अंग 421

अंग
421
राग आसा
राग: आसा · रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਜੇਹੀ ਸੇਵ ਕਰਾਈਐ ਕਰਣੀ ਭੀ ਸਾਈ ॥
ਆਪਿ ਕਰੇ ਕਿਸੁ ਆਖੀਐ ਵੇਖੈ ਵਡਿਆਈ ॥੭॥
ਗੁਰ ਕੀ ਸੇਵਾ ਸੋ ਕਰੇ ਜਿਸੁ ਆਪਿ ਕਰਾਏ ॥
ਨਾਨਕ ਸਿਰੁ ਦੇ ਛੂਟੀਐ ਦਰਗਹ ਪਤਿ ਪਾਏ ॥੮॥੧੮॥
जेही सेव कराईऐ करणी भी साई ॥
आपि करे किसु आखीऐ वेखै वडिआई ॥७॥
गुर की सेवा सो करे जिसु आपि कराए ॥
नानक सिरु दे छूटीऐ दरगह पति पाए ॥८॥१८॥

हिन्दी अर्थ: (पर जीवों के भी क्या वश। ) परमात्मा ने जिस तरह के काम में जीव को लगाना है।जीव ने उसी काम में लगना है। परमात्मा खुद ही (सृष्टि) रच के खुद ही इसकी संभाल करता है।ये उसकी अपनी ही बुजुर्गीयत है।(उसके बिना) और किसी के आगे पुकार नहीं की जा सकती। 7। हे नानक ! गुरू की बताई सेवा भी वही मनुष्य करता है जिससे परमात्मा खुद ही कराता है (नहीं तो ये माया का मोह बड़ा ही प्रबल है) स्वैभाव गवा के ही इससे छुटकारा मिलता है। जो मनुष्य अपना सिर (गुरू के) हवाले करता है।वह परमात्मा की हजूरी में आदर-मान प्राप्त करता है। 8। 18।
ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੧ ॥
ਰੂੜੋ ਠਾਕੁਰ ਮਾਹਰੋ ਰੂੜੀ ਗੁਰਬਾਣੀ ॥
ਵਡੈ ਭਾਗਿ ਸਤਿਗੁਰੁ ਮਿਲੈ ਪਾਈਐ ਪਦੁ ਨਿਰਬਾਣੀ ॥੧॥
ਮੈ ਓਲੑਗੀਆ ਓਲੑਗੀ ਹਮ ਛੋਰੂ ਥਾਰੇ ॥
ਜਿਉ ਤੂੰ ਰਾਖਹਿ ਤਿਉ ਰਹਾ ਮੁਖਿ ਨਾਮੁ ਹਮਾਰੇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਦਰਸਨ ਕੀ ਪਿਆਸਾ ਘਣੀ ਭਾਣੈ ਮਨਿ ਭਾਈਐ ॥
ਮੇਰੇ ਠਾਕੁਰ ਹਾਥਿ ਵਡਿਆਈਆ ਭਾਣੈ ਪਤਿ ਪਾਈਐ ॥੨॥
ਸਾਚਉ ਦੂਰਿ ਨ ਜਾਣੀਐ ਅੰਤਰਿ ਹੈ ਸੋਈ ॥
ਜਹ ਦੇਖਾ ਤਹ ਰਵਿ ਰਹੇ ਕਿਨਿ ਕੀਮਤਿ ਹੋਈ ॥੩॥
ਆਪਿ ਕਰੇ ਆਪੇ ਹਰੇ ਵੇਖੈ ਵਡਿਆਈ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਹੋਇ ਨਿਹਾਲੀਐ ਇਉ ਕੀਮਤਿ ਪਾਈ ॥੪॥
ਜੀਵਦਿਆ ਲਾਹਾ ਮਿਲੈ ਗੁਰ ਕਾਰ ਕਮਾਵੈ ॥
ਪੂਰਬਿ ਹੋਵੈ ਲਿਖਿਆ ਤਾ ਸਤਿਗੁਰੁ ਪਾਵੈ ॥੫॥
ਮਨਮੁਖ ਤੋਟਾ ਨਿਤ ਹੈ ਭਰਮਹਿ ਭਰਮਾਏ ॥
ਮਨਮੁਖੁ ਅੰਧੁ ਨ ਚੇਤਈ ਕਿਉ ਦਰਸਨੁ ਪਾਏ ॥੬॥
ਤਾ ਜਗਿ ਆਇਆ ਜਾਣੀਐ ਸਾਚੈ ਲਿਵ ਲਾਏ ॥
ਗੁਰ ਭੇਟੇ ਪਾਰਸੁ ਭਏ ਜੋਤੀ ਜੋਤਿ ਮਿਲਾਏ ॥੭॥
ਅਹਿਨਿਸਿ ਰਹੈ ਨਿਰਾਲਮੋ ਕਾਰ ਧੁਰ ਕੀ ਕਰਣੀ ॥
ਨਾਨਕ ਨਾਮਿ ਸੰਤੋਖੀਆ ਰਾਤੇ ਹਰਿ ਚਰਣੀ ॥੮॥੧੯॥
आसा महला १ ॥
रूड़ो ठाकुर माहरो रूड़ी गुरबाणी ॥
वडै भागि सतिगुरु मिलै पाईऐ पदु निरबाणी ॥१॥
मै ओल॑गीआ ओल॑गी हम छोरू थारे ॥
जिउ तूं राखहि तिउ रहा मुखि नामु हमारे ॥१॥ रहाउ ॥
दरसन की पिआसा घणी भाणै मनि भाईऐ ॥
मेरे ठाकुर हाथि वडिआईआ भाणै पति पाईऐ ॥२॥
साचउ दूरि न जाणीऐ अंतरि है सोई ॥
जह देखा तह रवि रहे किनि कीमति होई ॥३॥
आपि करे आपे हरे वेखै वडिआई ॥
गुरमुखि होइ निहालीऐ इउ कीमति पाई ॥४॥
जीवदिआ लाहा मिलै गुर कार कमावै ॥
पूरबि होवै लिखिआ ता सतिगुरु पावै ॥५॥
मनमुख तोटा नित है भरमहि भरमाए ॥
मनमुखु अंधु न चेतई किउ दरसनु पाए ॥६॥
ता जगि आइआ जाणीऐ साचै लिव लाए ॥
गुर भेटे पारसु भए जोती जोति मिलाए ॥७॥
अहिनिसि रहै निरालमो कार धुर की करणी ॥
नानक नामि संतोखीआ राते हरि चरणी ॥८॥१९॥

हिन्दी अर्थ: आसा महला १ ॥ हे ठाकुर ! तू सुन्दर है।तू सयाना है।गुरू की सुंदर बाणी से (तेरी प्राप्ति हो सकती है)। बड़ी किस्मत से गुरू मिलता है।(और गुरू के मिलने से) वासना-रहित आत्मिक अवस्था मिलती है। 1। (हे प्रभू !) मैं तेरे दासों का दास हूँ।मैं तेरा छोटा सा सेवक हूँ। (मेहर कर) मैं उसी तरह जीऊँ जैसे तेरी रजा हो।मेरे मुँह में अपना नाम दे। 1।रहाउ। प्रभू की रजा में (जीव के अंदर) उसके दर्शन की तीव्र चाहत पैदा होती है।उसकी रजा के अनुसार ही वह जीव के मन को प्यारा लगने लग जाता है। प्यारे ठाकुर के हाथ में ही सारी वडिआईआं है।उसकी रजा अनुसार ही (जीव को उसके दर पर) इज्जत मिलती है। 2। सदा-स्थिर रहने वाले परमात्मा को (कहीं) दूर (बैठा) नहीं समझना चाहिए।हरेक जीव के अंद रवह खुद ही (बस रहा) है। मैं जिधर देखता हूँ।उधर ही प्रभू भरपूर है।पर किसी जीव द्वारा उसका मूल्य नहीं आँका जा सकता। 3। परमात्मा खुद ही उसारता है खुद ही गिराता है।(अपनी ये) ताकत वह खुद ही देख रहा है। गुरू के सन्मुख हो के उसका दर्शन कर सकते हैं और इस तरह उसका मूल्य पड़ सकता है (कि वह हर जगह मौजूद है)। 4। जो मनुष्य गुरू की बताई हुई कार कता है उसको इसी जीवन में परमात्मा का नाम-लाभ मिल जाता है।पर। गुरू भी तब ही मिलता है यदि पिछले जन्मों में किए हुए अच्छे कर्मों के संस्कार (अंदर) मौजूद हों। 5। अपने मन के पीछे चलने वाले बंदों के आत्मिक गुणों में नित्य कमी होती रहती है।(माया के) भटकाए हुए वह (नित्य) भटकते रहते हैं। अपने मन के पीछे चलने वाला मनुष्य (माया में) अंधा हो जाता है।वह परमात्मा को याद नहीं करता।उसे परमात्मा के दर्शन कैसे हों। 6। तब ही किसी को जगत में जन्मा समझो।जब वह सदा स्थिर प्रभू (के चरणों में) सुरति जोड़ता हो। जो मनुष्य गुरू को मिल जाते हैं वह पारस बन जाते हैं।उनकी ज्योति परमात्मा की ज्योति में मिली रहती है। 7। हे नानक ! प्रभू के नाम में जुड़े हुए बंदे संतोष वाला जीवन गुजारते हैं।उस परमात्मा के चरणों में रंगे रहते हैं। जो जो मनुष्य धुर से मिली (सिमरन की) कार करते हैं वह सदा निर्मल अवस्था में रहते हैं। 8। 19।
ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੧ ॥
ਕੇਤਾ ਆਖਣੁ ਆਖੀਐ ਤਾ ਕੇ ਅੰਤ ਨ ਜਾਣਾ ॥
ਮੈ ਨਿਧਰਿਆ ਧਰ ਏਕ ਤੂੰ ਮੈ ਤਾਣੁ ਸਤਾਣਾ ॥੧॥
ਨਾਨਕ ਕੀ ਅਰਦਾਸਿ ਹੈ ਸਚ ਨਾਮਿ ਸੁਹੇਲਾ ॥
ਆਪੁ ਗਇਆ ਸੋਝੀ ਪਈ ਗੁਰ ਸਬਦੀ ਮੇਲਾ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਹਉਮੈ ਗਰਬੁ ਗਵਾਈਐ ਪਾਈਐ ਵੀਚਾਰੁ ॥
ਸਾਹਿਬ ਸਿਉ ਮਨੁ ਮਾਨਿਆ ਦੇ ਸਾਚੁ ਅਧਾਰੁ ॥੨॥
ਅਹਿਨਿਸਿ ਨਾਮਿ ਸੰਤੋਖੀਆ ਸੇਵਾ ਸਚੁ ਸਾਈ ॥
ਤਾ ਕਉ ਬਿਘਨੁ ਨ ਲਾਗਈ ਚਾਲੈ ਹੁਕਮਿ ਰਜਾਈ ॥੩॥
ਹੁਕਮਿ ਰਜਾਈ ਜੋ ਚਲੈ ਸੋ ਪਵੈ ਖਜਾਨੈ ॥
ਖੋਟੇ ਠਵਰ ਨ ਪਾਇਨੀ ਰਲੇ ਜੂਠਾਨੈ ॥੪॥
ਨਿਤ ਨਿਤ ਖਰਾ ਸਮਾਲੀਐ ਸਚੁ ਸਉਦਾ ਪਾਈਐ ॥
ਖੋਟੇ ਨਦਰਿ ਨ ਆਵਨੀ ਲੇ ਅਗਨਿ ਜਲਾਈਐ ॥੫॥
ਜਿਨੀ ਆਤਮੁ ਚੀਨਿਆ ਪਰਮਾਤਮੁ ਸੋਈ ॥
ਏਕੋ ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਬਿਰਖੁ ਹੈ ਫਲੁ ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਹੋਈ ॥੬॥
ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਫਲੁ ਜਿਨੀ ਚਾਖਿਆ ਸਚਿ ਰਹੇ ਅਘਾਈ ॥
ਤਿੰਨਾ ਭਰਮੁ ਨ ਭੇਦੁ ਹੈ ਹਰਿ ਰਸਨ ਰਸਾਈ ॥੭॥
ਹੁਕਮਿ ਸੰਜੋਗੀ ਆਇਆ ਚਲੁ ਸਦਾ ਰਜਾਈ ॥
ਅਉਗਣਿਆਰੇ ਕਉ ਗੁਣੁ ਨਾਨਕੈ ਸਚੁ ਮਿਲੈ ਵਡਾਈ ॥੮॥੨੦॥
आसा महला १ ॥
केता आखणु आखीऐ ता के अंत न जाणा ॥
मै निधरिआ धर एक तूं मै ताणु सताणा ॥१॥
नानक की अरदासि है सच नामि सुहेला ॥
आपु गइआ सोझी पई गुर सबदी मेला ॥१॥ रहाउ ॥
हउमै गरबु गवाईऐ पाईऐ वीचारु ॥
साहिब सिउ मनु मानिआ दे साचु अधारु ॥२॥
अहिनिसि नामि संतोखीआ सेवा सचु साई ॥
ता कउ बिघनु न लागई चालै हुकमि रजाई ॥३॥
हुकमि रजाई जो चलै सो पवै खजानै ॥
खोटे ठवर न पाइनी रले जूठानै ॥४॥
नित नित खरा समालीऐ सचु सउदा पाईऐ ॥
खोटे नदरि न आवनी ले अगनि जलाईऐ ॥५॥
जिनी आतमु चीनिआ परमातमु सोई ॥
एको अंम्रित बिरखु है फलु अंम्रितु होई ॥६॥
अंम्रित फलु जिनी चाखिआ सचि रहे अघाई ॥
तिंना भरमु न भेदु है हरि रसन रसाई ॥७॥
हुकमि संजोगी आइआ चलु सदा रजाई ॥
अउगणिआरे कउ गुणु नानकै सचु मिलै वडाई ॥८॥२०॥

हिन्दी अर्थ: आसा महला १ ॥ (परमात्मा बेअंत गुणों का मालिक है) उसके गुणों का भले ही कितना ही बयान किया जाए।मैं अंत नहीं जान सकता। (हे प्रभू ! मेरी तो नित्य यही अरदास है) कि निआसरे का सिर्फ तू ही आसरा है।और तू ही मुझ शक्तिहीन (निताणे) का तगड़ा ताण (मजबूत शक्ति) है। 1। (प्रभू की हजूरी में) नानक की ये अरदास है, मैं सदा स्थिर प्रभू के नाम में (जुड़ के) सुखी रहूँ (भाव।मैं परमात्मा की याद में रहके आत्मिक आनंद हासिल करूँ)। जो मनुष्य अपने अंदर से स्वैभाव (अहंकार का भाव) गवाता है उसे (इस तरह की अरदास करने की) समझ पड़ जाती है और गुरू के शबद के द्वारा (परमात्मा से उसका) मिलाप हो जाता है। 1।रहाउ। ‘मैं बड़ा मैं बड़ा’-जब ये अहंकार (अपने अंदर से) दूर कर दें।तब (परमात्मा के दर पर अरदास करने की) समझ पड़ती है। जब परमात्मा के साथ जीव का मन लग जाता है।तब वह प्रभू उसको अपना सदा-स्थिर नाम (का जीवन के वास्ते) आसरा देता है। 2। सदा स्थिर प्रभू वही सेवा (कबूल करता है।जिसकी बरकति से जीव) दिन-रात प्रभू के नाम में (जुड़ के) संतोषी जीवन बनाता है। जो मनुष्य रजा के मालिक प्रभू के हुकम में चलता है।उसे (जीवन सफर में माया के मोह आदि की) कोई रोक नहीं पड़ती। 3। जो मनुष्य रजा के मालिक परमात्मा के हुकम में चलता है वह (खरा सिक्का बन के) प्रभू के खजाने में पड़ता है। खोटे सिक्कों को (खोटे जीवन वालों को प्रभू के खजाने में) जगह नहीं मिलती।वह तो खोटों में मिले रहते हैं। 4। (हे भाई !) सदा ही उस परमात्मा को अपने दिल में संभाल के रखो जिस पर माया के मोह की रत्ती भर भी मैल नहीं।इस तरह वह सौदा (खरीद) लेते हैं जो हमेशा के लिए है।जो हमेशा मिला रहता है। खोटे सिक्के परमात्मा की नजर नहीं चढ़ते।खोटे सिक्कों को उनकी सिलावट आदि की मैल जलाने के लिए आग में डाल के तपाते हैं। 5। जिन लोगों ने अपने आत्मिक जीवन को परखा-पहचाना है वही लोग परमात्मा को पहचान लेते हैं। (वे समझ लेते हैं कि) एक परमात्मा ही आत्मिक जीवन रूपी फल देने वाला वृक्ष है।उस प्रभू-वृक्ष का फल सदा अमृत-रूप है। 6। जिन मनुष्यों ने आत्मिक जीवन देने वाला नाम-फल चख लिया।वह (सदा) सदा स्थिर प्रभू के नाम में जुड़ के (और स्वादों से) तृप्त रहते हैं। उन्हें (माया आदि की कोई) भटकना नहीं रहती। उनकी परमात्मा से कोई दूरी नहीं रहती।उनकी जीभ परमात्मा के नाम रस में रसी रहती है। 7। (हे जीव !) तू परमात्मा के हुकम में (अपने किए कर्मों के) संजोगों के अनुसार (जगत में) आया है।सदा उसकी रजा में ही चल (और नाम की दाति मांग।इसी में तेरी भलाई है)। (मुझे) गुण-हीन नानक को सदा-स्थिर परमात्मा (का सिमरन रूप) गुण मिल जाए (मैं नानक इसी बख्शिश को सबसे ऊँची) बडिआई समझता हूँ। 8। 20।
ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੧ ॥
ਮਨੁ ਰਾਤਉ ਹਰਿ ਨਾਇ ਸਚੁ ਵਖਾਣਿਆ ॥
ਲੋਕਾ ਦਾ ਕਿਆ ਜਾਇ ਜਾ ਤੁਧੁ ਭਾਣਿਆ ॥੧॥
आसा महला १ ॥
मनु रातउ हरि नाइ सचु वखाणिआ ॥
लोका दा किआ जाइ जा तुधु भाणिआ ॥१॥

हिन्दी अर्थ: आसा महला १ ॥ जिस मनुष्य का मन परमात्मा के नाम (-रंग) में रंगा जाए।जो मनुष्य सदा कायम रहने वाले परमात्मा की सिफत सालाह करे (वह परमात्मा को प्यारा लगता है)।(और। हे प्रभू !) जब (तेरी सेवा-भक्ति के कारण कोई भाग्यशाली जीव) तुझे प्यारा लगने लग पड़े तो इसमें लोगों का कुछ नहीं बिगड़ता (क्योंकि तेरी सिफत सालाह करने वाला तेरे पैदा किए बंदों का दोखी हो ही नहीं सकता)। 1।

संदर्भ: यह अंग 421 है, राग आसा का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)।

गुरु नानक की वाणी, observational, direct, बिना ornament।

Dwarka के नए-बसे sector में पहली बार आए परिवार का घर देखना।

ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।

यह अंग कुल 45 पंक्तियों का है, 4 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 421” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।

राग के context में: आसा राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।

पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।

अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।

“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।

नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।

अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।

तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।

हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।

ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।

दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।

“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।

हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।

अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।

आगे का अंग: अंग 422 →, पीछे का: ← अंग 420

हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।

(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)

शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।

संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।

शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।

संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।

एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।

अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।

स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।