नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।
हिन्दी अर्थ: आपके बड़प्पन का अंदाजा नहीं लगाया जा सकता। (यह) नहीं कहा जा सकता (कि आप कितना बड़ा है) आपकी वडिआई (महानता) कहने वाले (खुद को भूल के) आपके में (ही) लीन हैं जाते हैं। 1। हे मेरे बड़े मालिक ! आप (मानो। एक) गहरा (समुंद्र) है। आप बड़े जिगरे वाला है। और बेअंत गुणों वाला है। कोई भी जीव नहीं जानता कि आपका विस्तार कितना बड़ा है। 1। रहाउ। (आप कितना बड़ा है, ये बात जानने के लिए) समाधियां लगाने वाले कई बड़े-बड़े प्रसिद्ध जोगियों ध्यान जोड़ने के यत्न किए। बार-बार प्रयत्न किए; बड़े-बड़े प्रसिद्ध (शास्त्र-वेत्ताओं) विचारवानों ने आपस में एक दूसरे की सहायता लेकर आपके बराबर की कोई हस्ती तलाशने की कोशिश की। पर आपकी महानता का एक तिल जितना भी नहीं बता सके । 2। (विचारवान क्या और सिद्ध योगी क्या। आपकी महानता का अंदाजा तो कोई भी नहीं लगा सका; पर विचारवानों के) सारे भले काम। सारे तप। सारे अच्छे गुण। सिद्ध लोगों की (रिद्धियां-यिद्धियां आदि) बड़े-बड़े काम-किसी को भी ये कामयाबी आपकी सहायता के बिना हासिल नहीं हुई। (जिस किसी को सफलता हासिल हुई है) आपकी मेहर से प्राप्त हुई है। और कोई और (व्यक्ति) इस प्राप्ति के राह में रुकावट नहीं डाल सका। 3। जीव की क्या मजाल (स्मर्था) है कि इन गुणों को बयान कर सके। (हे प्रभू !) आपके गुणों के (मानो) खजाने भरे पड़े हैं। जिसे आप सिफत सालाह करने की दाति बख्शता है। उसके राह में रुकावट डालने के लिए किसी का जोर नहीं चल सकता। क्योंकि। हे नानक ! (कह, आप) सदा कायम रहने वाला प्रभू उस (भाग्यशाली) को सवारने वाला ख़ुद है। 4। 1।
आसा महला 1 ॥ आखा जीवा विसरै मरि जाउ ॥ आखणि अउखा साचा नाउ ॥ साचे नाम की लागै भूख ॥ तितु भूखै खाइ चलीअहि दूख ॥1॥ सो किउ विसरै मेरी माइ ॥ साचा साहिबु साचै नाइ ॥1॥ रहाउ ॥ साचे नाम की तिलु वडिआई ॥ आखि थके कीमति नही पाई ॥ जे सभि मिलि कै आखण पाहि ॥ वडा न होवै घाटि न जाइ ॥2॥ ना ओहु मरै न होवै सोगु ॥ देंदा रहै न चूकै भोगु ॥ गुणु एहो होरु नाही कोइ ॥ ना को होआ ना को होइ ॥3॥ जेवडु आपि तेवड तेरी दाति ॥ जिनि दिनु करि कै कीती राति ॥ खसमु विसारहि ते कमजाति ॥ नानक नावै बाझु सनाति ॥4॥2॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।
हिन्दी अर्थ: आसा महला 1 ॥ ज्यों-ज्यों मैं प्रभू का नाम उचारता हूँ मेरे अंदर आत्मिक जीवन पैदा होता है। जब मुझे नाम भूल जाता है। मेरी आत्मिक मौत होने लग जाती है। (ये पता होते हुए भी प्रभू का) सदा स्थिर नाम सिमरना (एक) मुश्किल काम है। (जिस मनुष्य के अंदर) प्रभू के सदा स्थिर नाम के सिमरन की भूख पैदा होती है। इस भूख की बरकति से (नाम भोजन) खा के उसके सारे दुख दूर हो जाते हैं। 1। हे मेरी माँ ! (अरदास कर कि) वह प्रभू मुझे कभी ना भूले। ज्यों-ज्यों उस सदा स्थिर रहने वाले का नाम सिमरें। त्यों-त्यों वह सदा स्थिर रहने वाला मालिक (मन में बसता है)। 1। रहाउ। सदा स्थिर रहने वाले परमात्मा के नाम की रत्ती जितनी भी महिमा (सारे जीव) बयान करके थक गए है (बयान नहीं कर सकते)। कोई भी बता नहीं सका कि उसके बराबर की कौन सी और हस्ती है। अगर (जगत के) सारे ही जीव मिल के (परमात्मा की महिमा) बयान करने का यत्न करें। तो वह परमात्मा (अपने असल से) बड़ा नहीं हो जाता (और अगर कोई उसकी महिमा का बखान ना करे) तो वह (पहले से) कम नहीं हो जाता। 2। वह परमात्मा कभी मरता नहीं। ना ही (उसकी खातिर) सोग होता है। वह प्रभू सदा (जीवों को रिज़क) देता है। उसकी दी हुई दातों का वितरण कभी खत्म नहीं होता (भाव। जीव उस की दी हुई दातें सदैव बरतते हैं पर वे खत्म नहीं होतीं)। उस प्रभू की बड़ी खूबी ये है कि कोई और उस जैसा नहीं। (उस जैसा अभी तक) ना कोई हुआ है ना ही कभी होंगे। 3। (हे प्रभू !) जितना (बेअंत आप) खुद है। उतनी (बेअंत) आपकी बख्शिश है। (आप ऐसा है) जिसने दिन बनाया है और रात बनाई है। हे नानक ! वह लोग बुरी अस्लियत वाले (बन जाते) हैं जो पति-प्रभू को बिसारते हैं। नाम से वंचित हुए जीव नीच हैं। 4। 2।
आसा महला 1 ॥ जे दरि मांगतु कूक करे महली खसमु सुणे ॥ भावै धीरक भावै धके एक वडाई देइ ॥1॥ जाणहु जोति न पूछहु जाती आगै जाति न हे ॥1॥ रहाउ ॥ आपि कराए आपि करेइ ॥ आपि उलाम॑े चिति धरेइ ॥ जा तूं करणहारु करतारु ॥ किआ मुहताजी किआ संसारु ॥2॥ आपि उपाए आपे देइ ॥ आपे दुरमति मनहि करेइ ॥ गुर परसादि वसै मनि आइ ॥ दुखु अन॑ेरा विचहु जाइ ॥3॥ साचु पिआरा आपि करेइ ॥ अवरी कउ साचु न देइ ॥ जे किसै देइ वखाणै नानकु आगै पूछ न लेइ ॥4॥3॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।
हिन्दी अर्थ: आसा महला 1 ॥ कोई मंगता (चाहे किसी भी जाति का हो) प्रभू के दर पे पुकार करे। तो वह महल का मालिक पति-प्रभू (उसकी पुकार) सुन लेता है। (फिर) उसकी मर्जी। हौसला दे। उसकी मर्जी धक्के दे (मंगते की अरदास सुन लेने में ही) प्रभू उसे इज्जत ही दे रहा है। 1। हे भाई ! सभी में एक प्रभू की ज्योति समझ के किसी की भी जाति ना पूछो (क्योंकि) आगे (परलोक में) किसी की जाति साथ नहीं जाती। 1। रहाउ। (हरेक जीव के अंदर व्यापक हो के) प्रभू खुद ही (प्रेरणा करके जीव से पुकार) करवाता है। (हरेक में व्यापक हो के) खुद ही (पुकार) करता है। खुद ही प्रभू (हरेक जीव के) गिले-शिकवे सुनता है। जब (हे प्रभू ! किसी जीव को आप ये निश्चय करा देता है कि) आप सृजनहार सब कुछ करने के समर्थ (सिर पर रक्षक) है। तो उसे (जगत की) कोई मुहताजी नहीं रहती। जगत उसका कुछ बिगाड़ नहीं सकता। 2। परमात्मा खुद ही जीवों को पैदा करता है। खुद ही (सबको रिज़क आदि) देता है। प्रभू खुद ही जीवों को बुरी मति से बचाता है। गुरू की कृपा से प्रभू जिसके मन में आ बसता है। उसके अंदर से डर दूर हो जाता है। अज्ञानता मिट जाती है। 3। प्रभू खुद ही जीवों के मन में अपना सिमरन प्यारा बनाता है (सिमरन का प्यार पैदा करता है); जिनके अंदर प्यार की अभी कमी है। उन्हें खुद ही सिमरन की दाति नहीं देता। नानक कहता है जिस किसी को सिमरन की दाति प्रभू देता है उससे फिर कर्मों का लेखा नहीं मांगता (भाव। वह जीव कोई ऐसे कर्म करता ही नहीं जिससे उसकी कोई खिचाई हो)। 4। 3।
आसा महला 1 ॥ ताल मदीरे घट के घाट ॥ दोलक दुनीआ वाजहि वाज ॥ नारदु नाचै कलि का भाउ ॥ जती सती कह राखहि पाउ ॥1॥ नानक नाम विटहु कुरबाणु ॥ अंधी दुनीआ साहिबु जाणु ॥1॥ रहाउ ॥ गुरू पासहु फिरि चेला खाइ ॥ तामि परीति वसै घरि आइ ॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।
हिन्दी अर्थ: आसा महला 1 ॥ (मनुष्य के) मन के संकल्प-विकल्प (जैसे) छैणे और पैरों के घुंघरू हैं। दुनिया का मुंह ढोलकी है, ये बाजे बज रहे हैं। और (प्रभू के नाम से सूना) मन (माया के हाथों पे) नाच रहा है। (इसे कहते हैं) कलियुग का प्रभाव। जत-सत को संसार में कहीं जगह नहीं रही। 1। हे नानक ! परमात्मा के नाम से सदके हो। (नाम के बिना) दुनिया (माया में) अंधी हो रही है। ये मालिक प्रभू स्वयं ही आँखों वाला है (उसकी शरण पड़ने से ही जिंदगी का सही रास्ता दिख सकता हैं1। रहाउ। (चेले ने गुरू की सेवा करनी होती है। अब) बल्कि चेला ही गुरू से उदर-पूर्ति करवाता है। रोटी की खातिर ही चेला आ बनता है।
आसा राग में एक भोर की हलकी ताज़गी है। आसा दी वार इसी राग में बँधी, और सिख-संगीत के परिदृश्य को आकार दिया। हर सुबह, अमृतसर के हरमंदिर साहिब में, यही राग खुलता है। आसा राग का क्षेत्र है। ‘आसा दी वार’ की रचना गुरु नानक की है, बाद में गुरु अंगद और गुरु अर्जन के साथ संगठित हुई।
नानक की रचनाओं में एक खास तरह की आबजर्वेशनल आँख है। एक पटवारी का पेशा छोड़ कर तीस के बाद के दशकों में वो काबुल, मक्का, अरब, असम, श्रीलंका, और तिब्बत की सरहद तक गए। हर जगह संत-फ़क़ीरों, बादशाहों, और साधारण किसानों से बातचीत की, और उसी बातचीत की पर्तें इन शबदों में बैठी हैं।
इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “आपके बड़प्पन का अंदाजा नहीं लगाया जा सकता।”
एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।