਗਤਿ ਰਾਮੁ ॥
ਬੰਧਨ ਤੋਰੇ ਸਹਜਿ ਧਿਆਨੁ ॥
ਛੂਟੈ ਗੁਰਮੁਖਿ ਹਰਿ ਗੁਰ ਗਿਆਨੁ ॥੭॥
ਨਾ ਜਮਦੂਤ ਦੂਖੁ ਤਿਸੁ ਲਾਗੈ ॥
ਜੋ ਜਨੁ ਰਾਮ ਨਾਮਿ ਲਿਵ ਜਾਗੈ ॥
ਭਗਤਿ ਵਛਲੁ ਭਗਤਾ ਹਰਿ ਸੰਗਿ ॥
ਨਾਨਕ ਮੁਕਤਿ ਭਏ ਹਰਿ ਰੰਗਿ ॥੮॥੯॥
ਤਨੁ ਬਿਨਸੈ ਧਨੁ ਕਾ ਕੋ ਕਹੀਐ ॥
ਬਿਨੁ ਗੁਰ ਰਾਮ ਨਾਮੁ ਕਤ ਲਹੀਐ ॥
ਰਾਮ ਨਾਮ ਧਨੁ ਸੰਗਿ ਸਖਾਈ ॥
ਅਹਿਨਿਸਿ ਨਿਰਮਲੁ ਹਰਿ ਲਿਵ ਲਾਈ ॥੧॥
ਰਾਮ ਨਾਮ ਬਿਨੁ ਕਵਨੁ ਹਮਾਰਾ ॥
ਸੁਖ ਦੁਖ ਸਮ ਕਰਿ ਨਾਮੁ ਨ ਛੋਡਉ ਆਪੇ ਬਖਸਿ ਮਿਲਾਵਣਹਾਰਾ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਕਨਿਕ ਕਾਮਨੀ ਹੇਤੁ ਗਵਾਰਾ ॥
ਦੁਬਿਧਾ ਲਾਗੇ ਨਾਮੁ ਵਿਸਾਰਾ ॥
ਜਿਸੁ ਤੂੰ ਬਖਸਹਿ ਨਾਮੁ ਜਪਾਇ ॥
ਦੂਤੁ ਨ ਲਾਗਿ ਸਕੈ ਗੁਨ ਗਾਇ ॥੨॥
ਹਰਿ ਗੁਰੁ ਦਾਤਾ ਰਾਮ ਗੁਪਾਲਾ ॥
ਜਿਉ ਭਾਵੈ ਤਿਉ ਰਾਖੁ ਦਇਆਲਾ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਰਾਮੁ ਮੇਰੈ ਮਨਿ ਭਾਇਆ ॥
ਰੋਗ ਮਿਟੇ ਦੁਖੁ ਠਾਕਿ ਰਹਾਇਆ ॥੩॥
ਅਵਰੁ ਨ ਅਉਖਧੁ ਤੰਤ ਨ ਮੰਤਾ ॥
ਹਰਿ ਹਰਿ ਸਿਮਰਣੁ ਕਿਲਵਿਖ ਹੰਤਾ ॥
ਤੂੰ ਆਪਿ ਭੁਲਾਵਹਿ ਨਾਮੁ ਵਿਸਾਰਿ ॥
ਤੂੰ ਆਪੇ ਰਾਖਹਿ ਕਿਰਪਾ ਧਾਰਿ ॥੪॥
ਰੋਗੁ ਭਰਮੁ ਭੇਦੁ ਮਨਿ ਦੂਜਾ ॥
ਗੁਰ ਬਿਨੁ ਭਰਮਿ ਜਪਹਿ ਜਪੁ ਦੂਜਾ ॥
ਆਦਿ ਪੁਰਖ ਗੁਰ ਦਰਸ ਨ ਦੇਖਹਿ ॥
ਵਿਣੁ ਗੁਰ ਸਬਦੈ ਜਨਮੁ ਕਿ ਲੇਖਹਿ ॥੫॥
ਦੇਖਿ ਅਚਰਜੁ ਰਹੇ ਬਿਸਮਾਦਿ ॥
ਘਟਿ ਘਟਿ ਸੁਰ ਨਰ ਸਹਜ ਸਮਾਧਿ ॥
ਭਰਿਪੁਰਿ ਧਾਰਿ ਰਹੇ ਮਨ ਮਾਹੀ ॥
ਤੁਮ ਸਮਸਰਿ ਅਵਰੁ ਕੋ ਨਾਹੀ ॥੬॥
ਜਾ ਕੀ ਭਗਤਿ ਹੇਤੁ ਮੁਖਿ ਨਾਮੁ ॥
ਸੰਤ ਭਗਤ ਕੀ ਸੰਗਤਿ ਰਾਮੁ ॥
ਬੰਧਨ ਤੋਰੇ ਸਹਜਿ ਧਿਆਨੁ ॥
ਛੂਟੈ ਗੁਰਮੁਖਿ ਹਰਿ ਗੁਰ ਗਿਆਨੁ ॥੭॥
ਨਾ ਜਮਦੂਤ ਦੂਖੁ ਤਿਸੁ ਲਾਗੈ ॥
ਜੋ ਜਨੁ ਰਾਮ ਨਾਮਿ ਲਿਵ ਜਾਗੈ ॥
ਭਗਤਿ ਵਛਲੁ ਭਗਤਾ ਹਰਿ ਸੰਗਿ ॥
ਨਾਨਕ ਮੁਕਤਿ ਭਏ ਹਰਿ ਰੰਗਿ ॥੮॥੯॥
आसा महला १ ॥
तनु बिनसै धनु का को कहीऐ ॥
बिनु गुर राम नामु कत लहीऐ ॥
राम नाम धनु संगि सखाई ॥
अहिनिसि निरमलु हरि लिव लाई ॥१॥
राम नाम बिनु कवनु हमारा ॥
सुख दुख सम करि नामु न छोडउ आपे बखसि मिलावणहारा ॥१॥ रहाउ ॥
कनिक कामनी हेतु गवारा ॥
दुबिधा लागे नामु विसारा ॥
जिसु तूं बखसहि नामु जपाइ ॥
दूतु न लागि सकै गुन गाइ ॥२॥
हरि गुरु दाता राम गुपाला ॥
जिउ भावै तिउ राखु दइआला ॥
गुरमुखि रामु मेरै मनि भाइआ ॥
रोग मिटे दुखु ठाकि रहाइआ ॥३॥
अवरु न अउखधु तंत न मंता ॥
हरि हरि सिमरणु किलविख हंता ॥
तूं आपि भुलावहि नामु विसारि ॥
तूं आपे राखहि किरपा धारि ॥४॥
रोगु भरमु भेदु मनि दूजा ॥
गुर बिनु भरमि जपहि जपु दूजा ॥
आदि पुरख गुर दरस न देखहि ॥
विणु गुर सबदै जनमु कि लेखहि ॥५॥
देखि अचरजु रहे बिसमादि ॥
घटि घटि सुर नर सहज समाधि ॥
भरिपुरि धारि रहे मन माही ॥
तुम समसरि अवरु को नाही ॥६॥
जा की भगति हेतु मुखि नामु ॥
संत भगत की संगति रामु ॥
बंधन तोरे सहजि धिआनु ॥
छूटै गुरमुखि हरि गुर गिआनु ॥७॥
ना जमदूत दूखु तिसु लागै ॥
जो जनु राम नामि लिव जागै ॥
भगति वछलु भगता हरि संगि ॥
नानक मुकति भए हरि रंगि ॥८॥९॥
तनु बिनसै धनु का को कहीऐ ॥
बिनु गुर राम नामु कत लहीऐ ॥
राम नाम धनु संगि सखाई ॥
अहिनिसि निरमलु हरि लिव लाई ॥१॥
राम नाम बिनु कवनु हमारा ॥
सुख दुख सम करि नामु न छोडउ आपे बखसि मिलावणहारा ॥१॥ रहाउ ॥
कनिक कामनी हेतु गवारा ॥
दुबिधा लागे नामु विसारा ॥
जिसु तूं बखसहि नामु जपाइ ॥
दूतु न लागि सकै गुन गाइ ॥२॥
हरि गुरु दाता राम गुपाला ॥
जिउ भावै तिउ राखु दइआला ॥
गुरमुखि रामु मेरै मनि भाइआ ॥
रोग मिटे दुखु ठाकि रहाइआ ॥३॥
अवरु न अउखधु तंत न मंता ॥
हरि हरि सिमरणु किलविख हंता ॥
तूं आपि भुलावहि नामु विसारि ॥
तूं आपे राखहि किरपा धारि ॥४॥
रोगु भरमु भेदु मनि दूजा ॥
गुर बिनु भरमि जपहि जपु दूजा ॥
आदि पुरख गुर दरस न देखहि ॥
विणु गुर सबदै जनमु कि लेखहि ॥५॥
देखि अचरजु रहे बिसमादि ॥
घटि घटि सुर नर सहज समाधि ॥
भरिपुरि धारि रहे मन माही ॥
तुम समसरि अवरु को नाही ॥६॥
जा की भगति हेतु मुखि नामु ॥
संत भगत की संगति रामु ॥
बंधन तोरे सहजि धिआनु ॥
छूटै गुरमुखि हरि गुर गिआनु ॥७॥
ना जमदूत दूखु तिसु लागै ॥
जो जनु राम नामि लिव जागै ॥
भगति वछलु भगता हरि संगि ॥
नानक मुकति भए हरि रंगि ॥८॥९॥
हिन्दी अर्थ: आसा महला १ ॥ जब मनुष्य का शरीर बिनस जाता है तब (उसका कमाया हुआ) धन उसका नहीं कहा जा सकता (परमात्मा का नाम ही असल धन है जो मनुष्य शरीर के नाश होने के बाद भी अपने साथ ले जा सकता है पर) परमात्मा का नाम-धन गुरू के बिना किसी और से नहीं मिल सकता। परमात्मा का नाम-धन ही मनुष्य का असल साथी है। जो मनुष्य दिन-रात अपनी सुरति प्रभू (-चरणों) में जोड़ता है उसका जीवन पवित्र हो जाता है। 1। परमात्मा के नाम के बिना हम (जीवों का) और कौन सदीवी (हमेशा के लिए मित्र) हो सकता है। (सुख और दुख उसी प्रभू की रजा में आते हैं।इस वास्ते) सुख और दुख को एक समान (उसी की रजा समझ के) मैं (कभी) उसका नाम नहीं छोड़ूँगा।(मुझे पक्का यकीन है कि) परमात्मा खुद ही मेहर करके (अपने चरणों में) जोड़ने वाला है। 1।रहाउ। वह मूर्ख हैंजो सोने व स्त्री के साथ ही मोह बढ़ा रहे हैं और जिन्होंने परमात्मा का नाम भुला दिया है व भटकना में पड़े हुए हैं (पर जीव के भी क्या वश। हे प्रभू !) जिस जीव को तू अपना नाम जपा के (नाम की दाति) बख्शता है। वह तेरे गुण गाता है।जमदूत उसके पास नहीं फटक सकते (आत्मिक मौत उसके नजदीक नहीं आती।‘कनिक कामिनी हेतु’ उसके आत्मिक जीवन को मार नहीं सकता)। 2। हे राम ! हे हरी ! हे गुपाल ! तू ही सब से बड़ा दाता है। जैसे तुझे ठीक लगे वैसे।हे दयालु ! मुझे (‘कनिक कामिनी हेत’ से) बचा ले। गुरू की शरण पड़ के परमात्मा (का नाम) मेरे मन को प्यारा लगता है। मेरे (आत्मिक) रोग मिट गए हैं (आत्मिक मौत वाला) दुख मैंने रोक लिया है। 3। (हे भाई ! ‘कनिक कामिनी हेत’ के रोग से बचाने वाले प्रभू-नाम के बिना) और कोई दवा नहीं।कोई मंत्र नहीं। परमात्मा के नाम का सिमरन ही सारे पापों का नाश करने वाला है। पर। हे प्रभू ! हम जीव क्या कर सकते हैं।हमारे मनों से (अपना) नाम भुला के तू खुद ही हमें गलत रास्ते पर डालता है। और तू स्वयं ही मेहर करके हमें विकारों से बचाता है। 4। उनके मन में विकारों का) रोग है।भटकना है।प्रभू से दूरी है।मेर-तेर है। गुरू की शरण के बिना जो मनुष्य गलत रास्ते पर पड़ के दूसरा जप जपते हैं (कनिक कामिनी आदि के मोह में सदा सुरति जोड़ के रखते हैं। जो मनुष्य कभी गुरू के दर्शन नहीं करते।सबसे आदि सर्व-व्यापक का दर्शन नहीं करते। गुरू के शबद में जुड़े बिना उनका जनम किसी भी काम का नहीं रह जाता। 5। (हे प्रभू !) तुझे आश्चर्य-रूप में देख के हम हैरान होते हैं। तू हरेक शरीर में मौजूद है।देवतों में।मनुष्यों में हरेक में सोए हुए ही अडोल टिका हुआ है। तू हरेक जीव के मन में भरपूर है।तू हरेक को सहारा दे रहा है। तेरे जैसा (रक्षक) और कोई नहीं। 6। (हे भाई !) परमात्मा उन संतों-भक्तों की संगति में मिलता है जिनके मुँह में (सदा उस का) नाम टिका रहता है। उन संत जनों के हृदय में उस प्रभू की भक्ति के वास्ते प्रेम है कसक है। अडोल अवस्था में (टिक के।प्रभू का) ध्यान (धर के संत जन ‘कनिक कामिनी’ वाले) बंधन तोड़ लेते हैं। जो मनुष्य गुरू के सन्मुख होता है जिसके अंदर गुरू का दिया हुआ रब्बी ज्ञान प्रगट होता है वह भी इन बंधनों से मुक्त हो जाता है। 7। उसे जम दूतों का दुख छू नहीं सकता (मौत का डर।आत्मिक मौत उसके पास नहीं फटकती)- जो मनुष्य परमात्मा के नाम में लिव लगा के।‘कनिक कामिनी हेत’ की ओर से सुचेत हो जाता है भक्ति से प्यार करने वाला परमात्मा अपने भक्तों के अंग-संग रहता है। हे नानक ! प्रभू के भक्त प्रभू के प्यार-रंग में (रंग के।बंधनों से) आजाद हो जाते हैं। 8। 9।
ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੧ ਇਕਤੁਕੀ ॥
ਗੁਰੁ ਸੇਵੇ ਸੋ ਠਾਕੁਰ ਜਾਨੈ ॥
ਦੂਖੁ ਮਿਟੈ ਸਚੁ ਸਬਦਿ ਪਛਾਨੈ ॥੧॥
ਰਾਮੁ ਜਪਹੁ ਮੇਰੀ ਸਖੀ ਸਖੈਨੀ ॥
ਸਤਿਗੁਰੁ ਸੇਵਿ ਦੇਖਹੁ ਪ੍ਰਭੁ ਨੈਨੀ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਬੰਧਨ ਮਾਤ ਪਿਤਾ ਸੰਸਾਰਿ ॥
ਬੰਧਨ ਸੁਤ ਕੰਨਿਆ ਅਰੁ ਨਾਰਿ ॥੨॥
ਬੰਧਨ ਕਰਮ ਧਰਮ ਹਉ ਕੀਆ ॥
ਬੰਧਨ ਪੁਤੁ ਕਲਤੁ ਮਨਿ ਬੀਆ ॥੩॥
ਬੰਧਨ ਕਿਰਖੀ ਕਰਹਿ ਕਿਰਸਾਨ ॥
ਹਉਮੈ ਡੰਨੁ ਸਹੈ ਰਾਜਾ ਮੰਗੈ ਦਾਨ ॥੪॥
ਬੰਧਨ ਸਉਦਾ ਅਣਵੀਚਾਰੀ ॥
ਤਿਪਤਿ ਨਾਹੀ ਮਾਇਆ ਮੋਹ ਪਸਾਰੀ ॥੫॥
ਬੰਧਨ ਸਾਹ ਸੰਚਹਿ ਧਨੁ ਜਾਇ ॥
ਬਿਨੁ ਹਰਿ ਭਗਤਿ ਨ ਪਵਈ ਥਾਇ ॥੬॥
ਬੰਧਨ ਬੇਦੁ ਬਾਦੁ ਅਹੰਕਾਰ ॥
ਬੰਧਨਿ ਬਿਨਸੈ ਮੋਹ ਵਿਕਾਰ ॥੭॥
ਨਾਨਕ ਰਾਮ ਨਾਮ ਸਰਣਾਈ ॥
ਸਤਿਗੁਰਿ ਰਾਖੇ ਬੰਧੁ ਨ ਪਾਈ ॥੮॥੧੦॥
ਗੁਰੁ ਸੇਵੇ ਸੋ ਠਾਕੁਰ ਜਾਨੈ ॥
ਦੂਖੁ ਮਿਟੈ ਸਚੁ ਸਬਦਿ ਪਛਾਨੈ ॥੧॥
ਰਾਮੁ ਜਪਹੁ ਮੇਰੀ ਸਖੀ ਸਖੈਨੀ ॥
ਸਤਿਗੁਰੁ ਸੇਵਿ ਦੇਖਹੁ ਪ੍ਰਭੁ ਨੈਨੀ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਬੰਧਨ ਮਾਤ ਪਿਤਾ ਸੰਸਾਰਿ ॥
ਬੰਧਨ ਸੁਤ ਕੰਨਿਆ ਅਰੁ ਨਾਰਿ ॥੨॥
ਬੰਧਨ ਕਰਮ ਧਰਮ ਹਉ ਕੀਆ ॥
ਬੰਧਨ ਪੁਤੁ ਕਲਤੁ ਮਨਿ ਬੀਆ ॥੩॥
ਬੰਧਨ ਕਿਰਖੀ ਕਰਹਿ ਕਿਰਸਾਨ ॥
ਹਉਮੈ ਡੰਨੁ ਸਹੈ ਰਾਜਾ ਮੰਗੈ ਦਾਨ ॥੪॥
ਬੰਧਨ ਸਉਦਾ ਅਣਵੀਚਾਰੀ ॥
ਤਿਪਤਿ ਨਾਹੀ ਮਾਇਆ ਮੋਹ ਪਸਾਰੀ ॥੫॥
ਬੰਧਨ ਸਾਹ ਸੰਚਹਿ ਧਨੁ ਜਾਇ ॥
ਬਿਨੁ ਹਰਿ ਭਗਤਿ ਨ ਪਵਈ ਥਾਇ ॥੬॥
ਬੰਧਨ ਬੇਦੁ ਬਾਦੁ ਅਹੰਕਾਰ ॥
ਬੰਧਨਿ ਬਿਨਸੈ ਮੋਹ ਵਿਕਾਰ ॥੭॥
ਨਾਨਕ ਰਾਮ ਨਾਮ ਸਰਣਾਈ ॥
ਸਤਿਗੁਰਿ ਰਾਖੇ ਬੰਧੁ ਨ ਪਾਈ ॥੮॥੧੦॥
आसा महला १ इकतुकी ॥
गुरु सेवे सो ठाकुर जानै ॥
दूखु मिटै सचु सबदि पछानै ॥१॥
रामु जपहु मेरी सखी सखैनी ॥
सतिगुरु सेवि देखहु प्रभु नैनी ॥१॥ रहाउ ॥
बंधन मात पिता संसारि ॥
बंधन सुत कंनिआ अरु नारि ॥२॥
बंधन करम धरम हउ कीआ ॥
बंधन पुतु कलतु मनि बीआ ॥३॥
बंधन किरखी करहि किरसान ॥
हउमै डंनु सहै राजा मंगै दान ॥४॥
बंधन सउदा अणवीचारी ॥
तिपति नाही माइआ मोह पसारी ॥५॥
बंधन साह संचहि धनु जाइ ॥
बिनु हरि भगति न पवई थाइ ॥६॥
बंधन बेदु बादु अहंकार ॥
बंधनि बिनसै मोह विकार ॥७॥
नानक राम नाम सरणाई ॥
सतिगुरि राखे बंधु न पाई ॥८॥१०॥
गुरु सेवे सो ठाकुर जानै ॥
दूखु मिटै सचु सबदि पछानै ॥१॥
रामु जपहु मेरी सखी सखैनी ॥
सतिगुरु सेवि देखहु प्रभु नैनी ॥१॥ रहाउ ॥
बंधन मात पिता संसारि ॥
बंधन सुत कंनिआ अरु नारि ॥२॥
बंधन करम धरम हउ कीआ ॥
बंधन पुतु कलतु मनि बीआ ॥३॥
बंधन किरखी करहि किरसान ॥
हउमै डंनु सहै राजा मंगै दान ॥४॥
बंधन सउदा अणवीचारी ॥
तिपति नाही माइआ मोह पसारी ॥५॥
बंधन साह संचहि धनु जाइ ॥
बिनु हरि भगति न पवई थाइ ॥६॥
बंधन बेदु बादु अहंकार ॥
बंधनि बिनसै मोह विकार ॥७॥
नानक राम नाम सरणाई ॥
सतिगुरि राखे बंधु न पाई ॥८॥१०॥
हिन्दी अर्थ: आसा महला १ इकतुकी ॥ जो मनुष्य गुरू के बताए हुए अनुसार परमात्मा का सिमरन करता है।वह परमात्मा को (हर जगह व्यापक) जान लेता है। वह मनुष्य सदा स्थिर प्रभू को गुरू के शबद के द्वारा (हर जगह) पहचान लेता है।और (इसतरह उसके मोह का) दुख मिट जाता है। 1। हे मेरी सहेलियो ! (हे मेरे सत्संगियो !) परमात्मा का नाम जपो। गुरू की बताई हुई (ये) सेवा करके (भाव।गुरू की शिक्षा के अनुसार प्रभू का भजन करके) तुम (हर जगह) परमात्मा के दर्शन करोगे। 1।रहाउ। (परमात्मा का सिमरन करने के बिना) संसार में माँ,पिता, पुत्र, बेटी और पत्नी (मोह के) बंधनों के कारण बन जाते हैं। 2। (सिमरन के बिना) धार्मिक रस्में बंधन बन जाती हैं।(मनुष्य गर्व करता है कि ये सब कुछ) ‘मैंने किया है।मैंने किया है’।यदि मन में (परमात्मा के बिना कोई और) दूसरा प्रेम है। तो पुत्र-स्त्री (का रिश्ता भी) बंधनों (का मूल हो जाता) है। 3। किसान (आजीविका के लिए) खेती-बाड़ी करते हैं (करनी भी चाहिए।पर सिमरन के बिना ये खेती-बाड़ी) बंधन बन जाती है। राजा (किसानों से) मामला लेता है।(पर।परमात्मा के सिमरन के बिना राजा ही) अहंकार की सजा भुगतता है। 4। (व्यापारी) व्यापार करता है।प्रभू का नाम सिमरन के बिना ये व्यापार बंधनों का मूल है। (क्योंकि सिमरन के बिना मनुष्य) माया के मोह के पसारे में (इतना फसता है कि माया से उसका) पेट नहीं भरता। 5। शाह-सौदागर (सौदागरी करके) धन एकत्र करते हैं।धन (आखिर) साथ छोड़ जाता है (पर नाम सिमरन के बिना धन) बंधन बन जाता है। परमात्मा की भक्ति के बिना (उनका कोई उद्यम परमात्मा की नजरों में) परवान नहीं होता। 6। (सिमरन के बिना) वेद पाठ और वेद रचना भी अहंकार का मूल है।बंधनों का मूल है। मोह के बंधन में।विकारों के बंधन में (फस के) मनुष्य की आत्मिक मौत हो जाती है। 7। हे नानक ! जो मनुष्य (दुनिया की हरेक किस्म की किरत-कार में) परमात्मा के नाम का आसरा लेते हैं। जान लो कि सतिगुरू ने उनको मोह के बंधनों से बचा लिया।उन्हे कोई बंधन नहीं पड़ता। 8। 10।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 416 है, राग आसा का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)।
गुरु नानक की वाणी, observational, direct, बिना ornament।
Karol Bagh की shopping street की भीड़, और घर लौटते वक़्त की थकान।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 54 पंक्तियों का है, 2 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 416” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: आसा राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 417 →, पीछे का: ← अंग 415।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।