अंग
407
राग आसा
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਕਿਛੁ ਕਿਛੁ ਨ ਚਾਹੀ ॥੨॥
ਚਰਨਨ ਸਰਨਨ ਸੰਤਨ ਬੰਦਨ ॥
ਸੁਖੋ ਸੁਖੁ ਪਾਹੀ ॥
ਨਾਨਕ ਤਪਤਿ ਹਰੀ ॥
ਮਿਲੇ ਪ੍ਰੇਮ ਪਿਰੀ ॥੩॥੩॥੧੪੩॥
ਚਰਨਨ ਸਰਨਨ ਸੰਤਨ ਬੰਦਨ ॥
ਸੁਖੋ ਸੁਖੁ ਪਾਹੀ ॥
ਨਾਨਕ ਤਪਤਿ ਹਰੀ ॥
ਮਿਲੇ ਪ੍ਰੇਮ ਪਿਰੀ ॥੩॥੩॥੧੪੩॥
किछु किछु न चाही ॥२॥
चरनन सरनन संतन बंदन ॥
सुखो सुखु पाही ॥
नानक तपति हरी ॥
मिले प्रेम पिरी ॥३॥३॥१४३॥
चरनन सरनन संतन बंदन ॥
सुखो सुखु पाही ॥
नानक तपति हरी ॥
मिले प्रेम पिरी ॥३॥३॥१४३॥
हिन्दी अर्थ: मुझे किसी भी चीज की जरूरत नहीं। 2। हे भाई ! संत-जनों के चरणों की शरणसंत-जनों के चरणों पे नमस्कार- मैं इसी में सुख ही सुख अनुभव करता हूँ। हे नानक !वह मन में से तृष्णा की जलन दूर कर देता है- अगर प्यारे प्रभू का प्रेम मिल जाए 3। 3। 143।
ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਗੁਰਹਿ ਦਿਖਾਇਓ ਲੋਇਨਾ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਈਤਹਿ ਊਤਹਿ ਘਟਿ ਘਟਿ ਘਟਿ ਘਟਿ ਤੂੰਹੀ ਤੂੰਹੀ ਮੋਹਿਨਾ ॥੧॥
ਕਾਰਨ ਕਰਨਾ ਧਾਰਨ ਧਰਨਾ ਏਕੈ ਏਕੈ ਸੋਹਿਨਾ ॥੨॥
ਸੰਤਨ ਪਰਸਨ ਬਲਿਹਾਰੀ ਦਰਸਨ ਨਾਨਕ ਸੁਖਿ ਸੁਖਿ ਸੋਇਨਾ ॥੩॥੪॥੧੪੪॥
ਗੁਰਹਿ ਦਿਖਾਇਓ ਲੋਇਨਾ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਈਤਹਿ ਊਤਹਿ ਘਟਿ ਘਟਿ ਘਟਿ ਘਟਿ ਤੂੰਹੀ ਤੂੰਹੀ ਮੋਹਿਨਾ ॥੧॥
ਕਾਰਨ ਕਰਨਾ ਧਾਰਨ ਧਰਨਾ ਏਕੈ ਏਕੈ ਸੋਹਿਨਾ ॥੨॥
ਸੰਤਨ ਪਰਸਨ ਬਲਿਹਾਰੀ ਦਰਸਨ ਨਾਨਕ ਸੁਖਿ ਸੁਖਿ ਸੋਇਨਾ ॥੩॥੪॥੧੪੪॥
आसा महला ५ ॥
गुरहि दिखाइओ लोइना ॥१॥ रहाउ ॥
ईतहि ऊतहि घटि घटि घटि घटि तूंही तूंही मोहिना ॥१॥
कारन करना धारन धरना एकै एकै सोहिना ॥२॥
संतन परसन बलिहारी दरसन नानक सुखि सुखि सोइना ॥३॥४॥१४४॥
गुरहि दिखाइओ लोइना ॥१॥ रहाउ ॥
ईतहि ऊतहि घटि घटि घटि घटि तूंही तूंही मोहिना ॥१॥
कारन करना धारन धरना एकै एकै सोहिना ॥२॥
संतन परसन बलिहारी दरसन नानक सुखि सुखि सोइना ॥३॥४॥१४४॥
हिन्दी अर्थ: आसा महला ५ ॥ (हे मोहन प्रभू !) गुरू ने मुझे इन आँखो से तेरे दर्शन करा दिए हैं। 1।रहाउ। (अब) हे मोहन ! इस लोक में।परलोक में।हरेक शरीर में।हरेक हृदय में (मुझे) तू ही दिख रहा है। 1। (अब) हे सोहाने प्रभू ! (मुझे यकीन हो गया है कि) एक तू ही सारे जगत का मूल रचने वाला है।एक तू ही सारी सृष्टि को सहारा देने वाला है। 2। हे नानक ! (कह,हे मोहन प्रभू !) मैं तेरे संतों के चरण छूता हूँ उनके दर्शनों से सदके जाता हूँ।(संतों की कृपा से ही तेरा मिलाप होता है।और) सदा के लिए आत्मिक आनंद में लीनता प्राप्त होती है। 3। 4। 144।
ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਹਰਿ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਅਮੋਲਾ ॥
ਓਹੁ ਸਹਜਿ ਸੁਹੇਲਾ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਸੰਗਿ ਸਹਾਈ ਛੋਡਿ ਨ ਜਾਈ ਓਹੁ ਅਗਹ ਅਤੋਲਾ ॥੧॥
ਪ੍ਰੀਤਮੁ ਭਾਈ ਬਾਪੁ ਮੋਰੋ ਮਾਈ ਭਗਤਨ ਕਾ ਓਲੑਾ ॥੨॥
ਅਲਖੁ ਲਖਾਇਆ ਗੁਰ ਤੇ ਪਾਇਆ ਨਾਨਕ ਇਹੁ ਹਰਿ ਕਾ ਚੋਲੑਾ ॥੩॥੫॥੧੪੫॥
ਹਰਿ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਅਮੋਲਾ ॥
ਓਹੁ ਸਹਜਿ ਸੁਹੇਲਾ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਸੰਗਿ ਸਹਾਈ ਛੋਡਿ ਨ ਜਾਈ ਓਹੁ ਅਗਹ ਅਤੋਲਾ ॥੧॥
ਪ੍ਰੀਤਮੁ ਭਾਈ ਬਾਪੁ ਮੋਰੋ ਮਾਈ ਭਗਤਨ ਕਾ ਓਲੑਾ ॥੨॥
ਅਲਖੁ ਲਖਾਇਆ ਗੁਰ ਤੇ ਪਾਇਆ ਨਾਨਕ ਇਹੁ ਹਰਿ ਕਾ ਚੋਲੑਾ ॥੩॥੫॥੧੪੫॥
आसा महला ५ ॥
हरि हरि नामु अमोला ॥
ओहु सहजि सुहेला ॥१॥ रहाउ ॥
संगि सहाई छोडि न जाई ओहु अगह अतोला ॥१॥
प्रीतमु भाई बापु मोरो माई भगतन का ओल॑ा ॥२॥
अलखु लखाइआ गुर ते पाइआ नानक इहु हरि का चोल॑ा ॥३॥५॥१४५॥
हरि हरि नामु अमोला ॥
ओहु सहजि सुहेला ॥१॥ रहाउ ॥
संगि सहाई छोडि न जाई ओहु अगह अतोला ॥१॥
प्रीतमु भाई बापु मोरो माई भगतन का ओल॑ा ॥२॥
अलखु लखाइआ गुर ते पाइआ नानक इहु हरि का चोल॑ा ॥३॥५॥१४५॥
हिन्दी अर्थ: आसा महला ५ ॥ हे भाई ! जिस मनुष्य को परमात्मा का अमोलक नाम प्राप्त हो जाता है वह मनुष्य आत्मिक अडोलता में टिका रहता है वह मनुष्य आसान जीवन व्यतीत करता है। 1।रहाउ। हे भाई ! परमात्मा ही सदा साथ रहने वाला साथी है।वह कभी छोड़ के नहीं जाता।पर वह (किसी चतुराई-समझदारी से) वश में नहीं आता उसके बराबर और कोई नहीं। 1। हे भाई ! वह परमात्मा ही मेरा प्रीतम है मेरा भाई है मेरा पिता है और मेरी माँ है।वह परमात्मा ही अपने भक्तों (की जिंदगी) का सहारा है। 2। हे नानक ! (कह, हे भाई !) उस परमात्मा का सही स्वरूप बयान नहीं किया जा सकता।गुरू ने मुझे उसकी समझ बख्श दी है।गुरू से मैंने उसका मिलाप हासिल किया है।ये उस परमात्मा का एक अजब तमाशा है (कि वह गुरू के द्वारा मिल जाता है)। 3। 4। 145।
ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਆਪੁਨੀ ਭਗਤਿ ਨਿਬਾਹਿ ॥
ਠਾਕੁਰ ਆਇਓ ਆਹਿ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਨਾਮੁ ਪਦਾਰਥੁ ਹੋਇ ਸਕਾਰਥੁ ਹਿਰਦੈ ਚਰਨ ਬਸਾਹਿ ॥੧॥
ਏਹ ਮੁਕਤਾ ਏਹ ਜੁਗਤਾ ਰਾਖਹੁ ਸੰਤ ਸੰਗਾਹਿ ॥੨॥
ਨਾਮੁ ਧਿਆਵਉ ਸਹਜਿ ਸਮਾਵਉ ਨਾਨਕ ਹਰਿ ਗੁਨ ਗਾਹਿ ॥੩॥੬॥੧੪੬॥
ਆਪੁਨੀ ਭਗਤਿ ਨਿਬਾਹਿ ॥
ਠਾਕੁਰ ਆਇਓ ਆਹਿ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਨਾਮੁ ਪਦਾਰਥੁ ਹੋਇ ਸਕਾਰਥੁ ਹਿਰਦੈ ਚਰਨ ਬਸਾਹਿ ॥੧॥
ਏਹ ਮੁਕਤਾ ਏਹ ਜੁਗਤਾ ਰਾਖਹੁ ਸੰਤ ਸੰਗਾਹਿ ॥੨॥
ਨਾਮੁ ਧਿਆਵਉ ਸਹਜਿ ਸਮਾਵਉ ਨਾਨਕ ਹਰਿ ਗੁਨ ਗਾਹਿ ॥੩॥੬॥੧੪੬॥
आसा महला ५ ॥
आपुनी भगति निबाहि ॥
ठाकुर आइओ आहि ॥१॥ रहाउ ॥
नामु पदारथु होइ सकारथु हिरदै चरन बसाहि ॥१॥
एह मुकता एह जुगता राखहु संत संगाहि ॥२॥
नामु धिआवउ सहजि समावउ नानक हरि गुन गाहि ॥३॥६॥१४६॥
आपुनी भगति निबाहि ॥
ठाकुर आइओ आहि ॥१॥ रहाउ ॥
नामु पदारथु होइ सकारथु हिरदै चरन बसाहि ॥१॥
एह मुकता एह जुगता राखहु संत संगाहि ॥२॥
नामु धिआवउ सहजि समावउ नानक हरि गुन गाहि ॥३॥६॥१४६॥
हिन्दी अर्थ: आसा महला ५ ॥ मुझे अपनी भक्ति सदा दिए रख। हे मेरे मालिक ! मैं तमन्ना करके (तेरी शरण) आया हूँ। 1।रहाउ। हे मेरे मालिक ! अपने चरण मेरे दिल में बसाए रख।मुझे अपना कीमती नाम दिये रख।ता कि मेरा जीवन सफल हो जाए। 1। हे मेरे मालिक ! मुझे अपने संतों की संगति में रखे रख।यही मेरे वास्ते मुक्ति है।और यही मेरे वास्ते जीवन-युक्ति है। 2। हे नानक ! (कह,) हे हरी ! (मेहर कर) तेरे गुणों में डुबकी लगा के मैं तेरा नाम सिमरता रहूँ और आत्मिक अडोलता में टिका रहूँ। 3। 6। 146।
ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਠਾਕੁਰ ਚਰਣ ਸੁਹਾਵੇ ॥
ਹਰਿ ਸੰਤਨ ਪਾਵੇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਆਪੁ ਗਵਾਇਆ ਸੇਵ ਕਮਾਇਆ ਗੁਨ ਰਸਿ ਰਸਿ ਗਾਵੇ ॥੧॥
ਏਕਹਿ ਆਸਾ ਦਰਸ ਪਿਆਸਾ ਆਨ ਨ ਭਾਵੇ ॥੨॥
ਦਇਆ ਤੁਹਾਰੀ ਕਿਆ ਜੰਤ ਵਿਚਾਰੀ ਨਾਨਕ ਬਲਿ ਬਲਿ ਜਾਵੇ ॥੩॥੭॥੧੪੭॥
ਠਾਕੁਰ ਚਰਣ ਸੁਹਾਵੇ ॥
ਹਰਿ ਸੰਤਨ ਪਾਵੇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਆਪੁ ਗਵਾਇਆ ਸੇਵ ਕਮਾਇਆ ਗੁਨ ਰਸਿ ਰਸਿ ਗਾਵੇ ॥੧॥
ਏਕਹਿ ਆਸਾ ਦਰਸ ਪਿਆਸਾ ਆਨ ਨ ਭਾਵੇ ॥੨॥
ਦਇਆ ਤੁਹਾਰੀ ਕਿਆ ਜੰਤ ਵਿਚਾਰੀ ਨਾਨਕ ਬਲਿ ਬਲਿ ਜਾਵੇ ॥੩॥੭॥੧੪੭॥
आसा महला ५ ॥
ठाकुर चरण सुहावे ॥
हरि संतन पावे ॥१॥ रहाउ ॥
आपु गवाइआ सेव कमाइआ गुन रसि रसि गावे ॥१॥
एकहि आसा दरस पिआसा आन न भावे ॥२॥
दइआ तुहारी किआ जंत विचारी नानक बलि बलि जावे ॥३॥७॥१४७॥
ठाकुर चरण सुहावे ॥
हरि संतन पावे ॥१॥ रहाउ ॥
आपु गवाइआ सेव कमाइआ गुन रसि रसि गावे ॥१॥
एकहि आसा दरस पिआसा आन न भावे ॥२॥
दइआ तुहारी किआ जंत विचारी नानक बलि बलि जावे ॥३॥७॥१४७॥
हिन्दी अर्थ: आसा महला ५ ॥ (हे भाई !) मालिक प्रभू के चरण सोहणे हैं। पर प्रभू के संतों को (इनका मिलाप) प्राप्त होता है। 1।रहाउ। (हे भाई ! परमात्मा के संत) स्वैभाव दूर करके परमातमा की सेवा-भक्ति करते हैं और उसके गुण बड़े आनंद से गाते रहते हैं। 1। (हे भाई ! परमात्मा के संतों को) एक परमात्मा की (सहायता की) ही आशा टिकी रहती है।उन्हें परमात्मा के दर्शनों की चाहत लगी रहती है (इसके बिना) कोई और (दुनियावी आशाएं) अच्छी नहीं लगती। 2। हे नानक ! (कह, हे प्रभू ! तेरे संतों के हृदय में तेरे चरणों का प्रेम होना-ये) तेरी ही मेहर है (नहीं तो) बिचारे जीवों का क्या जोर है।हे प्रभू ! मैं तुझसे कुर्बान जाता हूँ। 3। 7। 147।
ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਏਕੁ ਸਿਮਰਿ ਮਨ ਮਾਹੀ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਨਾਮੁ ਧਿਆਵਹੁ ਰਿਦੈ ਬਸਾਵਹੁ ਤਿਸੁ ਬਿਨੁ ਕੋ ਨਾਹੀ ॥੧॥
ਪ੍ਰਭ ਸਰਨੀ ਆਈਐ ਸਰਬ ਫਲ ਪਾਈਐ ਸਗਲੇ ਦੁਖ ਜਾਹੀ ॥੨॥
ਜੀਅਨ ਕੋ ਦਾਤਾ ਪੁਰਖੁ ਬਿਧਾਤਾ ਨਾਨਕ ਘਟਿ ਘਟਿ ਆਹੀ ॥੩॥੮॥੧੪੮॥
ਏਕੁ ਸਿਮਰਿ ਮਨ ਮਾਹੀ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਨਾਮੁ ਧਿਆਵਹੁ ਰਿਦੈ ਬਸਾਵਹੁ ਤਿਸੁ ਬਿਨੁ ਕੋ ਨਾਹੀ ॥੧॥
ਪ੍ਰਭ ਸਰਨੀ ਆਈਐ ਸਰਬ ਫਲ ਪਾਈਐ ਸਗਲੇ ਦੁਖ ਜਾਹੀ ॥੨॥
ਜੀਅਨ ਕੋ ਦਾਤਾ ਪੁਰਖੁ ਬਿਧਾਤਾ ਨਾਨਕ ਘਟਿ ਘਟਿ ਆਹੀ ॥੩॥੮॥੧੪੮॥
आसा महला ५ ॥
एकु सिमरि मन माही ॥१॥ रहाउ ॥
नामु धिआवहु रिदै बसावहु तिसु बिनु को नाही ॥१॥
प्रभ सरनी आईऐ सरब फल पाईऐ सगले दुख जाही ॥२॥
जीअन को दाता पुरखु बिधाता नानक घटि घटि आही ॥३॥८॥१४८॥
एकु सिमरि मन माही ॥१॥ रहाउ ॥
नामु धिआवहु रिदै बसावहु तिसु बिनु को नाही ॥१॥
प्रभ सरनी आईऐ सरब फल पाईऐ सगले दुख जाही ॥२॥
जीअन को दाता पुरखु बिधाता नानक घटि घटि आही ॥३॥८॥१४८॥
हिन्दी अर्थ: आसा महला ५ ॥ (हे भाई ! अपने) मन में एक परमात्मा को सिमरता रह। 1।रहाउ। (हे भाई !) परमात्मा का नाम सिमरा करो।हरि-नाम अपने दिल में बसाए रखो।परमात्मा के बिना और कोई (सहायता करने वाला) नहीं। 1। (हे भाई !) आओ।परमात्मा की शरण पड़े रहें (और परमात्मा से) सारे फल हासिल करें।(परमात्मा की शरण पड़ने से) सारे दुख दूर हो जाते हैं। 2। हे नानक ! (कह,) सृजनहार अकाल-पुरख सब जीवों को दातें देने वाला है।वह हरेक शरीर में मौजूद है। 3। 8। 148।
ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਹਰਿ ਬਿਸਰਤ ਸੋ ਮੂਆ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਨਾਮੁ ਧਿਆਵੈ ਸਰਬ ਫਲ ਪਾਵੈ ਸੋ ਜਨੁ ਸੁਖੀਆ ਹੂਆ ॥੧॥
ਰਾਜੁ ਕਹਾਵੈ ਹਉ ਕਰਮ ਕਮਾਵੈ ਬਾਧਿਓ ਨਲਿਨੀ ਭ੍ਰਮਿ ਸੂਆ ॥੨॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਜਿਸੁ ਸਤਿਗੁਰੁ ਭੇਟਿਆ ਸੋ ਜਨੁ ਨਿਹਚਲੁ ਥੀਆ ॥੩॥੯॥੧੪੯॥
ਹਰਿ ਬਿਸਰਤ ਸੋ ਮੂਆ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਨਾਮੁ ਧਿਆਵੈ ਸਰਬ ਫਲ ਪਾਵੈ ਸੋ ਜਨੁ ਸੁਖੀਆ ਹੂਆ ॥੧॥
ਰਾਜੁ ਕਹਾਵੈ ਹਉ ਕਰਮ ਕਮਾਵੈ ਬਾਧਿਓ ਨਲਿਨੀ ਭ੍ਰਮਿ ਸੂਆ ॥੨॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਜਿਸੁ ਸਤਿਗੁਰੁ ਭੇਟਿਆ ਸੋ ਜਨੁ ਨਿਹਚਲੁ ਥੀਆ ॥੩॥੯॥੧੪੯॥
आसा महला ५ ॥
हरि बिसरत सो मूआ ॥१॥ रहाउ ॥
नामु धिआवै सरब फल पावै सो जनु सुखीआ हूआ ॥१॥
राजु कहावै हउ करम कमावै बाधिओ नलिनी भ्रमि सूआ ॥२॥
कहु नानक जिसु सतिगुरु भेटिआ सो जनु निहचलु थीआ ॥३॥९॥१४९॥
हरि बिसरत सो मूआ ॥१॥ रहाउ ॥
नामु धिआवै सरब फल पावै सो जनु सुखीआ हूआ ॥१॥
राजु कहावै हउ करम कमावै बाधिओ नलिनी भ्रमि सूआ ॥२॥
कहु नानक जिसु सतिगुरु भेटिआ सो जनु निहचलु थीआ ॥३॥९॥१४९॥
हिन्दी अर्थ: आसा महला ५ ॥ हे भाई ! जिस मनुष्य को परमात्मा की याद भूल गई वह आत्मिक मौत मर गया। 1।रहाउ। जो मनुष्य परमात्मा का नाम सिमरता रहता है।वह सारे (मन-इच्छित) फल हासिल कर लेता है और आसान जीवन गुजारता है। 1। (पर।हे भाई ! परमात्मा का नाम बिसार के जो मनुष्य अपने आप को) राजा (भी) कहलवाता है वह अहंकार पैदा करने वाले काम (ही) करता है वह (राज के गुरूर में ऐसे) बंधा रहता है जैसे (डूबने से बचे रहने के) वहम में तोता नलकी से चिपका रहता है। 2। हे नानक ! कह, जिस मनुष्य को सतिगुरू मिल जाता है वह मनुष्य अॅटल आत्मिक जीवन वाला बन जाता है। 3। 9। 149।
ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੫ ਘਰੁ ੧੪
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ਓਹੁ ਨੇਹੁ ਨਵੇਲਾ ॥
ਅਪੁਨੇ ਪ੍ਰੀਤਮ ਸਿਉ ਲਾਗਿ ਰਹੈ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਜੋ ਪ੍ਰਭ ਭਾਵੈ ਜਨਮਿ ਨ ਆਵੈ ॥
ਹਰਿ ਪ੍ਰੇਮ ਭਗਤਿ ਹਰਿ ਪ੍ਰੀਤਿ ਰਚੈ ॥੧॥
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ਓਹੁ ਨੇਹੁ ਨਵੇਲਾ ॥
ਅਪੁਨੇ ਪ੍ਰੀਤਮ ਸਿਉ ਲਾਗਿ ਰਹੈ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਜੋ ਪ੍ਰਭ ਭਾਵੈ ਜਨਮਿ ਨ ਆਵੈ ॥
ਹਰਿ ਪ੍ਰੇਮ ਭਗਤਿ ਹਰਿ ਪ੍ਰੀਤਿ ਰਚੈ ॥੧॥
आसा महला ५ घरु १४
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
ओहु नेहु नवेला ॥
अपुने प्रीतम सिउ लागि रहै ॥१॥ रहाउ ॥
जो प्रभ भावै जनमि न आवै ॥
हरि प्रेम भगति हरि प्रीति रचै ॥१॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
ओहु नेहु नवेला ॥
अपुने प्रीतम सिउ लागि रहै ॥१॥ रहाउ ॥
जो प्रभ भावै जनमि न आवै ॥
हरि प्रेम भगति हरि प्रीति रचै ॥१॥
हिन्दी अर्थ: आसा महला ५ घरु १४ ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। वह प्यार सदा नया बना रहता है (दुनिया वाले प्यार जल्दी ही फीके पड़ जाते हैं)। हे भाई ! जो प्यार प्यारे प्रीतम प्रभू से बना रहता है1।रहाउ। हे भाई ! जो मनुष्य प्रभू को प्यारा लगने लग जाता है (वह उस प्यार की बरकति से बार-बार) जनम में नहीं आता। जिस मनुष्य को हरी का प्रेम प्राप्त हो जाता है हरी की भक्ति प्राप्त हो जाती है वह (सदा) हरी की प्रीति में मस्त रहता है। 1।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 407 है, राग आसा का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।
M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।
Old Delhi के Karim’s में दोपहर का खाना, और बीच में मौन-सा एक pause।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 44 पंक्तियों का है, 8 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 407” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: आसा राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 408 →, पीछे का: ← अंग 406।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।