अंग 381

अंग
381
राग आसा
राग: आसा · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਨਿੰਦਕ ਕੀ ਗਤਿ ਕਤਹੂੰ ਨਾਹੀ ਖਸਮੈ ਏਵੈ ਭਾਣਾ ॥
ਜੋ ਜੋ ਨਿੰਦ ਕਰੇ ਸੰਤਨ ਕੀ ਤਿਉ ਸੰਤਨ ਸੁਖੁ ਮਾਨਾ ॥੩॥
ਸੰਤਾ ਟੇਕ ਤੁਮਾਰੀ ਸੁਆਮੀ ਤੂੰ ਸੰਤਨ ਕਾ ਸਹਾਈ ॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਸੰਤ ਹਰਿ ਰਾਖੇ ਨਿੰਦਕ ਦੀਏ ਰੁੜਾਈ ॥੪॥੨॥੪੧॥
निंदक की गति कतहूं नाही खसमै एवै भाणा ॥
जो जो निंद करे संतन की तिउ संतन सुखु माना ॥३॥
संता टेक तुमारी सुआमी तूं संतन का सहाई ॥
कहु नानक संत हरि राखे निंदक दीए रुड़ाई ॥४॥२॥४१॥

हिन्दी अर्थ: पति-प्रभू की रजा ऐसे ही है कि (संत-जनों की) निंदा करने वाले मनुष्य को कहीं भी उच्च आत्मिक अवस्था प्राप्त नहीं हो सकती (क्योंकि वह ऊँची आत्मिक अवस्था वालों की तो सदा निंदा करता है। दूसरी तरफ़) ज्यों-ज्यों कोई मनुष्य संत-जनों की निंदा करता है (कमियां बयान करजा है) त्यों-त्यों संत-जन इस में सुख प्रतीत करते हैं (उनको अपने आत्मिक जीवन की पड़ताल करने का मौका मिलता रहता है)। 3। हे मालिक प्रभू ! तेरे संत-जनों को (जीवन की अगुवाई के लिए) सदा तेरा ही आसरा रहता है।तू (संतों का जीवन ऊँचा करने में) मददगार भी बनता है। हे नानक ! कह, (उस निंदा की बरकति से) संतों को तो परमात्मा (बुरे कर्मों से) बचाए रखता है पर निंदा करने वालों को (उनके निंदा की बाढ़ में) बहा देता है (उनके आत्मिक जीवन को निंदा की बाढ़ में बहा के समाप्त कर देता है)। 4। 2। 41।
ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਬਾਹਰੁ ਧੋਇ ਅੰਤਰੁ ਮਨੁ ਮੈਲਾ ਦੁਇ ਠਉਰ ਅਪੁਨੇ ਖੋਏ ॥
ਈਹਾ ਕਾਮਿ ਕ੍ਰੋਧਿ ਮੋਹਿ ਵਿਆਪਿਆ ਆਗੈ ਮੁਸਿ ਮੁਸਿ ਰੋਏ ॥੧॥
ਗੋਵਿੰਦ ਭਜਨ ਕੀ ਮਤਿ ਹੈ ਹੋਰਾ ॥
ਵਰਮੀ ਮਾਰੀ ਸਾਪੁ ਨ ਮਰਈ ਨਾਮੁ ਨ ਸੁਨਈ ਡੋਰਾ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਮਾਇਆ ਕੀ ਕਿਰਤਿ ਛੋਡਿ ਗਵਾਈ ਭਗਤੀ ਸਾਰ ਨ ਜਾਨੈ ॥
ਬੇਦ ਸਾਸਤ੍ਰ ਕਉ ਤਰਕਨਿ ਲਾਗਾ ਤਤੁ ਜੋਗੁ ਨ ਪਛਾਨੈ ॥੨॥
ਉਘਰਿ ਗਇਆ ਜੈਸਾ ਖੋਟਾ ਢਬੂਆ ਨਦਰਿ ਸਰਾਫਾ ਆਇਆ ॥
ਅੰਤਰਜਾਮੀ ਸਭੁ ਕਿਛੁ ਜਾਨੈ ਉਸ ਤੇ ਕਹਾ ਛਪਾਇਆ ॥੩॥
ਕੂੜਿ ਕਪਟਿ ਬੰਚਿ ਨਿੰਮੁਨੀਆਦਾ ਬਿਨਸਿ ਗਇਆ ਤਤਕਾਲੇ ॥
ਸਤਿ ਸਤਿ ਸਤਿ ਨਾਨਕਿ ਕਹਿਆ ਅਪਨੈ ਹਿਰਦੈ ਦੇਖੁ ਸਮਾਲੇ ॥੪॥੩॥੪੨॥
आसा महला ५ ॥
बाहरु धोइ अंतरु मनु मैला दुइ ठउर अपुने खोए ॥
ईहा कामि क्रोधि मोहि विआपिआ आगै मुसि मुसि रोए ॥१॥
गोविंद भजन की मति है होरा ॥
वरमी मारी सापु न मरई नामु न सुनई डोरा ॥१॥ रहाउ ॥
माइआ की किरति छोडि गवाई भगती सार न जानै ॥
बेद सासत्र कउ तरकनि लागा ततु जोगु न पछानै ॥२॥
उघरि गइआ जैसा खोटा ढबूआ नदरि सराफा आइआ ॥
अंतरजामी सभु किछु जानै उस ते कहा छपाइआ ॥३॥
कूड़ि कपटि बंचि निंमुनीआदा बिनसि गइआ ततकाले ॥
सति सति सति नानकि कहिआ अपनै हिरदै देखु समाले ॥४॥३॥४२॥

हिन्दी अर्थ: आसा महला ५ ॥ जो मनुष्य (तीर्थ आदि पर सिर्फ) शरीर धो के अंदरूनी मन (विकारों से) मैला ही रखता है वह लोक-परलोक अपने दोनों स्थान गवा लेता है। इस लोक में रहते हुए काम वासना में।क्रोध में।मोह में फसा रहता है।आगे परलोक में जा के सिसक-सिसक के रोता है। 1। (हे भाई !) परमात्मा का भजन करने वाली अक्ल और किस्म की होती है (उसमें दिखावा नहीं होता)। अगर मनुष्य परमात्मा का नाम नहीं सुनता। यदि नाम की ओर से बहरा रहता है (तो बाहरी धार्मिक कर्म ऐसे ही हैं जैसे सांप को मारने की जगह सांप के बिल को ही कूटे जाने)।पर अगर बिल को ही मारते जाएं तो इस तरह साँप नहीं मरता (बाहरी कर्मों से मन वश में नहीं आता)। 1।रहाउ। (जिस मनुष्य ने त्याग के भुलेखे में आजीविका की खातिर) माया कमाने का उद्यम छोड़ दिया वह भक्ति की कद्र भी नहीं जानता। जो मनुष्य वेद-शास्त्र आदि धर्म-पुस्तकों को सिर्फ बहसों में ही उपयोग करना आरम्भ कर देता है वह (आत्मिक जीवन की) अस्लियत नहीं समझता।वह परमात्मा का मिलाप नहीं समझता। 2। जैसे जब कोई खोटा रुपया सर्राफा की नजर पड़ता है तो उसका खोट प्रत्यक्ष दिखाई दे जाता है; (वैसे ही जो मनुष्य अंदर से विकारी है। पर बाहर से धार्मिक भेखी) वह परमातमा से (अपने अंदर का खोट) छुपा नहीं सकता।हरेक के दिल की जानने वाला परमात्मा उसकी हरेक करतूत को जानता है। 3। मनुष्य की इस जगत में चार-रोजा जिंदगी है पर ये माया के मोह में ठॅगी-फरेब में आत्मिक जीवन लुटा के बड़ी जल्दी आत्मिक मौत मर जाता है। हे भाई ! नानक ने ये बात यकीनन सच कही है कि परमात्मा के नाम को अपने हृदय में बसता देख (यही आत्मिक जीवन है।यही जीवन उद्देश्य है)। 4। 3। 42।
ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਉਦਮੁ ਕਰਤ ਹੋਵੈ ਮਨੁ ਨਿਰਮਲੁ ਨਾਚੈ ਆਪੁ ਨਿਵਾਰੇ ॥
ਪੰਚ ਜਨਾ ਲੇ ਵਸਗਤਿ ਰਾਖੈ ਮਨ ਮਹਿ ਏਕੰਕਾਰੇ ॥੧॥
ਤੇਰਾ ਜਨੁ ਨਿਰਤਿ ਕਰੇ ਗੁਨ ਗਾਵੈ ॥
ਰਬਾਬੁ ਪਖਾਵਜ ਤਾਲ ਘੁੰਘਰੂ ਅਨਹਦ ਸਬਦੁ ਵਜਾਵੈ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਪ੍ਰਥਮੇ ਮਨੁ ਪਰਬੋਧੈ ਅਪਨਾ ਪਾਛੈ ਅਵਰ ਰੀਝਾਵੈ ॥
ਰਾਮ ਨਾਮ ਜਪੁ ਹਿਰਦੈ ਜਾਪੈ ਮੁਖ ਤੇ ਸਗਲ ਸੁਨਾਵੈ ॥੨॥
ਕਰ ਸੰਗਿ ਸਾਧੂ ਚਰਨ ਪਖਾਰੈ ਸੰਤ ਧੂਰਿ ਤਨਿ ਲਾਵੈ ॥
ਮਨੁ ਤਨੁ ਅਰਪਿ ਧਰੇ ਗੁਰ ਆਗੈ ਸਤਿ ਪਦਾਰਥੁ ਪਾਵੈ ॥੩॥
ਜੋ ਜੋ ਸੁਨੈ ਪੇਖੈ ਲਾਇ ਸਰਧਾ ਤਾ ਕਾ ਜਨਮ ਮਰਨ ਦੁਖੁ ਭਾਗੈ ॥
ਐਸੀ ਨਿਰਤਿ ਨਰਕ ਨਿਵਾਰੈ ਨਾਨਕ ਗੁਰਮੁਖਿ ਜਾਗੈ ॥੪॥੪॥੪੩॥
आसा महला ५ ॥
उदमु करत होवै मनु निरमलु नाचै आपु निवारे ॥
पंच जना ले वसगति राखै मन महि एकंकारे ॥१॥
तेरा जनु निरति करे गुन गावै ॥
रबाबु पखावज ताल घुंघरू अनहद सबदु वजावै ॥१॥ रहाउ ॥
प्रथमे मनु परबोधै अपना पाछै अवर रीझावै ॥
राम नाम जपु हिरदै जापै मुख ते सगल सुनावै ॥२॥
कर संगि साधू चरन पखारै संत धूरि तनि लावै ॥
मनु तनु अरपि धरे गुर आगै सति पदारथु पावै ॥३॥
जो जो सुनै पेखै लाइ सरधा ता का जनम मरन दुखु भागै ॥
ऐसी निरति नरक निवारै नानक गुरमुखि जागै ॥४॥४॥४३॥

हिन्दी अर्थ: आसा महला ५ ॥ (हे भाई ! परमात्मा का भक्त ज्यों-ज्यों सिफत सालाह का) उद्यम करता है उसका मन पवित्र होता जाता है।वह अपने अंदर से स्वै भाव दूर करता है (ये मानो।वह परमात्मा की हजूरी में) नाच करता है। (परमात्मा का सेवक) अपने मन में परमात्मा को बसाए रखता है (इस तरह) वह कामादिक पाँचों को काबू में रखता है। 1। हे प्रभू ! (देवी देवताओं के भक्त अपने ईष्ट की भक्ति करने के समय उसके आगे नृत्य करते हैं।पर) तेरा भक्त तेरी सिफत सालाह के गीत गाता है (ये।मानो) वह नाच करता है। हे प्रभू ! तेरा भगत तेरी सिफत सालाह का शबद रूप बाजा (अपने अंदर) लगातार बजाता रहता है (शबद को हर वक्त अपने हृदय में बसाए रखता है) यही है उसके वास्ते रबाब तबला छैणे और घुंघरू (आदि साजों का बजना)। 1।रहाउ। (परमात्मा की सिफत सालाह की बरकति से परमात्मा का भक्त) पहले अपने मन को (मोह की नींद में से) जगाता है।फिर औरों के अंदर (सिफत सालाह की) रीझ पैदा करता है। पहले वह अपने हृदय में परमात्मा के नाम का जाप करता है और फिर मुंह से वह जाप औरों को भी सुनाता है। 2। (परमात्मा का सेवक) अपने हाथों से गुरमुखों के पैर धोता है संत जनों के चरणों की धूड़ अपने शरीर पर लगाता है। अपना मन गुरू के हवाले करता है अपना शरीर (हरेक ज्ञानेन्द्रिय) गुरू को सौंप देता है और गुरू से सदा कायम रहने वाला हरि नाम प्राप्त करता है। 3। हे नानक ! (परमात्मा की सिफत सालाह एक ऐसा नाच है कि) जो जो मनुष्य इसको सिदक धारण करके सुनता देखता है उसके जनम-मरण के चक्करों का दुख दूर हो जाता है। ऐसा नाच गुरू की शरण पड़ने वाले मनुष्य को नर्कों से बचा लेता है (इस नाच की बरकति से) वह (मोह की नींद से) जाग जाता है। 4। 4। 43।
ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਅਧਮ ਚੰਡਾਲੀ ਭਈ ਬ੍ਰਹਮਣੀ ਸੂਦੀ ਤੇ ਸ੍ਰੇਸਟਾਈ ਰੇ ॥
ਪਾਤਾਲੀ ਆਕਾਸੀ ਸਖਨੀ ਲਹਬਰ ਬੂਝੀ ਖਾਈ ਰੇ ॥੧॥
ਘਰ ਕੀ ਬਿਲਾਈ ਅਵਰ ਸਿਖਾਈ ਮੂਸਾ ਦੇਖਿ ਡਰਾਈ ਰੇ ॥
ਅਜ ਕੈ ਵਸਿ ਗੁਰਿ ਕੀਨੋ ਕੇਹਰਿ ਕੂਕਰ ਤਿਨਹਿ ਲਗਾਈ ਰੇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਬਾਝੁ ਥੂਨੀਆ ਛਪਰਾ ਥਾਮਿੑਆ ਨੀਘਰਿਆ ਘਰੁ ਪਾਇਆ ਰੇ ॥
ਬਿਨੁ ਜੜੀਏ ਲੈ ਜੜਿਓ ਜੜਾਵਾ ਥੇਵਾ ਅਚਰਜੁ ਲਾਇਆ ਰੇ ॥੨॥
ਦਾਦੀ ਦਾਦਿ ਨ ਪਹੁਚਨਹਾਰਾ ਚੂਪੀ ਨਿਰਨਉ ਪਾਇਆ ਰੇ ॥
ਮਾਲਿ ਦੁਲੀਚੈ ਬੈਠੀ ਲੇ ਮਿਰਤਕੁ ਨੈਨ ਦਿਖਾਲਨੁ ਧਾਇਆ ਰੇ ॥੩॥
आसा महला ५ ॥
अधम चंडाली भई ब्रहमणी सूदी ते स्रेसटाई रे ॥
पाताली आकासी सखनी लहबर बूझी खाई रे ॥१॥
घर की बिलाई अवर सिखाई मूसा देखि डराई रे ॥
अज कै वसि गुरि कीनो केहरि कूकर तिनहि लगाई रे ॥१॥ रहाउ ॥
बाझु थूनीआ छपरा थामि॑आ नीघरिआ घरु पाइआ रे ॥
बिनु जड़ीए लै जड़िओ जड़ावा थेवा अचरजु लाइआ रे ॥२॥
दादी दादि न पहुचनहारा चूपी निरनउ पाइआ रे ॥
मालि दुलीचै बैठी ले मिरतकु नैन दिखालनु धाइआ रे ॥३॥

हिन्दी अर्थ: आसा महला ५ ॥ हे भाई ! नाम अमृत की बरकति से अति नीच चण्डालण बिरती (मानो) ब्राहमणी हो गई और शूद्रनी से ऊँचे कुल वाली हो गई। जो बिरती पहले पाताल से लेकर आकाश तक सारी दुनिया के पदार्थ ले के भी भूखी ही रहती थी उसकी तृष्णा की आग की लाट बुझ गई। 1। (जिस मनुष्य को गुरू ने नाम-अमृत पिला दिया उसकी पहले वाली) संतोष-हीन बिरती बिल्ली अब और ही किस्म की शिक्षा लेती है वह दुनिया के पदार्थ (चूहा) देख के लालच करने से शर्माती है। गुरू ने उसके अहंकार-शेर को निम्रता-बकरी के अधीन कर दिया है।उसकी तमोगुणी इन्द्रियों (कुत्तों) को सतो गुणों की तरफ (घास खाने पर) लगा दिया। 1।रहाउ। (हे भाई ! जिस मनुष्य को गुरू ने नाम-अमृत पिला दिया उसके मन का) छप्पर (छत) दुनियावी पदार्थों की आशाओं की थंमियों के बिना ही थमा गया उसके भटकते मन ने (प्रभू चरणों में) ठिकाना ढूँढ लिया। कारीगर सुनारों कीसहायता के बिना ही (उसके मन का) जड़ाऊ गहना तैयार हो गया और उस मन-गहने में परमात्मा के नाम का सुंदर नग जड़ दिया गया। 2। (हे भाई ! परमात्मा के चरणों से विछुड़ के नित्य) शिकवे-शिकायतें करने वाला (अपनी मन-इच्छित) इन्साफ़ कभी भी प्राप्त नहीं कर सकता था (पर अब जबसे नाम-अमृत मिल गया तो) शांत-चित्त हुए को न्याय मिलने लग पड़ा।(ये विश्वास हो गया कि परमात्मा जो कुछ करता है ठीक करता है)। (नाम-अमृत की बरकति से मनुष्य का पहले वाला) औरों को घूरने वाला स्वभाव खत्म हो गया।दुलीचे मल के बैठने वाली (अहंकार भरी बिरती) उसे अब आत्मि्क मौत मरी हुई दिखाई देने लग पड़ी। 3।

संदर्भ: यह अंग 381 है, राग आसा का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।

M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।

Jor Bagh metro station से Khan Market की 10-मिनट की walk में मन का थमना।

ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।

यह अंग कुल 35 पंक्तियों का है, 4 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 381” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।

राग के context में: आसा राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।

पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।

अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।

“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।

नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।

अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।

तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।

हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।

ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।

दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।

“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।

हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।

अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।

आगे का अंग: अंग 382 →, पीछे का: ← अंग 380

हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।

(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)

शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।

संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।

शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।

संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।

एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।

अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।

स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।