॥ सलोक मः १ ॥ गऊ बिराहमण कउ करु लावहु गोबरि तरणु न जाई ॥ धोती टिका तै जपमाली धानु मलेछां खाई ॥ अंतरि पूजा पड़हि कतेबा संजमु तुरका भाई ॥ छोडीले पाखंडा ॥ नामि लइऐ जाहि तरंदा ॥१॥
॥ मः १ ॥ माणस खाणे करहि निवाज ॥ छुरी वगाइनि तिन गलि ताग ॥ तिन घरि ब्रहमण पूरहि नाद ॥ उन्हा भि आवहि ओई साद ॥ कूड़ी राजी कूड़ै तुलि ॥ कूड़ु बोलि करहि आहारु ॥ सरम धरम का डेरा दूरि ॥ नानक सचु रहिआ भरपूरि ॥ मथै टिका तेड़ि धोती कखाई ॥ हथि छुरी जगत कासाई ॥ नीलवसत्र पहिरि होवहि परवाणु ॥ मलेछ धानु ले पूजहि पुराणु ॥ अभाखिआ का कुठा बकरा खाणा ॥ चउकै उपरि किसै न जाणा ॥ दे कै चउका कढी कार ॥ उपरि आइ बैठे कूड़िआर ॥ मतु भिटै वे मतु भिटै ॥ इहु अंनु असाडा फिटै ॥ तनि फिटै फेड़ करेनि ॥ मनि जूठै चुली भरेनि ॥ कहु नानक सचु धिआईऐ ॥ सुचि होवै ता सचु पाईऐ ॥२॥
यह सलोक एक complete tableau है। नानक एक scene describe कर रहे हैं।
“माणस खाणे करहि निवाज।” “मांस खाने वाले” “नमाज़” “पढ़ते हैं।” “छुरी वगाइनि तिन गलि ताग।” “छुरी चलाने वालों” के “गले में जनेऊ।”
सब religions के members shown। मुसलमान (निवाज़ पढ़ने वाले) मांस खाते हैं। हिन्दू (जनेऊ पहनने वाले) जानवर काटते हैं। हर एक का अपना hypocrisy।
“तिन घरि ब्रहमण पूरहि नाद।” “उनके घरों में ब्राह्मण नाद (शंख) बजाते हैं।” “उन्हा भि आवहि ओई साद।” “उनको भी वही स्वाद आता है।”
यानी ब्राह्मण उन घरों में जाते हैं (जो म्लेच्छ behavior में हैं), और वहाँ भी same hospitality enjoy करते हैं।
“कूड़ी राजी कूड़ै तुलि।” “झूठा राज, झूठ के बराबर।” “कूड़ु बोलि करहि आहारु।” “झूठ बोल कर खाते हैं।”
पूरा system झूठ पर बनाया है, झूठ बोल कर पैसा कमाते हैं।
“सरम धरम का डेरा दूरि।” “शर्म” और “धर्म” का “डेरा” “दूर” है। “नानक सचु रहिआ भरपूरि।” नानक कहते हैं, “सच” “भरपूर” है।
यानी genuine शर्म-धर्म पता ही नहीं। मगर सच कहीं और तो है, “भरपूर।”
फिर एक specific scene: “मथै टिका तेड़ि धोती कखाई।” “माथे पर टीका, धोती कक्ष में।” “हथि छुरी जगत कासाई।” “हाथ में छुरी, जग का कसाई।”
यह hypocrisy का icon है, धोती-टीका वाला (धार्मिक look) मगर “जग का कसाई।”
फिर: “मलेछ धानु ले पूजहि पुराणु।” “म्लेच्छ का धन” ले कर “पुराण पूजते” हैं। “अभाखिआ का कुठा बकरा खाणा।” “अभाषित (मुस्लिम तरीक़े से कटे) बकरे खाते हैं।” “चउकै उपरि किसै न जाणा।” “चौकी (clean cooking area) पर किसी को नहीं जाने देते।”
यानी “हलाल” खाते हैं, मगर पंडितों को rasoi में आने देना forbid है। यह सबसे पेचीदा contradiction है।
“दे कै चउका कढी कार।” “चौका दे कर, कार (line, boundary) खींची।” “उपरि आइ बैठे कूड़िआर।” “ऊपर आ कर बैठे झूठे।”
चौके में बैठते हैं जो ख़ुद झूठे हैं।
“मतु भिटै वे मतु भिटै, इहु अंनु असाडा फिटै।” “कहीं भिट जाए, अरे कहीं भिट जाए, हमारा अन्न फिट जाए।”
यह actual conversation है। “कोई शूद्र न आ जाए, हमारा अन्न impure हो जाएगा।”
“तनि फिटै फेड़ करेनि।” “शरीर से (पवित्रता का) नाटक करते हैं।” “मनि जूठै चुली भरेनि।” “मन में झूठ है, मगर कुल्ली भरते हैं।”
बाहर ritualism, अंदर full of झूठ।
closing: “कहु नानक सचु धिआईऐ।” नानक कहते हैं, “सच ध्याओ।” “सुचि होवै ता सचु पाईऐ।” “शुद्ध” हो, तब “सच” मिले।
यानी genuine purity (अंदर की) ही असली है। ritual purity बेकार।
दिल्ली के context में: हम सब कई “purity” practices follow करते हैं। कुछ food-purity, कुछ social-purity (किसके साथ खाना, किसके साथ नहीं), कुछ cultural। नानक का question: अगर अंदर झूठ है, बाहर का सब “नाटक” है।
॥ पउड़ी ॥ चितै अंदरि सभु को वेखि नदरी हेठि चलाइदा ॥ आपे दे वडिआईआ आपे ही करम कराइदा ॥ वडहु वडा वड मेदनी सिरे सिरि धंधै लाइदा ॥ नदरि उपठी जे करे सुलतान खाने पाइदा ॥ दरि मंगनि भिख न पाइदा ॥१५॥
पौड़ी 15 हरि की scrutiny पर है।
“चितै अंदरि सभु को।” “सब” (हर एक को) “चित में” (consciousness में) रखता है। “वेखि नदरी हेठि चलाइदा।” “नज़र के नीचे” “चलाता” है।
यानी हरि एक active observer है, हर एक को individually देखते रहता है।
“आपे दे वडिआईआ, आपे ही करम कराइदा।” “ख़ुद वडिआई (greatness) देता है, ख़ुद ही कर्म कराता है।”
दोनों ends उसके हाथ में। हम जो “achievement” समझते हैं, वो भी उसकी देन।
“वडहु वडा वड मेदनी।” “बड़े से बड़े (powerful) धरती पर।” “सिरे सिरि धंधै लाइदा।” “हर सिर को धंधे में लगाता है।”
हर इंसान को कोई न कोई “धंधा” (कार्य) दिया है। यह random नहीं है।
“नदरि उपठी जे करे, सुलतान खाने पाइदा।” “नज़र उल्टी” करे (कृपा हट जाए), “सुल्तान को (भी) खाना (भीख) पड़ता है।”
यानी सबसे powerful आदमी (sultan), अगर हरि की कृपा हट जाए, भिखारी बन जाता है।
“दरि मंगनि भिख न पाइदा।” “द्वार पर माँगने पर भी भीख नहीं मिलती।”
और सबसे humbling, बेबसी का चरम।
दिल्ली में हम सब अपने आप को “self-made” मानते हैं। नानक एक reminder दे रहे हैं, कितने भी powerful हो, अगर वो ऊपर वाला हाथ हटा ले, सब कुछ कुछ नहीं।
यह सलोक नानक का सबसे sharp social satire है, हिन्दू-मुस्लिम ruling class का double-game expose कर रहे हैं।
historical context: 16वीं सदी का north India, मुग़ल/लोदी सल्तनत के तहत। हिन्दू ब्राह्मण-क्षत्रिय elite ने मुग़ल administration में जगह बना ली। और उन्होंने एक dual identity carry की, बाहर मुस्लिम administration के साथ, अंदर हिन्दू rituals।
नानक exactly वही target कर रहे हैं।
“गऊ बिराहमण कउ करु लावहु।” “गाय और ब्राह्मण” पर “कर” (tax) लगाते हो (हिन्दू rulers ने ऐसा नहीं किया था, यह जो मुस्लिम administration चलाने वाले हिन्दू थे, उनके बारे में)। “गोबरि तरणु न जाई।” “गोबर” से “तर” (पार) नहीं जाओगे।
यानी एक side पर तुम गाय पर tax लगा कर पैसा बना रहे हो (हिन्दू sentiments के against), दूसरे side पर घर पर गोबर से पवित्र-स्थान बनाते हो। यह तुम्हें “तार” नहीं सकता।
“धोती टिका तै जपमाली।” “धोती, टीका, जपमाला।” “धानु मलेछां खाई।” “धन” “म्लेच्छों” से खाते हो।
यानी हिन्दू ritual markers (धोती, टीका, जपमाला), मगर पैसा “म्लेच्छ” (मुस्लिम, या foreign rulers) से कमाते हो।
“अंतरि पूजा पड़हि कतेबा।” “अंदर (घर में) पूजा,” “किताबें (Quran)” पढ़ते हो। “संजमु तुरका भाई।” “संयम” (acting, अनुशासन) “तुर्कों जैसा।”
यानी घर में हिन्दू पूजा, बाहर इस्लामी text पढ़ते, और conduct मुस्लिम जैसी। यह double-game खेल रहे हो।
“छोडीले पाखंडा।” “पाखंड छोड़ो।” “नामि लइऐ जाहि तरंदा।” “नाम लेने से तर सकते हो।”
नानक का solution simple है, इस duplicity को छोड़ो। एक “नाम” को genuinely पकड़ो, चाहे जो परंपरा हो।
दिल्ली में आज भी relevant है। हम सब कई identities carry करते हैं, religious, secular, professional, social। कुछ contexts में हम “धार्मिक,” कुछ में “modern” बनते हैं। नानक कह रहे हैं, यह fundamentally inauthentic है। अंदर का “नाम” एक हो, फिर बाहर authentic flow होगा।