अंग
375
राग आसा
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਦਰਸਨ ਕੀ ਮਨਿ ਆਸ ਘਨੇਰੀ ਕੋਈ ਐਸਾ ਸੰਤੁ ਮੋ ਕਉ ਪਿਰਹਿ ਮਿਲਾਵੈ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਚਾਰਿ ਪਹਰ ਚਹੁ ਜੁਗਹ ਸਮਾਨੇ ॥
ਰੈਣਿ ਭਈ ਤਬ ਅੰਤੁ ਨ ਜਾਨੇ ॥੨॥
ਪੰਚ ਦੂਤ ਮਿਲਿ ਪਿਰਹੁ ਵਿਛੋੜੀ ॥
ਭ੍ਰਮਿ ਭ੍ਰਮਿ ਰੋਵੈ ਹਾਥ ਪਛੋੜੀ ॥੩॥
ਜਨ ਨਾਨਕ ਕਉ ਹਰਿ ਦਰਸੁ ਦਿਖਾਇਆ ॥
ਆਤਮੁ ਚੀਨਿੑ ਪਰਮ ਸੁਖੁ ਪਾਇਆ ॥੪॥੧੫॥
ਚਾਰਿ ਪਹਰ ਚਹੁ ਜੁਗਹ ਸਮਾਨੇ ॥
ਰੈਣਿ ਭਈ ਤਬ ਅੰਤੁ ਨ ਜਾਨੇ ॥੨॥
ਪੰਚ ਦੂਤ ਮਿਲਿ ਪਿਰਹੁ ਵਿਛੋੜੀ ॥
ਭ੍ਰਮਿ ਭ੍ਰਮਿ ਰੋਵੈ ਹਾਥ ਪਛੋੜੀ ॥੩॥
ਜਨ ਨਾਨਕ ਕਉ ਹਰਿ ਦਰਸੁ ਦਿਖਾਇਆ ॥
ਆਤਮੁ ਚੀਨਿੑ ਪਰਮ ਸੁਖੁ ਪਾਇਆ ॥੪॥੧੫॥
दरसन की मनि आस घनेरी कोई ऐसा संतु मो कउ पिरहि मिलावै ॥१॥ रहाउ ॥
चारि पहर चहु जुगह समाने ॥
रैणि भई तब अंतु न जाने ॥२॥
पंच दूत मिलि पिरहु विछोड़ी ॥
भ्रमि भ्रमि रोवै हाथ पछोड़ी ॥३॥
जन नानक कउ हरि दरसु दिखाइआ ॥
आतमु चीनि॑ परम सुखु पाइआ ॥४॥१५॥
चारि पहर चहु जुगह समाने ॥
रैणि भई तब अंतु न जाने ॥२॥
पंच दूत मिलि पिरहु विछोड़ी ॥
भ्रमि भ्रमि रोवै हाथ पछोड़ी ॥३॥
जन नानक कउ हरि दरसु दिखाइआ ॥
आतमु चीनि॑ परम सुखु पाइआ ॥४॥१५॥
हिन्दी अर्थ: (प्रभू-पति के मिलाप के बिना) मेरा मन धीरज नहीं धरता (मैं हर समय सोचती रहती हूँ कि) प्यारे को कैसे मिलूँ। 1। (दिन के) चार पहर (विछोड़े में मुझे) चार युगों के बराबर लगते हैं। जब रात आ पड़ती है फिर तो वह खत्म होने में ही नहीं आती। 2। (कामादिक) पाँचों वैरियों ने मिल के (जिस भी जीव-स्त्री को) प्रभू-पति से विछोड़ा है वह भटक-भटक के रोती है ओर पछताती है। 3। हे दास नानक ! (जिस जीव को) परमात्मा ने दर्शन दिया उसने अपने आत्मिक जीवन को पड़ताल के (आत्म-चिंतन करके) सबसे ऊँचा आत्मिक आनंद प्राप्त कर लिया। 4। 15।
ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਹਰਿ ਸੇਵਾ ਮਹਿ ਪਰਮ ਨਿਧਾਨੁ ॥
ਹਰਿ ਸੇਵਾ ਮੁਖਿ ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਨਾਮੁ ॥੧॥
ਹਰਿ ਮੇਰਾ ਸਾਥੀ ਸੰਗਿ ਸਖਾਈ ॥
ਦੁਖਿ ਸੁਖਿ ਸਿਮਰੀ ਤਹ ਮਉਜੂਦੁ ਜਮੁ ਬਪੁਰਾ ਮੋ ਕਉ ਕਹਾ ਡਰਾਈ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਹਰਿ ਮੇਰੀ ਓਟ ਮੈ ਹਰਿ ਕਾ ਤਾਣੁ ॥
ਹਰਿ ਮੇਰਾ ਸਖਾ ਮਨ ਮਾਹਿ ਦੀਬਾਣੁ ॥੨॥
ਹਰਿ ਮੇਰੀ ਪੂੰਜੀ ਮੇਰਾ ਹਰਿ ਵੇਸਾਹੁ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਧਨੁ ਖਟੀ ਹਰਿ ਮੇਰਾ ਸਾਹੁ ॥੩॥
ਗੁਰ ਕਿਰਪਾ ਤੇ ਇਹ ਮਤਿ ਆਵੈ ॥
ਜਨ ਨਾਨਕੁ ਹਰਿ ਕੈ ਅੰਕਿ ਸਮਾਵੈ ॥੪॥੧੬॥
ਹਰਿ ਸੇਵਾ ਮਹਿ ਪਰਮ ਨਿਧਾਨੁ ॥
ਹਰਿ ਸੇਵਾ ਮੁਖਿ ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਨਾਮੁ ॥੧॥
ਹਰਿ ਮੇਰਾ ਸਾਥੀ ਸੰਗਿ ਸਖਾਈ ॥
ਦੁਖਿ ਸੁਖਿ ਸਿਮਰੀ ਤਹ ਮਉਜੂਦੁ ਜਮੁ ਬਪੁਰਾ ਮੋ ਕਉ ਕਹਾ ਡਰਾਈ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਹਰਿ ਮੇਰੀ ਓਟ ਮੈ ਹਰਿ ਕਾ ਤਾਣੁ ॥
ਹਰਿ ਮੇਰਾ ਸਖਾ ਮਨ ਮਾਹਿ ਦੀਬਾਣੁ ॥੨॥
ਹਰਿ ਮੇਰੀ ਪੂੰਜੀ ਮੇਰਾ ਹਰਿ ਵੇਸਾਹੁ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਧਨੁ ਖਟੀ ਹਰਿ ਮੇਰਾ ਸਾਹੁ ॥੩॥
ਗੁਰ ਕਿਰਪਾ ਤੇ ਇਹ ਮਤਿ ਆਵੈ ॥
ਜਨ ਨਾਨਕੁ ਹਰਿ ਕੈ ਅੰਕਿ ਸਮਾਵੈ ॥੪॥੧੬॥
आसा महला ५ ॥
हरि सेवा महि परम निधानु ॥
हरि सेवा मुखि अंम्रित नामु ॥१॥
हरि मेरा साथी संगि सखाई ॥
दुखि सुखि सिमरी तह मउजूदु जमु बपुरा मो कउ कहा डराई ॥१॥ रहाउ ॥
हरि मेरी ओट मै हरि का ताणु ॥
हरि मेरा सखा मन माहि दीबाणु ॥२॥
हरि मेरी पूंजी मेरा हरि वेसाहु ॥
गुरमुखि धनु खटी हरि मेरा साहु ॥३॥
गुर किरपा ते इह मति आवै ॥
जन नानकु हरि कै अंकि समावै ॥४॥१६॥
हरि सेवा महि परम निधानु ॥
हरि सेवा मुखि अंम्रित नामु ॥१॥
हरि मेरा साथी संगि सखाई ॥
दुखि सुखि सिमरी तह मउजूदु जमु बपुरा मो कउ कहा डराई ॥१॥ रहाउ ॥
हरि मेरी ओट मै हरि का ताणु ॥
हरि मेरा सखा मन माहि दीबाणु ॥२॥
हरि मेरी पूंजी मेरा हरि वेसाहु ॥
गुरमुखि धनु खटी हरि मेरा साहु ॥३॥
गुर किरपा ते इह मति आवै ॥
जन नानकु हरि कै अंकि समावै ॥४॥१६॥
हिन्दी अर्थ: आसा महला ५ ॥ (हे भाई !) परमात्मा का आत्मिक जीवन देने वाला नाम मुंह से उचारना- ये परमात्मा की सेवा है। और परमात्मा की सेवा में सब से ऊँचा (आत्मिक जीवन का) खजाना (छुपा हुआ है)। 1। (हे भाई !) परमात्मा मेरा साथी है मित्र है। दुख के समय सुख के वक्त (जब भी) मैं उसको याद करता हूँ। वह वहाँ हाजिर होता है, सो विचारा जम (यम) मुझे कहाँ डरा सकता है। । 1। रहाउ। (हे भाई !) परमात्मा ही मेरी ओट है। मुझे परमात्मा का ही सहारा है। परमात्मा मेरा मित्र है। मुझे अपने मन में परमात्मा का ही आसरा है। 2। परमात्मा (का नाम ही) मेरी राशि-पूँजी है। परमात्मा (का नाम ही) मेरे वास्ते (आत्मिक जीवन का व्यापार करने के लिए) साख है (ऐतबार का वसीला है)। गुरू की शरण पड़ के मैं नाम-धन कमा रहा हूँ। परमात्मा ही मेरा शाह है (जो मुझे नाम-धन का सरमाया देता है)। 3। दास नानक (कहता है कि जिस मनुष्य को) गुरू की कृपा से इस व्यापार की समझ आ जाती है वह सदा परमात्मा की गोद में लीन रहता है। 4। 16।
ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਪ੍ਰਭੁ ਹੋਇ ਕ੍ਰਿਪਾਲੁ ਤ ਇਹੁ ਮਨੁ ਲਾਈ ॥
ਸਤਿਗੁਰੁ ਸੇਵਿ ਸਭੈ ਫਲ ਪਾਈ ॥੧॥
ਮਨ ਕਿਉ ਬੈਰਾਗੁ ਕਰਹਿਗਾ ਸਤਿਗੁਰੁ ਮੇਰਾ ਪੂਰਾ ॥
ਮਨਸਾ ਕਾ ਦਾਤਾ ਸਭ ਸੁਖ ਨਿਧਾਨੁ ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਸਰਿ ਸਦ ਹੀ ਭਰਪੂਰਾ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਚਰਣ ਕਮਲ ਰਿਦ ਅੰਤਰਿ ਧਾਰੇ ॥
ਪ੍ਰਗਟੀ ਜੋਤਿ ਮਿਲੇ ਰਾਮ ਪਿਆਰੇ ॥੨॥
ਪੰਚ ਸਖੀ ਮਿਲਿ ਮੰਗਲੁ ਗਾਇਆ ॥
ਅਨਹਦ ਬਾਣੀ ਨਾਦੁ ਵਜਾਇਆ ॥੩॥
ਗੁਰੁ ਨਾਨਕੁ ਤੁਠਾ ਮਿਲਿਆ ਹਰਿ ਰਾਇ ॥
ਸੁਖਿ ਰੈਣਿ ਵਿਹਾਣੀ ਸਹਜਿ ਸੁਭਾਇ ॥੪॥੧੭॥
ਪ੍ਰਭੁ ਹੋਇ ਕ੍ਰਿਪਾਲੁ ਤ ਇਹੁ ਮਨੁ ਲਾਈ ॥
ਸਤਿਗੁਰੁ ਸੇਵਿ ਸਭੈ ਫਲ ਪਾਈ ॥੧॥
ਮਨ ਕਿਉ ਬੈਰਾਗੁ ਕਰਹਿਗਾ ਸਤਿਗੁਰੁ ਮੇਰਾ ਪੂਰਾ ॥
ਮਨਸਾ ਕਾ ਦਾਤਾ ਸਭ ਸੁਖ ਨਿਧਾਨੁ ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਸਰਿ ਸਦ ਹੀ ਭਰਪੂਰਾ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਚਰਣ ਕਮਲ ਰਿਦ ਅੰਤਰਿ ਧਾਰੇ ॥
ਪ੍ਰਗਟੀ ਜੋਤਿ ਮਿਲੇ ਰਾਮ ਪਿਆਰੇ ॥੨॥
ਪੰਚ ਸਖੀ ਮਿਲਿ ਮੰਗਲੁ ਗਾਇਆ ॥
ਅਨਹਦ ਬਾਣੀ ਨਾਦੁ ਵਜਾਇਆ ॥੩॥
ਗੁਰੁ ਨਾਨਕੁ ਤੁਠਾ ਮਿਲਿਆ ਹਰਿ ਰਾਇ ॥
ਸੁਖਿ ਰੈਣਿ ਵਿਹਾਣੀ ਸਹਜਿ ਸੁਭਾਇ ॥੪॥੧੭॥
आसा महला ५ ॥
प्रभु होइ क्रिपालु त इहु मनु लाई ॥
सतिगुरु सेवि सभै फल पाई ॥१॥
मन किउ बैरागु करहिगा सतिगुरु मेरा पूरा ॥
मनसा का दाता सभ सुख निधानु अंम्रित सरि सद ही भरपूरा ॥१॥ रहाउ ॥
चरण कमल रिद अंतरि धारे ॥
प्रगटी जोति मिले राम पिआरे ॥२॥
पंच सखी मिलि मंगलु गाइआ ॥
अनहद बाणी नादु वजाइआ ॥३॥
गुरु नानकु तुठा मिलिआ हरि राइ ॥
सुखि रैणि विहाणी सहजि सुभाइ ॥४॥१७॥
प्रभु होइ क्रिपालु त इहु मनु लाई ॥
सतिगुरु सेवि सभै फल पाई ॥१॥
मन किउ बैरागु करहिगा सतिगुरु मेरा पूरा ॥
मनसा का दाता सभ सुख निधानु अंम्रित सरि सद ही भरपूरा ॥१॥ रहाउ ॥
चरण कमल रिद अंतरि धारे ॥
प्रगटी जोति मिले राम पिआरे ॥२॥
पंच सखी मिलि मंगलु गाइआ ॥
अनहद बाणी नादु वजाइआ ॥३॥
गुरु नानकु तुठा मिलिआ हरि राइ ॥
सुखि रैणि विहाणी सहजि सुभाइ ॥४॥१७॥
हिन्दी अर्थ: आसा महला ५ ॥ (हे भाई !) यदि परमात्मा दयावान हो तो ही मैं ये मन (गुरू के चरणों में) जोड़ सकता हूँ। तब ही गुरू की (बताई) सेवा करके मन-इच्छित फल प्राप्त कर सकता हूँ। 1। हे मेरे मन ! तू क्यूँ घबराता है। (यकीन रख। तेरे सिर पर वह) प्यारा सतिगुरू (रखवाला) है जो मन की जरूरतें पूरी करने वाला है जो सारे सुखों का खजाना है और जिस अमृत के सरोवर-गुरू में आत्मिक जीवन देने वाला नाम-जल नाको-नाक भरा हुआ है। 1। रहाउ। (हे भाई !) जिस मनुष्य ने अपने हृदय में (गुरू के) सुंदर चरण टिका लिए हैं (उसके अंदर) परमात्माकी ज्योति जग पड़ी, उसे प्यारा प्रभू मिल गया। 2। उसकी पाँचों ज्ञानेन्द्रियों ने मिल के मंगल गीत गाए परमात्मा की सिफत सालाह की बाणी का बाजा एक-रस बजाना शुरू कर दिया। 3। हे नानक ! जिस मनुष्य पे गुरू प्रसन्न हो गया उसे प्रभू पातशाह मिल गया। उसकी (जिंदगी की) रात सुख में आत्मिक अडोलता में बीतने लगी। 4। 17।
ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਕਰਿ ਕਿਰਪਾ ਹਰਿ ਪਰਗਟੀ ਆਇਆ ॥
ਮਿਲਿ ਸਤਿਗੁਰ ਧਨੁ ਪੂਰਾ ਪਾਇਆ ॥੧॥
ਐਸਾ ਹਰਿ ਧਨੁ ਸੰਚੀਐ ਭਾਈ ॥
ਭਾਹਿ ਨ ਜਾਲੈ ਜਲਿ ਨਹੀ ਡੂਬੈ ਸੰਗੁ ਛੋਡਿ ਕਰਿ ਕਤਹੁ ਨ ਜਾਈ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਤੋਟਿ ਨ ਆਵੈ ਨਿਖੁਟਿ ਨ ਜਾਇ ॥
ਖਾਇ ਖਰਚਿ ਮਨੁ ਰਹਿਆ ਅਘਾਇ ॥੨॥
ਸੋ ਸਚੁ ਸਾਹੁ ਜਿਸੁ ਘਰਿ ਹਰਿ ਧਨੁ ਸੰਚਾਣਾ ॥
ਇਸੁ ਧਨ ਤੇ ਸਭੁ ਜਗੁ ਵਰਸਾਣਾ ॥੩॥
ਤਿਨਿ ਹਰਿ ਧਨੁ ਪਾਇਆ ਜਿਸੁ ਪੁਰਬ ਲਿਖੇ ਕਾ ਲਹਣਾ ॥
ਜਨ ਨਾਨਕ ਅੰਤਿ ਵਾਰ ਨਾਮੁ ਗਹਣਾ ॥੪॥੧੮॥
ਕਰਿ ਕਿਰਪਾ ਹਰਿ ਪਰਗਟੀ ਆਇਆ ॥
ਮਿਲਿ ਸਤਿਗੁਰ ਧਨੁ ਪੂਰਾ ਪਾਇਆ ॥੧॥
ਐਸਾ ਹਰਿ ਧਨੁ ਸੰਚੀਐ ਭਾਈ ॥
ਭਾਹਿ ਨ ਜਾਲੈ ਜਲਿ ਨਹੀ ਡੂਬੈ ਸੰਗੁ ਛੋਡਿ ਕਰਿ ਕਤਹੁ ਨ ਜਾਈ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਤੋਟਿ ਨ ਆਵੈ ਨਿਖੁਟਿ ਨ ਜਾਇ ॥
ਖਾਇ ਖਰਚਿ ਮਨੁ ਰਹਿਆ ਅਘਾਇ ॥੨॥
ਸੋ ਸਚੁ ਸਾਹੁ ਜਿਸੁ ਘਰਿ ਹਰਿ ਧਨੁ ਸੰਚਾਣਾ ॥
ਇਸੁ ਧਨ ਤੇ ਸਭੁ ਜਗੁ ਵਰਸਾਣਾ ॥੩॥
ਤਿਨਿ ਹਰਿ ਧਨੁ ਪਾਇਆ ਜਿਸੁ ਪੁਰਬ ਲਿਖੇ ਕਾ ਲਹਣਾ ॥
ਜਨ ਨਾਨਕ ਅੰਤਿ ਵਾਰ ਨਾਮੁ ਗਹਣਾ ॥੪॥੧੮॥
आसा महला ५ ॥
करि किरपा हरि परगटी आइआ ॥
मिलि सतिगुर धनु पूरा पाइआ ॥१॥
ऐसा हरि धनु संचीऐ भाई ॥
भाहि न जालै जलि नही डूबै संगु छोडि करि कतहु न जाई ॥१॥ रहाउ ॥
तोटि न आवै निखुटि न जाइ ॥
खाइ खरचि मनु रहिआ अघाइ ॥२॥
सो सचु साहु जिसु घरि हरि धनु संचाणा ॥
इसु धन ते सभु जगु वरसाणा ॥३॥
तिनि हरि धनु पाइआ जिसु पुरब लिखे का लहणा ॥
जन नानक अंति वार नामु गहणा ॥४॥१८॥
करि किरपा हरि परगटी आइआ ॥
मिलि सतिगुर धनु पूरा पाइआ ॥१॥
ऐसा हरि धनु संचीऐ भाई ॥
भाहि न जालै जलि नही डूबै संगु छोडि करि कतहु न जाई ॥१॥ रहाउ ॥
तोटि न आवै निखुटि न जाइ ॥
खाइ खरचि मनु रहिआ अघाइ ॥२॥
सो सचु साहु जिसु घरि हरि धनु संचाणा ॥
इसु धन ते सभु जगु वरसाणा ॥३॥
तिनि हरि धनु पाइआ जिसु पुरब लिखे का लहणा ॥
जन नानक अंति वार नामु गहणा ॥४॥१८॥
हिन्दी अर्थ: आसा महला ५ ॥ (हे भाई !) परमात्मा कृपा करके उसके अंदर स्वयं आ के प्रत्यक्ष होता है- जिस मनुष्य ने सतिगुरू को मिल के कभी ना कम होने वाला नाम-धन हासिल कर लिया। 1। हे वीर ! ऐसा परमात्मा का नाम-धन एकत्र करना चाहिए जिसे आग जला नहीं सकती जो पानी में डूबता नहीं और जो साथ छोड़ के किसी भी और जगह नहीं जाता। 1। रहाउ। (हे भाई ! परमात्मा का नाम ऐसा धन है जिस में) कभी घाटा नहीं पड़ता जो कभी नहीं खत्म होता। ये धन खुद बरत के औरों को बाँट के (मनुष्य का) मन (दुनिया की धन-लालसा की ओर से) संतुष्ट (तृप्त) रहता है। 2। (हे भाई !) जिस मनुष्य के हृदय-घर में परमात्मा का नाम-धन जमा हो जाता है वही मनुष्य सदा के लिए शाहूकार बन जाता है। उसके इस धन से सारा जगत लाभ उठाता है। 3। (पर हे भाई !) उस मनुष्य ने ये हरि-धन हासिल किया है। जिसके भाग्यों में पूर्बले किए भले कर्मों के संस्कारों के अनुसार इसकी प्राप्ति लिखी होती है। हे दास नानक ! (कह,) परमात्मा का नाम-धन (मनुष्य की जिंद के वास्ते) आखिरी वक्त का गहना है। 4। 18।
ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਜੈਸੇ ਕਿਰਸਾਣੁ ਬੋਵੈ ਕਿਰਸਾਨੀ ॥
ਕਾਚੀ ਪਾਕੀ ਬਾਢਿ ਪਰਾਨੀ ॥੧॥
ਜੋ ਜਨਮੈ ਸੋ ਜਾਨਹੁ ਮੂਆ ॥
ਗੋਵਿੰਦ ਭਗਤੁ ਅਸਥਿਰੁ ਹੈ ਥੀਆ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਦਿਨ ਤੇ ਸਰਪਰ ਪਉਸੀ ਰਾਤਿ ॥
ਰੈਣਿ ਗਈ ਫਿਰਿ ਹੋਇ ਪਰਭਾਤਿ ॥੨॥
ਮਾਇਆ ਮੋਹਿ ਸੋਇ ਰਹੇ ਅਭਾਗੇ ॥
ਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ਕੋ ਵਿਰਲਾ ਜਾਗੇ ॥੩॥
ਜੈਸੇ ਕਿਰਸਾਣੁ ਬੋਵੈ ਕਿਰਸਾਨੀ ॥
ਕਾਚੀ ਪਾਕੀ ਬਾਢਿ ਪਰਾਨੀ ॥੧॥
ਜੋ ਜਨਮੈ ਸੋ ਜਾਨਹੁ ਮੂਆ ॥
ਗੋਵਿੰਦ ਭਗਤੁ ਅਸਥਿਰੁ ਹੈ ਥੀਆ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਦਿਨ ਤੇ ਸਰਪਰ ਪਉਸੀ ਰਾਤਿ ॥
ਰੈਣਿ ਗਈ ਫਿਰਿ ਹੋਇ ਪਰਭਾਤਿ ॥੨॥
ਮਾਇਆ ਮੋਹਿ ਸੋਇ ਰਹੇ ਅਭਾਗੇ ॥
ਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ਕੋ ਵਿਰਲਾ ਜਾਗੇ ॥੩॥
आसा महला ५ ॥
जैसे किरसाणु बोवै किरसानी ॥
काची पाकी बाढि परानी ॥१॥
जो जनमै सो जानहु मूआ ॥
गोविंद भगतु असथिरु है थीआ ॥१॥ रहाउ ॥
दिन ते सरपर पउसी राति ॥
रैणि गई फिरि होइ परभाति ॥२॥
माइआ मोहि सोइ रहे अभागे ॥
गुर प्रसादि को विरला जागे ॥३॥
जैसे किरसाणु बोवै किरसानी ॥
काची पाकी बाढि परानी ॥१॥
जो जनमै सो जानहु मूआ ॥
गोविंद भगतु असथिरु है थीआ ॥१॥ रहाउ ॥
दिन ते सरपर पउसी राति ॥
रैणि गई फिरि होइ परभाति ॥२॥
माइआ मोहि सोइ रहे अभागे ॥
गुर प्रसादि को विरला जागे ॥३॥
हिन्दी अर्थ: आसा महला ५ ॥ हे प्राणी ! (जैसे) कोई किसान खेती बीजता है (और जब जी चाहे) उसे काट लेता है (चाहे वह) कच्ची (चाहे हो) पक्की (इसी प्रकार मनुष्य पर मौत किसी भी वक्त आ सकती है)। 1। (हे भाई !) यकीन जानो कि जो जीव पैदा होता है वह मरता भी (जरूर) है। परमात्मा का भगत (इस अटॅल नियम को जानता हुआ मौत के सहम से) अडोल-चित्त हो जाता है। 1। रहाउ। (हे भाई !) दिन से अवश्य रात पड़ जाएगी। रात (भी) खत्म हो जाती है फिर दुबारा सवेर हो जाती है (इस तरह जगत में जनम और मरन का सिलसिला चला रहता है)। 2। (ये जानते हुए भी कि मौत जरूर आनी है) बद-नसीब लोग मायाके मोह में (फस के जीवन मनोरथ से) गाफिल हुए रहते हैं। कोई विरला मनुष्य ही गुरू की कृपा से (मोह की नींद) से जागता है।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 375 है, राग आसा का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।
M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।
Greater Kailash के बाज़ार में सर्दियों की धूप, और कोई पुराना दोस्त मिल जाए।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 49 पंक्तियों का है, 5 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 375” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: आसा राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 376 →, पीछे का: ← अंग 374।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।