Lulla Family

अंग 485

अंग
485
राग आसा
राग: आसा · रचयिता: Bhagat Naam Dev Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
आसा बाणी स्री नामदेउ जी की
एक अनेक बिआपक पूरक जत देखउ तत सोई ॥
माइआ चित्र बचित्र बिमोहित बिरला बूझै कोई ॥1॥
सभु गोबिंदु है सभु गोबिंदु है गोबिंद बिनु नही कोई ॥
सूतु एकु मणि सत सहंस जैसे ओति पोति प्रभु सोई ॥1॥ रहाउ ॥
जल तरंग अरु फेन बुदबुदा जल ते भिंन न होई ॥
इहु परपंचु पारब्रहम की लीला बिचरत आन न होई ॥2॥
मिथिआ भरमु अरु सुपन मनोरथ सति पदारथु जानिआ ॥
सुक्रित मनसा गुर उपदेसी जागत ही मनु मानिआ ॥3॥
कहत नामदेउ हरि की रचना देखहु रिदै बीचारी ॥
घट घट अंतरि सरब निरंतरि केवल एक मुरारी ॥4॥1॥
नामदेव की वाणी में मराठी और पंजाबी दोनों के असर हैं। आदि ग्रंथ में उनकी छियासठ रचनाएँ हैं, अधिकांश भक्ति-प्रधान।

हिन्दी अर्थ: ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। आसा बाणी श्री नामदेउ जी की एक परमात्मा अनेक रूप धार के हर जगह मौजूद है; मैं जिधर देखता हूँ।वह परमात्मा ही मौजूद है। पर (इस भेद को) कोई विरला आदमी ही समझता है।क्योंकि जीव आम तौर पर माया के रंग-बिरंगे रूपों में अच्छी तरह मोहे हुए हैं। 1। हर जगह परमात्मा है।हर जगह परमात्मा है।परमात्मा से वंचित (बची हुई) कोई जगह नहीं। जैसे एक धागा हो और (उसमें) सैकड़ों-हजारों मनके (परोए हुए हों) (इसी तरह सब जीवों में परमात्मा की ही जीवन-सत्ता मिली हुई है।जैसे) ताने पेटे में (धागे मिले हुए हैं।वैसे) वही परमात्मा (सब में मिला हुआ) है। 1।रहाउ। पानी की लहरें।झाग और बुलबुले- ये सारे पानी से अलग नहीं होते। वैसे ही ये दिखाई देता तमाशा-रूपी संसार परमात्मा की रची हुई खेल है।ध्यान से सोचने पर (ये समझ आ जाती है कि ये उससे) अलग नहीं। 2। (ये परपंच देख के जीवों को) गलत ख्याल बन गया है (कि इस का हमारा साथ पक्का निभने वाला है); ये पदार्थ यूँ ही हैं जैसे सुपने में देखे हुए पदार्थ; पर जीवों ने इन्हें सदा (अपने साथ) टिके रहने वाला ही समझ लिया है। जिस मनुष्य को सतिगुरू भली समझ बख्शता है वह इस वहिम में से जाग पड़ता है और उसके मन को तसल्ली हो जाती है (कि हमारा और इन पदार्थों का साथ सदा के लिए नहीं है)। 3। नामदेव कहता है, (हे भाई !) अपने हृदय में विचार के देख लो कि ये परमात्मा की रची हुई खेल है। इसमें हरेक घट के अंदर हर जगह सिर्फ एक परमात्मा ही बसता है। 4। 1।
आसा ॥
आनीले कुंभ भराईले ऊदक ठाकुर कउ इसनानु करउ ॥
बइआलीस लख जी जल महि होते बीठलु भैला काइ करउ ॥1॥
जत्र जाउ तत बीठलु भैला ॥
महा अनंद करे सद केला ॥1॥ रहाउ ॥
आनीले फूल परोईले माला ठाकुर की हउ पूज करउ ॥
पहिले बासु लई है भवरह बीठल भैला काइ करउ ॥2॥
आनीले दूधु रीधाईले खीरं ठाकुर कउ नैवेदु करउ ॥
पहिले दूधु बिटारिओ बछरै बीठलु भैला काइ करउ ॥3॥
ईभै बीठलु ऊभै बीठलु बीठल बिनु संसारु नही ॥
थान थनंतरि नामा प्रणवै पूरि रहिओ तूं सरब मही ॥4॥2॥
भगत नामदेव महाराष्ट्र के संत थे, तेरहवीं-चौदहवीं सदी के। पंढरपुर के विट्ठल-मन्दिर से जुड़े, मगर बाद में पंजाब आ कर बसे, और गुरुदासपुर के पास उनकी समाधि है।

हिन्दी अर्थ: आसा ॥ घड़ा ला के (उस में) पानी भरा के (अगर) मैं मूर्ति को स्नान कराऊँ (तो वह स्नान परवान नहीं।पानी झूठा है। क्योंकि) पानी में बयालिस लाख (जूनियों के) जीव रहते हैं।(पर मेरा) निर्लिप प्रभू तो पहले ही (उन जीवों में) बसता था (और स्नान कर रहा था।तो फिर मूर्ति को) मैं किस लिए स्नान करवाऊँ। 1। मैं जिधर जाता हूँ।उधर ही निर्लिप प्रभू मौजूद है (सब जीवों में व्यापक हो के) बड़े आनंद-चोज-तमाशे कर रहा है। 1।रहाउ। फूल ला के और उसकी माला परो के अगर मैं मूर्ति की पूजा करूँ (तो वह फूल झूठे होने के कारण वह पूजा परवान नहीं। क्योंकि उन फूलों की) सुगंधि तो पहले भौरे ने ले ली; (पर मेरा) बीठल तो पहले ही (उस भौरे में) बसता था (और सुगंधि ले रहा था।तो फिर इन फूलों से) मूर्ति की पूजा मैं किस लिए करूँ। 2। दूध ला के खीर पका के अगर मैं यह खाने वाला उत्तम पदार्थ मूर्ति के आगे भेटा रखूँ (तो दूध झूठा होने के कारण भोजन परवान नहीं। क्योंकि दूध दूहने के समय) पहले बछड़े ने दूध झूठा कर दिया था; (पर मेरा) बीठल तो पहले ही (उस बछड़े में) बसता था (और दूध पी रहा था।तो इस मूर्ति के आगे) मैं क्यों नैवेद भेटा करूँ। 3। (जगत में) नीचे ऊपर (हर जगह) बीठल ही बीठल है।बीठल से वंचित जगत रह ही नहीं सकता। नामदेव उस बीठल के आगे विनती करता है, (हे बीठल !) आप सारी सृष्टि में हर जगह पर भरपूर है। 4। 2।
आसा ॥
मनु मेरो गजु जिहबा मेरी काती ॥
मपि मपि काटउ जम की फासी ॥1॥
कहा करउ जाती कह करउ पाती ॥
राम को नामु जपउ दिन राती ॥1॥ रहाउ ॥
रांगनि रांगउ सीवनि सीवउ ॥
राम नाम बिनु घरीअ न जीवउ ॥2॥
भगति करउ हरि के गुन गावउ ॥
आठ पहर अपना खसमु धिआवउ ॥3॥
सुइने की सूई रुपे का धागा ॥
नामे का चितु हरि सउ लागा ॥4॥3॥
नामदेव की वाणी में मराठी और पंजाबी दोनों के असर हैं। आदि ग्रंथ में उनकी छियासठ रचनाएँ हैं, अधिकांश भक्ति-प्रधान।

हिन्दी अर्थ: आसा ॥ मेरा मन गज़ (बन गया है)।मेरी जीभ कैंची (बन गई है)। (प्रभू के नाम को मन में बसा के और जीभ से जप के) मैं (अपने मन रूपी गज़ से) नाप-नाप के (जीभ कैंची से) मौत के डर की फाही काटे जा रहा हूँ। 1। मुझे अब किसी (ऊँच-नीच) जाति-गोत की परवाह नहीं रही। क्योंकि मैं दिन-रात परमात्मा का नाम सिमरता हूँ। 1।रहाउ। (इस शरीर) मट्टी (रंगने वाले बर्तन) में मैं (अपने आप को नाम से) रंग रहा हूँ और प्रभू के नाम की सिलाई सी रहा हूँ। परमात्मा के नाम के बिना मैं एक घड़ी भर भी नहीं जी सकता। 2। मैं प्रभू की भक्ति कर रहा हूँ।हरी के गुण गा रहा हूँ। आठों पहर अपने पति-प्रभू को याद कर रहा हूँ। 3। मुझे (गुरू का शबद) सोने की सुई मिल गई है।(उसकी बरकति से मेरी सुरति शुद्ध-निर्मल हो गई है।ये।जैसे।मेरे पास) चाँदी का धागा है; (इस सुई-धागे से) मुझ नामे (नामदेव) का मन प्रभू के साथ सिला गया है। 4। 3।
आसा ॥
सापु कुंच छोडै बिखु नही छाडै ॥
उदक माहि जैसे बगु धिआनु माडै ॥1॥
काहे कउ कीजै धिआनु जपंना ॥
जब ते सुधु नाही मनु अपना ॥1॥ रहाउ ॥
सिंघच भोजनु जो नरु जानै ॥
ऐसे ही ठगदेउ बखानै ॥2॥
नामे के सुआमी लाहि ले झगरा ॥
भगत नामदेव महाराष्ट्र के संत थे, तेरहवीं-चौदहवीं सदी के। पंढरपुर के विट्ठल-मन्दिर से जुड़े, मगर बाद में पंजाब आ कर बसे, और गुरुदासपुर के पास उनकी समाधि है।

हिन्दी अर्थ: आसा ॥ साँप केंचुली उतार देता है पर अंदर से जहिर नही त्यागता; पानी में (खड़े हो के) जैसे बगुला समाधि लगाता है (इस तरह अगर अंदर तृष्णा है तो बाहर से भेख बनाने से आँखें बंद करने से कोई आत्मिक लाभ नहीं है)। 1। हे भाई ! जब तक (अंदर से) अपना मन पवित्र नहीं। तब तक समाधि लगाने व जाप करने का क्या लाभ है।रहाउ। जो मनुष्य जुलम वाली रोजी ही कमानी जानता है। (और बाहर से आँखे बंद करता है।जैसा समाधि लगाए बैठा हो) जगत ऐसे बंदे को बड़ा ठॅग कहता है। 2। हे नामदेव ! आपके मालिक प्रभू ने (आपके अंदर से ये पाखण्ड वाला) झगड़ा खत्म कर दिया है।

आसा राग में एक भोर की हलकी ताज़गी है। आसा दी वार इसी राग में बँधी, और सिख-संगीत के परिदृश्य को आकार दिया। हर सुबह, अमृतसर के हरमंदिर साहिब में, यही राग खुलता है। आसा राग का क्षेत्र है। ‘आसा दी वार’ की रचना गुरु नानक की है, बाद में गुरु अंगद और गुरु अर्जन के साथ संगठित हुई।

भगत नामदेव महाराष्ट्र के संत थे, तेरहवीं-चौदहवीं सदी के। पंढरपुर के विट्ठल-मन्दिर से जुड़े, मगर बाद में पंजाब आ कर बसे। उनकी वाणी में मराठी और पंजाबी दोनों के असर हैं।

इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है।”

एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।