अंग
415
राग आसा
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਗੁਰ ਪਰਸਾਦੀ ਕਰਮ ਕਮਾਉ ॥
ਨਾਮੇ ਰਾਤਾ ਹਰਿ ਗੁਣ ਗਾਉ ॥੫॥
ਗੁਰ ਸੇਵਾ ਤੇ ਆਪੁ ਪਛਾਤਾ ॥
ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਨਾਮੁ ਵਸਿਆ ਸੁਖਦਾਤਾ ॥
ਅਨਦਿਨੁ ਬਾਣੀ ਨਾਮੇ ਰਾਤਾ ॥੬॥
ਮੇਰਾ ਪ੍ਰਭੁ ਲਾਏ ਤਾ ਕੋ ਲਾਗੈ ॥
ਹਉਮੈ ਮਾਰੇ ਸਬਦੇ ਜਾਗੈ ॥
ਐਥੈ ਓਥੈ ਸਦਾ ਸੁਖੁ ਆਗੈ ॥੭॥
ਮਨੁ ਚੰਚਲੁ ਬਿਧਿ ਨਾਹੀ ਜਾਣੈ ॥
ਮਨਮੁਖਿ ਮੈਲਾ ਸਬਦੁ ਨ ਪਛਾਣੈ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਨਿਰਮਲੁ ਨਾਮੁ ਵਖਾਣੈ ॥੮॥
ਹਰਿ ਜੀਉ ਆਗੈ ਕਰੀ ਅਰਦਾਸਿ ॥
ਸਾਧੂ ਜਨ ਸੰਗਤਿ ਹੋਇ ਨਿਵਾਸੁ ॥
ਕਿਲਵਿਖ ਦੁਖ ਕਾਟੇ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਪ੍ਰਗਾਸੁ ॥੯॥
ਕਰਿ ਬੀਚਾਰੁ ਆਚਾਰੁ ਪਰਾਤਾ ॥
ਸਤਿਗੁਰ ਬਚਨੀ ਏਕੋ ਜਾਤਾ ॥
ਨਾਨਕ ਰਾਮ ਨਾਮਿ ਮਨੁ ਰਾਤਾ ॥੧੦॥੭॥
ਨਾਮੇ ਰਾਤਾ ਹਰਿ ਗੁਣ ਗਾਉ ॥੫॥
ਗੁਰ ਸੇਵਾ ਤੇ ਆਪੁ ਪਛਾਤਾ ॥
ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਨਾਮੁ ਵਸਿਆ ਸੁਖਦਾਤਾ ॥
ਅਨਦਿਨੁ ਬਾਣੀ ਨਾਮੇ ਰਾਤਾ ॥੬॥
ਮੇਰਾ ਪ੍ਰਭੁ ਲਾਏ ਤਾ ਕੋ ਲਾਗੈ ॥
ਹਉਮੈ ਮਾਰੇ ਸਬਦੇ ਜਾਗੈ ॥
ਐਥੈ ਓਥੈ ਸਦਾ ਸੁਖੁ ਆਗੈ ॥੭॥
ਮਨੁ ਚੰਚਲੁ ਬਿਧਿ ਨਾਹੀ ਜਾਣੈ ॥
ਮਨਮੁਖਿ ਮੈਲਾ ਸਬਦੁ ਨ ਪਛਾਣੈ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਨਿਰਮਲੁ ਨਾਮੁ ਵਖਾਣੈ ॥੮॥
ਹਰਿ ਜੀਉ ਆਗੈ ਕਰੀ ਅਰਦਾਸਿ ॥
ਸਾਧੂ ਜਨ ਸੰਗਤਿ ਹੋਇ ਨਿਵਾਸੁ ॥
ਕਿਲਵਿਖ ਦੁਖ ਕਾਟੇ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਪ੍ਰਗਾਸੁ ॥੯॥
ਕਰਿ ਬੀਚਾਰੁ ਆਚਾਰੁ ਪਰਾਤਾ ॥
ਸਤਿਗੁਰ ਬਚਨੀ ਏਕੋ ਜਾਤਾ ॥
ਨਾਨਕ ਰਾਮ ਨਾਮਿ ਮਨੁ ਰਾਤਾ ॥੧੦॥੭॥
गुर परसादी करम कमाउ ॥
नामे राता हरि गुण गाउ ॥५॥
गुर सेवा ते आपु पछाता ॥
अंम्रित नामु वसिआ सुखदाता ॥
अनदिनु बाणी नामे राता ॥६॥
मेरा प्रभु लाए ता को लागै ॥
हउमै मारे सबदे जागै ॥
ऐथै ओथै सदा सुखु आगै ॥७॥
मनु चंचलु बिधि नाही जाणै ॥
मनमुखि मैला सबदु न पछाणै ॥
गुरमुखि निरमलु नामु वखाणै ॥८॥
हरि जीउ आगै करी अरदासि ॥
साधू जन संगति होइ निवासु ॥
किलविख दुख काटे हरि नामु प्रगासु ॥९॥
करि बीचारु आचारु पराता ॥
सतिगुर बचनी एको जाता ॥
नानक राम नामि मनु राता ॥१०॥७॥
नामे राता हरि गुण गाउ ॥५॥
गुर सेवा ते आपु पछाता ॥
अंम्रित नामु वसिआ सुखदाता ॥
अनदिनु बाणी नामे राता ॥६॥
मेरा प्रभु लाए ता को लागै ॥
हउमै मारे सबदे जागै ॥
ऐथै ओथै सदा सुखु आगै ॥७॥
मनु चंचलु बिधि नाही जाणै ॥
मनमुखि मैला सबदु न पछाणै ॥
गुरमुखि निरमलु नामु वखाणै ॥८॥
हरि जीउ आगै करी अरदासि ॥
साधू जन संगति होइ निवासु ॥
किलविख दुख काटे हरि नामु प्रगासु ॥९॥
करि बीचारु आचारु पराता ॥
सतिगुर बचनी एको जाता ॥
नानक राम नामि मनु राता ॥१०॥७॥
हिन्दी अर्थ: गुरू की कृपा से मैं वही काम करूँ (जिनसे मुझे परमात्मा का नाम प्राप्त हो)। और परमात्मा के नाम रंग में रंगा हुआ मैं परमात्मा के गुण गाता रहूँ। 5। गुरू की बताई हुई सेवा के द्वारा जिस मनुष्य ने अपना आंतरिक आत्मिक जीवन पहचान लिया। उसके मन में आत्मिक जीवन देने वाला आत्मिक आनंद देने वाला हरी-नाम बस गया (समझो)। वह मनुष्य प्रभू की सिफत सालाह की बाणी के द्वारा हर रोज हरी के नाम-रंग में रंगा रहता है। 6। (पर ये खेल जीव के बस की नहीं) जब प्यारा प्रभू किसी जीव को अपने नाम में लगाता है तब ही कोई लगता है। तब ही गुरू शबद के द्वारा वह अहंकार को मार के (इस और से सदा) सचेत रहता है। फिर लोक-परलोक में सदा आत्मिक आनंद उसके सामने मौजूद रहता है। 7। पर चंचल मन (अहंकार को मारने का) तरीका नहीं जान सकता। क्योंकि मनमुख का मन (विकारों से सदा) मैला रहता है।वह गुरू के शबद से सांझ नहीं डाल सकता। गुरू के बताए राह पर चलने वाला मनुष्य परमात्मा का नाम सिमरता है और पवित्र जीवन वाला होता है। 8। मैं प्रभू जी के आगे ये अरदास करता हूँ कि गुरमुखों की संगति में मेरा निवास बना रहे। मेरे अंदर परमात्मा का नाम चमक पड़े।और वह नाम मेरे पाप-कलेशों को काट दे। 9। वह गुरू की बाणी को विचार केअच्छा आचरण बनाना समझ लेता है। जो मनुष्य गुरू के बचनों पर चल के एक परमात्मा के साथ सांझ डालता है। हे नानक !उसका मन परमात्मा के नाम-रंग में रंगा रहता है। 10। 7।
ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੧ ॥
ਮਨੁ ਮੈਗਲੁ ਸਾਕਤੁ ਦੇਵਾਨਾ ॥
ਬਨ ਖੰਡਿ ਮਾਇਆ ਮੋਹਿ ਹੈਰਾਨਾ ॥
ਇਤ ਉਤ ਜਾਹਿ ਕਾਲ ਕੇ ਚਾਪੇ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਖੋਜਿ ਲਹੈ ਘਰੁ ਆਪੇ ॥੧॥
ਬਿਨੁ ਗੁਰ ਸਬਦੈ ਮਨੁ ਨਹੀ ਠਉਰਾ ॥
ਸਿਮਰਹੁ ਰਾਮ ਨਾਮੁ ਅਤਿ ਨਿਰਮਲੁ ਅਵਰ ਤਿਆਗਹੁ ਹਉਮੈ ਕਉਰਾ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਇਹੁ ਮਨੁ ਮੁਗਧੁ ਕਹਹੁ ਕਿਉ ਰਹਸੀ ॥
ਬਿਨੁ ਸਮਝੇ ਜਮ ਕਾ ਦੁਖੁ ਸਹਸੀ ॥
ਆਪੇ ਬਖਸੇ ਸਤਿਗੁਰੁ ਮੇਲੈ ॥
ਕਾਲੁ ਕੰਟਕੁ ਮਾਰੇ ਸਚੁ ਪੇਲੈ ॥੨॥
ਇਹੁ ਮਨੁ ਕਰਮਾ ਇਹੁ ਮਨੁ ਧਰਮਾ ॥
ਇਹੁ ਮਨੁ ਪੰਚ ਤਤੁ ਤੇ ਜਨਮਾ ॥
ਸਾਕਤੁ ਲੋਭੀ ਇਹੁ ਮਨੁ ਮੂੜਾ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਨਾਮੁ ਜਪੈ ਮਨੁ ਰੂੜਾ ॥੩॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਮਨੁ ਅਸਥਾਨੇ ਸੋਈ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਤ੍ਰਿਭਵਣਿ ਸੋਝੀ ਹੋਈ ॥
ਇਹੁ ਮਨੁ ਜੋਗੀ ਭੋਗੀ ਤਪੁ ਤਾਪੈ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਚੀਨੈੑ ਹਰਿ ਪ੍ਰਭੁ ਆਪੈ ॥੪॥
ਮਨੁ ਬੈਰਾਗੀ ਹਉਮੈ ਤਿਆਗੀ ॥
ਘਟਿ ਘਟਿ ਮਨਸਾ ਦੁਬਿਧਾ ਲਾਗੀ ॥
ਰਾਮ ਰਸਾਇਣੁ ਗੁਰਮੁਖਿ ਚਾਖੈ ॥
ਦਰਿ ਘਰਿ ਮਹਲੀ ਹਰਿ ਪਤਿ ਰਾਖੈ ॥੫॥
ਇਹੁ ਮਨੁ ਰਾਜਾ ਸੂਰ ਸੰਗ੍ਰਾਮਿ ॥
ਇਹੁ ਮਨੁ ਨਿਰਭਉ ਗੁਰਮੁਖਿ ਨਾਮਿ ॥
ਮਾਰੇ ਪੰਚ ਅਪੁਨੈ ਵਸਿ ਕੀਏ ॥
ਹਉਮੈ ਗ੍ਰਾਸਿ ਇਕਤੁ ਥਾਇ ਕੀਏ ॥੬॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਰਾਗ ਸੁਆਦ ਅਨ ਤਿਆਗੇ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਇਹੁ ਮਨੁ ਭਗਤੀ ਜਾਗੇ ॥
ਅਨਹਦ ਸੁਣਿ ਮਾਨਿਆ ਸਬਦੁ ਵੀਚਾਰੀ ॥
ਆਤਮੁ ਚੀਨਿੑ ਭਏ ਨਿਰੰਕਾਰੀ ॥੭॥
ਇਹੁ ਮਨੁ ਨਿਰਮਲੁ ਦਰਿ ਘਰਿ ਸੋਈ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਭਗਤਿ ਭਾਉ ਧੁਨਿ ਹੋਈ ॥
ਅਹਿਨਿਸਿ ਹਰਿ ਜਸੁ ਗੁਰ ਪਰਸਾਦਿ ॥
ਘਟਿ ਘਟਿ ਸੋ ਪ੍ਰਭੁ ਆਦਿ ਜੁਗਾਦਿ ॥੮॥
ਰਾਮ ਰਸਾਇਣਿ ਇਹੁ ਮਨੁ ਮਾਤਾ ॥
ਸਰਬ ਰਸਾਇਣੁ ਗੁਰਮੁਖਿ ਜਾਤਾ ॥
ਭਗਤਿ ਹੇਤੁ ਗੁਰ ਚਰਣ ਨਿਵਾਸਾ ॥
ਨਾਨਕ ਹਰਿ ਜਨ ਕੇ ਦਾਸਨਿ ਦਾਸਾ ॥੯॥੮॥
ਮਨੁ ਮੈਗਲੁ ਸਾਕਤੁ ਦੇਵਾਨਾ ॥
ਬਨ ਖੰਡਿ ਮਾਇਆ ਮੋਹਿ ਹੈਰਾਨਾ ॥
ਇਤ ਉਤ ਜਾਹਿ ਕਾਲ ਕੇ ਚਾਪੇ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਖੋਜਿ ਲਹੈ ਘਰੁ ਆਪੇ ॥੧॥
ਬਿਨੁ ਗੁਰ ਸਬਦੈ ਮਨੁ ਨਹੀ ਠਉਰਾ ॥
ਸਿਮਰਹੁ ਰਾਮ ਨਾਮੁ ਅਤਿ ਨਿਰਮਲੁ ਅਵਰ ਤਿਆਗਹੁ ਹਉਮੈ ਕਉਰਾ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਇਹੁ ਮਨੁ ਮੁਗਧੁ ਕਹਹੁ ਕਿਉ ਰਹਸੀ ॥
ਬਿਨੁ ਸਮਝੇ ਜਮ ਕਾ ਦੁਖੁ ਸਹਸੀ ॥
ਆਪੇ ਬਖਸੇ ਸਤਿਗੁਰੁ ਮੇਲੈ ॥
ਕਾਲੁ ਕੰਟਕੁ ਮਾਰੇ ਸਚੁ ਪੇਲੈ ॥੨॥
ਇਹੁ ਮਨੁ ਕਰਮਾ ਇਹੁ ਮਨੁ ਧਰਮਾ ॥
ਇਹੁ ਮਨੁ ਪੰਚ ਤਤੁ ਤੇ ਜਨਮਾ ॥
ਸਾਕਤੁ ਲੋਭੀ ਇਹੁ ਮਨੁ ਮੂੜਾ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਨਾਮੁ ਜਪੈ ਮਨੁ ਰੂੜਾ ॥੩॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਮਨੁ ਅਸਥਾਨੇ ਸੋਈ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਤ੍ਰਿਭਵਣਿ ਸੋਝੀ ਹੋਈ ॥
ਇਹੁ ਮਨੁ ਜੋਗੀ ਭੋਗੀ ਤਪੁ ਤਾਪੈ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਚੀਨੈੑ ਹਰਿ ਪ੍ਰਭੁ ਆਪੈ ॥੪॥
ਮਨੁ ਬੈਰਾਗੀ ਹਉਮੈ ਤਿਆਗੀ ॥
ਘਟਿ ਘਟਿ ਮਨਸਾ ਦੁਬਿਧਾ ਲਾਗੀ ॥
ਰਾਮ ਰਸਾਇਣੁ ਗੁਰਮੁਖਿ ਚਾਖੈ ॥
ਦਰਿ ਘਰਿ ਮਹਲੀ ਹਰਿ ਪਤਿ ਰਾਖੈ ॥੫॥
ਇਹੁ ਮਨੁ ਰਾਜਾ ਸੂਰ ਸੰਗ੍ਰਾਮਿ ॥
ਇਹੁ ਮਨੁ ਨਿਰਭਉ ਗੁਰਮੁਖਿ ਨਾਮਿ ॥
ਮਾਰੇ ਪੰਚ ਅਪੁਨੈ ਵਸਿ ਕੀਏ ॥
ਹਉਮੈ ਗ੍ਰਾਸਿ ਇਕਤੁ ਥਾਇ ਕੀਏ ॥੬॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਰਾਗ ਸੁਆਦ ਅਨ ਤਿਆਗੇ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਇਹੁ ਮਨੁ ਭਗਤੀ ਜਾਗੇ ॥
ਅਨਹਦ ਸੁਣਿ ਮਾਨਿਆ ਸਬਦੁ ਵੀਚਾਰੀ ॥
ਆਤਮੁ ਚੀਨਿੑ ਭਏ ਨਿਰੰਕਾਰੀ ॥੭॥
ਇਹੁ ਮਨੁ ਨਿਰਮਲੁ ਦਰਿ ਘਰਿ ਸੋਈ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਭਗਤਿ ਭਾਉ ਧੁਨਿ ਹੋਈ ॥
ਅਹਿਨਿਸਿ ਹਰਿ ਜਸੁ ਗੁਰ ਪਰਸਾਦਿ ॥
ਘਟਿ ਘਟਿ ਸੋ ਪ੍ਰਭੁ ਆਦਿ ਜੁਗਾਦਿ ॥੮॥
ਰਾਮ ਰਸਾਇਣਿ ਇਹੁ ਮਨੁ ਮਾਤਾ ॥
ਸਰਬ ਰਸਾਇਣੁ ਗੁਰਮੁਖਿ ਜਾਤਾ ॥
ਭਗਤਿ ਹੇਤੁ ਗੁਰ ਚਰਣ ਨਿਵਾਸਾ ॥
ਨਾਨਕ ਹਰਿ ਜਨ ਕੇ ਦਾਸਨਿ ਦਾਸਾ ॥੯॥੮॥
आसा महला १ ॥
मनु मैगलु साकतु देवाना ॥
बन खंडि माइआ मोहि हैराना ॥
इत उत जाहि काल के चापे ॥
गुरमुखि खोजि लहै घरु आपे ॥१॥
बिनु गुर सबदै मनु नही ठउरा ॥
सिमरहु राम नामु अति निरमलु अवर तिआगहु हउमै कउरा ॥१॥ रहाउ ॥
इहु मनु मुगधु कहहु किउ रहसी ॥
बिनु समझे जम का दुखु सहसी ॥
आपे बखसे सतिगुरु मेलै ॥
कालु कंटकु मारे सचु पेलै ॥२॥
इहु मनु करमा इहु मनु धरमा ॥
इहु मनु पंच ततु ते जनमा ॥
साकतु लोभी इहु मनु मूड़ा ॥
गुरमुखि नामु जपै मनु रूड़ा ॥३॥
गुरमुखि मनु असथाने सोई ॥
गुरमुखि त्रिभवणि सोझी होई ॥
इहु मनु जोगी भोगी तपु तापै ॥
गुरमुखि चीनै॑ हरि प्रभु आपै ॥४॥
मनु बैरागी हउमै तिआगी ॥
घटि घटि मनसा दुबिधा लागी ॥
राम रसाइणु गुरमुखि चाखै ॥
दरि घरि महली हरि पति राखै ॥५॥
इहु मनु राजा सूर संग्रामि ॥
इहु मनु निरभउ गुरमुखि नामि ॥
मारे पंच अपुनै वसि कीए ॥
हउमै ग्रासि इकतु थाइ कीए ॥६॥
गुरमुखि राग सुआद अन तिआगे ॥
गुरमुखि इहु मनु भगती जागे ॥
अनहद सुणि मानिआ सबदु वीचारी ॥
आतमु चीनि॑ भए निरंकारी ॥७॥
इहु मनु निरमलु दरि घरि सोई ॥
गुरमुखि भगति भाउ धुनि होई ॥
अहिनिसि हरि जसु गुर परसादि ॥
घटि घटि सो प्रभु आदि जुगादि ॥८॥
राम रसाइणि इहु मनु माता ॥
सरब रसाइणु गुरमुखि जाता ॥
भगति हेतु गुर चरण निवासा ॥
नानक हरि जन के दासनि दासा ॥९॥८॥
मनु मैगलु साकतु देवाना ॥
बन खंडि माइआ मोहि हैराना ॥
इत उत जाहि काल के चापे ॥
गुरमुखि खोजि लहै घरु आपे ॥१॥
बिनु गुर सबदै मनु नही ठउरा ॥
सिमरहु राम नामु अति निरमलु अवर तिआगहु हउमै कउरा ॥१॥ रहाउ ॥
इहु मनु मुगधु कहहु किउ रहसी ॥
बिनु समझे जम का दुखु सहसी ॥
आपे बखसे सतिगुरु मेलै ॥
कालु कंटकु मारे सचु पेलै ॥२॥
इहु मनु करमा इहु मनु धरमा ॥
इहु मनु पंच ततु ते जनमा ॥
साकतु लोभी इहु मनु मूड़ा ॥
गुरमुखि नामु जपै मनु रूड़ा ॥३॥
गुरमुखि मनु असथाने सोई ॥
गुरमुखि त्रिभवणि सोझी होई ॥
इहु मनु जोगी भोगी तपु तापै ॥
गुरमुखि चीनै॑ हरि प्रभु आपै ॥४॥
मनु बैरागी हउमै तिआगी ॥
घटि घटि मनसा दुबिधा लागी ॥
राम रसाइणु गुरमुखि चाखै ॥
दरि घरि महली हरि पति राखै ॥५॥
इहु मनु राजा सूर संग्रामि ॥
इहु मनु निरभउ गुरमुखि नामि ॥
मारे पंच अपुनै वसि कीए ॥
हउमै ग्रासि इकतु थाइ कीए ॥६॥
गुरमुखि राग सुआद अन तिआगे ॥
गुरमुखि इहु मनु भगती जागे ॥
अनहद सुणि मानिआ सबदु वीचारी ॥
आतमु चीनि॑ भए निरंकारी ॥७॥
इहु मनु निरमलु दरि घरि सोई ॥
गुरमुखि भगति भाउ धुनि होई ॥
अहिनिसि हरि जसु गुर परसादि ॥
घटि घटि सो प्रभु आदि जुगादि ॥८॥
राम रसाइणि इहु मनु माता ॥
सरब रसाइणु गुरमुखि जाता ॥
भगति हेतु गुर चरण निवासा ॥
नानक हरि जन के दासनि दासा ॥९॥८॥
हिन्दी अर्थ: आसा महला १ ॥ (गुरू-शबद से टूट के) माया-ग्रसित मन पागल हाथी (की तरह) है। माया के मोह के कारण (संसार-) जंगल में भटकता फिरता है। (माया के मोह के कारण) जिन्हें आत्मिक मौत दबा लेती है वे इधर-उधर भटकते फिरते हैं। जो मनुष्य गुरू के सन्मुख होता है वह ढूँढ के अपने अंदर परमात्मा का ठिकाना पा लेता है (और भटकनों में नहीं पड़ता)। 1। गुरू के शबद (में जुड़े) बिना मन एक जगह टिका नहीं रह सकता। (हे भाई ! इसे टिकाने के वास्ते गुरू-शबद के द्वारा) परमात्मा का नाम सिमरो जो बहुत ही पवित्र है।और अन्य रसों को छोड़ दो।जो कड़वे भी हैं और अहंकार को बढ़ाते हैं। 1।रहाउ। (माया के मोह में हैरान हुआ) ये मन अपनी सूझ गवा लेता है।फिर बताएं।ये भटकने से कैसे बच सकता है। अपने असल की समझ के बिना ये मन आत्मिक मौत का दुख सहेगा ही। जिस मनुष्य पर परमात्मा स्वयं बख्शिश करता है।उसे गुरू मिल जाता है। वह दुखदाई आत्मिक मौत रूपी काँटे काल-कंटक को मार के निडर हो जाता है।सदा स्थिर प्रभू (उसे आत्मिक जीवन की ओर) प्रेरित करता है। 2। (माया के मोह में हैरान हुआ) ये मन और ही धार्मिक रस्में करता फिरता है। और जनम-मरण के चक्कर मेंलिए फिरता है। माया-ग्रसित ये मन लालची बन जाता है।मूर्ख हो जाता है। जो मनुष्य गुरू के सन्मुख हो के प्रभू का नाम जपता है उसका मन सुंदर (संरचना वाला बन जाता) है। 3। गुरू के सन्मुख हुए मनुष्य का मन परमात्मा को (अपने अंदर) जगह देता है। उसे उस प्रभू की सूझ हो जाती है जो तीनों भवनों में व्यापक है। (माया के मोह में हैरान हुआ) ये मन कभी योग-साधना करता है कभी माया के भोग भोगता है कभी तपों से शरीर को कष्ट देता है (पर आत्मिक आनंद उसको कभी नहीं मिलता)। जो मनुष्य गुरू के सन्मुख होता है वह हरी परमात्मा को अपने अंदर खोज लेता है। 4। (माया के मोह में हैरान हुआ) ये मन कभी (अपनी ओर से) अहंकार को त्याग के (दुनिया त्याग के) वैरागवान बन जाता है। कभी हरेक शारीर में (माया-ग्रसित मन को) मायावी फुरने व दुबिधा भरे विचार आ चिपकते हैं। जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ के रसों का घर नाम-रस चखता है। उसे अंदर-बाहर महल का मालिक प्रभू (दिखता है) जो (माया के मोह से बचा के) उसकी इज्जत रखता है। 5। (माया के मोह में हैरान हुआ) ये मन कभी रणभूमि में राजा और शूरवीर बना हुआ है। पर जब ये मन गुरू की शरण पड़ के प्रभू नाम में जुड़ता है तो (माया के हमलों से) निडर हो जाता है। कामादिक पाँचों (वैरियों) को मार देता है।अपने बस में कर लेता है। अहंकार को खत्म कर के इन सभी को एक ही जगह पर (काबू) कर लेता है। 6। गुरू के सन्मुख हुआ ये मन राग (द्वैष) व अन्य स्वाद त्याग देता है। गुरू की शरण पड़ के ये मन परमात्मा की भक्ति में जुड़ के (माया के हमलों की ओर से) सुचेत हो जाता है। जो मनुष्य गुरू के शबद को अपने सोच-मण्डल में टिकाता है।वह (अंदरूनी आत्मिक खेड़े के) एक रस (हो रहे गीत) को सुन-सुन के (उस में) समा जाता है। अपने आपे को खोज के परमात्मा का रूप हो जाता है। 7। (जब) ये मन (गुरू के सन्मुख होता है तब) पवित्र हो जाता है।उसको अंदर-बाहर वह परमात्मा ही दिखता है। गुरू के सन्मुख हो के (इस मन के अंदर) भक्ति की लगन लग पड़ती है। (इसके अंदर प्रभू का) प्यार (जाग पड़ता है) गुरू की कृपा से ये मन दिन-रात परमात्मा की सिफत सालाह करता है। जो परमात्मा सारी सृष्टि का आदि है जो परमात्मा जुगों के आरम्भ से मौजूद है वह इस मन को हरेक शरीर में बसता दिखाई दे जाता है। 8। गुरू के सन्मुख हो के ये मन रसों के घर नाम-रस में मस्त हो जाता है। गुरू के सन्मुख होने से ये मन सब रसों के श्रोत प्रभू को पहचान लेता है। जब गुरू के चरणों में (इस मन का) निवास होता है तो (इसके अंदर परमात्मा की) भक्ति का प्रेम (जाग पड़ता है)। हे नानक ! तब ये मन गुरमुखों के दासों का दास बन जाता है। 9। 8।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 415 है, राग आसा का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)।
गुरु नानक की वाणी, observational, direct, बिना ornament।
Pragati Maidan के पीछे यमुना के किनारे शाम का सूरज।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 56 पंक्तियों का है, 2 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 415” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: आसा राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 416 →, पीछे का: ← अंग 414।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।