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अंग 488

अंग
488
राग आसा
राग: आसा · रचयिता: Bhagat Sheikh Fareed Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
इह बिधि सुनि कै जाटरो उठि भगती लागा ॥
मिले प्रतखि गुसाईआ धंना वडभागा ॥4॥2॥
बाबा फरीद चिश्ती सूफ़ी सिलसिले के थे, बारहवीं-तेरहवीं सदी के। उनके दोहे और सलोक पंजाबी साहित्य के सबसे प्राचीन साहित्यिक नमूनों में हैं। पाकिस्तान में पाकपत्तन उनकी समाधि-स्थल है।

हिन्दी अर्थ: इस तरह (की बात) सुन के गरीब धन्ना जट भी उठके भक्ति करने लगा। उसको पामात्मा के साक्षात दीदार हुए और वह अति भाग्यशाली बन गया। 4। 2।
रे चित चेतसि की न दयाल दमोदर बिबहि न जानसि कोई ॥
जे धावहि ब्रहमंड खंड कउ करता करै सु होई ॥1॥ रहाउ ॥
जननी केरे उदर उदक महि पिंडु कीआ दस दुआरा ॥
देइ अहारु अगनि महि राखै ऐसा खसमु हमारा ॥1॥
कुंमी जल माहि तन तिसु बाहरि पंख खीरु तिन नाही ॥
पूरन परमानंद मनोहर समझि देखु मन माही ॥2॥
पाखणि कीटु गुपतु होइ रहता ता चो मारगु नाही ॥
कहै धंना पूरन ताहू को मत रे जीअ डरांही ॥3॥3॥
फरीद की वाणी में मरण की चेतना लगातार है, चिश्ती परम्परा का गहरा असर। उनके सलोक गुरु अर्जन ने 1604 के संकलन में जोड़े, क़रीब तीन-सौ साल बाद उनकी मृत्यु के।

हिन्दी अर्थ: हे (मेरे) मन ! दया के घर परमात्मा को आप क्यों नही सिमरता।(देखना) किसी और की आस ना लगाए रखना। अगर आप सारी सृष्टि के देसों-परदेसों में भी भटकता फिरेगा।तो भी वही कुछ होंगे जो करतार करेगा। 1।रहाउ। माँ के पेट के जल में उस प्रभू ने हमारा दस सोतों वाला शरीर बना दिया; खुराक दे के माँ के पेट की आग में वह हमारी रक्षा करता है (देख। हे मन !) वह हमारा मालिक ऐसा (दयालु) है। 1। कछुआ पानी में रहता है।उसके बच्चे बाहर (रेत पर रहते हैं)।ना (बच्चों के) पंख हैं (कि उड़ के कुछ खा लें)।ना (कछुए के) थन (हैं कि बच्चों को दूध पिलाए); (पर हे जीवात्मा !) मन में विचार के देख।वह सुंदर परमानंद पूर्ण प्रभू (उनकी पालना करता है)। 2। पत्थर में कीड़ा छुपा हुआ रहता है (पत्थर में से बाहर जाने के लिए) उसका कोई रास्ता नहीं; पर उसको (पालने वाला) भी पूर्ण परमात्मा है; धंना कहता है, हे जीवात्मा ! आप भी ना डर। 3। 3।
आसा सेख फरीद जीउ की बाणी
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
दिलहु मुहबति जिंन॑ सेई सचिआ ॥
जिन॑ मनि होरु मुखि होरु सि कांढे कचिआ ॥1॥
रते इसक खुदाइ रंगि दीदार के ॥
विसरिआ जिन॑ नामु ते भुइ भारु थीए ॥1॥ रहाउ ॥
आपि लीए लड़ि लाइ दरि दरवेस से ॥
तिन धंनु जणेदी माउ आए सफलु से ॥2॥
परवदगार अपार अगम बेअंत तू ॥
जिना पछाता सचु चुंमा पैर मूं ॥3॥
तेरी पनह खुदाइ तू बखसंदगी ॥
सेख फरीदै खैरु दीजै बंदगी ॥4॥1॥
बाबा फरीद चिश्ती सूफ़ी सिलसिले के थे, बारहवीं-तेरहवीं सदी के। उनके दोहे और सलोक पंजाबी साहित्य के सबसे प्राचीन साहित्यिक नमूनों में हैं। पाकिस्तान में पाकपत्तन उनकी समाधि-स्थल है।

हिन्दी अर्थ: आसा सेख फरीद जीउ की बाणी ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। जो मनुष्य रॅब के प्यार में रंगे हुए हैं।जो लोग रॅब के दीदार में रते हुए हैं।(वही असल मनुष्य हैं); पर जिन्हें रॅब का नाम भूल गया है वह मनुष्य धरती पर निरे भार ही हैं। 1।रहाउ। जिन मनुष्यों का रॅब से दिल से प्यार है।वही सच्चे आशिक हैं; पर जिनके मन में और है और मुंह में से कुछ और ही कहते हैं वह कच्चे (आशिक) कहे जाते हैं। 1। वही मनुष्य (रॅब के) दरवाजे पर दरवेश हैं (वही मनुष्य रॅब के दर से इश्क की खैर मांग सकते हैं) जिन्हें रॅब ने स्वयं अपने लड़ लगाया है। उनकी पैदा करने वाली माँ भाग्यों वाली है।उनका (जगत में) आना मुबारक है। 2। हे पालणहार ! हे बेअंत ! हे अपहुँच ! जिन्होंने ये समझ लिया है कि आप सदा कायम रहने वाला है। मैं उनके पैर चूमता हूँ। 3। हे खुदा ! मुझे आपका ही आसरा है।आप बख्शने वाला है; मुझ शेख फरीद को अपनी बंदगी की ख़ैर डाल। 4। 1।
आसा ॥
बोलै सेख फरीदु पिआरे अलह लगे ॥
इहु तनु होसी खाक निमाणी गोर घरे ॥1॥
आजु मिलावा सेख फरीद टाकिम कूंजड़ीआ मनहु मचिंदड़ीआ ॥1॥ रहाउ ॥
जे जाणा मरि जाईऐ घुमि न आईऐ ॥
झूठी दुनीआ लगि न आपु वञाईऐ ॥2॥
बोलीऐ सचु धरमु झूठु न बोलीऐ ॥
जो गुरु दसै वाट मुरीदा जोलीऐ ॥3॥
छैल लंघंदे पारि गोरी मनु धीरिआ ॥
कंचन वंने पासे कलवति चीरिआ ॥4॥
सेख हैयाती जगि न कोई थिरु रहिआ ॥
जिसु आसणि हम बैठे केते बैसि गइआ ॥5॥
कतिक कूंजां चेति डउ सावणि बिजुलीआं ॥
सीआले सोहंदीआं पिर गलि बाहड़ीआं ॥6॥
चले चलणहार विचारा लेइ मनो ॥
गंढेदिआं छिअ माह तुड़ंदिआ हिकु खिनो ॥7॥
जिमी पुछै असमान फरीदा खेवट किंनि गए ॥
जालण गोरां नालि उलामे जीअ सहे ॥8॥2॥
फरीद की वाणी में मरण की चेतना लगातार है, चिश्ती परम्परा का गहरा असर। उनके सलोक गुरु अर्जन ने 1604 के संकलन में जोड़े, क़रीब तीन-सौ साल बाद उनकी मृत्यु के।

हिन्दी अर्थ: आसा ॥ शेख फरीद कहता है, हे प्यारे ! रॅब (के चरणों) में जुड़; (आपका) ये जिस्म छोटी सी कब्र में पड़ के मिट्टी हैं जाएगा। 1। हे शेख फरीद ! इस मानस जन्म में ही (ईश्वर से) मेल हो सकता है (इस वास्ते इन) मन को मचाने वाली इन्द्रियों को काबू में रख। 1।रहाउ। (हे प्यारे मन !) जब आपको पता है कि आखिर मरना है और दुबारा (यहाँ) नहीं आना। तो इस नाशवंत दुनिया के साथ प्रीति लगा के अपना आप गवाना नहीं चाहिए; सच और धर्म ही बोलना चाहिए।झूठ नहीं बोलना चाहिए। जो रास्ता गुरू बताए उस रास्ते पे मुरीदों की तरह चलना चाहिए। 2। 3। (किसी दरिया से) जवानों को पार होते देख के (कमजोर) स्त्री का मन भी (हौसला पकड़ लेता है) (और पार होने की कोशिश करती है; इसी तरह संत-जनों को संसार-समुंद्र में से पार लांघता देख के कमजोर दिल मनुष्य में भी हिम्मत आ जाती है।इसलिए हे मन ! आप संत-जनों की संगति कर ! देख) जो मनुष्य निरे सोने-चाँदी की ओर (भाव।माया जोड़ने की तरफ लग) जाते हैं वे आरे से चीरे जाते हैं (भाव।बहुत दुखी जीवन व्यतीत करते हैं)। 4। हे शेख फरीद ! जगत में कोई सदा के लिए उम्र नहीं भोग सका (देख) जिस (धरती की इस) जगह पर हम (अब) बैठे हैं (इस धरती पर) कई बैठ के चले गए। 5। कार्तिक के महीने कूँजें (आती हैं); चेत्र में जंगलों को आग (लग पड़ती है)।सावन में बिजलियां (चमकती हैं)। ठंड में (सि्त्रयों की) सुहानी बाँहें (अपने) पतियों के गले में शोभती हैं (इसी तरह जगत की सारी कार अपने-अपने समय सिर हो के चलती जा रही है; जगत से) चले जाने वाले जीव (अपना-अपना समय गुजार के) चले जा रहे हैं; हे मन ! विचार के देख। जिस शरीर के बनने में छह महीने लगते हैं उसके नाश होने में एक पल ही लगता है। 6। 7। हे फरीद ! इस बात के जमीन व आसमान गवाह हैं कि वो बेअंत बंदे यहाँ से चले गए जो अपने आप को बड़े आगू कहलवाते थे। शरीर तो कब्रों में गल जाते हैं।(पर किए कर्मों के) दुख-सुख जिंद सहती है। 8। 2।

आसा राग सुबह की पहली रोशनी का है, उम्मीद से भरा, चलने को तैयार। आसा का अर्थ ही ‘आशा’ है। ‘आसा दी वार’ सिख परम्परा की सुबह-कीर्तन का केन्द्र-स्तम्भ रही है, चार-पाँच सदियों से। आसा राग का क्षेत्र है। ‘आसा दी वार’ की रचना गुरु नानक की है, बाद में गुरु अंगद और गुरु अर्जन के साथ संगठित हुई।

फरीद की वाणी में मरण की चेतना लगातार है। चिश्ती परम्परा का गहरा असर। उनके सलोक गुरु अर्जन ने 1604 के संकलन में जोड़े, क़रीब तीन-सौ साल बाद उनकी मृत्यु के।

इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “इस तरह (की बात) सुन के गरीब धन्ना जट भी उठके भक्ति करने लगा।”

इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।