अंग 411

अंग
411
राग आसा
राग: आसा · रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਸਭ ਕਉ ਤਜਿ ਗਏ ਹਾਂ ॥
ਸੁਪਨਾ ਜਿਉ ਭਏ ਹਾਂ ॥
ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਜਿਨਿੑ ਲਏ ॥੧॥
ਹਰਿ ਤਜਿ ਅਨ ਲਗੇ ਹਾਂ ॥
ਜਨਮਹਿ ਮਰਿ ਭਗੇ ਹਾਂ ॥
ਹਰਿ ਹਰਿ ਜਨਿ ਲਹੇ ਹਾਂ ॥
ਜੀਵਤ ਸੇ ਰਹੇ ਹਾਂ ॥
ਜਿਸਹਿ ਕ੍ਰਿਪਾਲੁ ਹੋਇ ਹਾਂ ॥
ਨਾਨਕ ਭਗਤੁ ਸੋਇ ॥੨॥੭॥੧੬੩॥੨੩੨॥
सभ कउ तजि गए हां ॥
सुपना जिउ भए हां ॥
हरि नामु जिनि॑ लए ॥१॥
हरि तजि अन लगे हां ॥
जनमहि मरि भगे हां ॥
हरि हरि जनि लहे हां ॥
जीवत से रहे हां ॥
जिसहि क्रिपालु होइ हां ॥
नानक भगतु सोइ ॥२॥७॥१६३॥२३२॥

हिन्दी अर्थ: आखिर उस सारी को छोड़ के यहाँ से चले गए। (अब वह) सपने की तरह हो गए हैं (कोई उन्हें याद भी नहीं करता)। (फिर) तू क्यों (माया का मोह छोड़ के) परमात्मा का नाम नहीं याद करता। 1। (हे भाई !) जो मनुष्य परमात्मा को भुला के अन्य पदार्थों के मोह में फसे रहते हैं वह जनम-मरण के चक्कर में भटकते फिरते हैं। जिस मनुष्य ने परमात्मा को पा लिया है वे आत्मिक जीवन के मालिक बन गए। (पर) हे नानक ! (जीव के अपने वश के बात नहीं) जिस मनुष्य पर प्रभू दयावान होता है वही उसका भक्त बनता है। 2। 7। 163। 232।
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ਰਾਗੁ ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੯ ॥
ਬਿਰਥਾ ਕਹਉ ਕਉਨ ਸਿਉ ਮਨ ਕੀ ॥
ਲੋਭਿ ਗ੍ਰਸਿਓ ਦਸ ਹੂ ਦਿਸ ਧਾਵਤ ਆਸਾ ਲਾਗਿਓ ਧਨ ਕੀ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਸੁਖ ਕੈ ਹੇਤਿ ਬਹੁਤੁ ਦੁਖੁ ਪਾਵਤ ਸੇਵ ਕਰਤ ਜਨ ਜਨ ਕੀ ॥
ਦੁਆਰਹਿ ਦੁਆਰਿ ਸੁਆਨ ਜਿਉ ਡੋਲਤ ਨਹ ਸੁਧ ਰਾਮ ਭਜਨ ਕੀ ॥੧॥
ਮਾਨਸ ਜਨਮ ਅਕਾਰਥ ਖੋਵਤ ਲਾਜ ਨ ਲੋਕ ਹਸਨ ਕੀ ॥
ਨਾਨਕ ਹਰਿ ਜਸੁ ਕਿਉ ਨਹੀ ਗਾਵਤ ਕੁਮਤਿ ਬਿਨਾਸੈ ਤਨ ਕੀ ॥੨॥੧॥੨੩੩॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
रागु आसा महला ९ ॥
बिरथा कहउ कउन सिउ मन की ॥
लोभि ग्रसिओ दस हू दिस धावत आसा लागिओ धन की ॥१॥ रहाउ ॥
सुख कै हेति बहुतु दुखु पावत सेव करत जन जन की ॥
दुआरहि दुआरि सुआन जिउ डोलत नह सुध राम भजन की ॥१॥
मानस जनम अकारथ खोवत लाज न लोक हसन की ॥
नानक हरि जसु किउ नही गावत कुमति बिनासै तन की ॥२॥१॥२३३॥

हिन्दी अर्थ: ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। रागु आसा महला ९ ॥ (हे भाई !) मैं इस (मानस) मन की बुरी हालत किसे बताऊँ।(हरेक मनुष्य का यही हाल है)। लोभ में फसा हुआ ये मन दसों दिशाओं में दौड़ता है।इसे धन जोड़ने की तृष्णा लगी रहती है। 1।रहाउ। (हे भाई !) सुख हासिल करने के लिए (ये मन) जगह जगह की खुशामद करता फिरता है (और इस तरह सुख की जगह बल्कि) दुख सहता है। कुत्ते की तरह हरेक के दर पर भटकता फिरता है।इसे परमात्मा का भजन करने की कभी नहीं सूझती। 1। (हे भाई ! लोभ में फसा हुआ जीव) अपना मानस जनम व्यर्थ ही गवा लेता है।(इसके लालच के कारण) लोगों द्वारा किए जा रहे हँसी-मजाक से भी इसे शर्म नहीं आती। हे नानक ! (कह,हे जीव !) तू परमात्मा की सिफत सालाह क्यूँ नही करता।(सिफतसालाह की बरकति से ही) तेरी ये खोटी मति दूर हो सकेगी। 2। 1। 233।
ਰਾਗੁ ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੧ ਅਸਟਪਦੀਆ ਘਰੁ ੨
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ਉਤਰਿ ਅਵਘਟਿ ਸਰਵਰਿ ਨੑਾਵੈ ॥
ਬਕੈ ਨ ਬੋਲੈ ਹਰਿ ਗੁਣ ਗਾਵੈ ॥
ਜਲੁ ਆਕਾਸੀ ਸੁੰਨਿ ਸਮਾਵੈ ॥
ਰਸੁ ਸਤੁ ਝੋਲਿ ਮਹਾ ਰਸੁ ਪਾਵੈ ॥੧॥
ਐਸਾ ਗਿਆਨੁ ਸੁਨਹੁ ਅਭ ਮੋਰੇ ॥
ਭਰਿਪੁਰਿ ਧਾਰਿ ਰਹਿਆ ਸਭ ਠਉਰੇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਸਚੁ ਬ੍ਰਤੁ ਨੇਮੁ ਨ ਕਾਲੁ ਸੰਤਾਵੈ ॥
ਸਤਿਗੁਰ ਸਬਦਿ ਕਰੋਧੁ ਜਲਾਵੈ ॥
ਗਗਨਿ ਨਿਵਾਸਿ ਸਮਾਧਿ ਲਗਾਵੈ ॥
ਪਾਰਸੁ ਪਰਸਿ ਪਰਮ ਪਦੁ ਪਾਵੈ ॥੨॥
ਸਚੁ ਮਨ ਕਾਰਣਿ ਤਤੁ ਬਿਲੋਵੈ ॥
ਸੁਭਰ ਸਰਵਰਿ ਮੈਲੁ ਨ ਧੋਵੈ ॥
ਜੈ ਸਿਉ ਰਾਤਾ ਤੈਸੋ ਹੋਵੈ ॥
ਆਪੇ ਕਰਤਾ ਕਰੇ ਸੁ ਹੋਵੈ ॥੩॥
ਗੁਰ ਹਿਵ ਸੀਤਲੁ ਅਗਨਿ ਬੁਝਾਵੈ ॥
ਸੇਵਾ ਸੁਰਤਿ ਬਿਭੂਤ ਚੜਾਵੈ ॥
ਦਰਸਨੁ ਆਪਿ ਸਹਜ ਘਰਿ ਆਵੈ ॥
ਨਿਰਮਲ ਬਾਣੀ ਨਾਦੁ ਵਜਾਵੈ ॥੪॥
ਅੰਤਰਿ ਗਿਆਨੁ ਮਹਾ ਰਸੁ ਸਾਰਾ ॥
ਤੀਰਥ ਮਜਨੁ ਗੁਰ ਵੀਚਾਰਾ ॥
ਅੰਤਰਿ ਪੂਜਾ ਥਾਨੁ ਮੁਰਾਰਾ ॥
ਜੋਤੀ ਜੋਤਿ ਮਿਲਾਵਣਹਾਰਾ ॥੫॥
ਰਸਿ ਰਸਿਆ ਮਤਿ ਏਕੈ ਭਾਇ ॥
ਤਖਤ ਨਿਵਾਸੀ ਪੰਚ ਸਮਾਇ ॥
ਕਾਰ ਕਮਾਈ ਖਸਮ ਰਜਾਇ ॥
ਅਵਿਗਤ ਨਾਥੁ ਨ ਲਖਿਆ ਜਾਇ ॥੬॥
ਜਲ ਮਹਿ ਉਪਜੈ ਜਲ ਤੇ ਦੂਰਿ ॥
ਜਲ ਮਹਿ ਜੋਤਿ ਰਹਿਆ ਭਰਪੂਰਿ ॥
ਕਿਸੁ ਨੇੜੈ ਕਿਸੁ ਆਖਾ ਦੂਰਿ ॥
ਨਿਧਿ ਗੁਣ ਗਾਵਾ ਦੇਖਿ ਹਦੂਰਿ ॥੭॥
ਅੰਤਰਿ ਬਾਹਰਿ ਅਵਰੁ ਨ ਕੋਇ ॥
रागु आसा महला १ असटपदीआ घरु २
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
उतरि अवघटि सरवरि न॑ावै ॥
बकै न बोलै हरि गुण गावै ॥
जलु आकासी सुंनि समावै ॥
रसु सतु झोलि महा रसु पावै ॥१॥
ऐसा गिआनु सुनहु अभ मोरे ॥
भरिपुरि धारि रहिआ सभ ठउरे ॥१॥ रहाउ ॥
सचु ब्रतु नेमु न कालु संतावै ॥
सतिगुर सबदि करोधु जलावै ॥
गगनि निवासि समाधि लगावै ॥
पारसु परसि परम पदु पावै ॥२॥
सचु मन कारणि ततु बिलोवै ॥
सुभर सरवरि मैलु न धोवै ॥
जै सिउ राता तैसो होवै ॥
आपे करता करे सु होवै ॥३॥
गुर हिव सीतलु अगनि बुझावै ॥
सेवा सुरति बिभूत चड़ावै ॥
दरसनु आपि सहज घरि आवै ॥
निरमल बाणी नादु वजावै ॥४॥
अंतरि गिआनु महा रसु सारा ॥
तीरथ मजनु गुर वीचारा ॥
अंतरि पूजा थानु मुरारा ॥
जोती जोति मिलावणहारा ॥५॥
रसि रसिआ मति एकै भाइ ॥
तखत निवासी पंच समाइ ॥
कार कमाई खसम रजाइ ॥
अविगत नाथु न लखिआ जाइ ॥६॥
जल महि उपजै जल ते दूरि ॥
जल महि जोति रहिआ भरपूरि ॥
किसु नेड़ै किसु आखा दूरि ॥
निधि गुण गावा देखि हदूरि ॥७॥
अंतरि बाहरि अवरु न कोइ ॥

हिन्दी अर्थ: रागु आसा महला १ असटपदीआ घरु २ ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। (हे भरथरी जोगी ! जोगी किसी टीले से पहाड़ से उतर के किसी तीर्थ-सरोवर में स्नान करता है।तो इसे पुंन्य-कर्म समझता है।पर) जो मनुष्य अहंकार आदि की मुश्किल घाटी से उतर के (सत्संग के) सरोवर में (आत्मिक) स्नान करता है। जो बहुत व्यर्थ नहीं बोलता और परमात्मा के गुण गाता है। वह मनुष्य ऐसे उस आत्मिक अवस्था में टिका रहता है जहाँ कोई मायावी फुरना नहीं उठता जैसे (समुंद्र का) जल (सूरज की मदद से ऊँचा उठ के भाप बन के) आकाशों में (बादल बन के उड़ानें भरता) है। वह मनुष्य शांति रस को हिला के (ले के) नाम-महा-रस पीता है। 1। हे मेरे मन ! परमात्मा के साथ गहरी सांझ डालने वाली ये बात सुन। (कि) परमात्मा हर जगह भरपूर है।और हर ज्रगह सहारा दे रहा है। 1।रहाउ। (हे जोगी !) जिस मनुष्य ने सदा स्थिर प्रभू (के नाम) को अपना नित्य प्रण बना लिया है।नित्य की कार बना ली है।उसे मौत का सहम नहीं सताता (आत्मिक मौत का खतरा नहीं रहता)। गुरू के शबद में जुड़ के वह (अपने अंदर से) क्रोध को जला लेता है। उच्च आत्मिक मण्डल में निवास करके वह प्रभू चरणों से जुड़ा रहता है (समाधि लगाए रखता है)। (हे जोगी ! गुरू) पारस (के चरणों) को छू के वह सबसे ऊँचा आत्मिक दर्जा हासिल कर लेता है। 2। (हे जोगी ! जो मनुष्य) अपने मन को वश करने के लिए सदा-स्थिर प्रभू को (याद रखता है) बार बार चेते करता है (जैसे दूध रिड़कते।बिलोते हैं) और अपने मूल।प्रभू की तलाश करता है। जो मनुष्य (नाम अमृत से) नाको नाक भरे हुए सरोवर में से (जिसमें कोई विकारों आदि की) मैल नहीं है अपने आप को धोता है। वह मनुष्य वैसा ही हो जाता है जैसे प्रभू के साथ वह प्यार डालता है। (उसे फिर ये समझ आ जाती है कि) जगत में वही कुछ होता है जो करतार आप ही कर रहा है। 3। (हे जोगी ! तुम बर्फानी पहाड़ों की गुफाओं में रहते हो।शरीर पे विभूति मलते हो।सिंञीं बजाते हो।पर) बर्फ जैसें ठण्डे-ठार जिगरे वाले गुरू को मिल के जो मनुष्य (अपने अंदर की तृष्णा की) आग बुझाता है। जो मनुष्य गुरू की बताई हुई सेवा में अपनी सुरति रखता है।जो।मानो।ये राख विभूति शरीर पे मलता है। जो मनुष्य प्रभू की सिफत सालाह से भरपूरगुरू की पवित्र बाणी सदा अपने अंदर बसाता है।जो मानो।ये नाद बजाता है। उसने (असल) भेष धारण कर लिया है।वह सदा अडोल आत्मिक अवस्था में टिका रहता है। 4। (हे जोगी !) जिस मनुष्य ने अपने अंदर प्रभू के साथ गहरी सांझ डाल ली है।जो सदा श्रेष्ठ नाम महा रस पी रहा है। जिसने सतिगुरू की बाणी की विचार को (अठारह) तीर्थों का स्नान बना लिया है। जिसने अपने हृदय को परमात्मा के रहने के लिए मंदिर बनाया है।और अंतरात्मे उसकी पूजा करता है। वह अपनी ज्योति को परमात्मा की ज्सोति में मिला लेता है। 5। (हे जोगी !) जिस मनुष्य का मन नाम-रस में भीग जाता है; जिसकी मति एक प्रभू के प्रेम में पसीज जाती है। वह कामादिक पाँचों को समाप्त करके अंदरात्मे अडोल हो जाता है। पति-प्रभू की रजा में चलना उसकी नित्य की कार।नित्य की कमाई हो जाती है। वह मनुष्य उस ‘नाथ’ का रूप हो जाता है जो अदृश्य है और जिसका स्वरूप बयान नहीं किया जा सकता। 6। (हे जोगी ! सूर्य व चंद्रमा सरोवर आदि के) पानी में चमकता है।पर उस पानी से वह बहुत ही दूर है। पानी में उसकी ज्योति चमक मारती है।इसी तरह परमात्मा की ज्योति सब जीवों में हर जगह व्यापक है (पर वह परमात्मा निर्लिप भी है।सबके नजदीक भी है और दूर भी है)। मैं ये नहीं बता सकता कि वह किसके नजदीक है किसके दूर है। उसको हर जगह मौजूद देख के मैं उस गुणों के खजाने प्रभू के गुण गाता हूँ। 7। हर जगह जीवों के अंदर और बाहर सारी सृष्टि में परमात्मा के बिना और कोई नहीं।

संदर्भ: यह अंग 411 है, राग आसा का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)।

गुरु नानक की वाणी, observational, direct, बिना ornament।

Khan Market की किताबों की दुकान में किसी पुरानी कविता-book को उठाते-उठाते।

ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।

यह अंग कुल 50 पंक्तियों का है, 3 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 411” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।

राग के context में: आसा राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।

पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।

अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।

“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।

नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।

अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।

तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।

हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।

ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।

दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।

“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।

हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।

अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।

आगे का अंग: अंग 412 →, पीछे का: ← अंग 410

हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।

(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)

शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।

संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।

शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।

संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।

एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।

अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।

स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।