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अंग 348

अंग
348
राग आसा
राग: आसा · रचयिता: Guru Raam Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
सो पातिसाहु साहा पति साहिबु नानक रहणु रजाई ॥1॥1॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।

हिन्दी अर्थ: अकाल पुरख बादशाह है। शाहों का शाह है। मालिक है। हे नानक ! (हमें) उसकी रजा में रहना (ही फबता है)।
आसा महला 4 ॥
सो पुरखु निरंजनु हरि पुरखु निरंजनु हरि अगमा अगम अपारा ॥
सभि धिआवहि सभि धिआवहि तुधु जी हरि सचे सिरजणहारा ॥
सभि जीअ तुमारे जी तूं जीआ का दातारा ॥
हरि धिआवहु संतहु जी सभि दूख विसारणहारा ॥
हरि आपे ठाकुरु हरि आपे सेवकु जी किआ नानक जंत विचारा ॥1॥
तूं घट घट अंतरि सरब निरंतरि जी हरि एको पुरखु समाणा ॥
इकि दाते इकि भेखारी जी सभि तेरे चोज विडाणा ॥
तूं आपे दाता आपे भुगता जी हउ तुधु बिनु अवरु न जाणा ॥
तूं पारब्रहमु बेअंतु बेअंतु जी तेरे किआ गुण आखि वखाणा ॥
जो सेवहि जो सेवहि तुधु जी जनु नानकु तिन॑ कुरबाणा ॥2॥
हरि धिआवहि हरि धिआवहि तुधु जी से जन जुग महि सुख वासी ॥
से मुकतु से मुकतु भए जिन॑ हरि धिआइआ जीउ तिन टूटी जम की फासी ॥
जिन निरभउ जिन॑ हरि निरभउ धिआइआ जीउ तिन का भउ सभु गवासी ॥
जिन॑ सेविआ जिन॑ सेविआ मेरा हरि जीउ ते हरि हरि रूपि समासी ॥
से धंनु से धंनु जिन हरि धिआइआ जीउ जनु नानकु तिन बलि जासी ॥3॥
तेरी भगति तेरी भगति भंडार जी भरे बेअंत बेअंता ॥
तेरे भगत तेरे भगत सलाहनि तुधु जी हरि अनिक अनेक अनंता ॥
तेरी अनिक तेरी अनिक करहि हरि पूजा जी तपु तापहि जपहि बेअंता ॥
तेरे अनेक तेरे अनेक पड़हि बहु सिंम्रिति सासत जी करि किरिआ खटु करम करंता ॥
से भगत से भगत भले जन नानक जी जो भावहि मेरे हरि भगवंता ॥4॥
तूं आदि पुरखु अपरंपरु करता जी तुधु जेवडु अवरु न कोई ॥
तूं जुगु जुगु एको सदा सदा तूं एको जी तूं निहचलु करता सोई ॥
तुधु आपे भावै सोई वरतै जी तूं आपे करहि सु होई ॥
तुधु आपे स्रिसटि सभ उपाई जी तुधु आपे सिरजि सभ गोई ॥
जनु नानकु गुण गावै करते के जी जो सभसै का जाणोई ॥5॥2॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।

हिन्दी अर्थ: आसा महला 4 ॥ वह परमात्मा सब जीवों में व्यापक है। (फिर भी) माया के प्रभाव से ऊपर है। अपहुँच है और बेअंत है। हे सदा कायम रहने वाले और सब जीवों को पैदा करने वाले हरी ! सारे जीव-जंतु आपको सिमरते हैं। सारे जीव आपकेही पैदा किए हुए हैं। आप सब जीवों को रिज़क देने वाला है। हे संत जनों ! उस प्रभू को सिमरो। वह सारे दुखों का नाश करने वाला है। वह प्रभू (जीवों में व्यापक होने के कारण) खुद ही मालिक है और खुद ही सेवक है। हे नानक ! जीव बिचारे क्या हैं। (भाव। जीवों की उस प्रभू से कोई अलग हस्ती नहीं)। 1। हे हरी ! आप हरेक शरीर में व्यापक है। आप सब जीवों में एक रस मौजूद है। आप एक स्वयं ही सब जीवों में समाया हुआ है। (फिर भी) कई जीव दानी हैं। कई जीव मंगते हैं,ये आपके ही आश्चर्यजनक तमाशे हैं (क्योंकि असल में) आप खुद ही दातें देने वाला है। और खुद ही (उन दातों को) बरतने वाला है। (सारी सृष्टि में) मैं आपके बिना किसी और को नहीं जानता (भाव। आपके बिना और कोई दूसरा नहीं दिखता)। मैं आपके कौन-कौन से गुण कह के बताऊँ। आप बेअंत पारब्रहम है। आप बेअंत पारबंहम है। हे प्रभू ! जो आपको याद करते हैं जो आपको सिमरते हैं। दास नानक उनसे सदके जाता है। 2। हे हरी ! जो मनुष्य आपको सिमरते हैं। जो आपको ध्याते हैं। वो अपनी जिंदगी में सुखी बसते हैं। जिन मनुष्यों ने हरी का नाम सिमरा है। वे सदा के लिए माया के बंधनों से आजाद हो गए हैं। उनकी जमों वाली फाही कट गई है। जिन्होंने निरभउ प्रभू को ध्याया है प्रभू उनका सारा डर दूर कर देता है। जिन्होंने प्यारे प्रभू को सिमरा है। वे प्रभू के स्वरूप् में ही लीन हो गए हैं। भाग्यशाली हैं वे मनुष्य। धन्य हैं वे मनुष्य। जिन्होंने प्रभू को ध्याया है। दास नानक उनसे कुर्बान जाता है। 3। अर्थ। हे प्रभू ! आपकी भगती के बेअंत खजाने भरे पड़े हैं। हे हरी ! अनेकों और बेअंत आपके भगत आपकी सिफत सालाह करते हैं। हे प्रभू ! अनेकों जीव आपकी पूजा करते हैं। बेअंत जीव (आपके मिलाप के लिए) तपसाधना करते हैं। आपके अनेकों सेवक कई समृतियां व शास्त्र पढ़ते हैं। (और उनके बताए हुए) छे धार्मिक कर्म और अन्य कर्म करते हैं। हे दास नानक ! वो भगत भले हैं (अर्थात। उनकी मेहनत सफल हुई जानो) जो प्यारे हरि भगवंत को प्यारे लगते हैं। 4। अर्थ। हे प्रभू ! आप सबका मूल है। सब में व्यापक है। बेअंत है। सबको पैदा करने वाला है। आपके बराबर का कोई नहीं। आप हरेक युग में खुद ही है। आप सदा एक स्वयं ही है। आप सदा कायम रहने वाला है। सबका पैदा करने वाला है और सबकी सार लेने वाला है। जगत में वही कुछ होता है जो आपको खुद को पसंद है। वही होता है जो आप स्वयं ही करता है। (हे प्रभू !) सारी सृष्टि तूने खुद ही पैदा की है। आप खुद ही पैदा करके खुद ही नाश करता है। दास नानक उस करतार के गुण गाता है। जो हरेक के दिल की जानने वाला है। 5। 2।
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
रागु आसा महला 1 चउपदे घरु 2 ॥
सुणि वडा आखै सभ कोई ॥
केवडु वडा डीठा होई ॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।

हिन्दी अर्थ: ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। रागु आसा महला 1 चउपदे घरु 2 ॥ हरेक जीव (औरों से सिर्फ) सुन के (कि) कह देता है कि (हे प्रभू !) आप बड़ा है। पर आप कितना बड़ा है ये बात आपको देख के ही बताई जा सकती है।

आसा राग सुबह की पहली रोशनी का है, उम्मीद से भरा, चलने को तैयार। आसा का अर्थ ही ‘आशा’ है। ‘आसा दी वार’ सिख परम्परा की सुबह-कीर्तन का केन्द्र-स्तम्भ रही है, चार-पाँच सदियों से। आसा राग का क्षेत्र है। ‘आसा दी वार’ की रचना गुरु नानक की है, बाद में गुरु अंगद और गुरु अर्जन के साथ संगठित हुई।

रामदास जी का जीवन-व्यवहार और रचना दोनों एक तरह की संगति में रहीं। अमृतसर का चयन, हरमंदिर साहिब का स्थल, और सूही राग की भावुक रचनाएँ, सब एक ही मनोदशा के अलग-अलग पहलू हैं।

इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे।

इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।