अंग 462, आसा की वार प्रारम्भ

SGGS, Ang
462
आसा की वार, पौड़ी 1 और 2
राग: राग आसा · रचयिता: गुरु नानक देव जी · महला 1 (शुरू)
पढ़ने का समय: लगभग 5 मिनट
यह आसा की वार का प्रारम्भ है, गुरु नानक देव जी की 24 पौड़ियों की रचना। हर पौड़ी से पहले एक या दो सलोक आते हैं, ज़्यादातर महला 1 (नानक) के, मगर बीच में महला 2 (गुरु अंगद देव जी) के भी। पूरी आसा की वार सिख gurdwara में रोज़ सुबह कीर्तन में गाई जाती है। (Editorial note: इस वेबसाइट पर AKV की 24 पौड़ियों का distribution 14 अंगों पर है। कुछ pauris का exact ang-placement किसी canonical SGGS edition से एक-अंग back-forth हो सकता है। पाँचों spec-anchor verses, पवणु गुरू, अंधा होइ, कूड़ु राजा, सूतकु, सो किउ मंदा, खोटे खरे, अपनी traditional positions पर हैं।) यह नानक का public voice है, satsang में सुनाने के लिए, अकेले में पढ़ने के लिए नहीं।
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॥ आसा महला १ ॥ वार सलोका नालि सलोक भी महले पहिले के लिखे ॥ टुंडे असराजै की धुनी ॥

पहले title देखिए: “वार सलोका नालि।” यानी यह वार है, सलोकों के साथ। और “सलोक भी महले पहिले के लिखे।” सलोक भी नानक (महला 1) के लिखे हुए हैं।

फिर एक interesting निर्देश: “टुंडे असराजै की धुनी।” यानी “Tundey Asraje” की धुन में गाना। यह एक popular folk-ballad थी उस समय, राजा असराजै की कथा। नानक कह रहे हैं, “उसी folk-tune में यह सिख वार गाओ।”

यह नानक की genius है। उन्होंने नया ritual नहीं बनाया, मौजूदा folk-tune ले कर उसमें नया content भर दिया। पंजाब का आदमी उस तर्ज़ को पहले से जानता था, अब उसी के साथ हरि की बात आ गई।

दिल्ली में आज भी यही pattern है। कोई popular Bollywood tune पर bhajan बना दिया जाता है, और तुरंत recognize हो जाता है। नानक 500 साल पहले same trick use कर रहे थे।

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॥ सलोक मः १ ॥ बलिहारी गुर आपणे दिउहाड़ी सद वार ॥ जिनि माणस ते देवते कीए करत न लागी वार ॥१॥

पहला सलोक, और एक भारी declaration: “बलिहारी गुर आपणे।” अपने गुरु पर मैं बलिहारी (क़ुर्बान) जाता हूँ। “दिउहाड़ी सद वार।” एक दिन में सौ बार।

यानी एक बार नहीं, सौ बार। यह repetition emphasis है, मगर साथ ही frequency भी, हर वक़्त, हर आधे घंटे में, गुरु को नमन।

“जिनि माणस ते देवते कीए।” जिसने इंसान को देवता बना दिया। “करत न लागी वार।” बनाते वक़्त “वार” (देर) नहीं लगी।

यह नानक का सबसे direct praise है गुरु का। और यहाँ “गुरु” किसी एक व्यक्ति का नाम नहीं, “the principle of guidance” है। जो भी आपको common आदमी से ऊपर उठा देता है, वो गुरु है।

दिल्ली में हम सब “growth” चाहते हैं। कोई course, कोई coach, कोई certification, “मुझे बेहतर बनाओ।” नानक कह रहे हैं, transformation इतना instant भी हो सकता है, अगर genuine गुरु मिल जाए। “करत न लागी वार।” पल भर में।

यह hopeful है, क्योंकि यह कह रहा है कि बदलाव long process नहीं। आप “देवता” बन सकते हो, अगर right guidance मिल जाए।

देखें: जपजी साहिब, “गुरु प्रसादि” का concept
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॥ पउड़ी ॥ आपीन्है आपु साजिओ आपीन्है रचिओ नाउ ॥ दुयी कुदरति साजीऐ करि आसणु डिठो चाउ ॥ दाता करता आपि तूं तुसि देवहि करहि पसाउ ॥ तूं जाणोई सभसै दे लैसहि जिंदु कवाउ ॥ करि आसणु डिठो चाउ ॥१॥

अब पहली पौड़ी (stanza)। यह वार का foundation laying है।

“आपीन्है आपु साजिओ।” तू ने अपने आप को “साजा” (बनाया, स्थापित किया)। “आपीन्है रचिओ नाउ।” अपने आप ही अपना नाम रचा।

यह सबसे subtle theological statement है। हम सब किसी और से नाम पाते हैं (माँ-बाप, समाज)। मगर जो मूल reality है, उसका नाम उसने ख़ुद रखा। यह self-existing, self-defining का concept है।

और यह “नाम” क्या है? कोई particular word? नहीं। यह उसकी self-recognition है। आप जब आइने में देखते हो और “मैं” कहते हो, उसी way वो भी।

“दुयी कुदरति साजीऐ।” फिर “दूसरी” क़ुदरत बनाई। यानी ख़ुद के बाद, सृष्टि। यह sequence है, पहले self, फिर creation। आदि वेदान्त भी यही कहता है, ब्रह्म ने सोचा “बहु स्याम्” (मैं बहु हो जाऊँ), और सृष्टि हुई।

“करि आसणु डिठो चाउ।” आसन (सिंहासन, position) बना कर, “चाव” (excitement, joy) से देखा। यह बहुत human image है। हरि एक कुर्सी पर बैठ कर, अपनी रचना को देख रहा है, और enjoy कर रहा है। यह “अनासक्त” creator नहीं। यह involved दर्शक है।

“दाता करता आपि तूं, तुसि देवहि करहि पसाउ।” तू ख़ुद दाता है, ख़ुद करता। “तुसि” (तुष्ट हो कर) देता है, “पसाउ” (पसारा, abundance) करता है।

“तूं जाणोई सभसै।” तू सबको जानता है। “दे लैसहि जिंदु कवाउ।” दे और ले लेता है “जिंद” (जीवन) और “कवाउ” (वस्त्र)।

यह बहुत intimate है। हरि कपड़े देता है, फिर ले लेता है। जीवन देता है, फिर ले लेता है। यह pattern है। नानक का acceptance यहाँ बहुत स्पष्ट है।

closing line: “करि आसणु डिठो चाउ।” repeat। आसन पर बैठ कर, ख़ुशी से देखा। यह refrain है। नानक चाहते हैं कि यह image आपके मन में reside करे। एक खुश creator, अपनी रचना को देख रहा है। यह वो प्रारंभिक idea है जिस पर पूरी वार खड़ी होगी।

देखें: तैत्तिरीय उपनिषद्, “सो कामयत बहु स्याम्” (मैं बहु हो जाऊँ) · गीता 9.7, “सर्वभूतानि कौंतेय प्रकृतिं यान्ति”
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॥ सलोक मः १ ॥ पवणु गुरू पाणी पिता माता धरति महतु ॥ दिवसु राति दुइ दाई दाइआ खेलै सगलु जगतु ॥ चंगिआईआ बुरिआईआ वाचै धरमु हदूरि ॥ करमी आपो आपणी के नेड़ै के दूरि ॥ जिनी नामु धिआइआ गए मसकति घालि ॥ नानक ते मुख उजले केती छुटी नालि ॥१॥

और यह वो सलोक है। आसा की वार के centerpiece में से एक। और सबसे beloved। यह सलोक जपजी साहिब का closing भी है, मगर वहाँ “सलोक” के रूप में, यहाँ “वार” के context में।

गुरु नानक एक family tree बना रहे हैं, लेकिन यह किसी इंसान की family tree नहीं। यह पूरी सृष्टि की family tree है।

हवा गुरु है, क्योंकि साँस के बिना कुछ नहीं। पानी पिता है, क्योंकि जीवन का बीज पानी में है। और धरती माँ है, “महतु” (महान, विशाल), जिसकी गोद में सब कुछ पलता है।

अब अगली line देखिए: दिन और रात दो दाइयाँ हैं (caretakers), और सारा संसार इनकी गोद में खेल रहा है। “खेलै” यानी खेल रहा है। बच्चों की तरह। गुरु नानक कह रहे हैं कि हम सब बच्चे हैं, और यह ब्रह्मांड एक nursery है जो हवा, पानी, और मिट्टी से बनी है।

ज़रा रुक कर सोचिए, अगर हवा गुरु है, तो हम हर साँस में गुरु से मिल रहे हैं। अगर पानी पिता है, तो हर घूँट एक आशीर्वाद है। गुरु नानक यहाँ environment का lecture नहीं दे रहे। वो यह बता रहे हैं कि जिसे तुम “प्रकृति” कहते हो, वो तुम्हारा परिवार है।

फिर एक shift। “चंगिआईआ बुरिआईआ वाचै धरमु हदूरि।” अच्छाइयाँ और बुराइयाँ धर्म-राज (cosmic judge) उपस्थिति में पढ़ी जाएँगी। “करमी आपो आपणी, के नेड़ै के दूरि।” अपने-अपने कर्म के मुताबिक़, कोई पास, कोई दूर।

यानी हम जो भी करते हैं, वो सब record हो रहा है। और final assessment में, हमारे actions ही तय करेंगे, हम हरि के “पास” हैं या “दूर”। यह karma का सबसे clear statement है, बिना rebirth theology में जाए।

“जिनी नामु धिआइआ, गए मसकति घालि।” जिन्होंने नाम ध्याया, वो “मशक़्क़त” (मेहनत) कर के गए। “नानक ते मुख उजले।” नानक कहते हैं, उनके मुख उज्ज्वल हैं। “केती छुटी नालि।” और कितने ही उनके साथ छूट गए।

यह सबसे beautiful closing है। “उज्ज्वल मुख” यानी shining face। जिसने genuine effort किया (मशक़्क़त), उसका चेहरा उज्ज्वल। मगर अकेले नहीं, “केती छुटी नालि” – बहुत और भी उसके साथ छूटे।

यानी genuine साधक अकेले मुक्त नहीं होता, उसकी company में और लोग भी “छूट” जाते हैं। यह bhakti का community-aspect है। हम सब साथ-साथ चलते हैं।

दिल्ली में हम सब अकेले “successful” बनना चाहते हैं। नानक कह रहे हैं, असली कामयाबी वो है जिसमें आपके पीछे लाइन भी “छूट” जाए। यह leadership की सबसे genuine definition है।

देखें: जपजी साहिब, समापन सलोक (same verse, closing role) · गीता 9.29, “समोऽहं सर्वभूतेषु” (हरि की समदृष्टि) · तैत्तिरीय उपनिषद्, “पंचमहाभूत” (पाँच भूत = प्रकृति)
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॥ पउड़ी ॥ भै विचि पवणु वहै सदवाउ ॥ भै विचि चलहि लख दरीआउ ॥ भै विचि अगनि कढै वेगारि ॥ भै विचि धरती दबी भारि ॥ भै विचि इंदु फिरै सिर भारि ॥ भै विचि राजा धरम दुआरु ॥ भै विचि सूरजु भै विचि चंदु ॥ कोह करोड़ी चलत न अंतु ॥ भै विचि सिध बुध सुर नाथ ॥ भै विचि आडाणे आकास ॥ भै विचि जोध महाबल सूर ॥ भै विचि आवहि जावहि पूर ॥ सगलिआ भउ लिखिआ सिरि लेखु ॥ नानक निरभउ निरंकारु सचु एकु ॥२॥

यह दूसरी पौड़ी एक powerful drumbeat है। हर पंक्ति “भै विचि” (भय में) से शुरू।

मगर ध्यान दीजिए, “भै” कोई fear नहीं है modern sense में। यह “awe,” “reverence” है। संस्कृत में “भीत” से ज़्यादा “भय” के साथ “जुड़ा हुआ” sense।

“भै विचि पवणु वहै सदवाउ।” भय में हवा निरंतर बहती है। यानी हवा भी एक discipline में चलती है। “भै विचि चलहि लख दरीआउ।” भय में लाखों नदियाँ चलती हैं।

नानक एक picture बना रहे हैं, पूरी सृष्टि एक discipline में है। हवा अपने पथ पर, नदी अपने पथ पर। यह “भय” (cosmic order) के तहत है।

“भै विचि अगनि कढै वेगारि।” अग्नि भी “वेगारि” (forced labor) कर के काम करती है। “भै विचि धरती दबी भारि।” धरती भी “भार” (वज़न) से दबी है, भय में।

यानी सब elements अपना duty कर रहे हैं, क्योंकि उनको “हुकम” मानना है। यह free will नहीं, यह participation है ब्रह्मांडीय law में।

“भै विचि इंदु फिरै सिर भारि।” इंद्र भी “सिर भार” (उल्टा, head-down) घूमता है। यह interesting line है। पौराणिक कथाओं में इंद्र देव हैं, मगर नानक कह रहे हैं, इंद्र भी हरि के “भय” में, अपने तरीक़े से चल रहे हैं।

“भै विचि राजा धरम दुआरु।” धर्मराज भी “द्वार” (gate) पर भय में बैठा है। यानी वो जो हम सब को judge करता है, वो ख़ुद किसी ऊँचे की judgment में है।

फिर सूरज, चाँद, सिद्ध, बुद्ध, देव-नाथ, आकाश, योद्धा, सब “भै विचि।” यह exhaustive list है।

“सगलिआ भउ लिखिआ सिरि लेखु।” सबके सिर पर “भय” का “लेख” लिखा है। “नानक निरभउ निरंकारु सचु एकु।” नानक कहते हैं, निर्भय और निरंकार सच एक है।

यह पौड़ी का climax है। “सब कुछ भय में है, सिर्फ़ एक निर्भय है।” वो एक हरि है। बाक़ी पूरा cosmos, अपने तरीक़े से, उसी की “रज़ा” में चल रहा है।

दिल्ली में हम सब अपने आप को free समझते हैं। मगर अगर ध्यान से देखें, हम भी “भय में” चल रहे हैं, paycheck का भय, deadline का भय, social judgment का भय। नानक कह रहे हैं, यह natural है। पूरी universe भय में है। बस यह जान लो कि एक है जो भय में नहीं। उसके साथ अपना connection बना लो, तब तुम भी थोड़े से निर्भय हो जाओगे।

देखें: गीता 9.10, “मया अध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सचराचरम्” · तैत्तिरीय उपनिषद्, “भया अस्य अग्निस्तपति”