जे सउ वर्हिआ जीवण खाणु ॥ खसम पछाणै सो दिनु परवाणु ॥2॥ दरसनि देखिऐ दइआ न होइ ॥ लए दिते विणु रहै न कोइ ॥ राजा निआउ करे हथि होइ ॥ कहै खुदाइ न मानै कोइ ॥3॥ माणस मूरति नानकु नामु ॥ करणी कुता दरि फुरमानु ॥ गुर परसादि जाणै मिहमानु ॥ ता किछु दरगह पावै मानु ॥4॥4॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।
हिन्दी अर्थ: (इस हालत में) अगर सौ साल मनुष्य जी ले। और आराम का खाना-पीना बना रहे (तो भी ये उम्र व्यर्थ ही समझो)। (जिंदगी का सिर्फ) वही दिन भाग्यशाली है जब मनुष्य अपने मालिक प्रभू से सांझ पाता है। 2। मनुष्य एक-दूसरे को देख के (अपना भाई जान के आपस में) प्यार की भावना नहीं ला रहे (क्योंकि संबंध ही माया का बन रहा है)। रिश्वत लिए-दिए बिना नहीं रहता। (यहां तक कि) राजा भी (हाकम भी) तभी इन्साफ़ करता है अगर उसे देने के लिए (सवाली के) हाथ-पल्ले माया हैं। अगर कोई निरा रॅब का वास्ता डाले तो उसकी पुकार कोई नहीं सुनता। 3। नानक (कहता है, देखने को ही) मनुष्य की शकल है। नाम-मात्र को ही मनुष्य है। पा आचरण में मनुष्य (वह) कुत्ता है जो (मालिक के) दर पर (रोटी की खातिर) हुकम (मान रहा है)। अगर गुरू की मेहर से (संसार में अपने आप को) मेहमान समझे (और माया से) इतनी पकड़ ना रखे। मनुष्य परमात्मा की हजूरी में तभी कुछ आदर-सत्कार ले सकता है 4। 4।
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।
हिन्दी अर्थ: आसा महला 1 ॥ (हे प्रभू !) (जगत में) ये जितना बोलना और सुनना है (जितनी ये बोलने और सुनने की क्रिया है)। ये सारी आपकी जीवन-लौअ (के सदके) है। ये जितना दिखाई देता आकार है। ये सारा आपका ही शरीर है (आपके स्वै का विस्तार है)। (सारे जीवों में व्यापक हैं के) आप खुद ही रस लेने वाला है। आप खुद ही (जीवों की) जिंदगी है। हे माँ ! परमात्मा के बिना और कोई दूसरी हस्ती नहीं है जिसके प्रथाय मैं कह सकूँ (कि ये हस्ती परमात्मा के बराबर की है)। 1। जितनी भी यह दुनिया दिखाई देती है, यह सब आपकी ही काया है। हे भाई ! परमात्मा ही हमारा एकमेव पति-मालिक है। बस ! वही एक मालिक है। उस जैसा। और कोई नहीं। 1। रहाउ। हे भाई ! मेरा मालिक केवल एक ही है और एक वही मेरा स्वामी है॥1॥ रहाउ ॥ प्रभू खुद ही (सब जीवों को) मारता है खुद ही बचाता है। खुद ही (जिंद) ले लेता है खुद ही (जिंद) देता है। प्रभू स्वयं ही (सबकी) संभाल करता है। स्वयं ही (संभाल करके) खुश होता है। स्वयं ही (सब पर) मेहर की नजर करता है। 2। (जगत में) जो कुछ घटित हो रहा है (प्रभू से आक़ी हो के किसी और जीव द्वारा) कुछ नहीं किया जा सकता। जैसी कार्रवाही प्रभू करता है। वैसा ही उसका नाम पड़ जाता है। (हे प्रभू !) ये जो कुछ दिखाई दे रहा है आपकी ही बुजुर्गीयत (का प्रकाश) है। 3। जैसे एक शराब बेचने वाली है उसके पास शराब है; शराबी आ के रोज पीता रहता है वैसे ही जगत में कलियुगी स्वभाव है (उसके असर तले) माया मीठी लग रही है। और जीवों का मन (माया में) मस्त हो रहा है, ऐ भांति-भांति के रूप भी प्रभू खुद ही बना रहा है (चाहे ये बात अलौकिक ही प्रतीत होती है; पर उस प्रभू को हर अच्छे-बुरे में व्यापक देख के) बिचारा नानक यही कह सकता है। 4। 5।
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।
हिन्दी अर्थ: आसा महला 1 ॥ जिस मनुष्य ने श्रेष्ठ बुद्धि को बाजा बनाया है। प्रभू के प्यार को तबला बनाया है (इन साजों के बजने से। श्रेष्ठ बुद्धि और प्रभू-प्रेम की बरकति से) उसके अंदर सदा आनंद बना रहता है। उसके मन में उत्साह रहता है। असल भक्ति यही है। और यही है महान तप। इस आत्मिक आनंद में टिके रहके सदैव जीवन राह पर चलो। बस ! यही नृत्य करो (रासों में नाच-नाच के उसको कृष्ण लीला समझना भुलेखा है)। 1। इनसे मन में आनंद एवं सदैव उमंग पैदा होती है। यही प्रभु-भक्ति एवं यही तपस्या की साधना है। इस प्रेम में आप अपने चरणों से ताल भरकर नृत्य कर ॥ 1 ॥ जो मनुष्य परमात्मा की सिफत सालाह करनी जानता है वह (जीवन-नृत्य में) ताल में नाचता है (जीवन की सही राहों पर चलता है)। (रास आदि में कृष्ण मूर्ति के आगे ये) नाच और ही हैं निरी मन का परचावा मात्र हैं। मन के चाव हैं (ये भगती नहीं। ये तो मन के नचाए नाचना है)। 1। रहाउ। (ख़लकत की) सेवा। संतोख (वाला जीवन) – ये दोनों छेणैं बजें। सदा प्रसन्न मुद्रा में रहना- ये पैरों में घुंघरू (बजें); (प्रभू-प्रेम के बिना) कोई और लगन ना हो – ये (हर समय अंदर) राग व अलाप (होता रहे)। (हे भाई !) इस आत्मिक आनंद में टिको। इस जीवन-राह पर चलो। बस ! ये नाच नाचो (भाव। इस तरह जीवन के आत्मिक हिलोरों का आनंद लो)। 2। प्रभू का डर-अदब मन-चित्त में टिका रहे- उठते-बैठते सदा हर समय नृत्य का ये चक्कर हो; अपने शरीर को मनुष्य नाशवंत समझे- ये लेट के नृत्यकारी हो। (हे भाई !) इस आनंद में टिके रहो; ये जीवन जीओ। बस ! ये नाच नाचो (ये आत्मिक हिलोरे लो)। 3। सत्संग में रहके गुरू के उपदेश का प्यार (अपने अंदर पैदा करना); गुरू के सन्मुख रहके परमात्मा का अटल नाम सुनते रहना; परमात्मा का नाम बरंबार जपना- इस रंग में। हे नानक ! टिको। इस जीवन-राह पर पैर धरो। बस ! ये नाच नाचो (ये जीवन आनंद लो)। 4। 6।
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।
हिन्दी अर्थ: आसा महला 1 ॥ परमात्मा ने हवा बनाई। सारी धरती की रचना की। आग व पानी का मेल किया (भाव। ये सारे विरोधी तत्व इकट्ठे करके जगत रचना की। रचनहार प्रभू की ये एक आश्चर्य भरी लीला है। जिससे दिखता है किवह बेअंत बड़ी ताकतों वाला है। पर उसकी ये महिमा भूल के निरा रावण को मारने में ही उसकी महानता समझनी भूल है)। अकल के अंधे रावण ने अपनी मौत को (मूर्खता में) दावत दी। परमात्मा (निरा उस मूर्ख) रावण को ही मार के बड़ा नहीं हो गया। 1। (हे प्रभू !) आपकी महिमा बयान नहीं की जा सकती। आप सब जीवों में व्यापक है। मौजूद है। 1। रहाउ। (हे अकाल-पुरख !) सृष्टि के सारे जीव पैदा करके सब की जीवन जुगति तूने अपने हाथ में रखी हुई है। (सबको नाथा हुआ है) सिर्फ काली-नाग को नाथ के आप बड़ा नहीं हैं गया। ना आप किसी खास स्त्री (स्त्री विशेष) का पति है। ना कोई स्त्री आपकी पत्नी है। आप सब जीवों के अंदर एक-रस मौजूद है। 2। (कहते हैं कि जो) ब्रहमा कमल की नाल में से पैदा हुआ था। विष्णु उसका हिमायती था। वह ब्रहमा परमात्मा का अंत तलाशने के लिए गया। (उस नालि में ही भटकता रहा) पर अंत ना मिल सका। (अकाल-पुरख बेअंत कुदरत का मालिक है) सिर्फ कंस को मार के वह कितना बड़ा बन गया। (ये तो उसके आगे एक साधारण सी बात है)। 3। (कहते हैं कि देवताओं और दैत्यों ने मिल के) समुंद्र-मंथन किया और (उसमें से) चौदह रत्न निकाले। (बाँटने के समय दोनों धड़े) गुस्से में आ-आ के कहने लगे कि ये रत्न हमने निकाले हैं। हमने निकाले हैं (अपनी ओर से परमात्मा की महिमा बयान करने के लिए कहते हैं कि परमात्मा ने मोहनी अवतार धार के वह रत्न) एक-एक करके बाँट दिए।
आसा राग सुबह की पहली रोशनी का है, उम्मीद से भरा, चलने को तैयार। आसा का अर्थ ही ‘आशा’ है। ‘आसा दी वार’ सिख परम्परा की सुबह-कीर्तन का केन्द्र-स्तम्भ रही है, चार-पाँच सदियों से। आसा राग का क्षेत्र है। ‘आसा दी वार’ की रचना गुरु नानक की है, बाद में गुरु अंगद और गुरु अर्जन के साथ संगठित हुई।
गुरु नानक की वाणी का अपना मिज़ाज है, सीधा-सादा, बिना अलंकार के, मगर हर पंक्ति में एक ठहराव। 1469 में तलवण्डी में जन्म, सुलतानपुर के बहीखाते में कुछ साल काम, फिर तीस की उम्र के क़रीब वो लम्बी पैदल यात्रा जो काबुल, बग़दाद, मक्का, जगन्नाथ-पुरी, तिब्बत की सरहद तक उन्हें ले गयी। उनके शबद इन्हीं यात्राओं की वाणी हैं।
इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(इस हालत में) अगर सौ साल मनुष्य जी ले।”
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।