अंग
435
राग आसा
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਪਹਿਲਾ ਫਾਹਾ ਪਇਆ ਪਾਧੇ ਪਿਛੋ ਦੇ ਗਲਿ ਚਾਟੜਿਆ ॥੫॥
ਸਸੈ ਸੰਜਮੁ ਗਇਓ ਮੂੜੇ ਏਕੁ ਦਾਨੁ ਤੁਧੁ ਕੁਥਾਇ ਲਇਆ ॥
ਸਾਈ ਪੁਤ੍ਰੀ ਜਜਮਾਨ ਕੀ ਸਾ ਤੇਰੀ ਏਤੁ ਧਾਨਿ ਖਾਧੈ ਤੇਰਾ ਜਨਮੁ ਗਇਆ ॥੬॥
ਮੰਮੈ ਮਤਿ ਹਿਰਿ ਲਈ ਤੇਰੀ ਮੂੜੇ ਹਉਮੈ ਵਡਾ ਰੋਗੁ ਪਇਆ ॥
ਅੰਤਰ ਆਤਮੈ ਬ੍ਰਹਮੁ ਨ ਚੀਨਿੑਆ ਮਾਇਆ ਕਾ ਮੁਹਤਾਜੁ ਭਇਆ ॥੭॥
ਕਕੈ ਕਾਮਿ ਕ੍ਰੋਧਿ ਭਰਮਿਓਹੁ ਮੂੜੇ ਮਮਤਾ ਲਾਗੇ ਤੁਧੁ ਹਰਿ ਵਿਸਰਿਆ ॥
ਪੜਹਿ ਗੁਣਹਿ ਤੂੰ ਬਹੁਤੁ ਪੁਕਾਰਹਿ ਵਿਣੁ ਬੂਝੇ ਤੂੰ ਡੂਬਿ ਮੁਆ ॥੮॥
ਤਤੈ ਤਾਮਸਿ ਜਲਿਓਹੁ ਮੂੜੇ ਥਥੈ ਥਾਨ ਭਰਿਸਟੁ ਹੋਆ ॥
ਘਘੈ ਘਰਿ ਘਰਿ ਫਿਰਹਿ ਤੂੰ ਮੂੜੇ ਦਦੈ ਦਾਨੁ ਨ ਤੁਧੁ ਲਇਆ ॥੯॥
ਪਪੈ ਪਾਰਿ ਨ ਪਵਹੀ ਮੂੜੇ ਪਰਪੰਚਿ ਤੂੰ ਪਲਚਿ ਰਹਿਆ ॥
ਸਚੈ ਆਪਿ ਖੁਆਇਓਹੁ ਮੂੜੇ ਇਹੁ ਸਿਰਿ ਤੇਰੈ ਲੇਖੁ ਪਇਆ ॥੧੦॥
ਭਭੈ ਭਵਜਲਿ ਡੁਬੋਹੁ ਮੂੜੇ ਮਾਇਆ ਵਿਚਿ ਗਲਤਾਨੁ ਭਇਆ ॥
ਗੁਰ ਪਰਸਾਦੀ ਏਕੋ ਜਾਣੈ ਏਕ ਘੜੀ ਮਹਿ ਪਾਰਿ ਪਇਆ ॥੧੧॥
ਵਵੈ ਵਾਰੀ ਆਈਆ ਮੂੜੇ ਵਾਸੁਦੇਉ ਤੁਧੁ ਵੀਸਰਿਆ ॥
ਏਹ ਵੇਲਾ ਨ ਲਹਸਹਿ ਮੂੜੇ ਫਿਰਿ ਤੂੰ ਜਮ ਕੈ ਵਸਿ ਪਇਆ ॥੧੨॥
ਝਝੈ ਕਦੇ ਨ ਝੂਰਹਿ ਮੂੜੇ ਸਤਿਗੁਰ ਕਾ ਉਪਦੇਸੁ ਸੁਣਿ ਤੂੰ ਵਿਖਾ ॥
ਸਤਿਗੁਰ ਬਾਝਹੁ ਗੁਰੁ ਨਹੀ ਕੋਈ ਨਿਗੁਰੇ ਕਾ ਹੈ ਨਾਉ ਬੁਰਾ ॥੧੩॥
ਧਧੈ ਧਾਵਤ ਵਰਜਿ ਰਖੁ ਮੂੜੇ ਅੰਤਰਿ ਤੇਰੈ ਨਿਧਾਨੁ ਪਇਆ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਹੋਵਹਿ ਤਾ ਹਰਿ ਰਸੁ ਪੀਵਹਿ ਜੁਗਾ ਜੁਗੰਤਰਿ ਖਾਹਿ ਪਇਆ ॥੧੪॥
ਗਗੈ ਗੋਬਿਦੁ ਚਿਤਿ ਕਰਿ ਮੂੜੇ ਗਲੀ ਕਿਨੈ ਨ ਪਾਇਆ ॥
ਗੁਰ ਕੇ ਚਰਨ ਹਿਰਦੈ ਵਸਾਇ ਮੂੜੇ ਪਿਛਲੇ ਗੁਨਹ ਸਭ ਬਖਸਿ ਲਇਆ ॥੧੫॥
ਹਾਹੈ ਹਰਿ ਕਥਾ ਬੂਝੁ ਤੂੰ ਮੂੜੇ ਤਾ ਸਦਾ ਸੁਖੁ ਹੋਈ ॥
ਮਨਮੁਖਿ ਪੜਹਿ ਤੇਤਾ ਦੁਖੁ ਲਾਗੈ ਵਿਣੁ ਸਤਿਗੁਰ ਮੁਕਤਿ ਨ ਹੋਈ ॥੧੬॥
ਰਾਰੈ ਰਾਮੁ ਚਿਤਿ ਕਰਿ ਮੂੜੇ ਹਿਰਦੈ ਜਿਨੑ ਕੈ ਰਵਿ ਰਹਿਆ ॥
ਗੁਰ ਪਰਸਾਦੀ ਜਿਨੑੀ ਰਾਮੁ ਪਛਾਤਾ ਨਿਰਗੁਣ ਰਾਮੁ ਤਿਨੑੀ ਬੂਝਿ ਲਹਿਆ ॥੧੭॥
ਤੇਰਾ ਅੰਤੁ ਨ ਜਾਈ ਲਖਿਆ ਅਕਥੁ ਨ ਜਾਈ ਹਰਿ ਕਥਿਆ ॥
ਨਾਨਕ ਜਿਨੑ ਕਉ ਸਤਿਗੁਰੁ ਮਿਲਿਆ ਤਿਨੑ ਕਾ ਲੇਖਾ ਨਿਬੜਿਆ ॥੧੮॥੧॥੨॥
ਸਸੈ ਸੰਜਮੁ ਗਇਓ ਮੂੜੇ ਏਕੁ ਦਾਨੁ ਤੁਧੁ ਕੁਥਾਇ ਲਇਆ ॥
ਸਾਈ ਪੁਤ੍ਰੀ ਜਜਮਾਨ ਕੀ ਸਾ ਤੇਰੀ ਏਤੁ ਧਾਨਿ ਖਾਧੈ ਤੇਰਾ ਜਨਮੁ ਗਇਆ ॥੬॥
ਮੰਮੈ ਮਤਿ ਹਿਰਿ ਲਈ ਤੇਰੀ ਮੂੜੇ ਹਉਮੈ ਵਡਾ ਰੋਗੁ ਪਇਆ ॥
ਅੰਤਰ ਆਤਮੈ ਬ੍ਰਹਮੁ ਨ ਚੀਨਿੑਆ ਮਾਇਆ ਕਾ ਮੁਹਤਾਜੁ ਭਇਆ ॥੭॥
ਕਕੈ ਕਾਮਿ ਕ੍ਰੋਧਿ ਭਰਮਿਓਹੁ ਮੂੜੇ ਮਮਤਾ ਲਾਗੇ ਤੁਧੁ ਹਰਿ ਵਿਸਰਿਆ ॥
ਪੜਹਿ ਗੁਣਹਿ ਤੂੰ ਬਹੁਤੁ ਪੁਕਾਰਹਿ ਵਿਣੁ ਬੂਝੇ ਤੂੰ ਡੂਬਿ ਮੁਆ ॥੮॥
ਤਤੈ ਤਾਮਸਿ ਜਲਿਓਹੁ ਮੂੜੇ ਥਥੈ ਥਾਨ ਭਰਿਸਟੁ ਹੋਆ ॥
ਘਘੈ ਘਰਿ ਘਰਿ ਫਿਰਹਿ ਤੂੰ ਮੂੜੇ ਦਦੈ ਦਾਨੁ ਨ ਤੁਧੁ ਲਇਆ ॥੯॥
ਪਪੈ ਪਾਰਿ ਨ ਪਵਹੀ ਮੂੜੇ ਪਰਪੰਚਿ ਤੂੰ ਪਲਚਿ ਰਹਿਆ ॥
ਸਚੈ ਆਪਿ ਖੁਆਇਓਹੁ ਮੂੜੇ ਇਹੁ ਸਿਰਿ ਤੇਰੈ ਲੇਖੁ ਪਇਆ ॥੧੦॥
ਭਭੈ ਭਵਜਲਿ ਡੁਬੋਹੁ ਮੂੜੇ ਮਾਇਆ ਵਿਚਿ ਗਲਤਾਨੁ ਭਇਆ ॥
ਗੁਰ ਪਰਸਾਦੀ ਏਕੋ ਜਾਣੈ ਏਕ ਘੜੀ ਮਹਿ ਪਾਰਿ ਪਇਆ ॥੧੧॥
ਵਵੈ ਵਾਰੀ ਆਈਆ ਮੂੜੇ ਵਾਸੁਦੇਉ ਤੁਧੁ ਵੀਸਰਿਆ ॥
ਏਹ ਵੇਲਾ ਨ ਲਹਸਹਿ ਮੂੜੇ ਫਿਰਿ ਤੂੰ ਜਮ ਕੈ ਵਸਿ ਪਇਆ ॥੧੨॥
ਝਝੈ ਕਦੇ ਨ ਝੂਰਹਿ ਮੂੜੇ ਸਤਿਗੁਰ ਕਾ ਉਪਦੇਸੁ ਸੁਣਿ ਤੂੰ ਵਿਖਾ ॥
ਸਤਿਗੁਰ ਬਾਝਹੁ ਗੁਰੁ ਨਹੀ ਕੋਈ ਨਿਗੁਰੇ ਕਾ ਹੈ ਨਾਉ ਬੁਰਾ ॥੧੩॥
ਧਧੈ ਧਾਵਤ ਵਰਜਿ ਰਖੁ ਮੂੜੇ ਅੰਤਰਿ ਤੇਰੈ ਨਿਧਾਨੁ ਪਇਆ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਹੋਵਹਿ ਤਾ ਹਰਿ ਰਸੁ ਪੀਵਹਿ ਜੁਗਾ ਜੁਗੰਤਰਿ ਖਾਹਿ ਪਇਆ ॥੧੪॥
ਗਗੈ ਗੋਬਿਦੁ ਚਿਤਿ ਕਰਿ ਮੂੜੇ ਗਲੀ ਕਿਨੈ ਨ ਪਾਇਆ ॥
ਗੁਰ ਕੇ ਚਰਨ ਹਿਰਦੈ ਵਸਾਇ ਮੂੜੇ ਪਿਛਲੇ ਗੁਨਹ ਸਭ ਬਖਸਿ ਲਇਆ ॥੧੫॥
ਹਾਹੈ ਹਰਿ ਕਥਾ ਬੂਝੁ ਤੂੰ ਮੂੜੇ ਤਾ ਸਦਾ ਸੁਖੁ ਹੋਈ ॥
ਮਨਮੁਖਿ ਪੜਹਿ ਤੇਤਾ ਦੁਖੁ ਲਾਗੈ ਵਿਣੁ ਸਤਿਗੁਰ ਮੁਕਤਿ ਨ ਹੋਈ ॥੧੬॥
ਰਾਰੈ ਰਾਮੁ ਚਿਤਿ ਕਰਿ ਮੂੜੇ ਹਿਰਦੈ ਜਿਨੑ ਕੈ ਰਵਿ ਰਹਿਆ ॥
ਗੁਰ ਪਰਸਾਦੀ ਜਿਨੑੀ ਰਾਮੁ ਪਛਾਤਾ ਨਿਰਗੁਣ ਰਾਮੁ ਤਿਨੑੀ ਬੂਝਿ ਲਹਿਆ ॥੧੭॥
ਤੇਰਾ ਅੰਤੁ ਨ ਜਾਈ ਲਖਿਆ ਅਕਥੁ ਨ ਜਾਈ ਹਰਿ ਕਥਿਆ ॥
ਨਾਨਕ ਜਿਨੑ ਕਉ ਸਤਿਗੁਰੁ ਮਿਲਿਆ ਤਿਨੑ ਕਾ ਲੇਖਾ ਨਿਬੜਿਆ ॥੧੮॥੧॥੨॥
पहिला फाहा पइआ पाधे पिछो दे गलि चाटड़िआ ॥५॥
ससै संजमु गइओ मूड़े एकु दानु तुधु कुथाइ लइआ ॥
साई पुत्री जजमान की सा तेरी एतु धानि खाधै तेरा जनमु गइआ ॥६॥
मंमै मति हिरि लई तेरी मूड़े हउमै वडा रोगु पइआ ॥
अंतर आतमै ब्रहमु न चीनि॑आ माइआ का मुहताजु भइआ ॥७॥
ककै कामि क्रोधि भरमिओहु मूड़े ममता लागे तुधु हरि विसरिआ ॥
पड़हि गुणहि तूं बहुतु पुकारहि विणु बूझे तूं डूबि मुआ ॥८॥
ततै तामसि जलिओहु मूड़े थथै थान भरिसटु होआ ॥
घघै घरि घरि फिरहि तूं मूड़े ददै दानु न तुधु लइआ ॥९॥
पपै पारि न पवही मूड़े परपंचि तूं पलचि रहिआ ॥
सचै आपि खुआइओहु मूड़े इहु सिरि तेरै लेखु पइआ ॥१०॥
भभै भवजलि डुबोहु मूड़े माइआ विचि गलतानु भइआ ॥
गुर परसादी एको जाणै एक घड़ी महि पारि पइआ ॥११॥
ववै वारी आईआ मूड़े वासुदेउ तुधु वीसरिआ ॥
एह वेला न लहसहि मूड़े फिरि तूं जम कै वसि पइआ ॥१२॥
झझै कदे न झूरहि मूड़े सतिगुर का उपदेसु सुणि तूं विखा ॥
सतिगुर बाझहु गुरु नही कोई निगुरे का है नाउ बुरा ॥१३॥
धधै धावत वरजि रखु मूड़े अंतरि तेरै निधानु पइआ ॥
गुरमुखि होवहि ता हरि रसु पीवहि जुगा जुगंतरि खाहि पइआ ॥१४॥
गगै गोबिदु चिति करि मूड़े गली किनै न पाइआ ॥
गुर के चरन हिरदै वसाइ मूड़े पिछले गुनह सभ बखसि लइआ ॥१५॥
हाहै हरि कथा बूझु तूं मूड़े ता सदा सुखु होई ॥
मनमुखि पड़हि तेता दुखु लागै विणु सतिगुर मुकति न होई ॥१६॥
रारै रामु चिति करि मूड़े हिरदै जिन॑ कै रवि रहिआ ॥
गुर परसादी जिन॑ी रामु पछाता निरगुण रामु तिन॑ी बूझि लहिआ ॥१७॥
तेरा अंतु न जाई लखिआ अकथु न जाई हरि कथिआ ॥
नानक जिन॑ कउ सतिगुरु मिलिआ तिन॑ का लेखा निबड़िआ ॥१८॥१॥२॥
ससै संजमु गइओ मूड़े एकु दानु तुधु कुथाइ लइआ ॥
साई पुत्री जजमान की सा तेरी एतु धानि खाधै तेरा जनमु गइआ ॥६॥
मंमै मति हिरि लई तेरी मूड़े हउमै वडा रोगु पइआ ॥
अंतर आतमै ब्रहमु न चीनि॑आ माइआ का मुहताजु भइआ ॥७॥
ककै कामि क्रोधि भरमिओहु मूड़े ममता लागे तुधु हरि विसरिआ ॥
पड़हि गुणहि तूं बहुतु पुकारहि विणु बूझे तूं डूबि मुआ ॥८॥
ततै तामसि जलिओहु मूड़े थथै थान भरिसटु होआ ॥
घघै घरि घरि फिरहि तूं मूड़े ददै दानु न तुधु लइआ ॥९॥
पपै पारि न पवही मूड़े परपंचि तूं पलचि रहिआ ॥
सचै आपि खुआइओहु मूड़े इहु सिरि तेरै लेखु पइआ ॥१०॥
भभै भवजलि डुबोहु मूड़े माइआ विचि गलतानु भइआ ॥
गुर परसादी एको जाणै एक घड़ी महि पारि पइआ ॥११॥
ववै वारी आईआ मूड़े वासुदेउ तुधु वीसरिआ ॥
एह वेला न लहसहि मूड़े फिरि तूं जम कै वसि पइआ ॥१२॥
झझै कदे न झूरहि मूड़े सतिगुर का उपदेसु सुणि तूं विखा ॥
सतिगुर बाझहु गुरु नही कोई निगुरे का है नाउ बुरा ॥१३॥
धधै धावत वरजि रखु मूड़े अंतरि तेरै निधानु पइआ ॥
गुरमुखि होवहि ता हरि रसु पीवहि जुगा जुगंतरि खाहि पइआ ॥१४॥
गगै गोबिदु चिति करि मूड़े गली किनै न पाइआ ॥
गुर के चरन हिरदै वसाइ मूड़े पिछले गुनह सभ बखसि लइआ ॥१५॥
हाहै हरि कथा बूझु तूं मूड़े ता सदा सुखु होई ॥
मनमुखि पड़हि तेता दुखु लागै विणु सतिगुर मुकति न होई ॥१६॥
रारै रामु चिति करि मूड़े हिरदै जिन॑ कै रवि रहिआ ॥
गुर परसादी जिन॑ी रामु पछाता निरगुण रामु तिन॑ी बूझि लहिआ ॥१७॥
तेरा अंतु न जाई लखिआ अकथु न जाई हरि कथिआ ॥
नानक जिन॑ कउ सतिगुरु मिलिआ तिन॑ का लेखा निबड़िआ ॥१८॥१॥२॥
हिन्दी अर्थ: उनके तहत तू सिर्फ माया की खातिर उम्र गुजार रहा है।पर अपने आप को पण्डित समझता और पण्डित कहलवाता है।निरी माया की खातिर दौड़-भाग छोड़।और) औरों (चेलों) को भी सिर्फ माया का लेखा-पत्रा ना सिखा।(सिर्फ माया का लेखा पढ़ने वाले) पण्डित ने पहले अपने गले में (माया की) फांसी डाली हुई है।फिर वही फांसी अपने विद्यार्थियों के गले में डाल देता है। 5। (अपने आप को पण्डित समझने वाले) हे मूख ! (निरी माया की खातिर पड़ने-पढ़ाने के कारण लालच-वश हो के) तू जीवन-जुगति भी गवा बैठा है।परोहित होने के कारण तू अपने जजमान से हर दिन-दिहाड़े के दान लेता है। (पर) एक दान तू अपने जजमान से गलत जगह पर लेता है।जजमान की बेटी तेरी ही बेटी है (बेटी के विवाह पर जजमान से दान लेना बेटी का पैसा खाना है)।ये अन्न खाने से (ये पैसा खाने से) तू अपना आत्मिक जीवन गवा लेता है। 6। हे मूर्ख ! (एक तरफ माया के लालच ने) तेरी लालच मारी हुई है (तुझे ‘कुथाय दान’-गलत जगह से दान लेने में भी संकोच नहीं।दूसरी तरफ) तुझे ये बड़ा आत्मिक रोग चिपका हुआ है कि मैं (विद्वान) हूँ।मैं (विद्वान) हूँ। तू अपने अंदर (बसते) परमात्मा को पहचान नहीं सका।(इस वास्ते तेरा स्वै) माया (के लालच) के अधीन है। 7। हेमूर्ख ! (औरों को समझाता) तू स्वयं काम वासना में।क्रोध में (फस के) गलत राह पर पड़ा हुआ है। तू (धर्म-पुस्तकें) पढ़ता है।अर्थ विचारता है।और औरों को सुनाता भी है।पर (सही जीवन राह) समझे बिना तू (लालच की बाढ़ में) डूब के आत्मिक मौत मर चुका है। 8। हेमूर्ख (पण्डित !) तू (अंदर से) क्रोध से जला हुआ है।तेरा हृदय-स्थल (लालच से) गंदा हुआ पड़ा है। हे मूर्ख ! तू हरेक (जजमान के) घर में (मायावी दक्षिणा के लिए तो) चलता फिरता है।पर प्रभू के नाम की दक्षिणा तूने अभी तक किसी से नहीं ली। 9। हे मूर्ख ! तू संसार (के मोह जाल) में (इतना) उलझ रहा है कि इस में से परले पासे नहीं पहुँच सकता। हे मूर्ख ! (तेरे अपने किए कर्मों के अनुसार) करतार ने तुझे (उसे) गलत राह पर डाल दिया है (जिधर तेरी रुची बनी हुई है।और) उनके किए कर्मों के संस्कारों के संचय का लेख तेरे माथे पे (इतना) करा पड़ा है (कि तुझे सही रास्ते की समझ नहीं रहती।पर तू औरों को सलाहें देता फिरता है)। 10। हे मूर्ख ! तू माया (के मोह) में इतना मस्त है कि तुझे और कुछ सूझता ही नहीं।तू संसार समुंद्र (की मोह की लहरों) में गोते खा रहा है (अपने बचाव के लिए तू कोई उद्यम नहीं करता)। (गुरू की शरण पड़ कर) गुरू की कृपा से जो मनुष्य परमात्मा से सांझ डालता है।वह इस संसार समुंद्र से एक पल में पार लांघ जाता है। 11। हेमूर्ख ! (सौभाग्य से) मानस जन्म (मिलने) की बारी आई थी।पर (इस अमोलक जनम में भी) तुझे परमात्मा भूला ही रहा। हे मूर्ख ! (अगर भटकता ही रहा तो) ये समय दुबारा नहीं मिलेगा (और माया के मोह में फसा रह के) तू जम के वश में पड़ जाएगा (जनम-मरण के चक्कर में पड़ जाएगा)। 12। हे मूर्ख ! तू पूरे गुरू का उपदेश धारण करके देख ले।(माया आदि की खातिर) तुझे कभी झुरना नहीं पड़ेगा (क्योंकि माया-मोह का जाल टूट जाएगा) पर अगर पूरे गुरू की शरण नहीं पड़ेगा तो कोई (रस्मी) गुरू (इन चिंताओं से सिसकियों से बचा) नहीं (सकता)। जो मनुष्य पूरे गुरू के बताए रास्ते पर नहीं चलता।(गलत रास्ते पर पड़ने के कारण) वह बदनामी ही कमाता है। 13। हेमूर्ख ! आत्मिक सुख का खजाना परमात्मा तेरे अंदर बस रहा है (पर।तू सुख की तलाश में बाहर भटकता फिरता है) बाहर भटकते मन को रोक के रख। अगर तू गुरू के बताए रास्ते पर चले तो (अंदर बसते) परमात्मा के नाम का रस पीएगा।सदा के लिए ये नाम रस बरसता रहेगा (कभी खत्म नहीं होगा)। 14। हे मूर्ख ! परमात्मा (के नाम) को अपने चित्त में बसा ले (तभी उससे मिलाप होगा)।सिर्फ बातों से किसी ने प्रभू को नहीं पाया। हे मूर्ख ! गुरू के चरण हृदय में टिकाए रख।पिछले किए हुए सारे पाप बख्शे जाएंगे। 15। हे मूर्ख ! अगर तू परमात्मा की सिफत सालाह करनी सीख ले तो तुझे सदा आत्मिक आनंद मिला रहे। अपने मन के पीछे चलने वाले बंदे जितना ही (प्रभू की सिफत सालाह से टूट के माया संबंधी और ही लेखे) पढ़ते रहते हैं।उतनी ही ज्यादा अशांति कमाते हैं।और गुरू की शरण के बिना (इस अशांति से) खलासी नहीं मिलती। 16। हे मूर्ख ! परमात्मा को अपने हृदय में बसाए रख।जिन लोगों के दिल में परमात्मा सदा बसता रहता है (जिन्हें प्रभू सदा याद है। उनकी संगति में रह के) गुरू की कृपा से जिन (और) लोगों ने परमात्मा के साथ सांझ डाली।उन्होंने माया से निर्लिप प्रभू (की अस्लियत) समझ के उस से मिलाप प्राप्त कर लिया। 17। हे प्रभू ! तेरे गुणों का अंत नहीं पाया जा सकता।परमात्मा का स्वरूप बयान से परे है।बयान नहीं किया जा सकता। हे नानक ! जिन्हें सतिगुरू मिल जाए (वह निरी माया के लेखे लिखने-पढ़ने की जगह परमात्मा की सिफत सालाह करने लग पड़ते हैं।इस तरह) उनके अंदर से माया के मोह के संस्कारों का हिसाब समाप्त हो जाता है। 18। 1। 2।
ਰਾਗੁ ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੧ ਛੰਤ ਘਰੁ ੧
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ਮੁੰਧ ਜੋਬਨਿ ਬਾਲੜੀਏ ਮੇਰਾ ਪਿਰੁ ਰਲੀਆਲਾ ਰਾਮ ॥
ਧਨ ਪਿਰ ਨੇਹੁ ਘਣਾ ਰਸਿ ਪ੍ਰੀਤਿ ਦਇਆਲਾ ਰਾਮ ॥
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ਮੁੰਧ ਜੋਬਨਿ ਬਾਲੜੀਏ ਮੇਰਾ ਪਿਰੁ ਰਲੀਆਲਾ ਰਾਮ ॥
ਧਨ ਪਿਰ ਨੇਹੁ ਘਣਾ ਰਸਿ ਪ੍ਰੀਤਿ ਦਇਆਲਾ ਰਾਮ ॥
रागु आसा महला १ छंत घरु १
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
मुंध जोबनि बालड़ीए मेरा पिरु रलीआला राम ॥
धन पिर नेहु घणा रसि प्रीति दइआला राम ॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
मुंध जोबनि बालड़ीए मेरा पिरु रलीआला राम ॥
धन पिर नेहु घणा रसि प्रीति दइआला राम ॥
हिन्दी अर्थ: रागु आसा महला १ छंत घरु १ ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। हे जोबन में मतवाली हुई अंजान युवती ! (अपने पति प्रभू को हृदय में बसा ले) प्यारा प्रभू ही आनंद का श्रोत है। जिस जीव-स्त्री से प्रभू-पति का ज्यादा प्रेम होता है वह बड़े चाव से दयालु प्रभू को प्यार करती है।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 435 है, राग आसा का हिस्सा। मुख्य रचयिता: Guru Amar Daas Ji।
Karwa Chauth की रात, चाँद का इंतज़ार, और बीच में हाथों की मेहंदी।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 31 पंक्तियों का है, 2 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 435” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: आसा राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 436 →, पीछे का: ← अंग 434।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।