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अंग 416

अंग
416
राग आसा
राग: आसा · रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
आसा महला 1 ॥
तनु बिनसै धनु का को कहीऐ ॥
बिनु गुर राम नामु कत लहीऐ ॥
राम नाम धनु संगि सखाई ॥
अहिनिसि निरमलु हरि लिव लाई ॥1॥
राम नाम बिनु कवनु हमारा ॥
सुख दुख सम करि नामु न छोडउ आपे बखसि मिलावणहारा ॥1॥ रहाउ ॥
कनिक कामनी हेतु गवारा ॥
दुबिधा लागे नामु विसारा ॥
जिसु तूं बखसहि नामु जपाइ ॥
दूतु न लागि सकै गुन गाइ ॥2॥
हरि गुरु दाता राम गुपाला ॥
जिउ भावै तिउ राखु दइआला ॥
गुरमुखि रामु मेरै मनि भाइआ ॥
रोग मिटे दुखु ठाकि रहाइआ ॥3॥
अवरु न अउखधु तंत न मंता ॥
हरि हरि सिमरणु किलविख हंता ॥
तूं आपि भुलावहि नामु विसारि ॥
तूं आपे राखहि किरपा धारि ॥4॥
रोगु भरमु भेदु मनि दूजा ॥
गुर बिनु भरमि जपहि जपु दूजा ॥
आदि पुरख गुर दरस न देखहि ॥
विणु गुर सबदै जनमु कि लेखहि ॥5॥
देखि अचरजु रहे बिसमादि ॥
घटि घटि सुर नर सहज समाधि ॥
भरिपुरि धारि रहे मन माही ॥
तुम समसरि अवरु को नाही ॥6॥
जा की भगति हेतु मुखि नामु ॥
संत भगत की संगति रामु ॥
बंधन तोरे सहजि धिआनु ॥
छूटै गुरमुखि हरि गुर गिआनु ॥7॥
ना जमदूत दूखु तिसु लागै ॥
जो जनु राम नामि लिव जागै ॥
भगति वछलु भगता हरि संगि ॥
नानक मुकति भए हरि रंगि ॥8॥9॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।

हिन्दी अर्थ: आसा महला 1 ॥ जब मनुष्य का शरीर बिनस जाता है तब (उसका कमाया हुआ) धन उसका नहीं कहा जा सकता (परमात्मा का नाम ही असल धन है जो मनुष्य शरीर के नाश होने के बाद भी अपने साथ ले जा सकता है पर) परमात्मा का नाम-धन गुरू के बिना किसी और से नहीं मिल सकता। परमात्मा का नाम-धन ही मनुष्य का असल साथी है। जो मनुष्य दिन-रात अपनी सुरति प्रभू (-चरणों) में जोड़ता है उसका जीवन पवित्र हो जाता है। 1। परमात्मा के नाम के बिना हम (जीवों का) और कौन सदीवी (हमेशा के लिए मित्र) हो सकता है। (सुख और दुख उसी प्रभू की रजा में आते हैं।इस वास्ते) सुख और दुख को एक समान (उसी की रजा समझ के) मैं (कभी) उसका नाम नहीं छोड़ूँगा।(मुझे पक्का यकीन है कि) परमात्मा खुद ही मेहर करके (अपने चरणों में) जोड़ने वाला है। 1।रहाउ। वह मूर्ख हैंजो सोने व स्त्री के साथ ही मोह बढ़ा रहे हैं और जिन्होंने परमात्मा का नाम भुला दिया है व भटकना में पड़े हुए हैं (पर जीव के भी क्या वश। हे प्रभू !) जिस जीव को आप अपना नाम जपा के (नाम की दाति) बख्शता है। वह आपके गुण गाता है।जमदूत उसके पास नहीं फटक सकते (आत्मिक मौत उसके नजदीक नहीं आती।‘कनिक कामिनी हेतु’ उसके आत्मिक जीवन को मार नहीं सकता)। 2। हे राम ! हे हरी ! हे गुपाल ! आप ही सब से बड़ा दाता है। जैसे आपको ठीक लगे वैसे।हे दयालु ! मुझे (‘कनिक कामिनी हेत’ से) बचा ले। गुरू की शरण पड़ के परमात्मा (का नाम) मेरे मन को प्यारा लगता है। मेरे (आत्मिक) रोग मिट गए हैं (आत्मिक मौत वाला) दुख मैंने रोक लिया है। 3। (हे भाई ! ‘कनिक कामिनी हेत’ के रोग से बचाने वाले प्रभू-नाम के बिना) और कोई दवा नहीं।कोई मंत्र नहीं। परमात्मा के नाम का सिमरन ही सारे पापों का नाश करने वाला है। पर। हे प्रभू ! हम जीव क्या कर सकते हैं।हमारे मनों से (अपना) नाम भुला के आप खुद ही हमें गलत रास्ते पर डालता है। और आप स्वयं ही मेहर करके हमें विकारों से बचाता है। 4। उनके मन में विकारों का) रोग है।भटकना है।प्रभू से दूरी है।मेर-तेर है। गुरू की शरण के बिना जो मनुष्य गलत रास्ते पर पड़ के दूसरा जप जपते हैं (कनिक कामिनी आदि के मोह में सदा सुरति जोड़ के रखते हैं। जो मनुष्य कभी गुरू के दर्शन नहीं करते।सबसे आदि सर्व-व्यापक का दर्शन नहीं करते। गुरू के शबद में जुड़े बिना उनका जनम किसी भी काम का नहीं रह जाता। 5। (हे प्रभू !) आपको आश्चर्य-रूप में देख के हम हैरान होते हैं। आप हरेक शरीर में मौजूद है।देवतों में।मनुष्यों में हरेक में सोए हुए ही अडोल टिका हुआ है। आप हरेक जीव के मन में भरपूर है।आप हरेक को सहारा दे रहा है। आपके जैसा (रक्षक) और कोई नहीं। 6। (हे भाई !) परमात्मा उन संतों-भक्तों की संगति में मिलता है जिनके मुँह में (सदा उस का) नाम टिका रहता है। उन संत जनों के हृदय में उस प्रभू की भक्ति के वास्ते प्रेम है कसक है। अडोल अवस्था में (टिक के।प्रभू का) ध्यान (धर के संत जन ‘कनिक कामिनी’ वाले) बंधन तोड़ लेते हैं। जो मनुष्य गुरू के सन्मुख होता है जिसके अंदर गुरू का दिया हुआ रब्बी ज्ञान प्रगट होता है वह भी इन बंधनों से मुक्त हो जाता है। 7। उसे जम दूतों का दुख छू नहीं सकता (मौत का डर।आत्मिक मौत उसके पास नहीं फटकती)- जो मनुष्य परमात्मा के नाम में लिव लगा के।‘कनिक कामिनी हेत’ की ओर से सुचेत हो जाता है भक्ति से प्यार करने वाला परमात्मा अपने भक्तों के अंग-संग रहता है। हे नानक ! प्रभू के भक्त प्रभू के प्यार-रंग में (रंग के।बंधनों से) आजाद हो जाते हैं। 8। 9।
आसा महला 1 इकतुकी ॥
गुरु सेवे सो ठाकुर जानै ॥
दूखु मिटै सचु सबदि पछानै ॥1॥
रामु जपहु मेरी सखी सखैनी ॥
सतिगुरु सेवि देखहु प्रभु नैनी ॥1॥ रहाउ ॥
बंधन मात पिता संसारि ॥
बंधन सुत कंनिआ अरु नारि ॥2॥
बंधन करम धरम हउ कीआ ॥
बंधन पुतु कलतु मनि बीआ ॥3॥
बंधन किरखी करहि किरसान ॥
हउमै डंनु सहै राजा मंगै दान ॥4॥
बंधन सउदा अणवीचारी ॥
तिपति नाही माइआ मोह पसारी ॥5॥
बंधन साह संचहि धनु जाइ ॥
बिनु हरि भगति न पवई थाइ ॥6॥
बंधन बेदु बादु अहंकार ॥
बंधनि बिनसै मोह विकार ॥7॥
नानक राम नाम सरणाई ॥
सतिगुरि राखे बंधु न पाई ॥8॥10॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।

हिन्दी अर्थ: आसा महला 1 इकतुकी ॥ जो मनुष्य गुरू के बताए हुए अनुसार परमात्मा का सिमरन करता है।वह परमात्मा को (हर जगह व्यापक) जान लेता है। वह मनुष्य सदा स्थिर प्रभू को गुरू के शबद के द्वारा (हर जगह) पहचान लेता है।और (इसतरह उसके मोह का) दुख मिट जाता है। 1। हे मेरी सहेलियो ! (हे मेरे सत्संगियो !) परमात्मा का नाम जपो। गुरू की बताई हुई (ये) सेवा करके (भाव।गुरू की शिक्षा के अनुसार प्रभू का भजन करके) आप (हर जगह) परमात्मा के दर्शन करेंगे। 1।रहाउ। (परमात्मा का सिमरन करने के बिना) संसार में माँ,पिता, पुत्र, बेटी और पत्नी (मोह के) बंधनों के कारण बन जाते हैं। 2। (सिमरन के बिना) धार्मिक रस्में बंधन बन जाती हैं।(मनुष्य गर्व करता है कि ये सब कुछ) ‘मैंने किया है।मैंने किया है’।यदि मन में (परमात्मा के बिना कोई और) दूसरा प्रेम है। तो पुत्र-स्त्री (का रिश्ता भी) बंधनों (का मूल हो जाता) है। 3। किसान (आजीविका के लिए) खेती-बाड़ी करते हैं (करनी भी चाहिए।पर सिमरन के बिना ये खेती-बाड़ी) बंधन बन जाती है। राजा (किसानों से) मामला लेता है।(पर।परमात्मा के सिमरन के बिना राजा ही) अहंकार की सजा भुगतता है। 4। (व्यापारी) व्यापार करता है।प्रभू का नाम सिमरन के बिना ये व्यापार बंधनों का मूल है। (क्योंकि सिमरन के बिना मनुष्य) माया के मोह के पसारे में (इतना फसता है कि माया से उसका) पेट नहीं भरता। 5। शाह-सौदागर (सौदागरी करके) धन एकत्र करते हैं।धन (आखिर) साथ छोड़ जाता है (पर नाम सिमरन के बिना धन) बंधन बन जाता है। परमात्मा की भक्ति के बिना (उनका कोई उद्यम परमात्मा की नजरों में) परवान नहीं होता। 6। (सिमरन के बिना) वेद पाठ और वेद रचना भी अहंकार का मूल है।बंधनों का मूल है। मोह के बंधन में।विकारों के बंधन में (फस के) मनुष्य की आत्मिक मौत हो जाती है। 7। हे नानक ! जो मनुष्य (दुनिया की हरेक किस्म की किरत-कार में) परमात्मा के नाम का आसरा लेते हैं। जान लो कि सतिगुरू ने उनको मोह के बंधनों से बचा लिया।उन्हे कोई बंधन नहीं पड़ता। 8। 10।

आसा राग सुबह की पहली रोशनी का है, उम्मीद से भरा, चलने को तैयार। आसा का अर्थ ही ‘आशा’ है। ‘आसा दी वार’ सिख परम्परा की सुबह-कीर्तन का केन्द्र-स्तम्भ रही है, चार-पाँच सदियों से। आसा राग का क्षेत्र है। ‘आसा दी वार’ की रचना गुरु नानक की है, बाद में गुरु अंगद और गुरु अर्जन के साथ संगठित हुई।

गुरु नानक की वाणी का अपना मिज़ाज है, सीधा-सादा, बिना अलंकार के, मगर हर पंक्ति में एक ठहराव। 1469 में तलवण्डी में जन्म, सुलतानपुर के बहीखाते में कुछ साल काम, फिर तीस की उम्र के क़रीब वो लम्बी पैदल यात्रा जो काबुल, बग़दाद, मक्का, जगन्नाथ-पुरी, तिब्बत की सरहद तक उन्हें ले गयी। उनके शबद इन्हीं यात्राओं की वाणी हैं।

इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “आसा महला 1 ॥ जब मनुष्य का शरीर बिनस जाता है तब (उसका कमाया हुआ) धन उसका नहीं कहा जा सकता (परमात्मा का नाम ही असल धन है जो मनुष्य शरीर के नाश होने के बाद भी अपने साथ ले जा सकता है प।”

इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
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