अंग 406

अंग
406
राग आसा
राग: आसा · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਦਇਆ ਕਰਹੁ ਕਿਰਮ ਅਪੁਨੇ ਕਉ ਇਹੈ ਮਨੋਰਥੁ ਸੁਆਉ ॥੨॥
ਤਨੁ ਧਨੁ ਤੇਰਾ ਤੂੰ ਪ੍ਰਭੁ ਮੇਰਾ ਹਮਰੈ ਵਸਿ ਕਿਛੁ ਨਾਹਿ ॥
ਜਿਉ ਜਿਉ ਰਾਖਹਿ ਤਿਉ ਤਿਉ ਰਹਣਾ ਤੇਰਾ ਦੀਆ ਖਾਹਿ ॥੩॥
ਜਨਮ ਜਨਮ ਕੇ ਕਿਲਵਿਖ ਕਾਟੈ ਮਜਨੁ ਹਰਿ ਜਨ ਧੂਰਿ ॥
ਭਾਇ ਭਗਤਿ ਭਰਮ ਭਉ ਨਾਸੈ ਹਰਿ ਨਾਨਕ ਸਦਾ ਹਜੂਰਿ ॥੪॥੪॥੧੩੯॥
दइआ करहु किरम अपुने कउ इहै मनोरथु सुआउ ॥२॥
तनु धनु तेरा तूं प्रभु मेरा हमरै वसि किछु नाहि ॥
जिउ जिउ राखहि तिउ तिउ रहणा तेरा दीआ खाहि ॥३॥
जनम जनम के किलविख काटै मजनु हरि जन धूरि ॥
भाइ भगति भरम भउ नासै हरि नानक सदा हजूरि ॥४॥४॥१३९॥

हिन्दी अर्थ: हे मेरे प्यारे ! तू मेरा मालिक है। अपने इस नाचीज सेवक पर मेहर कर कि – मेरा ये मनोरथ पूरा कर, मेरी ये अभिलाषा पूरी कर। 2। (हे प्रभू !) मेरा ये शरीर।मेरा ये धन सब कुछ तेरा ही दिया हुआ है।तू ही मेरा मालिक है।(हम जीव अपने उद्यम से तेरे नाम जपने के योग्य भी नहीं हैं) हमारे बस में कुछ भी नहीं। तू हम जीवों को जिस-जिस हाल में रखता है उसी तरह ही हम जीवन बिताते हैं।हम तेरा ही दिया हुआ हरेक पदार्थ खाते हैं। 3। हे नानक ! (कह,) परमात्मा के सेवकों (के चरणों) की धूड़ में (किया हुआ) स्नान (मनुष्य के) जन्मों-जन्मांतरों के (किए हुए) पाप दूर कर देता है। प्रभू-प्रेम से भक्ति की बरकति से (मनुष्य का) हरेक किस्म का डर वहम नाश हो जाता है।और परमात्मा सदा अंग-संग प्रतीत होने लग पड़ता है। 4। 4। 139।
ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਅਗਮ ਅਗੋਚਰੁ ਦਰਸੁ ਤੇਰਾ ਸੋ ਪਾਏ ਜਿਸੁ ਮਸਤਕਿ ਭਾਗੁ ॥
ਆਪਿ ਕ੍ਰਿਪਾਲਿ ਕ੍ਰਿਪਾ ਪ੍ਰਭਿ ਧਾਰੀ ਸਤਿਗੁਰਿ ਬਖਸਿਆ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ॥੧॥
ਕਲਿਜੁਗੁ ਉਧਾਰਿਆ ਗੁਰਦੇਵ ॥
ਮਲ ਮੂਤ ਮੂੜ ਜਿ ਮੁਘਦ ਹੋਤੇ ਸਭਿ ਲਗੇ ਤੇਰੀ ਸੇਵ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਤੂ ਆਪਿ ਕਰਤਾ ਸਭ ਸ੍ਰਿਸਟਿ ਧਰਤਾ ਸਭ ਮਹਿ ਰਹਿਆ ਸਮਾਇ ॥
ਧਰਮ ਰਾਜਾ ਬਿਸਮਾਦੁ ਹੋਆ ਸਭ ਪਈ ਪੈਰੀ ਆਇ ॥੨॥
ਸਤਜੁਗੁ ਤ੍ਰੇਤਾ ਦੁਆਪਰੁ ਭਣੀਐ ਕਲਿਜੁਗੁ ਊਤਮੋ ਜੁਗਾ ਮਾਹਿ ॥
ਅਹਿ ਕਰੁ ਕਰੇ ਸੁ ਅਹਿ ਕਰੁ ਪਾਏ ਕੋਈ ਨ ਪਕੜੀਐ ਕਿਸੈ ਥਾਇ ॥੩॥
ਹਰਿ ਜੀਉ ਸੋਈ ਕਰਹਿ ਜਿ ਭਗਤ ਤੇਰੇ ਜਾਚਹਿ ਏਹੁ ਤੇਰਾ ਬਿਰਦੁ ॥
ਕਰ ਜੋੜਿ ਨਾਨਕ ਦਾਨੁ ਮਾਗੈ ਅਪਣਿਆ ਸੰਤਾ ਦੇਹਿ ਹਰਿ ਦਰਸੁ ॥੪॥੫॥੧੪੦॥
आसा महला ५ ॥
अगम अगोचरु दरसु तेरा सो पाए जिसु मसतकि भागु ॥
आपि क्रिपालि क्रिपा प्रभि धारी सतिगुरि बखसिआ हरि नामु ॥१॥
कलिजुगु उधारिआ गुरदेव ॥
मल मूत मूड़ जि मुघद होते सभि लगे तेरी सेव ॥१॥ रहाउ ॥
तू आपि करता सभ स्रिसटि धरता सभ महि रहिआ समाइ ॥
धरम राजा बिसमादु होआ सभ पई पैरी आइ ॥२॥
सतजुगु त्रेता दुआपरु भणीऐ कलिजुगु ऊतमो जुगा माहि ॥
अहि करु करे सु अहि करु पाए कोई न पकड़ीऐ किसै थाइ ॥३॥
हरि जीउ सोई करहि जि भगत तेरे जाचहि एहु तेरा बिरदु ॥
कर जोड़ि नानक दानु मागै अपणिआ संता देहि हरि दरसु ॥४॥५॥१४०॥

हिन्दी अर्थ: आसा महला ५ ॥ हे अपहुँच प्रभू ! तू मनुष्यों की ज्ञानेन्द्रियों की पहुँच से परे है।तेरे दर्शन वही मनुष्य करता है।जिसके मस्तक के भाग्य जाग पड़ते हैं। (हे भाई ! जिस मनुष्य पर) कृपा के घर परमात्मा ने कृपा की निगाह की सतिगुरू ने उसे परमात्मा के नाम (-सिमरन की दाति) बख्श दी। 1। हे सतिगुरु ! तूने (तो) कलयुग को भी बचा लिया है (जिसे और युगों से बुरा समझा जाता है। भाव जो भी पहले) गंदे व मूर्ख (थे वह) सारे तेरी सेवा में आ के लगे हैं (तेरी बताई प्रभू की सेवा-भगती करने लग पड़े हैं)। 1।रहाउ। हे प्रभू ! तू स्वयं सारी सृष्टि को पैदा करने वाला है तू स्वयं (ही) सारी सृष्टि को आसरा देने वाला है।तू स्वयं ही सारी सृष्टि में व्यापक है (फिर कोई युग अच्छा कैसे।और कोई जुग बुरा कैसे।चाहे इस कलियुग को चारों युगों से बुरा कहा जाता है। फिर भी) धर्मराज हैरान हो रहा है (कि गुरू की कृपा से विकारों से हट के) सारी लुकाई तेरे चरणों में जुड़ रही है।(सो।अगर पुराने विचारों की तरफ भी जाएं तो भी ये कलियुग बुरा युग नहीं।और ये जुग जीवों को बुरे-कर्मों की ओर नहीं प्रेरता)। 2। हे भाई ! सतियुग को।त्रेते को।द्वापर को (अच्छा) युग कहा जाता है (पर।प्रत्यक्ष दिख रहा है कि बल्कि) कलियुग सारे युगों में श्रेष्ठ है (क्योंकि इस जुग में) जो हाथ कोई कर्म करता है।वही हाथ उसका फल भुगतता है।कोई मनुष्य किसी और मनुष्य की जगह (विकारों के कारण) पकड़ा नहीं जाता। 3। हे भाई ! (कोई भी युग हो।तू अपने भक्तों की लाज सदा रखता आया है) तू वही कुछ करता है जो तेरे भक्त तुझसे मांगते हैं।ये तेरा बिरद है (मूल स्वभाव है)। हे हरी ! (तेरा दास नानक भी अपने) दोनों हाथ जोड़ के (तेरे दर से) दान मांगता है कि नानक को अपने संत-जनों का दर्शन दे। 4। 5। 140।
ਰਾਗੁ ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੫ ਘਰੁ ੧੩
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ਸਤਿਗੁਰ ਬਚਨ ਤੁਮੑਾਰੇ ॥
ਨਿਰਗੁਣ ਨਿਸਤਾਰੇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਮਹਾ ਬਿਖਾਦੀ ਦੁਸਟ ਅਪਵਾਦੀ ਤੇ ਪੁਨੀਤ ਸੰਗਾਰੇ ॥੧॥
ਜਨਮ ਭਵੰਤੇ ਨਰਕਿ ਪੜੰਤੇ ਤਿਨੑ ਕੇ ਕੁਲ ਉਧਾਰੇ ॥੨॥
ਕੋਇ ਨ ਜਾਨੈ ਕੋਇ ਨ ਮਾਨੈ ਸੇ ਪਰਗਟੁ ਹਰਿ ਦੁਆਰੇ ॥੩॥
ਕਵਨ ਉਪਮਾ ਦੇਉ ਕਵਨ ਵਡਾਈ ਨਾਨਕ ਖਿਨੁ ਖਿਨੁ ਵਾਰੇ ॥੪॥੧॥੧੪੧॥
रागु आसा महला ५ घरु १३
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सतिगुर बचन तुम॑ारे ॥
निरगुण निसतारे ॥१॥ रहाउ ॥
महा बिखादी दुसट अपवादी ते पुनीत संगारे ॥१॥
जनम भवंते नरकि पड़ंते तिन॑ के कुल उधारे ॥२॥
कोइ न जानै कोइ न मानै से परगटु हरि दुआरे ॥३॥
कवन उपमा देउ कवन वडाई नानक खिनु खिनु वारे ॥४॥१॥१४१॥

हिन्दी अर्थ: रागु आसा महला ५ घरु १३ ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। हे सतिगुरू ! तेरे बचनों ने (तेरी शरण पड़े अनेकों) गुण-हीन लोगों को (संसार-समुंद्र से) पार लंघा दिया। 1।रहाउ। हे सतिगुरू ! तेरी संगति में रह के वे लोग भी पवित्र आचरण वाले बन गए।जो पहले बड़े कटु स्वभाव वाले थे।बुरे आचरण वाले थे और गलत बोल बोलने वाले थे। 1। हे सतिगुरु ! तूने उन लोगों के कुलों के कुल (विकारों में गिरने से) बचा लिए।जो अनेकों जूनियों में भटकते आ रहे थे और (जनम-मरण के चक्कर के) नर्क में पड़े हुए थे। 2। हे सतिगुरू ! तेरी मेहर से वे मनुष्य भी प्रभू के दर पर आदर-मान पाने के लायक हो गए। जिन्हें पहले कोई जानता-पहचानता ही नहीं था जिन्हें (जगत में) कोई आदर नहीं था देता। 4। हे नानक ! (कह, हे सतिगुरू !) मैं तेरे जैसा और किसे कहूँ।मैं तेरी क्या सिफत करूँ।मैं तुझसे हरेक पल कुर्बान जाता हूँ। 4। 1। 141।
ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਬਾਵਰ ਸੋਇ ਰਹੇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਮੋਹ ਕੁਟੰਬ ਬਿਖੈ ਰਸ ਮਾਤੇ ਮਿਥਿਆ ਗਹਨ ਗਹੇ ॥੧॥
ਮਿਥਨ ਮਨੋਰਥ ਸੁਪਨ ਆਨੰਦ ਉਲਾਸ ਮਨਿ ਮੁਖਿ ਸਤਿ ਕਹੇ ॥੨॥
ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਨਾਮੁ ਪਦਾਰਥੁ ਸੰਗੇ ਤਿਲੁ ਮਰਮੁ ਨ ਲਹੇ ॥੩॥
ਕਰਿ ਕਿਰਪਾ ਰਾਖੇ ਸਤਸੰਗੇ ਨਾਨਕ ਸਰਣਿ ਆਹੇ ॥੪॥੨॥੧੪੨॥
आसा महला ५ ॥
बावर सोइ रहे ॥१॥ रहाउ ॥
मोह कुटंब बिखै रस माते मिथिआ गहन गहे ॥१॥
मिथन मनोरथ सुपन आनंद उलास मनि मुखि सति कहे ॥२॥
अंम्रितु नामु पदारथु संगे तिलु मरमु न लहे ॥३॥
करि किरपा राखे सतसंगे नानक सरणि आहे ॥४॥२॥१४२॥

हिन्दी अर्थ: आसा महला ५ ॥ (माया के मोह में) बावरे हुए मनुष्य (गलफ़त की नींद में) सोए रहते हैं। 1।रहाउ। (हे भाई ! ऐसे लोग) परिवार के मोह और विषियों के स्वादों में मस्त हो के झूठे मैदान मारते रहते हैं। 1। (हे भाई ! माया के मोह में पागल हुए मन) उन पदार्थों की लालसा करते रहते हैं जिनसे साथ नहीं निभना जो सुपने में प्रतीत हो रहे मौज-मेलों की भांति हैं।(ऐसे लोग) इन पदार्थों को अपने मन में सदा कायम रहने वाला समझते हैं।मुंह से भी उन्हें ही पक्के साथी कहते हैं। 2। हे भाई ! आत्मिक जीवन देने वाला हरि-नाम ही सदा साथ देने वाला पदार्थ है।पर माया के मोह में झल्ले हुए मनुष्य इस हरि-नाम का भेद तिल भर भी नहीं समझते। 3। (जीवों के भी क्या वश। ) हे नानक ! प्रभू मेहर करके जिन मनुष्यों को साध-संगति में रखता है वही उस प्रभू की शरण में आए रहते हैं। 4। 2। 142।
ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੫ ਤਿਪਦੇ ॥
ਓਹਾ ਪ੍ਰੇਮ ਪਿਰੀ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਕਨਿਕ ਮਾਣਿਕ ਗਜ ਮੋਤੀਅਨ ਲਾਲਨ ਨਹ ਨਾਹ ਨਹੀ ॥੧॥
ਰਾਜ ਨ ਭਾਗ ਨ ਹੁਕਮ ਨ ਸਾਦਨ ॥
आसा महला ५ तिपदे ॥
ओहा प्रेम पिरी ॥१॥ रहाउ ॥
कनिक माणिक गज मोतीअन लालन नह नाह नही ॥१॥
राज न भाग न हुकम न सादन ॥

हिन्दी अर्थ: आसा महला ५ तिपदे ॥ (हे भाई ! मुझे तो) प्यारे (प्रभू) का वह प्रेम ही (चाहिए)। 1।रहाउ। (हे भाई ! प्रभू के प्यार के बदले में) सोना।मोती।बड़े बड़े मोती।हीरे लाल- मुझे इनमें से कुछ भी नहीं चाहिए।नहीं चाहिए। 1। (हे भाई ! प्रभू के प्यार की जगह) ना राज।ना धन-पदार्थ।ना हकूमत ना ही स्वादिष्ट खाने-

संदर्भ: यह अंग 406 है, राग आसा का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।

M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।

Lodhi Gardens में सुबह की walk, घूमते-घूमते एक पुरानी पंक्ति।

ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।

यह अंग कुल 34 पंक्तियों का है, 5 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 406” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।

राग के context में: आसा राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।

पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।

अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।

“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।

नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।

अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।

तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।

हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।

ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।

दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।

“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।

हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।

अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।

आगे का अंग: अंग 407 →, पीछे का: ← अंग 405

हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।

(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)

शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।

संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।

शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।

संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।

एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।

अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।

स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।