अंग
420
राग आसा
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਹੁਕਮੀ ਪੈਧਾ ਜਾਇ ਦਰਗਹ ਭਾਣੀਐ ॥
ਹੁਕਮੇ ਹੀ ਸਿਰਿ ਮਾਰ ਬੰਦਿ ਰਬਾਣੀਐ ॥੫॥
ਲਾਹਾ ਸਚੁ ਨਿਆਉ ਮਨਿ ਵਸਾਈਐ ॥
ਲਿਖਿਆ ਪਲੈ ਪਾਇ ਗਰਬੁ ਵਞਾਈਐ ॥੬॥
ਮਨਮੁਖੀਆ ਸਿਰਿ ਮਾਰ ਵਾਦਿ ਖਪਾਈਐ ॥
ਠਗਿ ਮੁਠੀ ਕੂੜਿਆਰ ਬੰਨਿੑ ਚਲਾਈਐ ॥੭॥
ਸਾਹਿਬੁ ਰਿਦੈ ਵਸਾਇ ਨ ਪਛੋਤਾਵਹੀ ॥
ਗੁਨਹਾਂ ਬਖਸਣਹਾਰੁ ਸਬਦੁ ਕਮਾਵਹੀ ॥੮॥
ਨਾਨਕੁ ਮੰਗੈ ਸਚੁ ਗੁਰਮੁਖਿ ਘਾਲੀਐ ॥
ਮੈ ਤੁਝ ਬਿਨੁ ਅਵਰੁ ਨ ਕੋਇ ਨਦਰਿ ਨਿਹਾਲੀਐ ॥੯॥੧੬॥
ਹੁਕਮੇ ਹੀ ਸਿਰਿ ਮਾਰ ਬੰਦਿ ਰਬਾਣੀਐ ॥੫॥
ਲਾਹਾ ਸਚੁ ਨਿਆਉ ਮਨਿ ਵਸਾਈਐ ॥
ਲਿਖਿਆ ਪਲੈ ਪਾਇ ਗਰਬੁ ਵਞਾਈਐ ॥੬॥
ਮਨਮੁਖੀਆ ਸਿਰਿ ਮਾਰ ਵਾਦਿ ਖਪਾਈਐ ॥
ਠਗਿ ਮੁਠੀ ਕੂੜਿਆਰ ਬੰਨਿੑ ਚਲਾਈਐ ॥੭॥
ਸਾਹਿਬੁ ਰਿਦੈ ਵਸਾਇ ਨ ਪਛੋਤਾਵਹੀ ॥
ਗੁਨਹਾਂ ਬਖਸਣਹਾਰੁ ਸਬਦੁ ਕਮਾਵਹੀ ॥੮॥
ਨਾਨਕੁ ਮੰਗੈ ਸਚੁ ਗੁਰਮੁਖਿ ਘਾਲੀਐ ॥
ਮੈ ਤੁਝ ਬਿਨੁ ਅਵਰੁ ਨ ਕੋਇ ਨਦਰਿ ਨਿਹਾਲੀਐ ॥੯॥੧੬॥
हुकमी पैधा जाइ दरगह भाणीऐ ॥
हुकमे ही सिरि मार बंदि रबाणीऐ ॥५॥
लाहा सचु निआउ मनि वसाईऐ ॥
लिखिआ पलै पाइ गरबु वञाईऐ ॥६॥
मनमुखीआ सिरि मार वादि खपाईऐ ॥
ठगि मुठी कूड़िआर बंनि॑ चलाईऐ ॥७॥
साहिबु रिदै वसाइ न पछोतावही ॥
गुनहां बखसणहारु सबदु कमावही ॥८॥
नानकु मंगै सचु गुरमुखि घालीऐ ॥
मै तुझ बिनु अवरु न कोइ नदरि निहालीऐ ॥९॥१६॥
हुकमे ही सिरि मार बंदि रबाणीऐ ॥५॥
लाहा सचु निआउ मनि वसाईऐ ॥
लिखिआ पलै पाइ गरबु वञाईऐ ॥६॥
मनमुखीआ सिरि मार वादि खपाईऐ ॥
ठगि मुठी कूड़िआर बंनि॑ चलाईऐ ॥७॥
साहिबु रिदै वसाइ न पछोतावही ॥
गुनहां बखसणहारु सबदु कमावही ॥८॥
नानकु मंगै सचु गुरमुखि घालीऐ ॥
मै तुझ बिनु अवरु न कोइ नदरि निहालीऐ ॥९॥१६॥
हिन्दी अर्थ: परमात्मा की रजा में ही (ममता-मोह विसार के) जीव यहाँ से इज्जत कमा के जाता है और प्रभू की दरगाह में भी आदर पाता है। प्रभू की रजा में ही (ममता-मोह में फसने के कारण) जीवों को सिर पर मार पड़ती है और (जनम-मरण की) ईश्वरीय कैद में जीव पड़ते हैं। 3। 4। 5। अगर ये बात मन में बसा लें कि (हर जगह) परमात्मा का न्याय बरत रहा है।तो सदा-स्थिर प्रभू का नाम-लाभ कमा लेते हैं। (पर किसी अपनी चतुराई के उद्यम का) गुमान दूर कर देना चाहिए।(प्रभू की रजा में ही) हरेक जीव अपने किए कर्मों के संस्कारों के अनुसार प्राप्ति करता है। 6। जो जीव-स्त्री अपने मन की अगुवाई में चलती है उसके सिर पर (जनम-मरण के चक्कर की) मार है।वह (ममता मोह के) झगड़े में ख्वार होती है। झूठ की व्यापारिन जीव-स्त्री (ममता-मोह में ही) ठॅगी जाती है लुटी जाती है।(मोह की फाही में बंधी हुई ही यहाँ से परलोक की तरफ भेज दी जाती है)। 7। हे भाई ! मालिक प्रभू को अपने हृदय में बसा।(अंत में) पछताना नहीं पड़ेगा। उस प्रभू की सिफत सालाह कर।वह सारे गुनाह बख्शने वाला है। 8। हे प्रभू ! नानक तेरा सदा-स्थिर नाम मांगता है।(तेरी मेहर हो तो) गुरू की शरण पड़ के मैं ये घाल-कमाई करूँ। तेरे बिना मेरा कोई और आसरा नहीं।मेरी तरफ अपनी मेहर भरी निगाह से देख। 9। 16।
ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੧ ॥
ਕਿਆ ਜੰਗਲੁ ਢੂਢੀ ਜਾਇ ਮੈ ਘਰਿ ਬਨੁ ਹਰੀਆਵਲਾ ॥
ਸਚਿ ਟਿਕੈ ਘਰਿ ਆਇ ਸਬਦਿ ਉਤਾਵਲਾ ॥੧॥
ਜਹ ਦੇਖਾ ਤਹ ਸੋਇ ਅਵਰੁ ਨ ਜਾਣੀਐ ॥
ਗੁਰ ਕੀ ਕਾਰ ਕਮਾਇ ਮਹਲੁ ਪਛਾਣੀਐ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਆਪਿ ਮਿਲਾਵੈ ਸਚੁ ਤਾ ਮਨਿ ਭਾਵਈ ॥
ਚਲੈ ਸਦਾ ਰਜਾਇ ਅੰਕਿ ਸਮਾਵਈ ॥੨॥
ਸਚਾ ਸਾਹਿਬੁ ਮਨਿ ਵਸੈ ਵਸਿਆ ਮਨਿ ਸੋਈ ॥
ਆਪੇ ਦੇ ਵਡਿਆਈਆ ਦੇ ਤੋਟਿ ਨ ਹੋਈ ॥੩॥
ਅਬੇ ਤਬੇ ਕੀ ਚਾਕਰੀ ਕਿਉ ਦਰਗਹ ਪਾਵੈ ॥
ਪਥਰ ਕੀ ਬੇੜੀ ਜੇ ਚੜੈ ਭਰ ਨਾਲਿ ਬੁਡਾਵੈ ॥੪॥
ਆਪਨੜਾ ਮਨੁ ਵੇਚੀਐ ਸਿਰੁ ਦੀਜੈ ਨਾਲੇ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਵਸਤੁ ਪਛਾਣੀਐ ਅਪਨਾ ਘਰੁ ਭਾਲੇ ॥੫॥
ਜੰਮਣ ਮਰਣਾ ਆਖੀਐ ਤਿਨਿ ਕਰਤੈ ਕੀਆ ॥
ਆਪੁ ਗਵਾਇਆ ਮਰਿ ਰਹੇ ਫਿਰਿ ਮਰਣੁ ਨ ਥੀਆ ॥੬॥
ਸਾਈ ਕਾਰ ਕਮਾਵਣੀ ਧੁਰ ਕੀ ਫੁਰਮਾਈ ॥
ਜੇ ਮਨੁ ਸਤਿਗੁਰ ਦੇ ਮਿਲੈ ਕਿਨਿ ਕੀਮਤਿ ਪਾਈ ॥੭॥
ਰਤਨਾ ਪਾਰਖੁ ਸੋ ਧਣੀ ਤਿਨਿ ਕੀਮਤਿ ਪਾਈ ॥
ਨਾਨਕ ਸਾਹਿਬੁ ਮਨਿ ਵਸੈ ਸਚੀ ਵਡਿਆਈ ॥੮॥੧੭॥
ਕਿਆ ਜੰਗਲੁ ਢੂਢੀ ਜਾਇ ਮੈ ਘਰਿ ਬਨੁ ਹਰੀਆਵਲਾ ॥
ਸਚਿ ਟਿਕੈ ਘਰਿ ਆਇ ਸਬਦਿ ਉਤਾਵਲਾ ॥੧॥
ਜਹ ਦੇਖਾ ਤਹ ਸੋਇ ਅਵਰੁ ਨ ਜਾਣੀਐ ॥
ਗੁਰ ਕੀ ਕਾਰ ਕਮਾਇ ਮਹਲੁ ਪਛਾਣੀਐ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਆਪਿ ਮਿਲਾਵੈ ਸਚੁ ਤਾ ਮਨਿ ਭਾਵਈ ॥
ਚਲੈ ਸਦਾ ਰਜਾਇ ਅੰਕਿ ਸਮਾਵਈ ॥੨॥
ਸਚਾ ਸਾਹਿਬੁ ਮਨਿ ਵਸੈ ਵਸਿਆ ਮਨਿ ਸੋਈ ॥
ਆਪੇ ਦੇ ਵਡਿਆਈਆ ਦੇ ਤੋਟਿ ਨ ਹੋਈ ॥੩॥
ਅਬੇ ਤਬੇ ਕੀ ਚਾਕਰੀ ਕਿਉ ਦਰਗਹ ਪਾਵੈ ॥
ਪਥਰ ਕੀ ਬੇੜੀ ਜੇ ਚੜੈ ਭਰ ਨਾਲਿ ਬੁਡਾਵੈ ॥੪॥
ਆਪਨੜਾ ਮਨੁ ਵੇਚੀਐ ਸਿਰੁ ਦੀਜੈ ਨਾਲੇ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਵਸਤੁ ਪਛਾਣੀਐ ਅਪਨਾ ਘਰੁ ਭਾਲੇ ॥੫॥
ਜੰਮਣ ਮਰਣਾ ਆਖੀਐ ਤਿਨਿ ਕਰਤੈ ਕੀਆ ॥
ਆਪੁ ਗਵਾਇਆ ਮਰਿ ਰਹੇ ਫਿਰਿ ਮਰਣੁ ਨ ਥੀਆ ॥੬॥
ਸਾਈ ਕਾਰ ਕਮਾਵਣੀ ਧੁਰ ਕੀ ਫੁਰਮਾਈ ॥
ਜੇ ਮਨੁ ਸਤਿਗੁਰ ਦੇ ਮਿਲੈ ਕਿਨਿ ਕੀਮਤਿ ਪਾਈ ॥੭॥
ਰਤਨਾ ਪਾਰਖੁ ਸੋ ਧਣੀ ਤਿਨਿ ਕੀਮਤਿ ਪਾਈ ॥
ਨਾਨਕ ਸਾਹਿਬੁ ਮਨਿ ਵਸੈ ਸਚੀ ਵਡਿਆਈ ॥੮॥੧੭॥
आसा महला १ ॥
किआ जंगलु ढूढी जाइ मै घरि बनु हरीआवला ॥
सचि टिकै घरि आइ सबदि उतावला ॥१॥
जह देखा तह सोइ अवरु न जाणीऐ ॥
गुर की कार कमाइ महलु पछाणीऐ ॥१॥ रहाउ ॥
आपि मिलावै सचु ता मनि भावई ॥
चलै सदा रजाइ अंकि समावई ॥२॥
सचा साहिबु मनि वसै वसिआ मनि सोई ॥
आपे दे वडिआईआ दे तोटि न होई ॥३॥
अबे तबे की चाकरी किउ दरगह पावै ॥
पथर की बेड़ी जे चड़ै भर नालि बुडावै ॥४॥
आपनड़ा मनु वेचीऐ सिरु दीजै नाले ॥
गुरमुखि वसतु पछाणीऐ अपना घरु भाले ॥५॥
जंमण मरणा आखीऐ तिनि करतै कीआ ॥
आपु गवाइआ मरि रहे फिरि मरणु न थीआ ॥६॥
साई कार कमावणी धुर की फुरमाई ॥
जे मनु सतिगुर दे मिलै किनि कीमति पाई ॥७॥
रतना पारखु सो धणी तिनि कीमति पाई ॥
नानक साहिबु मनि वसै सची वडिआई ॥८॥१७॥
किआ जंगलु ढूढी जाइ मै घरि बनु हरीआवला ॥
सचि टिकै घरि आइ सबदि उतावला ॥१॥
जह देखा तह सोइ अवरु न जाणीऐ ॥
गुर की कार कमाइ महलु पछाणीऐ ॥१॥ रहाउ ॥
आपि मिलावै सचु ता मनि भावई ॥
चलै सदा रजाइ अंकि समावई ॥२॥
सचा साहिबु मनि वसै वसिआ मनि सोई ॥
आपे दे वडिआईआ दे तोटि न होई ॥३॥
अबे तबे की चाकरी किउ दरगह पावै ॥
पथर की बेड़ी जे चड़ै भर नालि बुडावै ॥४॥
आपनड़ा मनु वेचीऐ सिरु दीजै नाले ॥
गुरमुखि वसतु पछाणीऐ अपना घरु भाले ॥५॥
जंमण मरणा आखीऐ तिनि करतै कीआ ॥
आपु गवाइआ मरि रहे फिरि मरणु न थीआ ॥६॥
साई कार कमावणी धुर की फुरमाई ॥
जे मनु सतिगुर दे मिलै किनि कीमति पाई ॥७॥
रतना पारखु सो धणी तिनि कीमति पाई ॥
नानक साहिबु मनि वसै सची वडिआई ॥८॥१७॥
हिन्दी अर्थ: आसा महला १ ॥ (जब गुरू की कार कमा के गुरू द्वारा बताए रास्ते पर चल केहर जगह प्रभू का निवास पहचान सकते हैं तो) मैं जंगलों में जा के क्यों (परमात्मा को मिलने के लिए) ढूँढू।जिस मनुष्य को परमात्मा हर जगह दिखाई दे जाए उसे घर में हरा-भरा जंगल (दिखता है।उसे घर में जंगल में हर जगह प्रभू ही नजर आता है)। जो मनुष्य गुरू के शबद के द्वारा सदा-स्थिर प्रभू में टिकता है।परमात्मा तुरंत उसके हृदय-घर में आ बसता है। 1। मैं जिधर भी देखता हूँ।मुझे उधरवह (परमात्मा) ही दिखता है।(ये कभी) नहीं समझना चाहिए (कि उस प्रभू के बिना) कोई और (भी उस जैसा जगत में मौजूद) है। गुरू की बताई कार कमा के (हर जगह परमात्मा का) ठिकाना (निवास) पहचान लेते हैं। 1।रहाउ। जब सदा-स्थिर प्रभू स्वयं (किसी जीव को अपने चरणों में) मिलाता है तबवह उस जीव के मन में प्यारा लगने लगता है। वह जीव सदा उसकी रजा में चलता है।और उसकी गोद में लीन हो जाता है। 2। सदा-स्थिर मालिक जिस मनुष्य के मन में बस जाता है।उस मनुष्य को अपने मन में बसा हुआ वही प्रभू (हर जगह दिखता है)। (उसको ये निश्चय हो जाता है कि) प्रभू खुद ही आदर-सत्कार व गुण (वडिआईआं) देता है (और उसके खजाने में इतनी वडिआईयां है कि) देते हुए वह कम नहीं होतीं। 3। (गुरू की बताई कार-कमाई छोड़ के) धड़े-धड़े की खुशामद करने से परमात्मा की हजूरी प्राप्त नहीं हो सकती। (धिर-धिर की खुशामद करना यूँ है।जैसे पत्थर की बेड़ी में सवार होना।और जो मनुष्य इस) पत्थर की बेड़ी में सवार होता है।वह (संसार-) समुंद्र में डूब जाता है। 4। (परमात्मा के नाम का सौदा करने के वास्ते) अगर अपना मन (गुरू के आगे) बेच दें।और अपना सिर भी दे दें (भाव।अपने मन के पीछे चलने की जगह।गुरू की मति पर चलें और अपनी बुद्धि का गुमान भी छोड़ दें) तो गुरू के द्वारा अपना हृदय-घर तलाश के (अपने अंदर ही) नाम पदार्थ पहचान लेते हैं। 5। हर कोई जनम-मरन के चक्कर का जिक्र करता है (और इससे डरता भी है कि ये जनम-मरन का चक्कर) ईश्वर ने खुद ही बनाया है। जो जीव स्वै भाव गवा के (माया के मोह की ओर से) मर जाते हैं।उन्हें ये जनम-मरन का चक्कर नहीं व्यापता। 6। (पर। जीव के भी क्या वश।पिछले किए कर्मों के संस्कारों के अनुसार) धुर से ही जीव को जिस तरह के कर्म करने का हुकम होता है जीव वही कर्म करता है। पर अगर जीव अपना मन गुरू के हवाले करके प्रभू-चरनों में टिक जाए (तो इसका इतना ऊँचा आत्मिक जीवन बन जाता है कि) कोई भी उसका मूल्य नहीं डाल सकता (वह अनमोल हो जाता है)। 7। (ये सारे जीव उस जौहरी परमात्मा के अपने ही बनाए हुए रत्न हैं) वह मालिक खुद ही इन रत्नों की परख करता है और (परख-परख के) स्वयं ही इनका मूल्य निर्धारित करता है। हे नानक ! जिस मनुष्य के मन में मालिक प्रभू बस जाता है।उसको सदा स्थिर रहने वाली इज्जत बख्शता है। 8। 17।
ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੧ ॥
ਜਿਨੑੀ ਨਾਮੁ ਵਿਸਾਰਿਆ ਦੂਜੈ ਭਰਮਿ ਭੁਲਾਈ ॥
ਮੂਲੁ ਛੋਡਿ ਡਾਲੀ ਲਗੇ ਕਿਆ ਪਾਵਹਿ ਛਾਈ ॥੧॥
ਬਿਨੁ ਨਾਵੈ ਕਿਉ ਛੂਟੀਐ ਜੇ ਜਾਣੈ ਕੋਈ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਹੋਇ ਤ ਛੂਟੀਐ ਮਨਮੁਖਿ ਪਤਿ ਖੋਈ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਜਿਨੑੀ ਏਕੋ ਸੇਵਿਆ ਪੂਰੀ ਮਤਿ ਭਾਈ ॥
ਆਦਿ ਜੁਗਾਦਿ ਨਿਰੰਜਨਾ ਜਨ ਹਰਿ ਸਰਣਾਈ ॥੨॥
ਸਾਹਿਬੁ ਮੇਰਾ ਏਕੁ ਹੈ ਅਵਰੁ ਨਹੀ ਭਾਈ ॥
ਕਿਰਪਾ ਤੇ ਸੁਖੁ ਪਾਇਆ ਸਾਚੇ ਪਰਥਾਈ ॥੩॥
ਗੁਰ ਬਿਨੁ ਕਿਨੈ ਨ ਪਾਇਓ ਕੇਤੀ ਕਹੈ ਕਹਾਏ ॥
ਆਪਿ ਦਿਖਾਵੈ ਵਾਟੜੀਂ ਸਚੀ ਭਗਤਿ ਦ੍ਰਿੜਾਏ ॥੪॥
ਮਨਮੁਖੁ ਜੇ ਸਮਝਾਈਐ ਭੀ ਉਝੜਿ ਜਾਏ ॥
ਬਿਨੁ ਹਰਿ ਨਾਮ ਨ ਛੂਟਸੀ ਮਰਿ ਨਰਕ ਸਮਾਏ ॥੫॥
ਜਨਮਿ ਮਰੈ ਭਰਮਾਈਐ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਨ ਲੇਵੈ ॥
ਤਾ ਕੀ ਕੀਮਤਿ ਨਾ ਪਵੈ ਬਿਨੁ ਗੁਰ ਕੀ ਸੇਵੈ ॥੬॥
ਜਿਨੑੀ ਨਾਮੁ ਵਿਸਾਰਿਆ ਦੂਜੈ ਭਰਮਿ ਭੁਲਾਈ ॥
ਮੂਲੁ ਛੋਡਿ ਡਾਲੀ ਲਗੇ ਕਿਆ ਪਾਵਹਿ ਛਾਈ ॥੧॥
ਬਿਨੁ ਨਾਵੈ ਕਿਉ ਛੂਟੀਐ ਜੇ ਜਾਣੈ ਕੋਈ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਹੋਇ ਤ ਛੂਟੀਐ ਮਨਮੁਖਿ ਪਤਿ ਖੋਈ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਜਿਨੑੀ ਏਕੋ ਸੇਵਿਆ ਪੂਰੀ ਮਤਿ ਭਾਈ ॥
ਆਦਿ ਜੁਗਾਦਿ ਨਿਰੰਜਨਾ ਜਨ ਹਰਿ ਸਰਣਾਈ ॥੨॥
ਸਾਹਿਬੁ ਮੇਰਾ ਏਕੁ ਹੈ ਅਵਰੁ ਨਹੀ ਭਾਈ ॥
ਕਿਰਪਾ ਤੇ ਸੁਖੁ ਪਾਇਆ ਸਾਚੇ ਪਰਥਾਈ ॥੩॥
ਗੁਰ ਬਿਨੁ ਕਿਨੈ ਨ ਪਾਇਓ ਕੇਤੀ ਕਹੈ ਕਹਾਏ ॥
ਆਪਿ ਦਿਖਾਵੈ ਵਾਟੜੀਂ ਸਚੀ ਭਗਤਿ ਦ੍ਰਿੜਾਏ ॥੪॥
ਮਨਮੁਖੁ ਜੇ ਸਮਝਾਈਐ ਭੀ ਉਝੜਿ ਜਾਏ ॥
ਬਿਨੁ ਹਰਿ ਨਾਮ ਨ ਛੂਟਸੀ ਮਰਿ ਨਰਕ ਸਮਾਏ ॥੫॥
ਜਨਮਿ ਮਰੈ ਭਰਮਾਈਐ ਹਰਿ ਨਾਮੁ ਨ ਲੇਵੈ ॥
ਤਾ ਕੀ ਕੀਮਤਿ ਨਾ ਪਵੈ ਬਿਨੁ ਗੁਰ ਕੀ ਸੇਵੈ ॥੬॥
आसा महला १ ॥
जिन॑ी नामु विसारिआ दूजै भरमि भुलाई ॥
मूलु छोडि डाली लगे किआ पावहि छाई ॥१॥
बिनु नावै किउ छूटीऐ जे जाणै कोई ॥
गुरमुखि होइ त छूटीऐ मनमुखि पति खोई ॥१॥ रहाउ ॥
जिन॑ी एको सेविआ पूरी मति भाई ॥
आदि जुगादि निरंजना जन हरि सरणाई ॥२॥
साहिबु मेरा एकु है अवरु नही भाई ॥
किरपा ते सुखु पाइआ साचे परथाई ॥३॥
गुर बिनु किनै न पाइओ केती कहै कहाए ॥
आपि दिखावै वाटड़ीं सची भगति द्रिड़ाए ॥४॥
मनमुखु जे समझाईऐ भी उझड़ि जाए ॥
बिनु हरि नाम न छूटसी मरि नरक समाए ॥५॥
जनमि मरै भरमाईऐ हरि नामु न लेवै ॥
ता की कीमति ना पवै बिनु गुर की सेवै ॥६॥
जिन॑ी नामु विसारिआ दूजै भरमि भुलाई ॥
मूलु छोडि डाली लगे किआ पावहि छाई ॥१॥
बिनु नावै किउ छूटीऐ जे जाणै कोई ॥
गुरमुखि होइ त छूटीऐ मनमुखि पति खोई ॥१॥ रहाउ ॥
जिन॑ी एको सेविआ पूरी मति भाई ॥
आदि जुगादि निरंजना जन हरि सरणाई ॥२॥
साहिबु मेरा एकु है अवरु नही भाई ॥
किरपा ते सुखु पाइआ साचे परथाई ॥३॥
गुर बिनु किनै न पाइओ केती कहै कहाए ॥
आपि दिखावै वाटड़ीं सची भगति द्रिड़ाए ॥४॥
मनमुखु जे समझाईऐ भी उझड़ि जाए ॥
बिनु हरि नाम न छूटसी मरि नरक समाए ॥५॥
जनमि मरै भरमाईऐ हरि नामु न लेवै ॥
ता की कीमति ना पवै बिनु गुर की सेवै ॥६॥
हिन्दी अर्थ: आसा महला १ ॥ जिन लोगों ने और भटकनों में पड़ के (सही जीवन राह से) टूट के परमात्मा का नाम भुला दिया। जो लोग (संसार-वृक्ष के) मूल (-प्रभू) को छोड़ के (संसार-वृक्ष की) डालियों (माया के पसारे) में लग गए उनको (आत्मिक जीवन में से) कुछ भी ना मिला। 1। (गुरू के द्वारा) यदि कोई मनुष्य ये समझ ले (तो उसे ये समझ आ जाती है कि) परमात्मा के नाम (में जुड़े) बिना (माया के मोह से) बच नहीं सकते। गुरू के बताए हुए रास्ते पर चले तब ही (माया के मोह से) मनुष्य को निजात मिलती है।अपने मन के पीछे चलने वाला मनुष्य (माया मोह में फस के) अपनी इज्जत (परमात्मा की नजरों में) गवा लेता है। 1।रहाउ। हे भाई ! जिन मनुष्यों ने एक परमात्मा का सिमरन किया।उनकी बुद्धि (माया के मोह में) मार नहीं खाती। प्रभू के वह सेवक उस प्रभू की शरण में ही टिके रहते हैं जो सारे जगत का मूल है और युगों के भी आरम्भ से है और जिस पर माया का प्रभाव नहीं पड़ सकता। 2। हे भाई ! हमारा मालिक-प्रभू बेमिसाल है।उस जैसा और कोई नही। अगर उस सदा-स्थिर प्रभू के ओट-आसरे टिके रहें।तो उसकी मेहर से आत्मिक आनंद मिलता है। 3। बहुती दुनिया अनेकों रास्ते बताती है।पर गुरू की शरण पड़े बिना परमात्मा की प्राप्ति नहीं होती। (गुरू की शरण पड़ने से) परमात्मा (अपने मिलाप का) सही रास्ता स्वयं ही दिखा देता है।(जीव के हृदय में) सदा-स्थिर रहने वाली भक्ति कर देता है। 4। पर जो मनुष्य अपने मन के पीछे चलता है उसे अगर (सही रास्ता) समझाने की कोशिश भी करें।तो भी वह गलत रास्ते पर ही जाता है। परमात्मा के नाम के बिना वह इस (गलत रास्ते से) बच नहीं सकता।(कुमार्ग पर पड़ा हुआ) वह आत्मिक मौत सहेड़ लेता है।(मानो) नर्क में पड़ा रहता है। 5। जो मनुष्य हरी का नाम नहीं सिमरता वह पैदा होता है मरता है पैदा होता है मरता है।इसी चक्कर में पड़ा रहता है। (इससे बचने के लिए एक ही तरीका है कि परमात्मा का नाम जपो।पर) गुरू की शरण पड़े बिना परमात्मा के नाम की कद्र नहीं पड़ सकती। 6।
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 420 है, राग आसा का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)।
गुरु नानक की वाणी, observational, direct, बिना ornament।
Faridabad-Delhi border के पास सर्दियों की धुंध में सुबह का सूरज।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 44 पंक्तियों का है, 3 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 420” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: आसा राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 421 →, पीछे का: ← अंग 419।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।