आसा-दी-वार का हिस्सा। पूरी 24 पउड़ियों की commentary /asa-di-vaar/ पर है।
जनम मरण अनेक बीते प्रिअ संग बिनु कछु नह गते ॥ कुल रूप धूप गिआनहीनी तुझ बिना मोहि कवन मात ॥ कर जोड़ि नानकु सरणि आइओ प्रिअ नाथ नरहर करहु गात ॥1॥ मीना जलहीन मीना जलहीन हे ओहु बिछुरत मन तन खीन हे कत जीवनु प्रिअ बिनु होत ॥ सनमुख सहि बान सनमुख सहि बान हे म्रिग अरपे मन तन प्रान हे ओहु बेधिओ सहज सरोत ॥ प्रिअ प्रीति लागी मिलु बैरागी खिनु रहनु ध्रिगु तनु तिसु बिना ॥ पलका न लागै प्रिअ प्रेम पागै चितवंति अनदिनु प्रभ मना ॥ स्रीरंग राते नाम माते भै भरम दुतीआ सगल खोत ॥ करि मइआ दइआ दइआल पूरन हरि प्रेम नानक मगन होत ॥2॥ अलीअल गुंजात अलीअल गुंजात हे मकरंद रस बासन मात हे प्रीति कमल बंधावत आप ॥ चात्रिक चित पिआस चात्रिक चित पिआस हे घन बूंद बचित्रि मनि आस हे अल पीवत बिनसत ताप ॥ तापा बिनासन दूख नासन मिलु प्रेमु मनि तनि अति घना ॥ सुंदरु चतुरु सुजान सुआमी कवन रसना गुण भना ॥ गहि भुजा लेवहु नामु देवहु द्रिसटि धारत मिटत पाप ॥ नानकु जंपै पतित पावन हरि दरसु पेखत नह संताप ॥3॥ चितवउ चित नाथ चितवउ चित नाथ हे रखि लेवहु सरणि अनाथ हे मिलु चाउ चाईले प्रान ॥ सुंदर तन धिआन सुंदर तन धिआन हे मनु लुबध गोपाल गिआन हे जाचिक जन राखत मान ॥ प्रभ मान पूरन दुख बिदीरन सगल इछ पुजंतीआ ॥ हरि कंठि लागे दिन सभागे मिलि नाह सेज सोहंतीआ ॥ प्रभ द्रिसटि धारी मिले मुरारी सगल कलमल भए हान ॥ बिनवंति नानक मेरी आस पूरन मिले स्रीधर गुण निधान ॥4॥1॥14॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।
हिन्दी अर्थ: (हे भाई !) जनम-मरण के अनेकों चक्कर गुजर चुके हैं।पर प्यारे प्रभू की संगति के बिना मेरा कोई बढ़िया हाल नहीं। (हे प्यारे प्रभू !) मेरी कोई बढ़िया कुल नहीं।मेरा सुंदर रूप नहीं।अंदर (गुणों की) सुगंधि नहीं।मुझे आत्मिक जीवन की कोई सूझ-बूझ नहीं।(हे प्यारे !) आपके बिना मेरा कोई रखवाला नहीं। (आपका सेवक) नानक (दोनों) हाथ जोड़ के आपकी शरण पड़ा है।हे प्यारे ! हे नाथ ! हे प्रभू ! मेरी आत्मिक अवस्था ऊँची बना। 1। हे भाई ! जब मछली पानी से विछुड़ जाती है।जब मछली पानी से विछुड़ जाती है।पानी से विछुड़ने से उसका मन उसका शरीर निढाल हो जाता है।प्यारे (पानी) के बिना वह कैसे जी सकती है। हे भाई ! हिरन आत्मिक जीवन देने वाली (घंडे हेड़े की आवाज) सुन के अपना मन अपना शरीर अपने प्राण (सब कुछ उस मीठी सुर से) सदके कर देता है।(और) सीधा मुंह पर वह (शिकारी का) तीर सहता है।सामने मुंह रख के तीर सहता है। हे प्यारे ! मेरी प्रीति (आपके चरणों में) लग गई है।(हे प्रभू ! मुझे) मिल।मेरा चित्त (दुनिया की ओर से) उदास है। हे भाई ! उस प्यारे के मिलाप के बिना यदि ये शरीर एक छिन भी टिका रह सके तो ये शरीर धिक्कारयोग्य है। हे प्यारे प्रभू ! मुझे नींद नहीं आती।आपके चरणों में मेरी प्रीति लगी हुई है।मेरा मन हर वक्त आपको ही याद कर रहा है। हे भाई ! जो भाग्यशाली परमात्मा के प्रेम-रंग में रंगे जाते हैं जो उसके नाम में मस्त हो जाते हैं।वे दुनिया के सारे डर।माया की भटकना- ये सब कुछ दूरकर लेते हैं। हे नानक ! (कह) हे सर्व-व्यापक दयालु हरी ! मेरे पे मेहर कर।तरस कर।मैं सदा आपके प्यार में मस्त रहूँ। 2। (हे भाई ! कमल के फूलों पे मंडराने वाले) भौरे गुंजन करते हैं।भौरे नित्य गुंजन करते हैं।कमल फूलों के मकरंद के रस की सुगंधि में मस्त होते हैं।प्रीति में खिंचे हुए वह अपने आपे को कमल-पुष्प में बंद करवा लेते हैं। (हे भाई ! चाहे सरोवर और तालाब पानी से भरे पड़े हैं।(पर)) पपीहे के चित्त को (बादलों के बूँद की) प्यास है।पपीहे की चाहत (सिर्फ बादलों की बूँद से) तृप्त होती है।उसके मन में बादलों के बूँद की ही तमन्ना है।जब पपीहा उस मस्त करा देने वाली बूँद को पीता है। तो उसकी तपश मिटती है। हे जीवों के दुख-कलेश नाश करने वाले ! ताप नाश करने वाले ! (मेरी आपके दर पर विनती है।मुझे) मिल।मेरे मन में मेरे हृदय में (आपके चरणों के प्रति) बहुत गहरा प्रेम है। आप मेरा सुंदर चतुर सियाना मालिक है।मैं (अपनी) जीभ से आपके कौन-कौन से गुण बयान करूँ। हे विकारों में गिरे हुओं को पवित्र करने वाले हरी ! मुझे बाँह से पकड़ के अपने चरणों से लगा लो।मुझे अपना नाम बख्शो।आपकी निगाह मेरे ऊपर पड़ते ही मेरे सारे पाप मिट जाते हैं। नानक विनती करता है, हे हरी ! आपके दर्शन करने से कोई दुख-कलेश छू नहीं सकता। 3। हे मेरे पति-प्रभू ! मैं चित्त (में आपको ही) चितवता हूँ।हे नाथ ! मैं चित्त में आपको ही याद करता हूँ।मुझ अनाथ को अपनी शरण में रख ले।(हे नाथ ! मुझे) मिल (आपको मिलने के लिए मेरे अंदर) चाव है। मेरी जीवात्मा आपके दर्शनों के लिए उत्साह में आए हुई है। हे प्रभू ! आपके सुंदर स्वरूप में मेरी सुरति जुड़ी हुई है।आपके सुंदर शरीर की ओर मेरा ध्यान लगा हुआ है।हे गोपाल ! मेरा मन आपके साथ गहरी सांझ पाने के लिए ललचा रहा है।आप उन (भाग्यशालियों) का आदर रखता है जो आपके दर पे मंगते बनते हैं। हे प्रभू ! (आप) अपने दर के मंगतों का आदर-मान करता है। आप उनके दुखों का नाश करता है।(आपकी मेहर से उनकी) सारी मनोकामनाएं पूरी हैं जाती हैं। हे भाई ! जो (भाग्यशाली मनुष्य) प्रभू-पति के गले लगते हैं।उनकी (जिंदगी) के दिन भाग्यशाली हो जाते हैं।पति प्रभू को मिल के उनके हृदय की सेज सोहणी बन जाती है। जिन पे प्रभू मेहर की निगाह करता है।जिनको परमात्मा मिल जाता है।उनके (पिछले किए) सारे पाप नाश हो जाते हैं। नानक विनती करता है, (हे भाई !) लक्ष्मी पति प्रभू सारे गुणों का खजाना-प्रभू मुझे मिल गया है।मेरी मन की मुराद पूरी हो गई है। 4। 1। 14। 35।
ੴ सति नामु करता पुरखु निरभउ निरवैरु अकाल मूरति अजूनी सैभं गुर प्रसादि ॥ आसा महला 1 ॥ वार सलोका नालि सलोक भी महले पहिले के लिखे टुंडे अस राजै की धुनी ॥ सलोकु मः 1 ॥ बलिहारी गुर आपणे दिउहाड़ी सद वार ॥ जिनि माणस ते देवते कीए करत न लागी वार ॥1॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।
हिन्दी अर्थ: अकाल-पुरख एक है; जिसका नाम ‘अस्तित्व वाला’ है।जो सृष्टि का रचनहार है।जो सब में व्यापक है।भय से रहित है।वैर रहित है।जिसका स्वरूप काल से परे है।(भाव।जिसका शरीर नाश-रहित है) जो जूनियों में नहीं आता।जिसका प्रकाश अपने आप से हुआ है और जो सतिगुरू की कृपासे मिलता है। आसा महला 1 ॥ (यह वार) टुंडे (राजा) असराज की (वार की) सुर में (गानी है।)। श्लोक महला 1॥ मैं अपने गुरू से (एक) दिन में सौ बार सदके जाता हूँ। जिस (गुरू) ने मनुष्यों से देवते बना दिए और बनाते हुए (थोड़ा सा) भी समय ना लगा। 1।
आसा राग सुबह की पहली रोशनी का है, उम्मीद से भरा, चलने को तैयार। आसा का अर्थ ही ‘आशा’ है। ‘आसा दी वार’ सिख परम्परा की सुबह-कीर्तन का केन्द्र-स्तम्भ रही है, चार-पाँच सदियों से। आसा राग का क्षेत्र है। ‘आसा दी वार’ की रचना गुरु नानक की है, बाद में गुरु अंगद और गुरु अर्जन के साथ संगठित हुई।
अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।
इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(हे भाई !) जनम-मरण के अनेकों चक्कर गुजर चुके हैं।”
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।