अंग 404

अंग
404
राग आसा
राग: आसा · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਸਾਜਨ ਸੰਤ ਹਮਾਰੇ ਮੀਤਾ ਬਿਨੁ ਹਰਿ ਹਰਿ ਆਨੀਤਾ ਰੇ ॥
ਸਾਧਸੰਗਿ ਮਿਲਿ ਹਰਿ ਗੁਣ ਗਾਏ ਇਹੁ ਜਨਮੁ ਪਦਾਰਥੁ ਜੀਤਾ ਰੇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਤ੍ਰੈ ਗੁਣ ਮਾਇਆ ਬ੍ਰਹਮ ਕੀ ਕੀਨੑੀ ਕਹਹੁ ਕਵਨ ਬਿਧਿ ਤਰੀਐ ਰੇ ॥
ਘੂਮਨ ਘੇਰ ਅਗਾਹ ਗਾਖਰੀ ਗੁਰ ਸਬਦੀ ਪਾਰਿ ਉਤਰੀਐ ਰੇ ॥੨॥
ਖੋਜਤ ਖੋਜਤ ਖੋਜਿ ਬੀਚਾਰਿਓ ਤਤੁ ਨਾਨਕ ਇਹੁ ਜਾਨਾ ਰੇ ॥
ਸਿਮਰਤ ਨਾਮੁ ਨਿਧਾਨੁ ਨਿਰਮੋਲਕੁ ਮਨੁ ਮਾਣਕੁ ਪਤੀਆਨਾ ਰੇ ॥੩॥੧॥੧੩੦॥
साजन संत हमारे मीता बिनु हरि हरि आनीता रे ॥
साधसंगि मिलि हरि गुण गाए इहु जनमु पदारथु जीता रे ॥१॥ रहाउ ॥
त्रै गुण माइआ ब्रहम की कीन॑ी कहहु कवन बिधि तरीऐ रे ॥
घूमन घेर अगाह गाखरी गुर सबदी पारि उतरीऐ रे ॥२॥
खोजत खोजत खोजि बीचारिओ ततु नानक इहु जाना रे ॥
सिमरत नामु निधानु निरमोलकु मनु माणकु पतीआना रे ॥३॥१॥१३०॥

हिन्दी अर्थ: हे संत जनो ! हे सज्जनों ! हे मेरे मित्रो ! (जगत में जो कुछ भी दिख रहा है परमात्मा के बिना और सब कुछ नाशवंत है (दिखते पसारे से मोह डाल के दुख ही प्राप्त होगा)। जिस मनुष्य ने साध-संगति में मिल के परमात्मा के गुण गाने शुरू कर दिए।उसने ये कीमती मानस जन्म जीत लिया (सफल कर लिया)। 1।रहाउ। हे भाई ! परमात्मा की पैदा की हुई ये त्रिगुणी माया (मानो।एक समुंद्र है।इस में से) बताओ।कैसे पार लांघ सकें। (इसमें अनेकों विकारों की) घुम्मण-घेरियां चल रही हैं।ये अथाह है।इसमें से पार होना बहुत मुश्किल है।(हां हे भाई !) गुरू के शबद के द्वारा ही इसमें से पार लांघ सकते हैं। 2। हे नानक ! जिस मनुष्य ने (साध-संगति में मिल के) खोज करते हुए विचार की और उसने ये अस्लियत समझली कि परमात्मा का नाम जो सारे गुणों का खजाना है जिसके बराबर का और कोई नहीं। ऐसे नाम को सिमर के मन मोती (जैसा कीमती) बन जाता है (और परमात्मा के सिमरन में) पतीज जाता है। 3। 1। 130।
ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੫ ਦੁਪਦੇ ॥
ਗੁਰ ਪਰਸਾਦਿ ਮੇਰੈ ਮਨਿ ਵਸਿਆ ਜੋ ਮਾਗਉ ਸੋ ਪਾਵਉ ਰੇ ॥
ਨਾਮ ਰੰਗਿ ਇਹੁ ਮਨੁ ਤ੍ਰਿਪਤਾਨਾ ਬਹੁਰਿ ਨ ਕਤਹੂੰ ਧਾਵਉ ਰੇ ॥੧॥
ਹਮਰਾ ਠਾਕੁਰੁ ਸਭ ਤੇ ਊਚਾ ਰੈਣਿ ਦਿਨਸੁ ਤਿਸੁ ਗਾਵਉ ਰੇ ॥
ਖਿਨ ਮਹਿ ਥਾਪਿ ਉਥਾਪਨਹਾਰਾ ਤਿਸ ਤੇ ਤੁਝਹਿ ਡਰਾਵਉ ਰੇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਜਬ ਦੇਖਉ ਪ੍ਰਭੁ ਅਪੁਨਾ ਸੁਆਮੀ ਤਉ ਅਵਰਹਿ ਚੀਤਿ ਨ ਪਾਵਉ ਰੇ ॥
ਨਾਨਕੁ ਦਾਸੁ ਪ੍ਰਭਿ ਆਪਿ ਪਹਿਰਾਇਆ ਭ੍ਰਮੁ ਭਉ ਮੇਟਿ ਲਿਖਾਵਉ ਰੇ ॥੨॥੨॥੧੩੧॥
आसा महला ५ दुपदे ॥
गुर परसादि मेरै मनि वसिआ जो मागउ सो पावउ रे ॥
नाम रंगि इहु मनु त्रिपताना बहुरि न कतहूं धावउ रे ॥१॥
हमरा ठाकुरु सभ ते ऊचा रैणि दिनसु तिसु गावउ रे ॥
खिन महि थापि उथापनहारा तिस ते तुझहि डरावउ रे ॥१॥ रहाउ ॥
जब देखउ प्रभु अपुना सुआमी तउ अवरहि चीति न पावउ रे ॥
नानकु दासु प्रभि आपि पहिराइआ भ्रमु भउ मेटि लिखावउ रे ॥२॥२॥१३१॥

हिन्दी अर्थ: आसा महला ५ दुपदे ॥ हे भाई ! जब से गुरू की किरपा से मेरा वह मालिक-प्रभू मेरे मन में आ बसा है तब से मैं (उससे) जो कुछ मांगता हूँ वही कुछ पा लेता हूँ। (मेरे मालिक-प्रभू के) नाम के प्रेम-रंग से मेरा ये मन (माया की तृष्णा से) भर चुका है (तब से) मैं दुबारा किसी और तरफ भटकता नहीं फिरता। 1। हे मेरे मन ! मेरा मालिक प्रभू सबसे ऊँचा है।मैं रात दिन उसकी (ही) सिफतसालाह करता रहता हूँ। मेरा वह मालिक एक छिन में पैदा करके नाश करने की समर्था रखने वाला है। मैं (हे मन !) तुझे उसके भय-अदब में रखना चाहता हूँ। 1। हे भाई ! जब मैं अपने पति-प्रभू को (अपने अंदर बसता) देख लेता हूँ मैं किसी और (ओट आसरे) को चित्त में जगह नहीं देता। हे भाई ! जब से प्रभू ने अपने दास नानक को खुद निवाजा है तब से मैंने अन्य सारी किस्म की भटकनें दूर करके (अपने चित्त में सिर्फ परमात्मा के नाम को) लिखता रहता हूँ। 2। 2। 131।
ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਚਾਰਿ ਬਰਨ ਚਉਹਾ ਕੇ ਮਰਦਨ ਖਟੁ ਦਰਸਨ ਕਰ ਤਲੀ ਰੇ ॥
ਸੁੰਦਰ ਸੁਘਰ ਸਰੂਪ ਸਿਆਨੇ ਪੰਚਹੁ ਹੀ ਮੋਹਿ ਛਲੀ ਰੇ ॥੧॥
ਜਿਨਿ ਮਿਲਿ ਮਾਰੇ ਪੰਚ ਸੂਰਬੀਰ ਐਸੋ ਕਉਨੁ ਬਲੀ ਰੇ ॥
ਜਿਨਿ ਪੰਚ ਮਾਰਿ ਬਿਦਾਰਿ ਗੁਦਾਰੇ ਸੋ ਪੂਰਾ ਇਹ ਕਲੀ ਰੇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਵਡੀ ਕੋਮ ਵਸਿ ਭਾਗਹਿ ਨਾਹੀ ਮੁਹਕਮ ਫਉਜ ਹਠਲੀ ਰੇ ॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਤਿਨਿ ਜਨਿ ਨਿਰਦਲਿਆ ਸਾਧਸੰਗਤਿ ਕੈ ਝਲੀ ਰੇ ॥੨॥੩॥੧੩੨॥
आसा महला ५ ॥
चारि बरन चउहा के मरदन खटु दरसन कर तली रे ॥
सुंदर सुघर सरूप सिआने पंचहु ही मोहि छली रे ॥१॥
जिनि मिलि मारे पंच सूरबीर ऐसो कउनु बली रे ॥
जिनि पंच मारि बिदारि गुदारे सो पूरा इह कली रे ॥१॥ रहाउ ॥
वडी कोम वसि भागहि नाही मुहकम फउज हठली रे ॥
कहु नानक तिनि जनि निरदलिआ साधसंगति कै झली रे ॥२॥३॥१३२॥

हिन्दी अर्थ: आसा महला ५ ॥ हे भाई ! (हमारे देश में ब्राहमण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र ये) चार वर्ण (प्रसिद्ध) हैं।(कामादिक विकार इन) चारों वर्णों (के लोगों) को मसल देने वाले हैं।छे भेषों (के साधुओं) को भी ये हाथों की तलियों पर (नचाते हैं)। सुंदर, सुनॅखे, बाँके, सयाने (कोई भी होंकामादिक) पाँचों ने सभी को मोह कर छल लिया है। 1। हे भाई ! कोई विरला ही ऐसा बलवान मनुष्य है जिसने (गुरू को) मिल के कामादिक पाँचों शूरवीरों को मार लिया है (पर विजय पा ली हो)। हे भाई ! जगत में वही मनुष्य पूर्ण है जिसने इन पाँचों को मार के टुकड़े-टुकड़े कर दिया है। 1।रहाउ। हे भाई ! (इन कामादिकों का बहुत बडा) बलशाली कुनबा है।ना ये किसी के काबू में आते हैं ना ये किसी से डर के भागते हैं।इनकी फौज बड़ी मजबूत और हठ वाली है। हे भाई ! कह, हे भाई ! सिर्फ उस मनुष्य ने इनको अच्छी तरह लिताड़ा है जो साध-संगति के आसरे में (ओट में) रहता है। 2। 3। 132।
ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਨੀਕੀ ਜੀਅ ਕੀ ਹਰਿ ਕਥਾ ਊਤਮ ਆਨ ਸਗਲ ਰਸ ਫੀਕੀ ਰੇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਬਹੁ ਗੁਨਿ ਧੁਨਿ ਮੁਨਿ ਜਨ ਖਟੁ ਬੇਤੇ ਅਵਰੁ ਨ ਕਿਛੁ ਲਾਈਕੀ ਰੇ ॥੧॥
ਬਿਖਾਰੀ ਨਿਰਾਰੀ ਅਪਾਰੀ ਸਹਜਾਰੀ ਸਾਧਸੰਗਿ ਨਾਨਕ ਪੀਕੀ ਰੇ ॥੨॥੪॥੧੩੩॥
आसा महला ५ ॥
नीकी जीअ की हरि कथा ऊतम आन सगल रस फीकी रे ॥१॥ रहाउ ॥
बहु गुनि धुनि मुनि जन खटु बेते अवरु न किछु लाईकी रे ॥१॥
बिखारी निरारी अपारी सहजारी साधसंगि नानक पीकी रे ॥२॥४॥१३३॥

हिन्दी अर्थ: आसा महला ५ ॥ हे भाई ! परमात्मा की सिफत सालाह की बात जिंद के वास्ते श्रेष्ठ और सुंदर है।(दुनिया के) और सारे पदार्थों के स्वाद (इसके मुकाबले पर) फीके हैं। 1।रहाउ। हे भाई ! ये हरि कथा बहुत गुणों वाली है (जीव के अंदर गुण पैदा करने वाली है) मिठास भरी है।छे शस्त्रों को जानने वाले ऋषि लोग (ही हरि-कथा के बिना) किसी और उद्यम को (जीवात्मा के लिए) लाभदायक नहीं मानते। 1। हे भाई ! ये हरि-कथा (जैसे।अमृत की धार है जो) विषियों के जहर के असर का नाश करती है।हे नानक ! (ये हरि-कथा।ये अमृत-धारा) साध-संगति में (टिक के ही) पीयी जा सकती है। 2। 4। 133।
ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਹਮਾਰੀ ਪਿਆਰੀ ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਧਾਰੀ ਗੁਰਿ ਨਿਮਖ ਨ ਮਨ ਤੇ ਟਾਰੀ ਰੇ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਦਰਸਨ ਪਰਸਨ ਸਰਸਨ ਹਰਸਨ ਰੰਗਿ ਰੰਗੀ ਕਰਤਾਰੀ ਰੇ ॥੧॥
ਖਿਨੁ ਰਮ ਗੁਰ ਗਮ ਹਰਿ ਦਮ ਨਹ ਜਮ ਹਰਿ ਕੰਠਿ ਨਾਨਕ ਉਰਿ ਹਾਰੀ ਰੇ ॥੨॥੫॥੧੩੪॥
आसा महला ५ ॥
हमारी पिआरी अंम्रित धारी गुरि निमख न मन ते टारी रे ॥१॥ रहाउ ॥
दरसन परसन सरसन हरसन रंगि रंगी करतारी रे ॥१॥
खिनु रम गुर गम हरि दम नह जम हरि कंठि नानक उरि हारी रे ॥२॥५॥१३४॥

हिन्दी अर्थ: आसा महला ५ ॥ हे भाई ! गुरू ने (कृपा करके प्रभू की सिफत सालाह वाली अपनी बाणी) आँख झपकने जितने समय के लिए भी मेरे मन से कभी भूलने नहीं दी।ये बाणी मुझे मधुर लगती है।ये बाणी आत्मिक जीवन देने वाले नाम-जल की धारा मेरे अंदर जारी रखती है। 1।रहाउ। हे भाई ! ये बाणी करतार के प्रेम रंग में रंगने वाली है।इसकी बरकति से करतार के दर्शन होते हैं करतार के चरणों की छूह मिलती है मन में आनंद और खिलाउ पैदा होता है। 1। हे भाई ! इस बाणी को एक छिन वास्ते भी हृदय में बसाने से गुरू के चरणों तक पहुँच बन जाती है।इसे स्वास-स्वास हृदय में बसाने से जमों का डर नहीं व्याप सकता।हे नानक ! इस हरि-कथा को अपने गले में परो के रख।अपने हृदय का हार (बना के) रख। 2। 5। 134।
ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਨੀਕੀ ਸਾਧ ਸੰਗਾਨੀ ॥ ਰਹਾਉ ॥
ਪਹਰ ਮੂਰਤ ਪਲ ਗਾਵਤ ਗਾਵਤ ਗੋਵਿੰਦ ਗੋਵਿੰਦ ਵਖਾਨੀ ॥੧॥
ਚਾਲਤ ਬੈਸਤ ਸੋਵਤ ਹਰਿ ਜਸੁ ਮਨਿ ਤਨਿ ਚਰਨ ਖਟਾਨੀ ॥੨॥
ਹਂਉ ਹਉਰੋ ਤੂ ਠਾਕੁਰੁ ਗਉਰੋ ਨਾਨਕ ਸਰਨਿ ਪਛਾਨੀ ॥੩॥੬॥੧੩੫॥
आसा महला ५ ॥
नीकी साध संगानी ॥ रहाउ ॥
पहर मूरत पल गावत गावत गोविंद गोविंद वखानी ॥१॥
चालत बैसत सोवत हरि जसु मनि तनि चरन खटानी ॥२॥
हंउ हउरो तू ठाकुरु गउरो नानक सरनि पछानी ॥३॥६॥१३५॥

हिन्दी अर्थ: आसा महला ५ ॥ (हे भाई !) साध-संगति (मनुष्य के लिए एक) खूबसूरत बरकत है।रहाउ। (हे भाई ! साध-संगति में) आठों पहर।पल पल।घड़ी-घड़ी परमात्मा की सिफत सालाह के गीत गाए जाते हैं।परमात्मा के सिफत सालाह की बातें होती है। 1। (हे भाई ! साध-संगति की बरकति से) चलते-बैठते-सोए हुए (हर वक्त) परमातमा की सिफत सालाह (करने का स्वभाव बन जाता है) मन में परमात्मा।हृदय में परमात्मा आ बसता है।परमात्मा के चरणों में हर वक्त मेल बना रहता है। 2। हे नानक ! (कह, हे प्रभू !) मैं गुण-हीन हूँ।तू मेरा मालिक गुणों से भरपूर है (साध-संगति के सदका) मुझे तेरी शरण पड़ने की समझ आई है। 3। 6। 135।

संदर्भ: यह अंग 404 है, राग आसा का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।

M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।

Saket के Mall में Sunday-shopping के बीच कोई हल्की-सी पंक्ति याद आ जाए, क्या होगा।

ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।

यह अंग कुल 33 पंक्तियों का है, 6 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 404” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।

राग के context में: आसा राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।

पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।

अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।

“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।

नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।

अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।

तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।

हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।

ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।

दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।

“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।

हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।

अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।

आगे का अंग: अंग 405 →, पीछे का: ← अंग 403

हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।

(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)

शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।

संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।

शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।

संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।

एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।

अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।

स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।