अंग 373

अंग
373
राग आसा
राग: आसा · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਦੂਖ ਰੋਗ ਭਏ ਗਤੁ ਤਨ ਤੇ ਮਨੁ ਨਿਰਮਲੁ ਹਰਿ ਹਰਿ ਗੁਣ ਗਾਇ ॥
ਭਏ ਅਨੰਦ ਮਿਲਿ ਸਾਧੂ ਸੰਗਿ ਅਬ ਮੇਰਾ ਮਨੁ ਕਤ ਹੀ ਨ ਜਾਇ ॥੧॥
ਤਪਤਿ ਬੁਝੀ ਗੁਰ ਸਬਦੀ ਮਾਇ ॥
ਬਿਨਸਿ ਗਇਓ ਤਾਪ ਸਭ ਸਹਸਾ ਗੁਰੁ ਸੀਤਲੁ ਮਿਲਿਓ ਸਹਜਿ ਸੁਭਾਇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਧਾਵਤ ਰਹੇ ਏਕੁ ਇਕੁ ਬੂਝਿਆ ਆਇ ਬਸੇ ਅਬ ਨਿਹਚਲੁ ਥਾਇ ॥
ਜਗਤੁ ਉਧਾਰਨ ਸੰਤ ਤੁਮਾਰੇ ਦਰਸਨੁ ਪੇਖਤ ਰਹੇ ਅਘਾਇ ॥੨॥
ਜਨਮ ਦੋਖ ਪਰੇ ਮੇਰੇ ਪਾਛੈ ਅਬ ਪਕਰੇ ਨਿਹਚਲੁ ਸਾਧੂ ਪਾਇ ॥
ਸਹਜ ਧੁਨਿ ਗਾਵੈ ਮੰਗਲ ਮਨੂਆ
ਅਬ ਤਾ ਕਉ ਫੁਨਿ ਕਾਲੁ ਨ ਖਾਇ ॥੩॥
ਕਰਨ ਕਾਰਨ ਸਮਰਥ ਹਮਾਰੇ ਸੁਖਦਾਈ ਮੇਰੇ ਹਰਿ ਹਰਿ ਰਾਇ ॥
ਨਾਮੁ ਤੇਰਾ ਜਪਿ ਜੀਵੈ ਨਾਨਕੁ ਓਤਿ ਪੋਤਿ ਮੇਰੈ ਸੰਗਿ ਸਹਾਇ ॥੪॥੯॥
दूख रोग भए गतु तन ते मनु निरमलु हरि हरि गुण गाइ ॥
भए अनंद मिलि साधू संगि अब मेरा मनु कत ही न जाइ ॥१॥
तपति बुझी गुर सबदी माइ ॥
बिनसि गइओ ताप सभ सहसा गुरु सीतलु मिलिओ सहजि सुभाइ ॥१॥ रहाउ ॥
धावत रहे एकु इकु बूझिआ आइ बसे अब निहचलु थाइ ॥
जगतु उधारन संत तुमारे दरसनु पेखत रहे अघाइ ॥२॥
जनम दोख परे मेरे पाछै अब पकरे निहचलु साधू पाइ ॥
सहज धुनि गावै मंगल मनूआ
अब ता कउ फुनि कालु न खाइ ॥३॥
करन कारन समरथ हमारे सुखदाई मेरे हरि हरि राइ ॥
नामु तेरा जपि जीवै नानकु ओति पोति मेरै संगि सहाइ ॥४॥९॥

हिन्दी अर्थ: (हे माँ !) परमात्मा के सिफत सालाह के गीत गा-गा के मेरा मन पवित्र हो गया है। मेरे शरीर के सारे दुख और रोग दूर हो गए हैं। गुरू की संगति में मिल के मेरे अंदर आनंद ही आनंद बना हुआ है। अब मेरा मन किसी भी तरफ नहीं भटकता। 1। हे माँ ! गुरू के शबद की बरकति से (मेरे अंदर से विकारों की) जलन मिट गई है। मेरे सारे दुख-कलेश व सहम नाश हो गए हैं। आत्मिक ठंड देने वाला गुरू मुझे मिल गया है। अब मैं आत्मिक अडोलता में टिका हुआ हूँ। अब मैं प्रभू प्रेम में मगन हूँ। 1। रहाउ। एक ईश्वर का बोध होने से मेरा भटकना खत्म हो गया है और अब मैं अटल स्थान पर रहता हूँ। (हे प्रभू !) सारे संसार को विकारों से बचाने वाले तेरे संत-जनों का दर्शन करके मेरी सारी तृष्णा समाप्त हो गई है। 2। (हे माँ !) अब मैंने अडोल चित्त हो के गुरू के पैर पकड़ लिए हैं। मेरे अनेकों जन्मों के पाप मेरी खलासी कर गए है। मेरा मन आत्मिक अडोलता की सुर में सिफत सालाह के गीत गाता रहता है। अब इस मन को कभी आत्मिक मौत हड़प नहीं करती। 3। हे मेरे प्रभू पातशाह ! हे सुखों के बख्शने वाले ! हे सब कुछ करने-कराने की शक्ति रखने वाले ! (तेरा दास) नानक। तेरा नाम याद कर कर के आत्मिक जीवन हासिल कर रहा है। तू मेरे साथ (ऐसे हर समय का) साथी है। (जैसे) ताने-पेटे में (धागा मिला हुआ होता है)। 4। 9।
ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਅਰੜਾਵੈ ਬਿਲਲਾਵੈ ਨਿੰਦਕੁ ॥
ਪਾਰਬ੍ਰਹਮੁ ਪਰਮੇਸਰੁ ਬਿਸਰਿਆ ਅਪਣਾ ਕੀਤਾ ਪਾਵੈ ਨਿੰਦਕੁ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਜੇ ਕੋਈ ਉਸ ਕਾ ਸੰਗੀ ਹੋਵੈ ਨਾਲੇ ਲਏ ਸਿਧਾਵੈ ॥
ਅਣਹੋਦਾ ਅਜਗਰੁ ਭਾਰੁ ਉਠਾਏ ਨਿੰਦਕੁ ਅਗਨੀ ਮਾਹਿ ਜਲਾਵੈ ॥੧॥
ਪਰਮੇਸਰ ਕੈ ਦੁਆਰੈ ਜਿ ਹੋਇ ਬਿਤੀਤੈ ਸੁ ਨਾਨਕੁ ਆਖਿ ਸੁਣਾਵੈ ॥
ਭਗਤ ਜਨਾ ਕਉ ਸਦਾ ਅਨੰਦੁ ਹੈ ਹਰਿ ਕੀਰਤਨੁ ਗਾਇ ਬਿਗਸਾਵੈ ॥੨॥੧੦॥
आसा महला ५ ॥
अरड़ावै बिललावै निंदकु ॥
पारब्रहमु परमेसरु बिसरिआ अपणा कीता पावै निंदकु ॥१॥ रहाउ ॥
जे कोई उस का संगी होवै नाले लए सिधावै ॥
अणहोदा अजगरु भारु उठाए निंदकु अगनी माहि जलावै ॥१॥
परमेसर कै दुआरै जि होइ बितीतै सु नानकु आखि सुणावै ॥
भगत जना कउ सदा अनंदु है हरि कीरतनु गाइ बिगसावै ॥२॥१०॥

हिन्दी अर्थ: आसा महला ५ ॥ (हे भाई ! भगत जनों की) निंदा करने वाला (अपने अंदर) बहुत दुखी रहता है। बड़ा विलकता है। (निंदा में फंसे हुए उसको) पारब्रहम परमात्मा भूला रहता है। (इस करके) निंदा करने वाला मनुष्य (गुरमुखों की) की हुई निंदा का (दुख-रूपी) फल भोगता रहता है। 1। रहाउ। (हे भाई !) अगर कोई मनुष्य उस निंदक का साथी बने (निंदक के साथ मेल-जोल रखना शुरू करे। तो निंदक) उसको भी अपने साथ ले चलता है (निंदा करने का स्वभाव डाल देता है)। निंदक (निंदा का) मनो-कल्पित ही बेअंत भार (अपने सिर पर) उठाए फिरता है। और अपने आप को निंदा की आग में जलाता रहता है। 1। (हे भाई ! आत्मिक जीवन के बारे में) जो नियम परमात्मा के दर पे सदा चलता है नानक वह नियम (तुमको) खेल के सुनाता है (कि भक्त) जनों का निंदक तो निंदा की आग में जलता रहता है। (पर) भगत जनों को (भक्ति के सदका) सदा आनंद प्राप्त होता रहता है। परमात्मा का भगत परमात्मा के सिफत सालाह के गीत गा-गा के खुश रहता है। 2। 10।
ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਜਉ ਮੈ ਕੀਓ ਸਗਲ ਸੀਗਾਰਾ ॥
ਤਉ ਭੀ ਮੇਰਾ ਮਨੁ ਨ ਪਤੀਆਰਾ ॥
ਅਨਿਕ ਸੁਗੰਧਤ ਤਨ ਮਹਿ ਲਾਵਉ ॥
ਓਹੁ ਸੁਖੁ ਤਿਲੁ ਸਮਾਨਿ ਨਹੀ ਪਾਵਉ ॥
ਮਨ ਮਹਿ ਚਿਤਵਉ ਐਸੀ ਆਸਾਈ ॥
ਪ੍ਰਿਅ ਦੇਖਤ ਜੀਵਉ ਮੇਰੀ ਮਾਈ ॥੧॥
ਮਾਈ ਕਹਾ ਕਰਉ ਇਹੁ ਮਨੁ ਨ ਧੀਰੈ ॥
ਪ੍ਰਿਅ ਪ੍ਰੀਤਮ ਬੈਰਾਗੁ ਹਿਰੈ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਬਸਤ੍ਰ ਬਿਭੂਖਨ ਸੁਖ ਬਹੁਤ ਬਿਸੇਖੈ ॥
ਓਇ ਭੀ ਜਾਨਉ ਕਿਤੈ ਨ ਲੇਖੈ ॥
ਪਤਿ ਸੋਭਾ ਅਰੁ ਮਾਨੁ ਮਹਤੁ ॥
ਆਗਿਆਕਾਰੀ ਸਗਲ ਜਗਤੁ ॥
ਗ੍ਰਿਹੁ ਐਸਾ ਹੈ ਸੁੰਦਰ ਲਾਲ ॥
ਪ੍ਰਭ ਭਾਵਾ ਤਾ ਸਦਾ ਨਿਹਾਲ ॥੨॥
ਬਿੰਜਨ ਭੋਜਨ ਅਨਿਕ ਪਰਕਾਰ ॥
ਰੰਗ ਤਮਾਸੇ ਬਹੁਤੁ ਬਿਸਥਾਰ ॥
ਰਾਜ ਮਿਲਖ ਅਰੁ ਬਹੁਤੁ ਫੁਰਮਾਇਸਿ ॥
ਮਨੁ ਨਹੀ ਧ੍ਰਾਪੈ ਤ੍ਰਿਸਨਾ ਨ ਜਾਇਸਿ ॥
ਬਿਨੁ ਮਿਲਬੇ ਇਹੁ ਦਿਨੁ ਨ ਬਿਹਾਵੈ ॥
ਮਿਲੈ ਪ੍ਰਭੂ ਤਾ ਸਭ ਸੁਖ ਪਾਵੈ ॥੩॥
ਖੋਜਤ ਖੋਜਤ ਸੁਨੀ ਇਹ ਸੋਇ ॥
ਸਾਧਸੰਗਤਿ ਬਿਨੁ ਤਰਿਓ ਨ ਕੋਇ ॥
ਜਿਸੁ ਮਸਤਕਿ ਭਾਗੁ ਤਿਨਿ ਸਤਿਗੁਰੁ ਪਾਇਆ ॥
ਪੂਰੀ ਆਸਾ ਮਨੁ ਤ੍ਰਿਪਤਾਇਆ ॥
ਪ੍ਰਭ ਮਿਲਿਆ ਤਾ ਚੂਕੀ ਡੰਝਾ ॥
ਨਾਨਕ ਲਧਾ ਮਨ ਤਨ ਮੰਝਾ ॥੪॥੧੧॥
आसा महला ५ ॥
जउ मै कीओ सगल सीगारा ॥
तउ भी मेरा मनु न पतीआरा ॥
अनिक सुगंधत तन महि लावउ ॥
ओहु सुखु तिलु समानि नही पावउ ॥
मन महि चितवउ ऐसी आसाई ॥
प्रिअ देखत जीवउ मेरी माई ॥१॥
माई कहा करउ इहु मनु न धीरै ॥
प्रिअ प्रीतम बैरागु हिरै ॥१॥ रहाउ ॥
बसत्र बिभूखन सुख बहुत बिसेखै ॥
ओइ भी जानउ कितै न लेखै ॥
पति सोभा अरु मानु महतु ॥
आगिआकारी सगल जगतु ॥
ग्रिहु ऐसा है सुंदर लाल ॥
प्रभ भावा ता सदा निहाल ॥२॥
बिंजन भोजन अनिक परकार ॥
रंग तमासे बहुतु बिसथार ॥
राज मिलख अरु बहुतु फुरमाइसि ॥
मनु नही ध्रापै त्रिसना न जाइसि ॥
बिनु मिलबे इहु दिनु न बिहावै ॥
मिलै प्रभू ता सभ सुख पावै ॥३॥
खोजत खोजत सुनी इह सोइ ॥
साधसंगति बिनु तरिओ न कोइ ॥
जिसु मसतकि भागु तिनि सतिगुरु पाइआ ॥
पूरी आसा मनु त्रिपताइआ ॥
प्रभ मिलिआ ता चूकी डंझा ॥
नानक लधा मन तन मंझा ॥४॥११॥

हिन्दी अर्थ: आसा महला ५ ॥ यदि मैंने हरेक किस्म का सीगार किया तो भी मेरा मन संतुष्ट ना हुआ। अगर मैं अपने शरीर पर अनेकों सुंगधियां इस्तेमाल करती हूँ तो भी मैं तिल जितना भी वह सुख नहीं हासिल कर सकती (जो सुख प्यारे पति के दर्शनोंसे मिलता है)। हे मेरी माँ ! अब मैं ऐसी आशाएं ही बनाती रहती हूँ (कि कैसे प्रभू पति मिले)। प्यारे प्रभू-पति का दर्शन करके मेरे अंदर आत्मिक जीवन पैदा हो जाता है। 1। हे माँ ! मैं क्या करूँ। (प्यारे के बिना) मेरा मन ठहरता नहीं। प्यारे प्रीतम का प्रेम खींच डाल रहा है। 1। रहाउ। (सुंदर) कपड़े गहने खास तरह के अनेकों सुख- मैं समझती हूँ कि वह सारे भी (प्रभू पति के बिना) किसी काम के नहीं। इज्जत शोभा आदर सत्कार महिमा (भी मिल जाए)। सारा जगत मेरी आज्ञा में चलने लगे। बड़ा सुंदर व कीमती घर (रहने के वास्ते मिला हो। तो भी) तभी मैं सदा के लिए खुश रह सकती हूँ अगर प्रभू पति को प्यारी लगूँ। 2। (हे माँ !) अगर अनेकों किस्म के स्वादिष्ट खाने मिल जाएं। अगर बहुत तरह के रंग तमाशे (देखने को हों)। अगर राज मिल जाए। जमीन की मल्कियत हो जाय और बहुत हकूमत मिल जाए। तो भी ये मन कभी भरता नहीं। इसकी तृष्णा खत्म नहीं होती। (ये सब कुछ होते हुए भी। हे माँ ! प्रभू-पति को) मिले बिना मेरा ये दिन (सुख से) नहीं गुजरता। जब (जीव-स्त्री को) प्रभू-पति मिल जाए तो वह (मानो) सारे सुख हासिल कर लेती है। 3। तलाश करते-करते (हे माँ !) मैंने ये ख़बर सुन ली कि साध-संगति के बिना (तृष्णा की बाढ़ से) कोई जीव कभी पार नहीं लांघ सका। जिसके माथे पर अच्छे भाग्य जागे उसने गुरू पा लिया। उसकी हरेक आस पूरी हो गई। उसका मन तृप्त हो गया। जब जीव (गुरू की शरण पड़ कर) प्रभू को मिल पड़ा उसकी (अंदरूनी तृष्णा की) भड़की खत्म हो गई। हे नानक ! उसने अपने मन में अपने हृदय में (बसता) प्रभू पा लिया। 4। 11।
ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੫ ਪੰਚਪਦੇ ॥
आसा महला ५ पंचपदे ॥

हिन्दी अर्थ: आसा महला ५ पंचपदे ॥

संदर्भ: यह अंग 373 है, राग आसा का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।

M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।

Vasant Vihar के market में Sunday सुबह की धीमी-धीमी activity।

ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।

यह अंग कुल 46 पंक्तियों का है, 4 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 373” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।

राग के context में: आसा राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।

पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।

अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।

“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।

नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।

अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।

तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।

हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।

ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।

दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।

“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।

हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।

अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।

आगे का अंग: अंग 374 →, पीछे का: ← अंग 372

हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।

(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)

शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।

संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।

शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।

संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।

एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।

अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।

स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।