गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।
हिन्दी अर्थ: (पर) नानक कहता है (कि निरे ये रत्न बाँटने से परमात्मा की कौन सी महानता बन गई। उसकी महानता तो उसकी रची कुदरत में जगह-जगह दिखाई दे रही हैं) वह चाहे अपनी कुदरत में छुपा हुआ है। पर छुपा नहीं रह सकता (प्रत्यक्ष उसकी बेअंत कुदरत बता रही है किवह बहुत ताकतों का मालिक है)। 4। 7।
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।
हिन्दी अर्थ: आसा महला 1 ॥ (सिमरन की बरकति से) उस मनुष्य का उच्च आचरण बनता है (ये। मानो। ऊँची मनुष्यता की फुटी हुई) फैली हुई बेल है। (इस बेल को) परमात्मा का नाम-फल लगता है (उसकी सुरति नाम में जुड़ी रहती है) माया-रहित प्रभू ने उसके अंदर सिफत-सालाह का एक प्रवाह चला दिया होता है (वह प्रवाह। मानो। एक संगीत है) जो एक-रस (निरंतर) प्रभाव डाले रखता है। पर उसकी कोई रूप-रेखा बयान नहीं की जा सकती। 1 अगर कोई मनुष्य (सिमरन के द्वारा) परमात्मा से जान-पहिचान बना ले और उसकी सिफत-सालाह करता रहे तो वह नाम-अमृत पीता है (सिमरन से पैदा होने वाला आत्मिक आनंद पाता है)। 1। रहाउ। जिन-जिन जीवों ने वह नाम रस पीया। वे मस्त हो गए। (उन) के (माया के) बंधन और जंजीरें छूट गई। उनके अंदर परमात्मा की जोति टिक गई। उन्होंने माया की खातिर (दिन-रात की) दौड़-भाग छोड़ दी (भा। वे माया के मोह-जाल में से निकल गए)। 2। (जिस मनुष्य ने सिमरन की बरकति से नाम-रस पीया। उस ने। हे प्रभू !) सारे जीवों में आपका ही दीदार किया। उसने सारे भवनों में आपकी पैदा की हुई माया प्रभाव डालती देखी। (वह मनुष्य देखता है कि) परमात्मा इस झगड़ा-रूपी संसार से निराला बैठा हुआ है। और बीच में ही प्रतिबिंब की भांति व्यापक हो के देख भी रहा है। 3। वही (मनुष्य है असल) जोगी। जो अपार परमात्मा के (इस) दृश्य में (मस्त हो के) परमात्मा की सिफत-सालाह रूपी वीणा बजाता रहता है। नानक (अपना ये) ख्याल बताता है कि एक-रस सिफत-सालाह में जुड़े रहने के कारण वह मनुष्य पति-प्रभू के रंग में रंगा रहता है। 4। 8।
आसा महला 1 ॥ मै गुण गला के सिरि भार ॥ गली गला सिरजणहार ॥ खाणा पीणा हसणा बादि ॥ जब लगु रिदै न आवहि यादि ॥1॥ तउ परवाह केही किआ कीजै ॥ जनमि जनमि किछु लीजी लीजै ॥1॥ रहाउ ॥ मन की मति मतागलु मता ॥ जो किछु बोलीऐ सभु खतो खता ॥ किआ मुहु लै कीचै अरदासि ॥ पापु पुंनु दुइ साखी पासि ॥2॥ जैसा तूं करहि तैसा को होइ ॥ तुझ बिनु दूजा नाही कोइ ॥ जेही तूं मति देहि तेही को पावै ॥ तुधु आपे भावै तिवै चलावै ॥3॥ राग रतन परीआ परवार ॥ तिसु विचि उपजै अंम्रितु सार ॥ नानक करते का इहु धनु मालु ॥ जे को बूझै एहु बीचारु ॥4॥9॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।
हिन्दी अर्थ: आसा महला 1 ॥ (पर हे सृजनहार !) मेरे में तो सिर्फ यही गुण हैं (मैंने तो सिर्फ यही कमाई की है) कि मैंने अपने सिर पर (निरी) बातों का भार ही बाँधा हुआ है। बातों में से सिर्फ वही बातें ही ठीक हैं जो। हे सृजनहार ! आपकी बातें हैं (आपकी सिफत-सालाह करी बाते हैं)। तब तक मेरा खाना-पीना मेरा हस-हस के समय गुजारना- ये सब व्यर्थ है – जब तक। हे सृजनहार ! आप मेरे दिल में याद ना आए । 1। तब कोई परवाह नहीं रह जाती और किसी की मुहताजी नहीं रहती जब मनुष्य जनम में आ के कमाने लायक पदार्थ एकत्र करें। 1। रहाउ। (हमने कमाने-योग्य पदार्थ नहीं कमाया। इसलिए) हमारी मन की मति यह है कि मन मस्त हाथी बना पड़ा है (इस अहंकारी मन की अगुवाई में) जो कुछ बोलते हैं सब बुरा ही बुरा है। (हे प्रभू ! आपके दर पर) अरदास भी किस मुंह से करें। (अपनी ढीठता में अरदास करते हुए भी शर्म आती है। क्योंकि) हमारा भला और हमारा बुरा (अच्छाईयों का संग्रह और बुराईयों का संग्रह) ये दोनों हमारी करतूतों के गवाह मौजूद हैं। 2। (पर। हमारे बस में कुछ भी नहीं। हे प्रभू !) आप खुद ही जीव को जैसा बनाता है वैसा ही वह बन जाता है। आपके बगैर और कोई नहीं (जो हमें मति दे सके)। आप ही जैसी बुद्धि बख्शता है। वही मति जीव ग्रहण कर लेता है। जैसे आपको ठीक लगता है। आप उसी तरह जगत का कार चला रहा है। 3। श्रेष्ठ बढ़िया राग और उनकी रागनियां आदि ये सारा परिवार – अगर इस राग-परिवार में श्रेष्ठ नाम-रस भी पैदा हो जाए (तो इस मेल से आश्चर्यजनक आत्मिक आनंद पैदा होता है)। ये आत्मिक आनंद ही) ईश्वर तक पहुँचाने वाला माल-असबाब है हे नानक ! यदि किसी भाग्यशाली मनुष्य को ये समझ आ जाए (तो। वह इस आत्मिक आनंद को भोगे।)। 4। 9।
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।
हिन्दी अर्थ: आसा महला 1 ॥ जब मेरा पति-प्रभू (मुझ जीव-स्त्री को अपना के मेरे दिल को अपने रहने का घर बना के) अपने घर में आ टिका। तो मेरी सहेलियों ने मिल के (जीभ-आँखों-कानों ने मिल के) प्रभू-पति के साथ मेल के गीत गान शुरू कर दिए। मेरा पति-प्रभू मुझे ब्याहने आया है (मुझे अपने चरणों में जोड़ने आया है) – प्रभू मिलाप के लिए ये उद्यम देख के मेरे मन में आनंद पैदा हो गया है। 1। हे सि्त्रयो ! (हे मेरी ज्ञानेन्द्रियो ! अच्छे-बुरे की) परख की विचार (पैदा करने वाला गीत) बारंबार गाओ (हे मेरी जीभ ! सिफत सालाह में जुड़। ता कि आपको निंदा करने से हटने की सूझ आ जाए। हे मेरे कानो ! सिफत सालाह के गीत सुनते रहो। ताकि निंदा सुनने का चस्का हटे)। हमारे घर में (मेरे हृदय-घर में) वह पति-प्रभू आ बसा है जो सारे जगत की जिंदगी (का आसरा) है। 1। रहाउ। गुरू की शरण पड़ने से हमारा ये विवाह हुआ (गुरू ने मुझे प्रभू-पति के साथ जोड़ा)। जब मुझे पति-प्रभू मिल गया। तब मुझे समझ आ गई कि वह प्रभू जीवन-रौअ बन के सारे जगत में व्यापक हो रहा है। मेरे अंदर से स्वैभाव दूर हो गया। मेरा मन उस प्रभू-पति की याद में रम गया। 2। प्रभू-पति जीव-स्त्री को अपने साथ मिलाने का ये काम अपना समझता है। और खुद ही इस कारज को सिरे चढ़ाता है। किसी और द्वारा ये काम नहीं किया जा सकता। इस मेल की बरकति से (जीव स्त्री के अंदर) सेवा-संतोख-दया-धर्म आदि गुण पैदा होते हैं। इस भेद को वही मनुष्य समझता है जो गुरू के सन्मुख होता है। 3। नानक कहता है, (चाहे जैसे) परमात्मा ही सब जीव-सि्त्रयों का पति है। (फिर भी) जिस के ऊपर मेहर की निगाह करता है (जिसके हृदय में आ के प्रगट होता है) वही भाग्यशाली होती है। 4। 10।
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।
हिन्दी अर्थ: आसा महला 1 ॥ (जिसने मन को वश में कर लिया। उस मनुष्य के लिए) घर और जंगल एक समान है। क्योंकि वह अडोल अवस्था में रहता है। प्रभू के प्यार में (मस्त रहता) है। उस मनुष्य की बुरी मति दूर हो जाती है उसकी जगह उसके अंदर प्रभू की सिफत सालाह बसती है। प्रभू का सदा स्थिर रहने वाला नाम उसके मुंह में होता है।
आसा राग में एक भोर की हलकी ताज़गी है। आसा दी वार इसी राग में बँधी, और सिख-संगीत के परिदृश्य को आकार दिया। हर सुबह, अमृतसर के हरमंदिर साहिब में, यही राग खुलता है। आसा राग का क्षेत्र है। ‘आसा दी वार’ की रचना गुरु नानक की है, बाद में गुरु अंगद और गुरु अर्जन के साथ संगठित हुई।
नानक का स्वर साफ़ है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पन्द्रहवीं सदी के अंतिम दशकों में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पहली बड़ी यात्रा पर थे। वो जो शब्द लाए, वो आज भी इसी ग्रंथ में पढ़े जाते हैं।
इस अंग पर 5 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(पर) नानक कहता है (कि निरे ये रत्न बाँटने से परमात्मा की कौन सी महानता बन गई।”
बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।