अंग 437

अंग
437
राग आसा
राग: आसा · रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਕਰਿ ਮਜਨੋ ਸਪਤ ਸਰੇ ਮਨ ਨਿਰਮਲ ਮੇਰੇ ਰਾਮ ॥
ਨਿਰਮਲ ਜਲਿ ਨੑਾਏ ਜਾ ਪ੍ਰਭ ਭਾਏ ਪੰਚ ਮਿਲੇ ਵੀਚਾਰੇ ॥
ਕਾਮੁ ਕਰੋਧੁ ਕਪਟੁ ਬਿਖਿਆ ਤਜਿ ਸਚੁ ਨਾਮੁ ਉਰਿ ਧਾਰੇ ॥
ਹਉਮੈ ਲੋਭ ਲਹਰਿ ਲਬ ਥਾਕੇ ਪਾਏ ਦੀਨ ਦਇਆਲਾ ॥
ਨਾਨਕ ਗੁਰ ਸਮਾਨਿ ਤੀਰਥੁ ਨਹੀ ਕੋਈ ਸਾਚੇ ਗੁਰ ਗੋਪਾਲਾ ॥੩॥
ਹਉ ਬਨੁ ਬਨੋ ਦੇਖਿ ਰਹੀ ਤ੍ਰਿਣੁ ਦੇਖਿ ਸਬਾਇਆ ਰਾਮ ॥
ਤ੍ਰਿਭਵਣੋ ਤੁਝਹਿ ਕੀਆ ਸਭੁ ਜਗਤੁ ਸਬਾਇਆ ਰਾਮ ॥
ਤੇਰਾ ਸਭੁ ਕੀਆ ਤੂੰ ਥਿਰੁ ਥੀਆ ਤੁਧੁ ਸਮਾਨਿ ਕੋ ਨਾਹੀ ॥
ਤੂੰ ਦਾਤਾ ਸਭ ਜਾਚਿਕ ਤੇਰੇ ਤੁਧੁ ਬਿਨੁ ਕਿਸੁ ਸਾਲਾਹੀ ॥
ਅਣਮੰਗਿਆ ਦਾਨੁ ਦੀਜੈ ਦਾਤੇ ਤੇਰੀ ਭਗਤਿ ਭਰੇ ਭੰਡਾਰਾ ॥
ਰਾਮ ਨਾਮ ਬਿਨੁ ਮੁਕਤਿ ਨ ਹੋਈ ਨਾਨਕੁ ਕਹੈ ਵੀਚਾਰਾ ॥੪॥੨॥
करि मजनो सपत सरे मन निरमल मेरे राम ॥
निरमल जलि न॑ाए जा प्रभ भाए पंच मिले वीचारे ॥
कामु करोधु कपटु बिखिआ तजि सचु नामु उरि धारे ॥
हउमै लोभ लहरि लब थाके पाए दीन दइआला ॥
नानक गुर समानि तीरथु नही कोई साचे गुर गोपाला ॥३॥
हउ बनु बनो देखि रही त्रिणु देखि सबाइआ राम ॥
त्रिभवणो तुझहि कीआ सभु जगतु सबाइआ राम ॥
तेरा सभु कीआ तूं थिरु थीआ तुधु समानि को नाही ॥
तूं दाता सभ जाचिक तेरे तुधु बिनु किसु सालाही ॥
अणमंगिआ दानु दीजै दाते तेरी भगति भरे भंडारा ॥
राम नाम बिनु मुकति न होई नानकु कहै वीचारा ॥४॥२॥

हिन्दी अर्थ: (हे सहेली ! उसमें) पाँचों ज्ञानेंद्रियों को मन और बुद्धि समेत स्नान करा।तेरा मन पवित्र हो जाएगा। जीव (गुरू शबद रूप) पवित्र जल में तब ही स्नान कर सकता है जब प्रभू को अच्छा लगता है।(गुरू के शबद की) विचार की बरकति से इसे (सत-संतोख-दया-धर्म और धैर्य) पाँचों ही प्राप्त हो जाते हैं। और काम-क्रोध खोट (माया का मोह आदि) त्याग के जीव सदा-स्थिर प्रभू नाम को अपने हृदय में बसा लेता है। जो मनुष्य दीनों पे दया करने वाले परमात्मा को प्राप्त कर लेता है।उसके अंदर से अहंकार।लोभ की लहर।और लालच (आदि) समाप्त हो जाते हैं। हे नानक ! गुरू सदा-स्थिर प्रभू गोपाल का रूप है।गुरू जैसा और कोई तीर्थ नहीं। 3। हे प्रभू ! मैं हरेक जंगल देख चुकी हूँ।सारी बनस्पति को ताक चुकी हूँ (मुझे यकीन आ गया है कि) ये सारा जगत तूने ही पैदा किया है। ये तीनों भवन तेरे ही बनाए हुए हैं।सारा संसार तेरा ही बनाया हुआ है। (भले ही ये संसार तो नाशवंत है।पर) तू सदा कायम रहने वाला है।तेरे बराबर का और कोई नहीं। सारे जीव तेरे (दर पे) मंगते हैं।तू सबको दातें देने वाला है (दुनियां के पदार्थों के वास्ते) मैं तेरे बिना और किस की सिफत सालाह करूँ। हे दातार ! तू तो (जीवों के) माँगे बिना ही बख्शिशें किए जाता है (मुझे अपनी भक्ति की दाति दे) भक्ति की दाति से तेरे खजाने भरे पड़े हैं। नानक ये विचार की बात बताता है कि परमात्मा के नाम के बिना (लब-लोभ-काम-क्रोध आदि विकारों से) निजात नहीं मिल सकती। 4। 2।
ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੧ ॥
ਮੇਰਾ ਮਨੋ ਮੇਰਾ ਮਨੁ ਰਾਤਾ ਰਾਮ ਪਿਆਰੇ ਰਾਮ ॥
ਸਚੁ ਸਾਹਿਬੋ ਆਦਿ ਪੁਰਖੁ ਅਪਰੰਪਰੋ ਧਾਰੇ ਰਾਮ ॥
ਅਗਮ ਅਗੋਚਰੁ ਅਪਰ ਅਪਾਰਾ ਪਾਰਬ੍ਰਹਮੁ ਪਰਧਾਨੋ ॥
ਆਦਿ ਜੁਗਾਦੀ ਹੈ ਭੀ ਹੋਸੀ ਅਵਰੁ ਝੂਠਾ ਸਭੁ ਮਾਨੋ ॥
ਕਰਮ ਧਰਮ ਕੀ ਸਾਰ ਨ ਜਾਣੈ ਸੁਰਤਿ ਮੁਕਤਿ ਕਿਉ ਪਾਈਐ ॥
ਨਾਨਕ ਗੁਰਮੁਖਿ ਸਬਦਿ ਪਛਾਣੈ ਅਹਿਨਿਸਿ ਨਾਮੁ ਧਿਆਈਐ ॥੧॥
ਮੇਰਾ ਮਨੋ ਮੇਰਾ ਮਨੁ ਮਾਨਿਆ ਨਾਮੁ ਸਖਾਈ ਰਾਮ ॥
ਹਉਮੈ ਮਮਤਾ ਮਾਇਆ ਸੰਗਿ ਨ ਜਾਈ ਰਾਮ ॥
ਮਾਤਾ ਪਿਤ ਭਾਈ ਸੁਤ ਚਤੁਰਾਈ ਸੰਗਿ ਨ ਸੰਪੈ ਨਾਰੇ ॥
ਸਾਇਰ ਕੀ ਪੁਤ੍ਰੀ ਪਰਹਰਿ ਤਿਆਗੀ ਚਰਣ ਤਲੈ ਵੀਚਾਰੇ ॥
ਆਦਿ ਪੁਰਖਿ ਇਕੁ ਚਲਤੁ ਦਿਖਾਇਆ ਜਹ ਦੇਖਾ ਤਹ ਸੋਈ ॥
ਨਾਨਕ ਹਰਿ ਕੀ ਭਗਤਿ ਨ ਛੋਡਉ ਸਹਜੇ ਹੋਇ ਸੁ ਹੋਈ ॥੨॥
ਮੇਰਾ ਮਨੋ ਮੇਰਾ ਮਨੁ ਨਿਰਮਲੁ ਸਾਚੁ ਸਮਾਲੇ ਰਾਮ ॥
ਅਵਗਣ ਮੇਟਿ ਚਲੇ ਗੁਣ ਸੰਗਮ ਨਾਲੇ ਰਾਮ ॥
ਅਵਗਣ ਪਰਹਰਿ ਕਰਣੀ ਸਾਰੀ ਦਰਿ ਸਚੈ ਸਚਿਆਰੋ ॥
ਆਵਣੁ ਜਾਵਣੁ ਠਾਕਿ ਰਹਾਏ ਗੁਰਮੁਖਿ ਤਤੁ ਵੀਚਾਰੋ ॥
ਸਾਜਨੁ ਮੀਤੁ ਸੁਜਾਣੁ ਸਖਾ ਤੂੰ ਸਚਿ ਮਿਲੈ ਵਡਿਆਈ ॥
ਨਾਨਕ ਨਾਮੁ ਰਤਨੁ ਪਰਗਾਸਿਆ ਐਸੀ ਗੁਰਮਤਿ ਪਾਈ ॥੩॥
ਸਚੁ ਅੰਜਨੋ ਅੰਜਨੁ ਸਾਰਿ ਨਿਰੰਜਨਿ ਰਾਤਾ ਰਾਮ ॥
ਮਨਿ ਤਨਿ ਰਵਿ ਰਹਿਆ ਜਗਜੀਵਨੋ ਦਾਤਾ ਰਾਮ ॥
ਜਗਜੀਵਨੁ ਦਾਤਾ ਹਰਿ ਮਨਿ ਰਾਤਾ ਸਹਜਿ ਮਿਲੈ ਮੇਲਾਇਆ ॥
ਸਾਧ ਸਭਾ ਸੰਤਾ ਕੀ ਸੰਗਤਿ ਨਦਰਿ ਪ੍ਰਭੂ ਸੁਖੁ ਪਾਇਆ ॥
ਹਰਿ ਕੀ ਭਗਤਿ ਰਤੇ ਬੈਰਾਗੀ ਚੂਕੇ ਮੋਹ ਪਿਆਸਾ ॥
ਨਾਨਕ ਹਉਮੈ ਮਾਰਿ ਪਤੀਣੇ ਵਿਰਲੇ ਦਾਸ ਉਦਾਸਾ ॥੪॥੩॥
आसा महला १ ॥
मेरा मनो मेरा मनु राता राम पिआरे राम ॥
सचु साहिबो आदि पुरखु अपरंपरो धारे राम ॥
अगम अगोचरु अपर अपारा पारब्रहमु परधानो ॥
आदि जुगादी है भी होसी अवरु झूठा सभु मानो ॥
करम धरम की सार न जाणै सुरति मुकति किउ पाईऐ ॥
नानक गुरमुखि सबदि पछाणै अहिनिसि नामु धिआईऐ ॥१॥
मेरा मनो मेरा मनु मानिआ नामु सखाई राम ॥
हउमै ममता माइआ संगि न जाई राम ॥
माता पित भाई सुत चतुराई संगि न संपै नारे ॥
साइर की पुत्री परहरि तिआगी चरण तलै वीचारे ॥
आदि पुरखि इकु चलतु दिखाइआ जह देखा तह सोई ॥
नानक हरि की भगति न छोडउ सहजे होइ सु होई ॥२॥
मेरा मनो मेरा मनु निरमलु साचु समाले राम ॥
अवगण मेटि चले गुण संगम नाले राम ॥
अवगण परहरि करणी सारी दरि सचै सचिआरो ॥
आवणु जावणु ठाकि रहाए गुरमुखि ततु वीचारो ॥
साजनु मीतु सुजाणु सखा तूं सचि मिलै वडिआई ॥
नानक नामु रतनु परगासिआ ऐसी गुरमति पाई ॥३॥
सचु अंजनो अंजनु सारि निरंजनि राता राम ॥
मनि तनि रवि रहिआ जगजीवनो दाता राम ॥
जगजीवनु दाता हरि मनि राता सहजि मिलै मेलाइआ ॥
साध सभा संता की संगति नदरि प्रभू सुखु पाइआ ॥
हरि की भगति रते बैरागी चूके मोह पिआसा ॥
नानक हउमै मारि पतीणे विरले दास उदासा ॥४॥३॥

हिन्दी अर्थ: आसा महला १ ॥ (गुरू की शरण पड़ के शबद में जुड़ के) मेरा मन उस प्यारे प्रभू के नाम-रंग से रंगा गया है जो सदा-स्थिर रहने वाला है जो सबका मालिक है। जो सबका आदि है।जो सब में व्यापक है जिससे परे और कोई नहीं और जो सबको आसरा देता है। वह परमात्मा अपहुँच है।मनुष्य की ज्ञानेद्रियों की उस तक पहुँच नहीं हो सकती।उससे परे और कोई नहीं।बेअंत है और सबसे बड़ा है। सृष्टि के आरम्भ से जुगों के आरम्भ से चला आ रहा है।अब भी मौजूद है सदा के लिए मौजूद रहेगा।(हे भाई !) और सारे संसार को नाशवंत जानो। मेरा मन शास्त्रों के बताए हुए धार्मिक कर्मों की सार नहीं जानता।मेरे मन को ये सुरति भी नहीं है कि मुक्ति कैसे मिलती है। हे नानक ! गुरू की शरण पड़ के गुरू के शबद में जुड़ के मेरा मन यही पहचानता है कि दिन-रात परमात्मा का नाम सिमरना चाहिए। 1। (गुरू की शरण पड़ के) मेरा मन मान चुका है कि परमात्मा का नाम ही (असल) साथी है माया की ममता और अहंकार मनुष्य के साथ नहीं जाते। माता-पिता-भाई-पुत्र-धन-स्त्री-दुनिया वाली चतुराई (सदा के लिए) साथी नहीं बन सकते। (इस वास्ते) गुरू के शबद के विचार की बरकति से मैंने माया का मोह बिल्कुल ही त्याग दिया है।और इसे अपने पैरों के नीचे रखा हुआ है (भाव।अपने ऊपर इसका प्रभाव नहीं पड़ने देता)। (मुझे यह यकीन हो गया है कि) आदि पुरखु ने (जगत रूप) एक तमाशा दिखा दिया है।मैं जिधर देखता हूँ उधरवह परमात्मा ही मुझे दिखता है। हे नानक ! (कह,) मैं परमात्मा की भक्ति (कभी) नहीं भुलाता (मुझे विश्वास है कि) जगत में जो कुछ हो रहा है अपने आप ही प्रभू की रजा में हो रहा है। 2। सदा-स्थिर परमात्मा का नाम (हृदय में) संभाल के मेरा मन पवित्र हो गया है। (जीवन-राह में) मैं अवगुण (अपने अंदर से) मिटा केचल रहा हूँ।मेरे साथ गुणों का साथ बन गया है। जो मनुष्य गुरू के द्वारा अवगुण त्याग के (नाम सिमरन की) श्रेष्ठ करणी करता है वह सदा-स्थिर प्रभू के दर पर सच्चा माना जाता है। वह मनुष्य अपने जनम-मरण का चक्कर मिटा लेता है।वह जगत के मूल को अपने सोच मण्डल में टिकाए रखता है। हे प्रभू ! तू ही मेरा सज्जन है तू ही मेरा मित्र है तू ही मेरे दिल की जानने वाला साथी है।तेरे सदा-स्थिर नाम में जुड़ने से (तेरे दर पे) आदर मिलता है। हे नानक ! (कह,) मुझे गुरू की ऐसी मति प्राप्त हुई है कि मेरे हृदय में परमात्मा का श्रेष्ठ नाम प्रगट हो गया है। 3। (प्रभू के ज्ञान का) सुरमा डाल के मेरा मन माया-रहित परमात्मा के नाम में रंगा गया है। जगत का जीवन व सभी दातें देने वाला प्रभू मेरे मन में मेरे हृदय में हर वक्त मौजूद रहता है।(गुरू के द्वारा) जगत का जीवन और सबको दातें देने वाला परमात्मा मन में बस जाता है। मन उसके नाम-रंग में रंगा जाता है और मन आत्मिक अडोलता में टिक जाता है। गुरमुखों की संगति में रहने से परमात्मा की मेहर की निगाह से आत्मिक आनंद प्राप्त होता है। जो परमात्मा की भक्ति के रंग में रंग के माया के मोह से निर्लिप रहते हैं। जिनके अंदर से मोह और तृष्णा खत्म हो जाते हैं। हे नानक ! जगत में ऐसे विरले लोग हैंजो अहंकार को मार के परमात्मा के नाम में सदा ही लिप्त रहते हैं। 4। 3।

संदर्भ: यह अंग 437 है, राग आसा का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)।

गुरु नानक की वाणी, observational, direct, बिना ornament।

Janmashtami की मधुर रात, मंदिर में 12 बजे का दर्शन।

ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।

यह अंग कुल 36 पंक्तियों का है, 2 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 437” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।

राग के context में: आसा राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।

पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।

अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।

“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।

नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।

अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।

तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।

हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।

ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।

दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।

“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।

हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।

अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।

आगे का अंग: अंग 438 →, पीछे का: ← अंग 436

हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।

(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)

शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।

संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।

शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।

संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।

एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।

अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।

स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।