अंग
418
राग आसा
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਥਾਨ ਮੁਕਾਮ ਜਲੇ ਬਿਜ ਮੰਦਰ ਮੁਛਿ ਮੁਛਿ ਕੁਇਰ ਰੁਲਾਇਆ ॥
ਕੋਈ ਮੁਗਲੁ ਨ ਹੋਆ ਅੰਧਾ ਕਿਨੈ ਨ ਪਰਚਾ ਲਾਇਆ ॥੪॥
ਮੁਗਲ ਪਠਾਣਾ ਭਈ ਲੜਾਈ ਰਣ ਮਹਿ ਤੇਗ ਵਗਾਈ ॥
ਓਨੑੀ ਤੁਪਕ ਤਾਣਿ ਚਲਾਈ ਓਨੑੀ ਹਸਤਿ ਚਿੜਾਈ ॥
ਜਿਨੑ ਕੀ ਚੀਰੀ ਦਰਗਹ ਪਾਟੀ ਤਿਨੑਾ ਮਰਣਾ ਭਾਈ ॥੫॥
ਇਕ ਹਿੰਦਵਾਣੀ ਅਵਰ ਤੁਰਕਾਣੀ ਭਟਿਆਣੀ ਠਕੁਰਾਣੀ ॥
ਇਕਨੑਾ ਪੇਰਣ ਸਿਰ ਖੁਰ ਪਾਟੇ ਇਕਨੑਾ ਵਾਸੁ ਮਸਾਣੀ ॥
ਜਿਨੑ ਕੇ ਬੰਕੇ ਘਰੀ ਨ ਆਇਆ ਤਿਨੑ ਕਿਉ ਰੈਣਿ ਵਿਹਾਣੀ ॥੬॥
ਆਪੇ ਕਰੇ ਕਰਾਏ ਕਰਤਾ ਕਿਸ ਨੋ ਆਖਿ ਸੁਣਾਈਐ ॥
ਦੁਖੁ ਸੁਖੁ ਤੇਰੈ ਭਾਣੈ ਹੋਵੈ ਕਿਸ ਥੈ ਜਾਇ ਰੂਆਈਐ ॥
ਹੁਕਮੀ ਹੁਕਮਿ ਚਲਾਏ ਵਿਗਸੈ ਨਾਨਕ ਲਿਖਿਆ ਪਾਈਐ ॥੭॥੧੨॥
ਕੋਈ ਮੁਗਲੁ ਨ ਹੋਆ ਅੰਧਾ ਕਿਨੈ ਨ ਪਰਚਾ ਲਾਇਆ ॥੪॥
ਮੁਗਲ ਪਠਾਣਾ ਭਈ ਲੜਾਈ ਰਣ ਮਹਿ ਤੇਗ ਵਗਾਈ ॥
ਓਨੑੀ ਤੁਪਕ ਤਾਣਿ ਚਲਾਈ ਓਨੑੀ ਹਸਤਿ ਚਿੜਾਈ ॥
ਜਿਨੑ ਕੀ ਚੀਰੀ ਦਰਗਹ ਪਾਟੀ ਤਿਨੑਾ ਮਰਣਾ ਭਾਈ ॥੫॥
ਇਕ ਹਿੰਦਵਾਣੀ ਅਵਰ ਤੁਰਕਾਣੀ ਭਟਿਆਣੀ ਠਕੁਰਾਣੀ ॥
ਇਕਨੑਾ ਪੇਰਣ ਸਿਰ ਖੁਰ ਪਾਟੇ ਇਕਨੑਾ ਵਾਸੁ ਮਸਾਣੀ ॥
ਜਿਨੑ ਕੇ ਬੰਕੇ ਘਰੀ ਨ ਆਇਆ ਤਿਨੑ ਕਿਉ ਰੈਣਿ ਵਿਹਾਣੀ ॥੬॥
ਆਪੇ ਕਰੇ ਕਰਾਏ ਕਰਤਾ ਕਿਸ ਨੋ ਆਖਿ ਸੁਣਾਈਐ ॥
ਦੁਖੁ ਸੁਖੁ ਤੇਰੈ ਭਾਣੈ ਹੋਵੈ ਕਿਸ ਥੈ ਜਾਇ ਰੂਆਈਐ ॥
ਹੁਕਮੀ ਹੁਕਮਿ ਚਲਾਏ ਵਿਗਸੈ ਨਾਨਕ ਲਿਖਿਆ ਪਾਈਐ ॥੭॥੧੨॥
थान मुकाम जले बिज मंदर मुछि मुछि कुइर रुलाइआ ॥
कोई मुगलु न होआ अंधा किनै न परचा लाइआ ॥४॥
मुगल पठाणा भई लड़ाई रण महि तेग वगाई ॥
ओन॑ी तुपक ताणि चलाई ओन॑ी हसति चिड़ाई ॥
जिन॑ की चीरी दरगह पाटी तिन॑ा मरणा भाई ॥५॥
इक हिंदवाणी अवर तुरकाणी भटिआणी ठकुराणी ॥
इकन॑ा पेरण सिर खुर पाटे इकन॑ा वासु मसाणी ॥
जिन॑ के बंके घरी न आइआ तिन॑ किउ रैणि विहाणी ॥६॥
आपे करे कराए करता किस नो आखि सुणाईऐ ॥
दुखु सुखु तेरै भाणै होवै किस थै जाइ रूआईऐ ॥
हुकमी हुकमि चलाए विगसै नानक लिखिआ पाईऐ ॥७॥१२॥
कोई मुगलु न होआ अंधा किनै न परचा लाइआ ॥४॥
मुगल पठाणा भई लड़ाई रण महि तेग वगाई ॥
ओन॑ी तुपक ताणि चलाई ओन॑ी हसति चिड़ाई ॥
जिन॑ की चीरी दरगह पाटी तिन॑ा मरणा भाई ॥५॥
इक हिंदवाणी अवर तुरकाणी भटिआणी ठकुराणी ॥
इकन॑ा पेरण सिर खुर पाटे इकन॑ा वासु मसाणी ॥
जिन॑ के बंके घरी न आइआ तिन॑ किउ रैणि विहाणी ॥६॥
आपे करे कराए करता किस नो आखि सुणाईऐ ॥
दुखु सुखु तेरै भाणै होवै किस थै जाइ रूआईऐ ॥
हुकमी हुकमि चलाए विगसै नानक लिखिआ पाईऐ ॥७॥१२॥
हिन्दी अर्थ: (पर उनकी तसब्बियां फिरने पर भी।उनके जादू-टूणे की शक्ति प्रदर्शन के बावजूद भी कोई फर्क नहीं पड़ा।बल्कि मुगलों द्वारा लगाई जा रही आग से) पक्के जगह-मुकाम।पक्के महल तक जल कर राख हो गए।उन्होंने (मुगलों ने) पठानों के शहजादों को टुकड़े-टुकड़े कर कर के (मिट्टी में) मिला दिया। (पीरों के जादू-टूणों से) कोई एक भी मुग़ल अंधा नहीं हुआ।किसी भी पीर से कोई करामात ना हो सकी। 4। जब मुग़लों और पठानों की लड़ाई हुई।लड़ाई के मैदान में (दोनों पक्षों ने) तलवार चलाई। उन मुग़लों ने बंदूकों के निशाने साध-साध के गोलियां चलाई।पर पठानों के हाथों में ही चिड़ चिड़ कर गई। पर हे भाई ! धुर से ही जिनकी उम्र की चिट्ठी फट जाती है।उन्होंने तो मरना ही हुआ। 5। क्या हिन्दू-सि्त्रयांक्या मुसलमान औरतें और क्या भट्टों व ठाकुरों की औरतें- कईयों के बुरके सिर से ले के पैरों तक लीरो-लीर हो गए।और कईयों का (मर के) मसाणों में जा वासा हुआ। (जो बच रहीं।वो भी बेचारी क्या बचीं। ) जिनके सोहणे पति घर वापस ही ना आए।उन्होंने (वह बिपता भरी) रात कैसे काटी होगी। 6। परये दर्द भरी कहानी किसे कह के सुनाई जाय।ईश्वर स्वयं ही सब कुछ करता है और जीवों से कराता है। हे करतार ! दुख हो चाहे सुख हो तेरी रजा में ही घटित होता है।तेरे बिना और किस के पास जा के दुख फरोलें। हे नानक ! रजा का मालिक प्रभू अपनी रजा में ही जगत की कार चला रहा है और (देख देख के) संतुष्ट हो रहा है।(अपने-अपने किए कर्मों के मुताबिक) लिखे लेख भोगते हैं। 7। 12।
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ਆਸਾ ਕਾਫੀ ਮਹਲਾ ੧ ਘਰੁ ੮ ਅਸਟਪਦੀਆ ॥
ਜੈਸੇ ਗੋਇਲਿ ਗੋਇਲੀ ਤੈਸੇ ਸੰਸਾਰਾ ॥
ਕੂੜੁ ਕਮਾਵਹਿ ਆਦਮੀ ਬਾਂਧਹਿ ਘਰ ਬਾਰਾ ॥੧॥
ਜਾਗਹੁ ਜਾਗਹੁ ਸੂਤਿਹੋ ਚਲਿਆ ਵਣਜਾਰਾ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਨੀਤ ਨੀਤ ਘਰ ਬਾਂਧੀਅਹਿ ਜੇ ਰਹਣਾ ਹੋਈ ॥
ਪਿੰਡੁ ਪਵੈ ਜੀਉ ਚਲਸੀ ਜੇ ਜਾਣੈ ਕੋਈ ॥੨॥
ਓਹੀ ਓਹੀ ਕਿਆ ਕਰਹੁ ਹੈ ਹੋਸੀ ਸੋਈ ॥
ਤੁਮ ਰੋਵਹੁਗੇ ਓਸ ਨੋ ਤੁਮੑ ਕਉ ਕਉਣੁ ਰੋਈ ॥੩॥
ਧੰਧਾ ਪਿਟਿਹੁ ਭਾਈਹੋ ਤੁਮੑ ਕੂੜੁ ਕਮਾਵਹੁ ॥
ਓਹੁ ਨ ਸੁਣਈ ਕਤ ਹੀ ਤੁਮੑ ਲੋਕ ਸੁਣਾਵਹੁ ॥੪॥
ਜਿਸ ਤੇ ਸੁਤਾ ਨਾਨਕਾ ਜਾਗਾਏ ਸੋਈ ॥
ਜੇ ਘਰੁ ਬੂਝੈ ਆਪਣਾ ਤਾਂ ਨੀਦ ਨ ਹੋਈ ॥੫॥
ਜੇ ਚਲਦਾ ਲੈ ਚਲਿਆ ਕਿਛੁ ਸੰਪੈ ਨਾਲੇ ॥
ਤਾ ਧਨੁ ਸੰਚਹੁ ਦੇਖਿ ਕੈ ਬੂਝਹੁ ਬੀਚਾਰੇ ॥੬॥
ਵਣਜੁ ਕਰਹੁ ਮਖਸੂਦੁ ਲੈਹੁ ਮਤ ਪਛੋਤਾਵਹੁ ॥
ਅਉਗਣ ਛੋਡਹੁ ਗੁਣ ਕਰਹੁ ਐਸੇ ਤਤੁ ਪਰਾਵਹੁ ॥੭॥
ਧਰਮੁ ਭੂਮਿ ਸਤੁ ਬੀਜੁ ਕਰਿ ਐਸੀ ਕਿਰਸ ਕਮਾਵਹੁ ॥
ਤਾਂ ਵਾਪਾਰੀ ਜਾਣੀਅਹੁ ਲਾਹਾ ਲੈ ਜਾਵਹੁ ॥੮॥
ਕਰਮੁ ਹੋਵੈ ਸਤਿਗੁਰੁ ਮਿਲੈ ਬੂਝੈ ਬੀਚਾਰਾ ॥
ਨਾਮੁ ਵਖਾਣੈ ਸੁਣੇ ਨਾਮੁ ਨਾਮੇ ਬਿਉਹਾਰਾ ॥੯॥
ਜਿਉ ਲਾਹਾ ਤੋਟਾ ਤਿਵੈ ਵਾਟ ਚਲਦੀ ਆਈ ॥
ਜੋ ਤਿਸੁ ਭਾਵੈ ਨਾਨਕਾ ਸਾਈ ਵਡਿਆਈ ॥੧੦॥੧੩॥
ਆਸਾ ਕਾਫੀ ਮਹਲਾ ੧ ਘਰੁ ੮ ਅਸਟਪਦੀਆ ॥
ਜੈਸੇ ਗੋਇਲਿ ਗੋਇਲੀ ਤੈਸੇ ਸੰਸਾਰਾ ॥
ਕੂੜੁ ਕਮਾਵਹਿ ਆਦਮੀ ਬਾਂਧਹਿ ਘਰ ਬਾਰਾ ॥੧॥
ਜਾਗਹੁ ਜਾਗਹੁ ਸੂਤਿਹੋ ਚਲਿਆ ਵਣਜਾਰਾ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਨੀਤ ਨੀਤ ਘਰ ਬਾਂਧੀਅਹਿ ਜੇ ਰਹਣਾ ਹੋਈ ॥
ਪਿੰਡੁ ਪਵੈ ਜੀਉ ਚਲਸੀ ਜੇ ਜਾਣੈ ਕੋਈ ॥੨॥
ਓਹੀ ਓਹੀ ਕਿਆ ਕਰਹੁ ਹੈ ਹੋਸੀ ਸੋਈ ॥
ਤੁਮ ਰੋਵਹੁਗੇ ਓਸ ਨੋ ਤੁਮੑ ਕਉ ਕਉਣੁ ਰੋਈ ॥੩॥
ਧੰਧਾ ਪਿਟਿਹੁ ਭਾਈਹੋ ਤੁਮੑ ਕੂੜੁ ਕਮਾਵਹੁ ॥
ਓਹੁ ਨ ਸੁਣਈ ਕਤ ਹੀ ਤੁਮੑ ਲੋਕ ਸੁਣਾਵਹੁ ॥੪॥
ਜਿਸ ਤੇ ਸੁਤਾ ਨਾਨਕਾ ਜਾਗਾਏ ਸੋਈ ॥
ਜੇ ਘਰੁ ਬੂਝੈ ਆਪਣਾ ਤਾਂ ਨੀਦ ਨ ਹੋਈ ॥੫॥
ਜੇ ਚਲਦਾ ਲੈ ਚਲਿਆ ਕਿਛੁ ਸੰਪੈ ਨਾਲੇ ॥
ਤਾ ਧਨੁ ਸੰਚਹੁ ਦੇਖਿ ਕੈ ਬੂਝਹੁ ਬੀਚਾਰੇ ॥੬॥
ਵਣਜੁ ਕਰਹੁ ਮਖਸੂਦੁ ਲੈਹੁ ਮਤ ਪਛੋਤਾਵਹੁ ॥
ਅਉਗਣ ਛੋਡਹੁ ਗੁਣ ਕਰਹੁ ਐਸੇ ਤਤੁ ਪਰਾਵਹੁ ॥੭॥
ਧਰਮੁ ਭੂਮਿ ਸਤੁ ਬੀਜੁ ਕਰਿ ਐਸੀ ਕਿਰਸ ਕਮਾਵਹੁ ॥
ਤਾਂ ਵਾਪਾਰੀ ਜਾਣੀਅਹੁ ਲਾਹਾ ਲੈ ਜਾਵਹੁ ॥੮॥
ਕਰਮੁ ਹੋਵੈ ਸਤਿਗੁਰੁ ਮਿਲੈ ਬੂਝੈ ਬੀਚਾਰਾ ॥
ਨਾਮੁ ਵਖਾਣੈ ਸੁਣੇ ਨਾਮੁ ਨਾਮੇ ਬਿਉਹਾਰਾ ॥੯॥
ਜਿਉ ਲਾਹਾ ਤੋਟਾ ਤਿਵੈ ਵਾਟ ਚਲਦੀ ਆਈ ॥
ਜੋ ਤਿਸੁ ਭਾਵੈ ਨਾਨਕਾ ਸਾਈ ਵਡਿਆਈ ॥੧੦॥੧੩॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
आसा काफी महला १ घरु ८ असटपदीआ ॥
जैसे गोइलि गोइली तैसे संसारा ॥
कूड़ु कमावहि आदमी बांधहि घर बारा ॥१॥
जागहु जागहु सूतिहो चलिआ वणजारा ॥१॥ रहाउ ॥
नीत नीत घर बांधीअहि जे रहणा होई ॥
पिंडु पवै जीउ चलसी जे जाणै कोई ॥२॥
ओही ओही किआ करहु है होसी सोई ॥
तुम रोवहुगे ओस नो तुम॑ कउ कउणु रोई ॥३॥
धंधा पिटिहु भाईहो तुम॑ कूड़ु कमावहु ॥
ओहु न सुणई कत ही तुम॑ लोक सुणावहु ॥४॥
जिस ते सुता नानका जागाए सोई ॥
जे घरु बूझै आपणा तां नीद न होई ॥५॥
जे चलदा लै चलिआ किछु संपै नाले ॥
ता धनु संचहु देखि कै बूझहु बीचारे ॥६॥
वणजु करहु मखसूदु लैहु मत पछोतावहु ॥
अउगण छोडहु गुण करहु ऐसे ततु परावहु ॥७॥
धरमु भूमि सतु बीजु करि ऐसी किरस कमावहु ॥
तां वापारी जाणीअहु लाहा लै जावहु ॥८॥
करमु होवै सतिगुरु मिलै बूझै बीचारा ॥
नामु वखाणै सुणे नामु नामे बिउहारा ॥९॥
जिउ लाहा तोटा तिवै वाट चलदी आई ॥
जो तिसु भावै नानका साई वडिआई ॥१०॥१३॥
आसा काफी महला १ घरु ८ असटपदीआ ॥
जैसे गोइलि गोइली तैसे संसारा ॥
कूड़ु कमावहि आदमी बांधहि घर बारा ॥१॥
जागहु जागहु सूतिहो चलिआ वणजारा ॥१॥ रहाउ ॥
नीत नीत घर बांधीअहि जे रहणा होई ॥
पिंडु पवै जीउ चलसी जे जाणै कोई ॥२॥
ओही ओही किआ करहु है होसी सोई ॥
तुम रोवहुगे ओस नो तुम॑ कउ कउणु रोई ॥३॥
धंधा पिटिहु भाईहो तुम॑ कूड़ु कमावहु ॥
ओहु न सुणई कत ही तुम॑ लोक सुणावहु ॥४॥
जिस ते सुता नानका जागाए सोई ॥
जे घरु बूझै आपणा तां नीद न होई ॥५॥
जे चलदा लै चलिआ किछु संपै नाले ॥
ता धनु संचहु देखि कै बूझहु बीचारे ॥६॥
वणजु करहु मखसूदु लैहु मत पछोतावहु ॥
अउगण छोडहु गुण करहु ऐसे ततु परावहु ॥७॥
धरमु भूमि सतु बीजु करि ऐसी किरस कमावहु ॥
तां वापारी जाणीअहु लाहा लै जावहु ॥८॥
करमु होवै सतिगुरु मिलै बूझै बीचारा ॥
नामु वखाणै सुणे नामु नामे बिउहारा ॥९॥
जिउ लाहा तोटा तिवै वाट चलदी आई ॥
जो तिसु भावै नानका साई वडिआई ॥१०॥१३॥
हिन्दी अर्थ: ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। आसा काफी महला १ घरु ८ असटपदीआ ॥ जैसे कोई ग्वाला पराए चरागाह में (अपना माल-पशू चराने के लिए ले जाता है) वैसे ही इस जगत का काम है। जो आदमी (मौत को भुला के) पक्के घर मकान बनाते हैं।वे व्यर्थ उद्यम करते हैं। 1। (माया के मोह की नींद में) सोए हुए जीवो ! होश करो।होश करो।(तुम्हारे सामने तुम्हारा साथी) जीव-वणजारा (दुनिया से सदा के लिए) जा रहा है (इसी तरह) तुम्हारी बारी भी आएगी।परमात्मा को याद (रखो)। 1।रहाउ। सदा टिके रहने वाले घर तभी बनाए जाते हैं अगर यहाँ सदा टिके रहना हो। पर अगर कोई मनुष्य विचार करे (तो अस्लियत ये है कि) जब जीवात्मा यहाँ से चल पड़ती है तो शरीर भी गिर जाता है (ना शरीर रहता है ना जीवात्मा)। 2। (हे भाई ! किसी संबंधी के मरने पर) क्यूँ बेकार में ‘हाय ! हाय !’ करते हो।सदा-स्थिर तो परमात्मा ही है जो अब भी मौजूद है और सदा मौजूद रहेगा। यदि तुम (अपने) उस मरने वाले के मरने पर रोते हो तो (मरना तो तुमने भी है) तुम्हें भी कोई रोएगा। 3। हे भाई ! तुम (किसी के मरने पर रोने का) व्यर्थ चीख-चिहाड़ा डालते हो।व्यर्थ काम करते हो। जो मर गया है।वह तो तुम्हारा रोना बिल्कुल ही नहीं सुनता।तुम (लोकाचारी) सिर्फ लोगों को सुना रहे हो। 4। (जीव के भी क्या वश। ) हे नानक ! जिस परमात्मा के हुकम से जीव (माया के मोह में) सो रहा है।वही इसे जगाता है। (प्रभू की मेहर से) अगर जीव ये समझ ले कि मेरा असल घर कौन सा है तो उसे माया के मोह की नींद नहीं व्याप्ती। 5। यदि कोई मरने वाला मनुष्य मरने के समय अपने साथ कुछ धन ले के जाता है। तो तुम भी धन बेशक जोड़े चलो, हे भाई ! देख के विचार के समझो।। 6। (हे भाई ! नाम सिमरन का ऐसा) वणज-व्यापार करो।जिससे जीवन मनोरथ का लाभ कमा सको।नहीं तो पछताना ही पड़ेगा। बुरे काम छोड़ो।गुण ग्रहण करो।इस तरह असल (कमाई) कमाओ। 7। (हे भाई !) धर्म को धरती बनाओ।उसमें स्वच्छ आचरण के बीज बीजो।बस ! इस तरह की ही (आत्मिक जीवन को प्रफुल्लित करने वाली) खेती करो। अगर तुम (यहाँ से ऊँचे आत्मिक जीवन का) लाभ कमा के ले के जाओगे तो (समझदार) व्यापारी समझे जाओगे। 8। (जिस मनुष्य पर परमात्मा की) बख्शिश हो उसे गुरू मिलता है और वह इस विचार को समझता है। वह परमात्मा का नाम उचारता है।नाम सुनता है।और नाम में ही व्यवहार करता है। 9। संसार की ये यही रीति (सदा से) चली आई है।कोई (नाम में जुड़ के आत्मिक) लाभ कमाता है।(तो।कोई माया के मोह में फस के आत्मिक जीवन में) घाटा खाता है। हे नानक ! परमात्मा को जो अच्छा लगता है (वही होता है)।यही उसकी बुजुर्गीयत है। 10। 13।
ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੧ ॥
ਚਾਰੇ ਕੁੰਡਾ ਢੂਢੀਆ ਕੋ ਨੀਮੑੀ ਮੈਡਾ ॥
ਜੇ ਤੁਧੁ ਭਾਵੈ ਸਾਹਿਬਾ ਤੂ ਮੈ ਹਉ ਤੈਡਾ ॥੧॥
ਦਰੁ ਬੀਭਾ ਮੈ ਨੀਮਿੑ ਕੋ ਕੈ ਕਰੀ ਸਲਾਮੁ ॥
ਹਿਕੋ ਮੈਡਾ ਤੂ ਧਣੀ ਸਾਚਾ ਮੁਖਿ ਨਾਮੁ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਸਿਧਾ ਸੇਵਨਿ ਸਿਧ ਪੀਰ ਮਾਗਹਿ ਰਿਧਿ ਸਿਧਿ ॥
ਮੈ ਇਕੁ ਨਾਮੁ ਨ ਵੀਸਰੈ ਸਾਚੇ ਗੁਰ ਬੁਧਿ ॥੨॥
ਚਾਰੇ ਕੁੰਡਾ ਢੂਢੀਆ ਕੋ ਨੀਮੑੀ ਮੈਡਾ ॥
ਜੇ ਤੁਧੁ ਭਾਵੈ ਸਾਹਿਬਾ ਤੂ ਮੈ ਹਉ ਤੈਡਾ ॥੧॥
ਦਰੁ ਬੀਭਾ ਮੈ ਨੀਮਿੑ ਕੋ ਕੈ ਕਰੀ ਸਲਾਮੁ ॥
ਹਿਕੋ ਮੈਡਾ ਤੂ ਧਣੀ ਸਾਚਾ ਮੁਖਿ ਨਾਮੁ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਸਿਧਾ ਸੇਵਨਿ ਸਿਧ ਪੀਰ ਮਾਗਹਿ ਰਿਧਿ ਸਿਧਿ ॥
ਮੈ ਇਕੁ ਨਾਮੁ ਨ ਵੀਸਰੈ ਸਾਚੇ ਗੁਰ ਬੁਧਿ ॥੨॥
आसा महला १ ॥
चारे कुंडा ढूढीआ को नीम॑ी मैडा ॥
जे तुधु भावै साहिबा तू मै हउ तैडा ॥१॥
दरु बीभा मै नीमि॑ को कै करी सलामु ॥
हिको मैडा तू धणी साचा मुखि नामु ॥१॥ रहाउ ॥
सिधा सेवनि सिध पीर मागहि रिधि सिधि ॥
मै इकु नामु न वीसरै साचे गुर बुधि ॥२॥
चारे कुंडा ढूढीआ को नीम॑ी मैडा ॥
जे तुधु भावै साहिबा तू मै हउ तैडा ॥१॥
दरु बीभा मै नीमि॑ को कै करी सलामु ॥
हिको मैडा तू धणी साचा मुखि नामु ॥१॥ रहाउ ॥
सिधा सेवनि सिध पीर मागहि रिधि सिधि ॥
मै इकु नामु न वीसरै साचे गुर बुधि ॥२॥
हिन्दी अर्थ: आसा महला १ ॥ मैंने सारी सृष्टि तलाश के देख ली है।मुझे कोई भी अपना (सच्चा दर्दी) नहीं मिला। हे मेरे साहिब ! अगर तुझे (मेरी विनती) पसंद आए (तो मेहर कर) तू मेरा (रक्षक बन)।मैं तेरा (सेवक) बना रहूँ। 1। मुझे (तेरे दर के बिना) कोई और दर नहीं मिलता।और किसके आगे मैं सलाम करूँ।(और किससे मैं मांगूँ। ) सिर्फ एक तू ही मेरा मालिक है (मैं तुझसे ही ये दान माँगता हूँ कि) तेरा सदा स्थिर रहने वाला नाम मेरे मुंह में (टिका रहे)। 1।रहाउ। (लोग) सिद्ध और पीर (बनने के लिए) पहुँचे हुए जोगियों की सेवा करते हैं।और उनसे रिद्धियों-सिद्धियों (की ताकत) मांगते हैं। (मेरी एक तेरे आगे ही ये अरदास है कि) अभॅुल गुरू की बख्शी बुद्धि के अनुसार मुझे तेरा नाम कभी ना भूले। 2।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 418 है, राग आसा का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)।
गुरु नानक की वाणी, observational, direct, बिना ornament।
Nizamuddin dargah के बाहर qawwali सुनते-सुनते।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 41 पंक्तियों का है, 3 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 418” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: आसा राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 419 →, पीछे का: ← अंग 417।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।