अंग
422
राग आसा
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਜਉ ਲਗੁ ਜੀਉ ਪਰਾਣ ਸਚੁ ਧਿਆਈਐ ॥
ਲਾਹਾ ਹਰਿ ਗੁਣ ਗਾਇ ਮਿਲੈ ਸੁਖੁ ਪਾਈਐ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਸਚੀ ਤੇਰੀ ਕਾਰ ਦੇਹਿ ਦਇਆਲ ਤੂੰ ॥
ਹਉ ਜੀਵਾ ਤੁਧੁ ਸਾਲਾਹਿ ਮੈ ਟੇਕ ਅਧਾਰੁ ਤੂੰ ॥੨॥
ਦਰਿ ਸੇਵਕੁ ਦਰਵਾਨੁ ਦਰਦੁ ਤੂੰ ਜਾਣਹੀ ॥
ਭਗਤਿ ਤੇਰੀ ਹੈਰਾਨੁ ਦਰਦੁ ਗਵਾਵਹੀ ॥੩॥
ਦਰਗਹ ਨਾਮੁ ਹਦੂਰਿ ਗੁਰਮੁਖਿ ਜਾਣਸੀ ॥
ਵੇਲਾ ਸਚੁ ਪਰਵਾਣੁ ਸਬਦੁ ਪਛਾਣਸੀ ॥੪॥
ਸਤੁ ਸੰਤੋਖੁ ਕਰਿ ਭਾਉ ਤੋਸਾ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਸੇਇ ॥
ਮਨਹੁ ਛੋਡਿ ਵਿਕਾਰ ਸਚਾ ਸਚੁ ਦੇਇ ॥੫॥
ਸਚੇ ਸਚਾ ਨੇਹੁ ਸਚੈ ਲਾਇਆ ॥
ਆਪੇ ਕਰੇ ਨਿਆਉ ਜੋ ਤਿਸੁ ਭਾਇਆ ॥੬॥
ਸਚੇ ਸਚੀ ਦਾਤਿ ਦੇਹਿ ਦਇਆਲੁ ਹੈ ॥
ਤਿਸੁ ਸੇਵੀ ਦਿਨੁ ਰਾਤਿ ਨਾਮੁ ਅਮੋਲੁ ਹੈ ॥੭॥
ਤੂੰ ਉਤਮੁ ਹਉ ਨੀਚੁ ਸੇਵਕੁ ਕਾਂਢੀਆ ॥
ਨਾਨਕ ਨਦਰਿ ਕਰੇਹੁ ਮਿਲੈ ਸਚੁ ਵਾਂਢੀਆ ॥੮॥੨੧॥
ਲਾਹਾ ਹਰਿ ਗੁਣ ਗਾਇ ਮਿਲੈ ਸੁਖੁ ਪਾਈਐ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਸਚੀ ਤੇਰੀ ਕਾਰ ਦੇਹਿ ਦਇਆਲ ਤੂੰ ॥
ਹਉ ਜੀਵਾ ਤੁਧੁ ਸਾਲਾਹਿ ਮੈ ਟੇਕ ਅਧਾਰੁ ਤੂੰ ॥੨॥
ਦਰਿ ਸੇਵਕੁ ਦਰਵਾਨੁ ਦਰਦੁ ਤੂੰ ਜਾਣਹੀ ॥
ਭਗਤਿ ਤੇਰੀ ਹੈਰਾਨੁ ਦਰਦੁ ਗਵਾਵਹੀ ॥੩॥
ਦਰਗਹ ਨਾਮੁ ਹਦੂਰਿ ਗੁਰਮੁਖਿ ਜਾਣਸੀ ॥
ਵੇਲਾ ਸਚੁ ਪਰਵਾਣੁ ਸਬਦੁ ਪਛਾਣਸੀ ॥੪॥
ਸਤੁ ਸੰਤੋਖੁ ਕਰਿ ਭਾਉ ਤੋਸਾ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਸੇਇ ॥
ਮਨਹੁ ਛੋਡਿ ਵਿਕਾਰ ਸਚਾ ਸਚੁ ਦੇਇ ॥੫॥
ਸਚੇ ਸਚਾ ਨੇਹੁ ਸਚੈ ਲਾਇਆ ॥
ਆਪੇ ਕਰੇ ਨਿਆਉ ਜੋ ਤਿਸੁ ਭਾਇਆ ॥੬॥
ਸਚੇ ਸਚੀ ਦਾਤਿ ਦੇਹਿ ਦਇਆਲੁ ਹੈ ॥
ਤਿਸੁ ਸੇਵੀ ਦਿਨੁ ਰਾਤਿ ਨਾਮੁ ਅਮੋਲੁ ਹੈ ॥੭॥
ਤੂੰ ਉਤਮੁ ਹਉ ਨੀਚੁ ਸੇਵਕੁ ਕਾਂਢੀਆ ॥
ਨਾਨਕ ਨਦਰਿ ਕਰੇਹੁ ਮਿਲੈ ਸਚੁ ਵਾਂਢੀਆ ॥੮॥੨੧॥
जउ लगु जीउ पराण सचु धिआईऐ ॥
लाहा हरि गुण गाइ मिलै सुखु पाईऐ ॥१॥ रहाउ ॥
सची तेरी कार देहि दइआल तूं ॥
हउ जीवा तुधु सालाहि मै टेक अधारु तूं ॥२॥
दरि सेवकु दरवानु दरदु तूं जाणही ॥
भगति तेरी हैरानु दरदु गवावही ॥३॥
दरगह नामु हदूरि गुरमुखि जाणसी ॥
वेला सचु परवाणु सबदु पछाणसी ॥४॥
सतु संतोखु करि भाउ तोसा हरि नामु सेइ ॥
मनहु छोडि विकार सचा सचु देइ ॥५॥
सचे सचा नेहु सचै लाइआ ॥
आपे करे निआउ जो तिसु भाइआ ॥६॥
सचे सची दाति देहि दइआलु है ॥
तिसु सेवी दिनु राति नामु अमोलु है ॥७॥
तूं उतमु हउ नीचु सेवकु कांढीआ ॥
नानक नदरि करेहु मिलै सचु वांढीआ ॥८॥२१॥
लाहा हरि गुण गाइ मिलै सुखु पाईऐ ॥१॥ रहाउ ॥
सची तेरी कार देहि दइआल तूं ॥
हउ जीवा तुधु सालाहि मै टेक अधारु तूं ॥२॥
दरि सेवकु दरवानु दरदु तूं जाणही ॥
भगति तेरी हैरानु दरदु गवावही ॥३॥
दरगह नामु हदूरि गुरमुखि जाणसी ॥
वेला सचु परवाणु सबदु पछाणसी ॥४॥
सतु संतोखु करि भाउ तोसा हरि नामु सेइ ॥
मनहु छोडि विकार सचा सचु देइ ॥५॥
सचे सचा नेहु सचै लाइआ ॥
आपे करे निआउ जो तिसु भाइआ ॥६॥
सचे सची दाति देहि दइआलु है ॥
तिसु सेवी दिनु राति नामु अमोलु है ॥७॥
तूं उतमु हउ नीचु सेवकु कांढीआ ॥
नानक नदरि करेहु मिलै सचु वांढीआ ॥८॥२१॥
हिन्दी अर्थ: जब तक (शरीर में) जीवात्मा है स्वास हैं (तब तक) सदा कायम रहने वाले परमात्मा को सिमरना चाहिए। जो सिमरता है (उसको) प्रभू के गुण गा के (सिफत सालाह करके) आत्मिक आनंद-रूप लाभ मिलता है। 1।रहाउ। हे दयालु प्रभू ! तू मुझे अपनी (भक्ति की) कार बख्श (ये ऐसा काम है कि) इस में कोई उकाई नहीं। ज्यों-ज्यों मैं तेरी सिफत सालाह करता हूँ।मेरा आत्मिक जीवन पलता है।हे प्रभू ! तू मेरे जीवन की टेक है।तू मेरा आसरा है। 2। हे प्रभू ! जो मनुष्य तेरे दर पर सेवक बनता है जो तेरे दर पर रहता है।तू उस (के दिल) का दुख-दर्द जानता है। जगत देख के हैरान होता है कि जो तेरी भक्ति करता है तू उसके दुख-दर्द दूर कर देता है। 3। जो मनुष्य गुरू के सन्मुख होता है उसे समझ आ जाती है कि परमात्मा की दरगाह में हजूरी में उस का नाम (-सिमरन ही) परवान होता है। जो मनुष्य गुरू के शबद को पहचानता है (शबद से सांझ डालता है) उसका जीवन समय सफल है।कबूल है। 4। वे सत-संतोष-प्रेम और हरि नाम को (जीवन सफर में) रास्ते का खर्च बनाते हैं (अपने आत्मिक जीवन का आधार बनाते हैं) वह अपने मन में से विकार छोड़ देते है , जिन लोगों को सदा स्थिर प्रभू अपना सदा स्थिर नाम देता है। 5। (यदि किसी जीव को) सदा स्थिर प्रभू का सदा-स्थिर प्रेम लगा है (तो यह प्रेम) सदा-स्थिर प्रभू ने स्वयं ही लगाया है। वह स्वयं ही न्याय करता है (कि किसे प्रेम की दाति देनी है)।जो उसे पसंद आता है (वही न्याय है)। 6। मैं (भी) दिन-रात उस प्रभू का सिमरन करता हूँ जिसका नाम अमोलक है जो सदा जीवों पर दया करता है। (मैं उसके दर पर अरदास करता हूँ-) हे सदा-स्थिर रहने वाले प्रभू ! मुझे अपने नाम की दाति दे।यह दाति सदा कायम रहने वाली है। 7। हे नानक ! (प्रभू-दर पर सदा ऐसे अरदास कर-हे प्रभू !) तू उत्तम है।मैं नीच हूँ (पर फिर भी मैं तेरा) सेवक कहलवाता हूँ। मेरे पर मेहर की नजर कर।(ता कि) मुझे (तेरे चरणों से) विछुड़े हुए को तेरा सदा-स्थिर नाम मिल जाए। 8। 21।
ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੧ ॥
ਆਵਣ ਜਾਣਾ ਕਿਉ ਰਹੈ ਕਿਉ ਮੇਲਾ ਹੋਈ ॥
ਜਨਮ ਮਰਣ ਕਾ ਦੁਖੁ ਘਣੋ ਨਿਤ ਸਹਸਾ ਦੋਈ ॥੧॥
ਬਿਨੁ ਨਾਵੈ ਕਿਆ ਜੀਵਨਾ ਫਿਟੁ ਧ੍ਰਿਗੁ ਚਤੁਰਾਈ ॥
ਸਤਿਗੁਰ ਸਾਧੁ ਨ ਸੇਵਿਆ ਹਰਿ ਭਗਤਿ ਨ ਭਾਈ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਆਵਣੁ ਜਾਵਣੁ ਤਉ ਰਹੈ ਪਾਈਐ ਗੁਰੁ ਪੂਰਾ ॥
ਰਾਮ ਨਾਮੁ ਧਨੁ ਰਾਸਿ ਦੇਇ ਬਿਨਸੈ ਭ੍ਰਮੁ ਕੂਰਾ ॥੨॥
ਸੰਤ ਜਨਾ ਕਉ ਮਿਲਿ ਰਹੈ ਧਨੁ ਧਨੁ ਜਸੁ ਗਾਏ ॥
ਆਦਿ ਪੁਰਖੁ ਅਪਰੰਪਰਾ ਗੁਰਮੁਖਿ ਹਰਿ ਪਾਏ ॥੩॥
ਨਟੂਐ ਸਾਂਗੁ ਬਣਾਇਆ ਬਾਜੀ ਸੰਸਾਰਾ ॥
ਖਿਨੁ ਪਲੁ ਬਾਜੀ ਦੇਖੀਐ ਉਝਰਤ ਨਹੀ ਬਾਰਾ ॥੪॥
ਹਉਮੈ ਚਉਪੜਿ ਖੇਲਣਾ ਝੂਠੇ ਅਹੰਕਾਰਾ ॥
ਸਭੁ ਜਗੁ ਹਾਰੈ ਸੋ ਜਿਣੈ ਗੁਰ ਸਬਦੁ ਵੀਚਾਰਾ ॥੫॥
ਜਿਉ ਅੰਧੁਲੈ ਹਥਿ ਟੋਹਣੀ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਹਮਾਰੈ ॥
ਰਾਮ ਨਾਮੁ ਹਰਿ ਟੇਕ ਹੈ ਨਿਸਿ ਦਉਤ ਸਵਾਰੈ ॥੬॥
ਜਿਉ ਤੂੰ ਰਾਖਹਿ ਤਿਉ ਰਹਾ ਹਰਿ ਨਾਮ ਅਧਾਰਾ ॥
ਅੰਤਿ ਸਖਾਈ ਪਾਇਆ ਜਨ ਮੁਕਤਿ ਦੁਆਰਾ ॥੭॥
ਜਨਮ ਮਰਣ ਦੁਖ ਮੇਟਿਆ ਜਪਿ ਨਾਮੁ ਮੁਰਾਰੇ ॥
ਨਾਨਕ ਨਾਮੁ ਨ ਵੀਸਰੈ ਪੂਰਾ ਗੁਰੁ ਤਾਰੇ ॥੮॥੨੨॥
ਆਵਣ ਜਾਣਾ ਕਿਉ ਰਹੈ ਕਿਉ ਮੇਲਾ ਹੋਈ ॥
ਜਨਮ ਮਰਣ ਕਾ ਦੁਖੁ ਘਣੋ ਨਿਤ ਸਹਸਾ ਦੋਈ ॥੧॥
ਬਿਨੁ ਨਾਵੈ ਕਿਆ ਜੀਵਨਾ ਫਿਟੁ ਧ੍ਰਿਗੁ ਚਤੁਰਾਈ ॥
ਸਤਿਗੁਰ ਸਾਧੁ ਨ ਸੇਵਿਆ ਹਰਿ ਭਗਤਿ ਨ ਭਾਈ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਆਵਣੁ ਜਾਵਣੁ ਤਉ ਰਹੈ ਪਾਈਐ ਗੁਰੁ ਪੂਰਾ ॥
ਰਾਮ ਨਾਮੁ ਧਨੁ ਰਾਸਿ ਦੇਇ ਬਿਨਸੈ ਭ੍ਰਮੁ ਕੂਰਾ ॥੨॥
ਸੰਤ ਜਨਾ ਕਉ ਮਿਲਿ ਰਹੈ ਧਨੁ ਧਨੁ ਜਸੁ ਗਾਏ ॥
ਆਦਿ ਪੁਰਖੁ ਅਪਰੰਪਰਾ ਗੁਰਮੁਖਿ ਹਰਿ ਪਾਏ ॥੩॥
ਨਟੂਐ ਸਾਂਗੁ ਬਣਾਇਆ ਬਾਜੀ ਸੰਸਾਰਾ ॥
ਖਿਨੁ ਪਲੁ ਬਾਜੀ ਦੇਖੀਐ ਉਝਰਤ ਨਹੀ ਬਾਰਾ ॥੪॥
ਹਉਮੈ ਚਉਪੜਿ ਖੇਲਣਾ ਝੂਠੇ ਅਹੰਕਾਰਾ ॥
ਸਭੁ ਜਗੁ ਹਾਰੈ ਸੋ ਜਿਣੈ ਗੁਰ ਸਬਦੁ ਵੀਚਾਰਾ ॥੫॥
ਜਿਉ ਅੰਧੁਲੈ ਹਥਿ ਟੋਹਣੀ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਹਮਾਰੈ ॥
ਰਾਮ ਨਾਮੁ ਹਰਿ ਟੇਕ ਹੈ ਨਿਸਿ ਦਉਤ ਸਵਾਰੈ ॥੬॥
ਜਿਉ ਤੂੰ ਰਾਖਹਿ ਤਿਉ ਰਹਾ ਹਰਿ ਨਾਮ ਅਧਾਰਾ ॥
ਅੰਤਿ ਸਖਾਈ ਪਾਇਆ ਜਨ ਮੁਕਤਿ ਦੁਆਰਾ ॥੭॥
ਜਨਮ ਮਰਣ ਦੁਖ ਮੇਟਿਆ ਜਪਿ ਨਾਮੁ ਮੁਰਾਰੇ ॥
ਨਾਨਕ ਨਾਮੁ ਨ ਵੀਸਰੈ ਪੂਰਾ ਗੁਰੁ ਤਾਰੇ ॥੮॥੨੨॥
आसा महला १ ॥
आवण जाणा किउ रहै किउ मेला होई ॥
जनम मरण का दुखु घणो नित सहसा दोई ॥१॥
बिनु नावै किआ जीवना फिटु ध्रिगु चतुराई ॥
सतिगुर साधु न सेविआ हरि भगति न भाई ॥१॥ रहाउ ॥
आवणु जावणु तउ रहै पाईऐ गुरु पूरा ॥
राम नामु धनु रासि देइ बिनसै भ्रमु कूरा ॥२॥
संत जना कउ मिलि रहै धनु धनु जसु गाए ॥
आदि पुरखु अपरंपरा गुरमुखि हरि पाए ॥३॥
नटूऐ सांगु बणाइआ बाजी संसारा ॥
खिनु पलु बाजी देखीऐ उझरत नही बारा ॥४॥
हउमै चउपड़ि खेलणा झूठे अहंकारा ॥
सभु जगु हारै सो जिणै गुर सबदु वीचारा ॥५॥
जिउ अंधुलै हथि टोहणी हरि नामु हमारै ॥
राम नामु हरि टेक है निसि दउत सवारै ॥६॥
जिउ तूं राखहि तिउ रहा हरि नाम अधारा ॥
अंति सखाई पाइआ जन मुकति दुआरा ॥७॥
जनम मरण दुख मेटिआ जपि नामु मुरारे ॥
नानक नामु न वीसरै पूरा गुरु तारे ॥८॥२२॥
आवण जाणा किउ रहै किउ मेला होई ॥
जनम मरण का दुखु घणो नित सहसा दोई ॥१॥
बिनु नावै किआ जीवना फिटु ध्रिगु चतुराई ॥
सतिगुर साधु न सेविआ हरि भगति न भाई ॥१॥ रहाउ ॥
आवणु जावणु तउ रहै पाईऐ गुरु पूरा ॥
राम नामु धनु रासि देइ बिनसै भ्रमु कूरा ॥२॥
संत जना कउ मिलि रहै धनु धनु जसु गाए ॥
आदि पुरखु अपरंपरा गुरमुखि हरि पाए ॥३॥
नटूऐ सांगु बणाइआ बाजी संसारा ॥
खिनु पलु बाजी देखीऐ उझरत नही बारा ॥४॥
हउमै चउपड़ि खेलणा झूठे अहंकारा ॥
सभु जगु हारै सो जिणै गुर सबदु वीचारा ॥५॥
जिउ अंधुलै हथि टोहणी हरि नामु हमारै ॥
राम नामु हरि टेक है निसि दउत सवारै ॥६॥
जिउ तूं राखहि तिउ रहा हरि नाम अधारा ॥
अंति सखाई पाइआ जन मुकति दुआरा ॥७॥
जनम मरण दुख मेटिआ जपि नामु मुरारे ॥
नानक नामु न वीसरै पूरा गुरु तारे ॥८॥२२॥
हिन्दी अर्थ: आसा महला १ ॥ (परमात्मा का नाम सिमरन के बिना) जनम मरण का चक्कर खत्म नहीं होता।परमात्मा से मिलाप नहीं होता। जनम-मरण का भारी कलेश बना रहता है और माया के मोह में फसे रहने के कारण (जीवात्मा को) नित्य सहम (खाता रहता) है। 1। जो (सारी उम्र) परमात्मा के नाम से वंचित रहा।उसका जीना असल जीना नहीं।(अगर वह मनुष्य दुनियादारी वाली कोई समझदारी दिखा रहा है तो उसकी वह) समझदारी धिक्कारयोग्य है। जिस मनुष्य ने साधू गुरू की (बताई) सेवा नहीं की।जिसे परमात्मा की भक्ति अच्छी नहीं लगी। 1।रहाउ। जनम-मरण का चक्र तभी समाप्त होता है जब पूरा सतिगुरू मिलता है। गुरू परमात्मा का नाम-धन (रूपी) सरमाया देता है (जिसकी बरकति से) झूठी माया की भटकना समाप्त हो जाती है। 2। गुरू की शरण पड़ के मनुष्य साध-संगति में टिका रहता है।परमात्मा का शुक्र-शुक्र करके उसकी सिफत सालाह करता है। और इस तरह जगत के मूल सर्व-व्यापक बेअंत परमात्मा को पा लेता है। 3। (जैसे किसी) मदारी ने (कोई) तमाशा रचाया होता है (और लोग उस तमाशे को देख-देख के खुश होते हैं। घड़ी पल के बाद वह तमाशा खत्म हो जाता है।इसी तरह ये) संसार (एक) खेल (ही) है।घड़ी-पल ये खेल देखते हैं।इसके उजड़ते देर नहीं लगती। 4। (मैं बड़ा मैं बड़ा बन जाऊँ- इस) अहंम् की चौपड़ (जगत) झूठ और अहंकार (की नर्दों) से खेल रहा है। (इस खेल में लग के) सारा संसार (मानस जीवन की बाजी) हार रहा है।सिर्फ वही मनुष्य जीतता है जो गुरू के शबद को अपने विचार-मण्डल में टिकाता है। 5। जैसे किसी अंधे मनुष्य के हाथ में डंडी होती है (जिससे वह टोह-टोह के रास्ता ढूँढता है।इसी तरह) हम जीवों के पास नाम (ही है जो हमें सही जीवन का राह दिखता है)। परमात्मा का नाम (एक ऐसा) सहारा है (जो) दिन-रात (हर वक्त हमारी सहायता करता है)। 6। हे प्रभू ! जिस हालत में तू मुझे रखे।मैं उसी हालत में रह सकता हूँ।(तेरी मेहर से ही) हे हरी ! (हम जीवों को) तेरे नाम का आसरा मिल सकता है। जिन्होंने आखिर तक साथ निभाने वाला साथी तलाश लिया।उन्हें माया के मोह से निजात पाने का राह मिल जाता है। 7। परमात्मा का नाम जप के जनम-मरण के चक्र का कलेश मिटाया जा सकता है। हे नानक ! जिन्हें (गुरू की कृपा से परमात्मा का) नाम नहीं भूलता।उन्हें पूरा गुरू संसार समुंद्र से पार लंघा लेता है। 8। 22।
ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੩ ਅਸਟਪਦੀਆ ਘਰੁ ੨
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ਸਾਸਤੁ ਬੇਦੁ ਸਿੰਮ੍ਰਿਤਿ ਸਰੁ ਤੇਰਾ ਸੁਰਸਰੀ ਚਰਣ ਸਮਾਣੀ ॥
ਸਾਖਾ ਤੀਨਿ ਮੂਲੁ ਮਤਿ ਰਾਵੈ ਤੂੰ ਤਾਂ ਸਰਬ ਵਿਡਾਣੀ ॥੧॥
ਤਾ ਕੇ ਚਰਣ ਜਪੈ ਜਨੁ ਨਾਨਕੁ ਬੋਲੇ ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਬਾਣੀ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਤੇਤੀਸ ਕਰੋੜੀ ਦਾਸ ਤੁਮੑਾਰੇ ਰਿਧਿ ਸਿਧਿ ਪ੍ਰਾਣ ਅਧਾਰੀ ॥
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ਸਾਸਤੁ ਬੇਦੁ ਸਿੰਮ੍ਰਿਤਿ ਸਰੁ ਤੇਰਾ ਸੁਰਸਰੀ ਚਰਣ ਸਮਾਣੀ ॥
ਸਾਖਾ ਤੀਨਿ ਮੂਲੁ ਮਤਿ ਰਾਵੈ ਤੂੰ ਤਾਂ ਸਰਬ ਵਿਡਾਣੀ ॥੧॥
ਤਾ ਕੇ ਚਰਣ ਜਪੈ ਜਨੁ ਨਾਨਕੁ ਬੋਲੇ ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਬਾਣੀ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਤੇਤੀਸ ਕਰੋੜੀ ਦਾਸ ਤੁਮੑਾਰੇ ਰਿਧਿ ਸਿਧਿ ਪ੍ਰਾਣ ਅਧਾਰੀ ॥
आसा महला ३ असटपदीआ घरु २
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सासतु बेदु सिंम्रिति सरु तेरा सुरसरी चरण समाणी ॥
साखा तीनि मूलु मति रावै तूं तां सरब विडाणी ॥१॥
ता के चरण जपै जनु नानकु बोले अंम्रित बाणी ॥१॥ रहाउ ॥
तेतीस करोड़ी दास तुम॑ारे रिधि सिधि प्राण अधारी ॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सासतु बेदु सिंम्रिति सरु तेरा सुरसरी चरण समाणी ॥
साखा तीनि मूलु मति रावै तूं तां सरब विडाणी ॥१॥
ता के चरण जपै जनु नानकु बोले अंम्रित बाणी ॥१॥ रहाउ ॥
तेतीस करोड़ी दास तुम॑ारे रिधि सिधि प्राण अधारी ॥
हिन्दी अर्थ: आसा महला ३ असटपदीआ घरु २ ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। हे प्रभू ! तेरा नाम-सरोवर (मेरे वास्ते) शास्त्र-वेद-स्मृतियों (की विचार) है।तेरे चरणों में लीनता (मेरे वास्ते) गंगा (आदि तीर्थ का स्नान) है। हे प्रभू ! तू इस सारे आश्चर्य जगत का मालिक है।तू ही त्रिगुणी माया का करता है।मेरी बुद्धि (तेरी याद के आनंद का ही) रस लेती रहती है। 1। (हे भाई ! प्रभू का) दास नानक उस परमात्मा के चरणों का ध्यान धरे रहता है।आत्मिक जीवन देने वाली उस सिफत सालाह की बाणी को उचारता रहता है। 1।रहाउ। (हे प्रभू ! लोगों द्वारा निहित किए हुए) तेतीस करोड़ देवते तेरे ही दास हैं (जिन रिद्धियों-सिद्धयों और प्राणायम सेलोग रीझते हैं उन) रिद्धियों-सिद्धियों व प्राणों का तू ही आसरा है।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 422 है, राग आसा का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)।
गुरु नानक की वाणी, observational, direct, बिना ornament।
Noida के office-tower की 15वीं मंज़िल से शाम का Delhi-view।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 41 पंक्तियों का है, 3 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 422” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: आसा राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 423 →, पीछे का: ← अंग 421।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।