अंग 405

अंग
405
राग आसा
राग: आसा · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਰਾਗੁ ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੫ ਘਰੁ ੧੨
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ਤਿਆਗਿ ਸਗਲ ਸਿਆਨਪਾ ਭਜੁ ਪਾਰਬ੍ਰਹਮ ਨਿਰੰਕਾਰੁ ॥
ਏਕ ਸਾਚੇ ਨਾਮ ਬਾਝਹੁ ਸਗਲ ਦੀਸੈ ਛਾਰੁ ॥੧॥
ਸੋ ਪ੍ਰਭੁ ਜਾਣੀਐ ਸਦ ਸੰਗਿ ॥
ਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦੀ ਬੂਝੀਐ ਏਕ ਹਰਿ ਕੈ ਰੰਗਿ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਸਰਣਿ ਸਮਰਥ ਏਕ ਕੇਰੀ ਦੂਜਾ ਨਾਹੀ ਠਾਉ ॥
ਮਹਾ ਭਉਜਲੁ ਲੰਘੀਐ ਸਦਾ ਹਰਿ ਗੁਣ ਗਾਉ ॥੨॥
ਜਨਮ ਮਰਣੁ ਨਿਵਾਰੀਐ ਦੁਖੁ ਨ ਜਮ ਪੁਰਿ ਹੋਇ ॥
ਨਾਮੁ ਨਿਧਾਨੁ ਸੋਈ ਪਾਏ ਕ੍ਰਿਪਾ ਕਰੇ ਪ੍ਰਭੁ ਸੋਇ ॥੩॥
ਏਕ ਟੇਕ ਅਧਾਰੁ ਏਕੋ ਏਕ ਕਾ ਮਨਿ ਜੋਰੁ ॥
ਨਾਨਕ ਜਪੀਐ ਮਿਲਿ ਸਾਧਸੰਗਤਿ ਹਰਿ ਬਿਨੁ ਅਵਰੁ ਨ ਹੋਰੁ ॥੪॥੧॥੧੩੬॥
रागु आसा महला ५ घरु १२
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
तिआगि सगल सिआनपा भजु पारब्रहम निरंकारु ॥
एक साचे नाम बाझहु सगल दीसै छारु ॥१॥
सो प्रभु जाणीऐ सद संगि ॥
गुर प्रसादी बूझीऐ एक हरि कै रंगि ॥१॥ रहाउ ॥
सरणि समरथ एक केरी दूजा नाही ठाउ ॥
महा भउजलु लंघीऐ सदा हरि गुण गाउ ॥२॥
जनम मरणु निवारीऐ दुखु न जम पुरि होइ ॥
नामु निधानु सोई पाए क्रिपा करे प्रभु सोइ ॥३॥
एक टेक अधारु एको एक का मनि जोरु ॥
नानक जपीऐ मिलि साधसंगति हरि बिनु अवरु न होरु ॥४॥१॥१३६॥

हिन्दी अर्थ: रागु आसा महला ५ घरु १२ ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। (हे भाई ! संसार-समुंद्र में से पार लांघने के लिए इस संबंधी अपनी) सारी सियानपें छोड़ दे।परमात्मा निरंकार का सिमरन किया कर। सदा कायम रहने वाले परमात्मा का नाम सिमरन के बिना (संसार-समुंद्र से पार लांघने संबंधी और) हरेक चतुराई निकम्मी (मूर्खता साबित होती) है। 1। (हे भाई ! अगर संसार-समुंद्र में से अपनी जीवन-बेड़ी सही-सलामत पार लंघानी है।तो) उस परमात्मा को हमेशा अपने अंग-संग बसता समझना चाहिए। ये समझ तभी पड़ सकती है अगर गुरू की कृपा से एक परमात्मा के प्यार में टिके रहें। 1।रहाउ। (हे भाई ! संसार-समुंद्र से पार लंघा सकने की) ताकत रखने वाली सिर्फ एक परमात्मा की ओट है।इसके बिना और कोई सहारा नहीं (इस वास्ते हे भाई !) सदा परमात्मा के गुण गाता रह तो ही इस बिखड़े संसार-समुंद्र से पार लांघा जा सकेगा। 2। (हे भाई ! यदि परमात्मा को सदा अंग-संग बसता पहचान लें तो) जनम-मरन का चक्कर समाप्त हो जाता है।जमों के शहर में निवास नहीं होता (आत्मिक मौत नजदीक नहीं फटकती) कोई दुख छू नहीं सकता। (पर सारे गुणों का) खजाना ये हरि-नाम वही मनुष्य प्राप्त करता है जिस पर प्रभू स्वयं कृपा करता है। 3। (हे भाई !) एक परमात्मा की ही ओट।एक परमात्मा का ही आसरा।एक परमात्मा का ही मन में तकिया (जम-पुरी से बचा सकता) है। (इस वास्ते) हे नानक ! साध-संगति में मिल के परमात्मा का ही नाम सिमरना चाहिए।परमात्मा के बिना और कोई नहीं (जो जमपुरी से बचा सके जो संसार समुंद्र से पार लंघा सके)। 4। 1। 136।
ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਜੀਉ ਮਨੁ ਤਨੁ ਪ੍ਰਾਨ ਪ੍ਰਭ ਕੇ ਦੀਏ ਸਭਿ ਰਸ ਭੋਗ ॥
ਦੀਨ ਬੰਧਪ ਜੀਅ ਦਾਤਾ ਸਰਣਿ ਰਾਖਣ ਜੋਗੁ ॥੧॥
ਮੇਰੇ ਮਨ ਧਿਆਇ ਹਰਿ ਹਰਿ ਨਾਉ ॥
ਹਲਤਿ ਪਲਤਿ ਸਹਾਇ ਸੰਗੇ ਏਕ ਸਿਉ ਲਿਵ ਲਾਉ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਬੇਦ ਸਾਸਤ੍ਰ ਜਨ ਧਿਆਵਹਿ ਤਰਣ ਕਉ ਸੰਸਾਰੁ ॥
ਕਰਮ ਧਰਮ ਅਨੇਕ ਕਿਰਿਆ ਸਭ ਊਪਰਿ ਨਾਮੁ ਅਚਾਰੁ ॥੨॥
ਕਾਮੁ ਕ੍ਰੋਧੁ ਅਹੰਕਾਰੁ ਬਿਨਸੈ ਮਿਲੈ ਸਤਿਗੁਰ ਦੇਵ ॥
ਨਾਮੁ ਦ੍ਰਿੜੁ ਕਰਿ ਭਗਤਿ ਹਰਿ ਕੀ ਭਲੀ ਪ੍ਰਭ ਕੀ ਸੇਵ ॥੩॥
ਚਰਣ ਸਰਣ ਦਇਆਲ ਤੇਰੀ ਤੂੰ ਨਿਮਾਣੇ ਮਾਣੁ ॥
ਜੀਅ ਪ੍ਰਾਣ ਅਧਾਰੁ ਤੇਰਾ ਨਾਨਕ ਕਾ ਪ੍ਰਭੁ ਤਾਣੁ ॥੪॥੨॥੧੩੭॥
आसा महला ५ ॥
जीउ मनु तनु प्रान प्रभ के दीए सभि रस भोग ॥
दीन बंधप जीअ दाता सरणि राखण जोगु ॥१॥
मेरे मन धिआइ हरि हरि नाउ ॥
हलति पलति सहाइ संगे एक सिउ लिव लाउ ॥१॥ रहाउ ॥
बेद सासत्र जन धिआवहि तरण कउ संसारु ॥
करम धरम अनेक किरिआ सभ ऊपरि नामु अचारु ॥२॥
कामु क्रोधु अहंकारु बिनसै मिलै सतिगुर देव ॥
नामु द्रिड़ु करि भगति हरि की भली प्रभ की सेव ॥३॥
चरण सरण दइआल तेरी तूं निमाणे माणु ॥
जीअ प्राण अधारु तेरा नानक का प्रभु ताणु ॥४॥२॥१३७॥

हिन्दी अर्थ: आसा महला ५ ॥ (हे भाई !) ये जिंद, ये मन, ये शरीर, ये प्राण, सारे स्वादिष्ट पदार्थ -ये सब परमात्मा के दिए हुए हैं। परमात्मा ही गरीबों का (असल) संबंधी है।परमात्मा ही आत्मिक जीवन देने वाला है।परमात्मा ही शरण पड़े की रक्षा करने में समर्थ है। 1। हे मेरे मन ! सदा परमात्मा का नाम सिमरता रह। परमात्मा ही इस लोक में और परलोक में तेरी सहायता करने वाला है तेरे साथ रहने वाला है।एक परमात्मा के साथ ही सुरति जोड़े रख। 1।रहाउ। हे भाई ! संसार-समुंद्र से पार लांघने के वास्ते लोग वेदों-शास्त्रों को विचारते हैं (और उनके बताए मुताबिक निहित) अनेकों धार्मिक कर्म व अन्य साधन करते हैं। पर परमात्मा का नाम-सिमरन एक ऐसा धार्मिक उद्यम है जो उन निहित सब धार्मिक कर्मों से ऊँचा है श्रेष्ठ है। 2। हे भाई ! जो मनुष्य गुरू-देव को मिल जाता है (और उसकी शिक्षा के अनुसार परमात्मा का नाम सिमरता है।उसके मन में से) काम-वासना दूर हो जाती है क्रोध मिट जाता है।अहंकार खत्म हो जाता है। (हे भाई ! तू भी अपने हृदय में) परमात्मा का नाम पक्की तरह टिकाए रख।परमात्मा की भक्ति कर।परमात्मा की सेवा-भक्ति ही बढ़िया काम है। 3। हे दया के घर प्रभू ! मैंने तेरे चरणों की ओट ली है।तू ही मुझ निमाणे को आदर देने वाला है। हे प्रभू ! मुझे अपनी जिंद वास्ते।प्राणों के वास्ते तेरा ही सहारा है। हे भाई ! (दास) नानक का आसरा परमात्मा ही है। 4। 2। 137।
ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਡੋਲਿ ਡੋਲਿ ਮਹਾ ਦੁਖੁ ਪਾਇਆ ਬਿਨਾ ਸਾਧੂ ਸੰਗ ॥
ਖਾਟਿ ਲਾਭੁ ਗੋਬਿੰਦ ਹਰਿ ਰਸੁ ਪਾਰਬ੍ਰਹਮ ਇਕ ਰੰਗ ॥੧॥
ਹਰਿ ਕੋ ਨਾਮੁ ਜਪੀਐ ਨੀਤਿ ॥
ਸਾਸਿ ਸਾਸਿ ਧਿਆਇ ਸੋ ਪ੍ਰਭੁ ਤਿਆਗਿ ਅਵਰ ਪਰੀਤਿ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਕਰਣ ਕਾਰਣ ਸਮਰਥ ਸੋ ਪ੍ਰਭੁ ਜੀਅ ਦਾਤਾ ਆਪਿ ॥
ਤਿਆਗਿ ਸਗਲ ਸਿਆਣਪਾ ਆਠ ਪਹਰ ਪ੍ਰਭੁ ਜਾਪਿ ॥੨॥
ਮੀਤੁ ਸਖਾ ਸਹਾਇ ਸੰਗੀ ਊਚ ਅਗਮ ਅਪਾਰੁ ॥
ਚਰਣ ਕਮਲ ਬਸਾਇ ਹਿਰਦੈ ਜੀਅ ਕੋ ਆਧਾਰੁ ॥੩॥
ਕਰਿ ਕਿਰਪਾ ਪ੍ਰਭ ਪਾਰਬ੍ਰਹਮ ਗੁਣ ਤੇਰਾ ਜਸੁ ਗਾਉ ॥
ਸਰਬ ਸੂਖ ਵਡੀ ਵਡਿਆਈ ਜਪਿ ਜੀਵੈ ਨਾਨਕੁ ਨਾਉ ॥੪॥੩॥੧੩੮॥
आसा महला ५ ॥
डोलि डोलि महा दुखु पाइआ बिना साधू संग ॥
खाटि लाभु गोबिंद हरि रसु पारब्रहम इक रंग ॥१॥
हरि को नामु जपीऐ नीति ॥
सासि सासि धिआइ सो प्रभु तिआगि अवर परीति ॥१॥ रहाउ ॥
करण कारण समरथ सो प्रभु जीअ दाता आपि ॥
तिआगि सगल सिआणपा आठ पहर प्रभु जापि ॥२॥
मीतु सखा सहाइ संगी ऊच अगम अपारु ॥
चरण कमल बसाइ हिरदै जीअ को आधारु ॥३॥
करि किरपा प्रभ पारब्रहम गुण तेरा जसु गाउ ॥
सरब सूख वडी वडिआई जपि जीवै नानकु नाउ ॥४॥३॥१३८॥

हिन्दी अर्थ: आसा महला ५ ॥ (हे मन !) गुरू की संगति से वंचित रह के (असल सहाई परमात्मा से) सिदक-हीन हो हो के तू बड़ा दुख सहता रहा। अब तो हरि-नाम का स्वाद चख।एक परमात्मा के मिलाप का आनंद ले (यही है जीवन का) लाभ (ये) कमा ले। 1। (हे भाई !) परमात्मा का नाम सदा जपते रहना चाहिए। (हे भाई !) हरेक सांस के साथ उस परमात्मा को सिमरता रह।औरों की प्रीति त्याग दे। 1।रहाउ। वह प्रभू ही सारे जगत का मूल है।(दुख दूर करने के) समर्थ है।वह खुद ही आत्मिक जीवन देने वाला है। (हे भाई ! दुखों से छुटकारा पाने के लिए) और सारी चतुराईयां छोड़ दे।आठों पहर प्रभू को याद करता रह। 2। हे भाई ! वह सबसे ऊँचा।अपहुँच व बेअंत परमात्मा ही तेरा असल मित्र है दोस्त है सहायक है साथी है। उसके सोहाने कोमल चरण अपने दिल में बसाए रख।वही जिंद का (असली) सहारा है। 3। हे प्रभू ! हे पारब्रहम ! मेहर कर मैं सदा तेरे गुण गाता रहूँ तेरी सिफत सालाह करता रहूँ। (तेरी सिफत सालाह में ही) सारे सुख हैं और बड़ी इज्जत है।(तेरा दास) नानक तेरा नाम सिमर के आत्मिक जीवन प्राप्त करता है। 4। 3। 138।
ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਉਦਮੁ ਕਰਉ ਕਰਾਵਹੁ ਠਾਕੁਰ ਪੇਖਤ ਸਾਧੂ ਸੰਗਿ ॥
ਹਰਿ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਚਰਾਵਹੁ ਰੰਗਨਿ ਆਪੇ ਹੀ ਪ੍ਰਭ ਰੰਗਿ ॥੧॥
ਮਨ ਮਹਿ ਰਾਮ ਨਾਮਾ ਜਾਪਿ ॥
ਕਰਿ ਕਿਰਪਾ ਵਸਹੁ ਮੇਰੈ ਹਿਰਦੈ ਹੋਇ ਸਹਾਈ ਆਪਿ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਸੁਣਿ ਸੁਣਿ ਨਾਮੁ ਤੁਮਾਰਾ ਪ੍ਰੀਤਮ ਪ੍ਰਭੁ ਪੇਖਨ ਕਾ ਚਾਉ ॥
आसा महला ५ ॥
उदमु करउ करावहु ठाकुर पेखत साधू संगि ॥
हरि हरि नामु चरावहु रंगनि आपे ही प्रभ रंगि ॥१॥
मन महि राम नामा जापि ॥
करि किरपा वसहु मेरै हिरदै होइ सहाई आपि ॥१॥ रहाउ ॥
सुणि सुणि नामु तुमारा प्रीतम प्रभु पेखन का चाउ ॥

हिन्दी अर्थ: आसा महला ५ ॥ हे मेरे मालिक ! (मुझसे ये उद्यम) करवाता रह।गुरू की संगति में तेरे दर्शन करते हुए मैं तेरा नाम जपने का आहर करता रहूँ। हे प्रभू ! मेरे मन पर तू अपने नाम की रंगत चढ़ा दे।तू खुद ही (मेरे मन को अपने प्रेम के रंग में) रंग दे। 1। मैं अपने मन में तेरा राम-नाम जपता रहूँ – हे प्रभू ! (मेरे पर) किरपा कर। यदि तू मेरा मददगार बने तो,मेरे (आप ) दिल में आ बसे । । 1।रहाउ। तेरा नाम सुन-सुन के मेरे अंदर तेरे दर्शनों का चाव बना रहे

संदर्भ: यह अंग 405 है, राग आसा का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।

M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।

AIIMS के बाहर रात 2 बजे का इंतज़ार, परिवार वाले उम्मीद और थकान के बीच।

ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।

यह अंग कुल 40 पंक्तियों का है, 4 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 405” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।

राग के context में: आसा राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।

पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।

अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।

“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।

नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।

अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।

तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।

हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।

ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।

दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।

“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।

हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।

अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।

आगे का अंग: अंग 406 →, पीछे का: ← अंग 404

हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।

(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)

शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।

संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।

शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।

संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।

एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।

अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।

स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।