Lulla Family

अंग 347

अंग
347
राग आसा
राग: आसा · रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ੴ सति नामु करता पुरखु निरभउ निरवैरु अकाल मूरति अजूनी सैभं गुर प्रसादि ॥
रागु आसा महला 1 घरु 1 सो दरु ॥
सो दरु तेरा केहा सो घरु केहा जितु बहि सरब सम॑ाले ॥
वाजे तेरे नाद अनेक असंखा केते तेरे वावणहारे ॥
केते तेरे राग परी सिउ कहीअहि केते तेरे गावणहारे ॥
गावनि॑ तुधनो पउणु पाणी बैसंतरु गावै राजा धरम दुआरे ॥
गावनि॑ तुधनो चितु गुपतु लिखि जाणनि लिखि लिखि धरमु वीचारे ॥
गावनि॑ तुधनो ईसरु ब्रहमा देवी सोहनि तेरे सदा सवारे ॥
गावनि॑ तुधनो इंद्र इंद्रासणि बैठे देवतिआ दरि नाले ॥
गावनि॑ तुधनो सिध समाधी अंदरि गावनि॑ तुधनो साध बीचारे ॥
गावनि॑ तुधनो जती सती संतोखी गावनि तुधनो वीर करारे ॥
गावनि तुधनो पंडित पड़े रखीसुर जुगु जुगु बेदा नाले ॥
गावनि तुधनो मोहणीआ मनु मोहनि सुरगु मछु पइआले ॥
गावनि॑ तुधनो रतन उपाए तेरे जेते अठसठि तीरथ नाले ॥
गावनि॑ तुधनो जोध महाबल सूरा गावनि॑ तुधनो खाणी चारे ॥
गावनि॑ तुधनो खंड मंडल ब्रहमंडा करि करि रखे तेरे धारे ॥
सेई तुधनो गावनि॑ जो तुधु भावनि॑ रते तेरे भगत रसाले ॥
होरि केते तुधनो गावनि से मै चिति न आवनि नानकु किआ बीचारे ॥
सोई सोई सदा सचु साहिबु साचा साची नाई ॥
है भी होसी जाइ न जासी रचना जिनि रचाई ॥
रंगी रंगी भाती जिनसी माइआ जिनि उपाई ॥
करि करि देखै कीता अपणा जिउ तिस दी वडिआई ॥
जो तिसु भावै सोई करसी फिरि हुकमु न करणा जाई ॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।

हिन्दी अर्थ: 1 ऑ- निरंकार वही एक है। सति नामु – उसका नाम सत्य है। करता – वह सृष्टि व उसके जीवों की रचने वाला है। पुरखु – वह यह सब कुछ करने में परिपूर्ण (शक्तिमान) है। निरभउ – उसमें किसी तरह का भय व्याप्त नहीं। अर्थात् – अन्य देव-दैत्यों तथा सांसारिक जीवों की भाँति उसमें द्वेष अथवा जन्म-मरण का भय नहीं है ; वह इन सबसे परे हैं। निरवैरु- वह वैर से रहित है। अकाल- वह काल (मृत्यु) से परे है; अर्थात्-वह अविनाशी है। मूरति – वह अविनाशी होने के कारण उसका अस्तित्व सदैव रहता है। अजूनी – वह कोई योनि धारण नहीं करता, क्योंकि वह आवागमन के चक्कर से रहित है। सैभं – वह स्वयं से प्रकाशमान हुआ है। गुर – अंधकार (अज्ञान) में प्रकाश (ज्ञान) करने वाला (गुरु)। प्रसादि- कृपा की बख्शिश। अर्थात्-गुरु की कृपा से यह सब उपलब्ध हो सकता है। रागु आसा महला 1 घरु 1 सो दरु ॥ वह दर बड़ा ही आश्चर्य भरा है। जहाँ बैठ के (हे निरंकार !) आप सारे जीवों की संभाल कर रहा है। (आपकी इस रची हुई कुदरति में) अनेकों व अनगिनत बाजे और राग हैं। बेअंत ही जीव (उन बाजों को) बजाने वाले हैं। रागनियों समेत बेअंत ही राग कहे जाते हैं और अनेकों ही जीव (इन रागों के) गाने वाले हैं (जो आपको गा रहे हैं)। अर्थ। (हे निरंकार !) हवा। पानी। आग आपके गुण गा रहे हैं। धर्मराज आपके दर पे (खड़ा हैं के) आपकी उपमा गा रहा है। वह चित्रगुप्त भी जो (जीवों के अच्छे-बुरे कर्मों के लेख) लिखने जानते हैं और जिनके द्वारा लिखेलेख धर्मराज विचारता है। आपकी महिमा का गुणगान कर रहे हैं। अर्थ। (हे अकाल-पुरख !) देवियां। शिव और ब्रहमा जो आपके सवारे हुए हैं और शोभायमान हैं। तूझे गा रहे हैं। कई इन्द्र अपने सिंहासन पर बैठे हुए देवताओं सहित आपके दर पे तूझे सालाह रहे हैं। अर्थ। सिद्ध लोग समाधियां लगा के आपको गा रहे हैं। साधु विचार कर-कर के आपको सलाह रहे हैं। जटाधारी दानी और संतोषी पुरुष आपके गुण गा रहे हैं। और (बेअंत) महान शूरवीर आपकी महिमा गा रहे हैं। अर्थ। (हे अकाल पुरख !) पढ़े हुए पण्डित और महाऋषि वेदों समेत आपको गा रहे हैं। मन को मोहने वाली सुंदर सि्त्रयां आपको गा रही हैं। स्वर्ग लोक। मात लोक। पाताल लोक आपको गा रहे हैं। अर्थ। (हे निरंकार !) जितने भी आपके पैदा किए हुए रत्न हैं। वे अढ़सठ तीर्थों समेत आपको गा रहे हैं। महाबली योद्धे और शूरवीर आपकी सराहना कर रहे हैं। सारी सृष्टि। सृष्टि के सारे खण्ड और चक्र। जो तूने पैदा करके टिकाए हुए हैं; आपको गाते हैं। अर्थ। (हे अकाल पुरख !) (दरअसल तो) वही आपके प्रेम में रंगे हुए रसिए भगतजन आपको गाते हैं (भाव। उनका ही गाना सफल है) जो आपको अच्छे लगते हैं। अनेकों और जीव आपको गा रहे हैं। जो मुझसे गिने भी नहीं जा सकते। (भला) नानक (बिचारा) क्या विचार कर सकता है। अर्थ। ना वह पैदा हुआ है ना ही मरेगा। वह परमात्मा सदा स्थिर है। वह सच्चा मालिक है। जिस अकाल-पुरखु ने ये सृष्टि पैदा की है वह इस समय मौजूद है। सदा रहेगा। उसकी वडिआई महिमा भी सदा अटॅल है। अर्थ। जिस अकाल-पुरख ने कई रंग। किस्मों और जिनसों की माया रच दी है। वह वैसे उसकी रजा है (भाव। जितना बड़ा वह खुद है उतने बड़े जिगरे के साथ जगत को रच के) अपने पैदा किए हुए की संभाल भी कर रहा है। अर्थ। जो कुछ अकाल-पुरख को भाता है। वह ही वह करेगा। किसी जीव द्वारा परमात्मा को हुकम नहीं किया जा सकता (उसे ये नहीं कह सकता-ऐसे ना करो। ऐसे करो)।

आसा राग में एक भोर की हलकी ताज़गी है। आसा दी वार इसी राग में बँधी, और सिख-संगीत के परिदृश्य को आकार दिया। हर सुबह, अमृतसर के हरमंदिर साहिब में, यही राग खुलता है। आसा राग का क्षेत्र है। ‘आसा दी वार’ की रचना गुरु नानक की है, बाद में गुरु अंगद और गुरु अर्जन के साथ संगठित हुई।

गुरु नानक की वाणी का अपना मिज़ाज है, सीधा-सादा, बिना अलंकार के, मगर हर पंक्ति में एक ठहराव। 1469 में तलवण्डी में जन्म, सुलतानपुर के बहीखाते में कुछ साल काम, फिर तीस की उम्र के क़रीब वो लम्बी पैदल यात्रा जो काबुल, बग़दाद, मक्का, जगन्नाथ-पुरी, तिब्बत की सरहद तक उन्हें ले गयी। उनके शबद इन्हीं यात्राओं की वाणी हैं।

इस अंग पर एक ही शबद है।

बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।