अंग
372
राग आसा
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਪਰਦੇਸੁ ਝਾਗਿ ਸਉਦੇ ਕਉ ਆਇਆ ॥
ਵਸਤੁ ਅਨੂਪ ਸੁਣੀ ਲਾਭਾਇਆ ॥
ਗੁਣ ਰਾਸਿ ਬੰਨਿੑ ਪਲੈ ਆਨੀ ॥
ਦੇਖਿ ਰਤਨੁ ਇਹੁ ਮਨੁ ਲਪਟਾਨੀ ॥੧॥
ਸਾਹ ਵਾਪਾਰੀ ਦੁਆਰੈ ਆਏ ॥
ਵਖਰੁ ਕਾਢਹੁ ਸਉਦਾ ਕਰਾਏ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਸਾਹਿ ਪਠਾਇਆ ਸਾਹੈ ਪਾਸਿ ॥
ਅਮੋਲ ਰਤਨ ਅਮੋਲਾ ਰਾਸਿ ॥
ਵਿਸਟੁ ਸੁਭਾਈ ਪਾਇਆ ਮੀਤ ॥
ਸਉਦਾ ਮਿਲਿਆ ਨਿਹਚਲ ਚੀਤ ॥੨॥
ਭਉ ਨਹੀ ਤਸਕਰ ਪਉਣ ਨ ਪਾਨੀ ॥
ਸਹਜਿ ਵਿਹਾਝੀ ਸਹਜਿ ਲੈ ਜਾਨੀ ॥
ਸਤ ਕੈ ਖਟਿਐ ਦੁਖੁ ਨਹੀ ਪਾਇਆ ॥
ਸਹੀ ਸਲਾਮਤਿ ਘਰਿ ਲੈ ਆਇਆ ॥੩॥
ਮਿਲਿਆ ਲਾਹਾ ਭਏ ਅਨੰਦ ॥
ਧੰਨੁ ਸਾਹ ਪੂਰੇ ਬਖਸਿੰਦ ॥
ਇਹੁ ਸਉਦਾ ਗੁਰਮੁਖਿ ਕਿਨੈ ਵਿਰਲੈ ਪਾਇਆ ॥
ਸਹਲੀ ਖੇਪ ਨਾਨਕੁ ਲੈ ਆਇਆ ॥੪॥੬॥
ਪਰਦੇਸੁ ਝਾਗਿ ਸਉਦੇ ਕਉ ਆਇਆ ॥
ਵਸਤੁ ਅਨੂਪ ਸੁਣੀ ਲਾਭਾਇਆ ॥
ਗੁਣ ਰਾਸਿ ਬੰਨਿੑ ਪਲੈ ਆਨੀ ॥
ਦੇਖਿ ਰਤਨੁ ਇਹੁ ਮਨੁ ਲਪਟਾਨੀ ॥੧॥
ਸਾਹ ਵਾਪਾਰੀ ਦੁਆਰੈ ਆਏ ॥
ਵਖਰੁ ਕਾਢਹੁ ਸਉਦਾ ਕਰਾਏ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਸਾਹਿ ਪਠਾਇਆ ਸਾਹੈ ਪਾਸਿ ॥
ਅਮੋਲ ਰਤਨ ਅਮੋਲਾ ਰਾਸਿ ॥
ਵਿਸਟੁ ਸੁਭਾਈ ਪਾਇਆ ਮੀਤ ॥
ਸਉਦਾ ਮਿਲਿਆ ਨਿਹਚਲ ਚੀਤ ॥੨॥
ਭਉ ਨਹੀ ਤਸਕਰ ਪਉਣ ਨ ਪਾਨੀ ॥
ਸਹਜਿ ਵਿਹਾਝੀ ਸਹਜਿ ਲੈ ਜਾਨੀ ॥
ਸਤ ਕੈ ਖਟਿਐ ਦੁਖੁ ਨਹੀ ਪਾਇਆ ॥
ਸਹੀ ਸਲਾਮਤਿ ਘਰਿ ਲੈ ਆਇਆ ॥੩॥
ਮਿਲਿਆ ਲਾਹਾ ਭਏ ਅਨੰਦ ॥
ਧੰਨੁ ਸਾਹ ਪੂਰੇ ਬਖਸਿੰਦ ॥
ਇਹੁ ਸਉਦਾ ਗੁਰਮੁਖਿ ਕਿਨੈ ਵਿਰਲੈ ਪਾਇਆ ॥
ਸਹਲੀ ਖੇਪ ਨਾਨਕੁ ਲੈ ਆਇਆ ॥੪॥੬॥
आसा महला ५ ॥
परदेसु झागि सउदे कउ आइआ ॥
वसतु अनूप सुणी लाभाइआ ॥
गुण रासि बंनि॑ पलै आनी ॥
देखि रतनु इहु मनु लपटानी ॥१॥
साह वापारी दुआरै आए ॥
वखरु काढहु सउदा कराए ॥१॥ रहाउ ॥
साहि पठाइआ साहै पासि ॥
अमोल रतन अमोला रासि ॥
विसटु सुभाई पाइआ मीत ॥
सउदा मिलिआ निहचल चीत ॥२॥
भउ नही तसकर पउण न पानी ॥
सहजि विहाझी सहजि लै जानी ॥
सत कै खटिऐ दुखु नही पाइआ ॥
सही सलामति घरि लै आइआ ॥३॥
मिलिआ लाहा भए अनंद ॥
धंनु साह पूरे बखसिंद ॥
इहु सउदा गुरमुखि किनै विरलै पाइआ ॥
सहली खेप नानकु लै आइआ ॥४॥६॥
परदेसु झागि सउदे कउ आइआ ॥
वसतु अनूप सुणी लाभाइआ ॥
गुण रासि बंनि॑ पलै आनी ॥
देखि रतनु इहु मनु लपटानी ॥१॥
साह वापारी दुआरै आए ॥
वखरु काढहु सउदा कराए ॥१॥ रहाउ ॥
साहि पठाइआ साहै पासि ॥
अमोल रतन अमोला रासि ॥
विसटु सुभाई पाइआ मीत ॥
सउदा मिलिआ निहचल चीत ॥२॥
भउ नही तसकर पउण न पानी ॥
सहजि विहाझी सहजि लै जानी ॥
सत कै खटिऐ दुखु नही पाइआ ॥
सही सलामति घरि लै आइआ ॥३॥
मिलिआ लाहा भए अनंद ॥
धंनु साह पूरे बखसिंद ॥
इहु सउदा गुरमुखि किनै विरलै पाइआ ॥
सहली खेप नानकु लै आइआ ॥४॥६॥
हिन्दी अर्थ: आसा महला ५ ॥ हे शाह ! (चौरासी लाख जूनियों वाला) पराया देश बड़ी मुश्किलों से पार करके मैं (तेरे दर पे नाम का) सौदा करने आया हूँ। मैंने सुना है कि नाम-वस्तु बड़ी अनुपम है और लाभदायक है। हे गुरू ! मैंने गुणों की सरमाया पल्ले बाँध के लाया हूँ। प्रभू का नाम-रत्नदेख के मेरा ये मन (इसे खरीदने के लिए) रीझ गया है। 1। हे शाह ! हे सतिगुरू ! तेरे दर पे (नाम का वणज करने वाले) जीव-व्यापारी आए हैं (तू अपने खजाने में से नाम का) सौदा निकाल के इन्हें सौदा करने की जाच सिखा। 1। रहाउ। (हे भाई !) परमात्मा-शाह ने मुझे गुरू के पास भेजा (गुरू के दर पर मुझे वह) रत्न मिल गया है वह राशि प्राप्त हो गई है। दुनिया में जिसके बराबर की कीमत का कोई पदार्थ नहीं। (परमात्मा की मेहर से मुझे) प्यार भरे हृदय वाला विचोला मित्र मिल गया है। उससे परमात्मा के नाम का सौदा मिला है और मेरा मन दुनिया के पदार्थों की ओर डोलने से हट गया है। 2। (हे भाई ! इस रत्न को इस सरमाए को) चोरों से खतरा नहीं। हवा से डर नहीं। पानी से भय नहीं (ना चोर चुरा सकते हैं ना तुफान उड़ा सकते हैं ना ही पानी डुबा सकता है)। आत्मिक अडोलता की बरकति से ये रत्न मैंने (गुरू से) खरीदा है। आत्मिक अडोलता में टिका रहके ये रत्न मैं अपने साथ ले जाऊँगा। ईमानदारी से कमाने के कारण इस रत्न को हासिल करने में मुझे कोई दुख नहीं सहना पड़ा। और ये नाम-सौदा मैं सही सलामत संभाल के अपने हृदय-घर में ले आया हूँ। 3। (तेरी मेहर से मुझे तेरे नाम का) लाभ मिला है और मेरे अंदर आनंद पैदा हो गया है। हे पूरी बख्शिशें करने वाले शाह प्रभू ! मैं तुझे ही सलाहता हॅू हे भाई ! किसी विरले भाग्यवान ने ही गुरू की शरण पड़ कर (प्रभू के नाम का) सौदा प्राप्त किया है (गुरू की शरण पड़ के ही) नानक भी ये लाभदायक सौदा कमा सका है। 4। 6।
ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਗੁਨੁ ਅਵਗਨੁ ਮੇਰੋ ਕਛੁ ਨ ਬੀਚਾਰੋ ॥
ਨਹ ਦੇਖਿਓ ਰੂਪ ਰੰਗ ਸਂੀਗਾਰੋ ॥
ਚਜ ਅਚਾਰ ਕਿਛੁ ਬਿਧਿ ਨਹੀ ਜਾਨੀ ॥
ਬਾਹ ਪਕਰਿ ਪ੍ਰਿਅ ਸੇਜੈ ਆਨੀ ॥੧॥
ਸੁਨਿਬੋ ਸਖੀ ਕੰਤਿ ਹਮਾਰੋ ਕੀਅਲੋ ਖਸਮਾਨਾ ॥
ਕਰੁ ਮਸਤਕਿ ਧਾਰਿ ਰਾਖਿਓ ਕਰਿ ਅਪੁਨਾ ਕਿਆ ਜਾਨੈ ਇਹੁ ਲੋਕੁ ਅਜਾਨਾ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਸੁਹਾਗੁ ਹਮਾਰੋ ਅਬ ਹੁਣਿ ਸੋਹਿਓ ॥
ਕੰਤੁ ਮਿਲਿਓ ਮੇਰੋ ਸਭੁ ਦੁਖੁ ਜੋਹਿਓ ॥
ਆਂਗਨਿ ਮੇਰੈ ਸੋਭਾ ਚੰਦ ॥
ਨਿਸਿ ਬਾਸੁਰ ਪ੍ਰਿਅ ਸੰਗਿ ਅਨੰਦ ॥੨॥
ਬਸਤ੍ਰ ਹਮਾਰੇ ਰੰਗਿ ਚਲੂਲ ॥
ਸਗਲ ਆਭਰਣ ਸੋਭਾ ਕੰਠਿ ਫੂਲ ॥
ਪ੍ਰਿਅ ਪੇਖੀ ਦ੍ਰਿਸਟਿ ਪਾਏ ਸਗਲ ਨਿਧਾਨ ॥
ਦੁਸਟ ਦੂਤ ਕੀ ਚੂਕੀ ਕਾਨਿ ॥੩॥
ਸਦ ਖੁਸੀਆ ਸਦਾ ਰੰਗ ਮਾਣੇ ॥
ਨਉ ਨਿਧਿ ਨਾਮੁ ਗ੍ਰਿਹ ਮਹਿ ਤ੍ਰਿਪਤਾਨੇ ॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਜਉ ਪਿਰਹਿ ਸੀਗਾਰੀ ॥
ਥਿਰੁ ਸੋਹਾਗਨਿ ਸੰਗਿ ਭਤਾਰੀ ॥੪॥੭॥
ਗੁਨੁ ਅਵਗਨੁ ਮੇਰੋ ਕਛੁ ਨ ਬੀਚਾਰੋ ॥
ਨਹ ਦੇਖਿਓ ਰੂਪ ਰੰਗ ਸਂੀਗਾਰੋ ॥
ਚਜ ਅਚਾਰ ਕਿਛੁ ਬਿਧਿ ਨਹੀ ਜਾਨੀ ॥
ਬਾਹ ਪਕਰਿ ਪ੍ਰਿਅ ਸੇਜੈ ਆਨੀ ॥੧॥
ਸੁਨਿਬੋ ਸਖੀ ਕੰਤਿ ਹਮਾਰੋ ਕੀਅਲੋ ਖਸਮਾਨਾ ॥
ਕਰੁ ਮਸਤਕਿ ਧਾਰਿ ਰਾਖਿਓ ਕਰਿ ਅਪੁਨਾ ਕਿਆ ਜਾਨੈ ਇਹੁ ਲੋਕੁ ਅਜਾਨਾ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਸੁਹਾਗੁ ਹਮਾਰੋ ਅਬ ਹੁਣਿ ਸੋਹਿਓ ॥
ਕੰਤੁ ਮਿਲਿਓ ਮੇਰੋ ਸਭੁ ਦੁਖੁ ਜੋਹਿਓ ॥
ਆਂਗਨਿ ਮੇਰੈ ਸੋਭਾ ਚੰਦ ॥
ਨਿਸਿ ਬਾਸੁਰ ਪ੍ਰਿਅ ਸੰਗਿ ਅਨੰਦ ॥੨॥
ਬਸਤ੍ਰ ਹਮਾਰੇ ਰੰਗਿ ਚਲੂਲ ॥
ਸਗਲ ਆਭਰਣ ਸੋਭਾ ਕੰਠਿ ਫੂਲ ॥
ਪ੍ਰਿਅ ਪੇਖੀ ਦ੍ਰਿਸਟਿ ਪਾਏ ਸਗਲ ਨਿਧਾਨ ॥
ਦੁਸਟ ਦੂਤ ਕੀ ਚੂਕੀ ਕਾਨਿ ॥੩॥
ਸਦ ਖੁਸੀਆ ਸਦਾ ਰੰਗ ਮਾਣੇ ॥
ਨਉ ਨਿਧਿ ਨਾਮੁ ਗ੍ਰਿਹ ਮਹਿ ਤ੍ਰਿਪਤਾਨੇ ॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਜਉ ਪਿਰਹਿ ਸੀਗਾਰੀ ॥
ਥਿਰੁ ਸੋਹਾਗਨਿ ਸੰਗਿ ਭਤਾਰੀ ॥੪॥੭॥
आसा महला ५ ॥
गुनु अवगनु मेरो कछु न बीचारो ॥
नह देखिओ रूप रंग संीगारो ॥
चज अचार किछु बिधि नही जानी ॥
बाह पकरि प्रिअ सेजै आनी ॥१॥
सुनिबो सखी कंति हमारो कीअलो खसमाना ॥
करु मसतकि धारि राखिओ करि अपुना किआ जानै इहु लोकु अजाना ॥१॥ रहाउ ॥
सुहागु हमारो अब हुणि सोहिओ ॥
कंतु मिलिओ मेरो सभु दुखु जोहिओ ॥
आंगनि मेरै सोभा चंद ॥
निसि बासुर प्रिअ संगि अनंद ॥२॥
बसत्र हमारे रंगि चलूल ॥
सगल आभरण सोभा कंठि फूल ॥
प्रिअ पेखी द्रिसटि पाए सगल निधान ॥
दुसट दूत की चूकी कानि ॥३॥
सद खुसीआ सदा रंग माणे ॥
नउ निधि नामु ग्रिह महि त्रिपताने ॥
कहु नानक जउ पिरहि सीगारी ॥
थिरु सोहागनि संगि भतारी ॥४॥७॥
गुनु अवगनु मेरो कछु न बीचारो ॥
नह देखिओ रूप रंग संीगारो ॥
चज अचार किछु बिधि नही जानी ॥
बाह पकरि प्रिअ सेजै आनी ॥१॥
सुनिबो सखी कंति हमारो कीअलो खसमाना ॥
करु मसतकि धारि राखिओ करि अपुना किआ जानै इहु लोकु अजाना ॥१॥ रहाउ ॥
सुहागु हमारो अब हुणि सोहिओ ॥
कंतु मिलिओ मेरो सभु दुखु जोहिओ ॥
आंगनि मेरै सोभा चंद ॥
निसि बासुर प्रिअ संगि अनंद ॥२॥
बसत्र हमारे रंगि चलूल ॥
सगल आभरण सोभा कंठि फूल ॥
प्रिअ पेखी द्रिसटि पाए सगल निधान ॥
दुसट दूत की चूकी कानि ॥३॥
सद खुसीआ सदा रंग माणे ॥
नउ निधि नामु ग्रिह महि त्रिपताने ॥
कहु नानक जउ पिरहि सीगारी ॥
थिरु सोहागनि संगि भतारी ॥४॥७॥
हिन्दी अर्थ: आसा महला ५ ॥ (हे सहेली ! मेरे पति ने) मेरा कोई गुण नहीं विचारा मेरा कोई अवगुण नहीं ताका। उसने मेरा रूप नहीं देखा। रंग नहीं देखा। मैंने कोई सुचॅज नहीं था सीखा हुआ। मैं कोई उच्च आचरण का ढंग नहीं थी जानती। फिर भी (हे सहेलियो !) मेरी बाँह पकड़ के प्यारे (प्रभू-पति) मुझे अपनी सेज पर ले आए। 1। हे (मेरी) सहेलिए ! सुन मेरे पति-प्रभू ने (मेरी) संभाल की है। (मेरे) माथे पर (अपना) हाथ रख के उसने मुझे अपना समझ के रक्षा की है। पर। ये मूर्ख जगत इस (भेद) को क्या समझे। 1। रहाउ। (हे सहेलियो !) अब मेरा बढ़िया सितारा चमक उठा है। मेरा प्रभू-पति मुझे मिल गया है। उसने मेरा सारा रोग ध्यान से देख लिया है। मेरे (हृदय के) आंगन में शोभा का चाँद चढ़ आया है। मैं रात-दिन प्यारे (प्रभू-पति) के साथ आनंद ले रही हूँ। 2। मेरे (सालू आदि) कपड़े। गाढ़े रंग में रंगे गए हैं। सारे गहने (मेरे शरीर पर फब रहे हैं) फूलों के हार मेरे गले में शोभायमान हैं। (हे सहेली !) प्यारे (प्रभू-पति) ने मुझे (प्यार भरी) निगाह से देखा है (अब जैसे) मैंने सारे ही खजाने प्राप्त कर लिए हैं। हे सहेलिए ! (कामादिक) बुरे वैरियों की धौंस (मेरे पर) नहीं चलती। 3। मुझे अब सदा खुशियां ही खुशियां हैं। मैं अब सदा आत्मिक आनंद ले रही हूँ। (हे सहेली ! जगत के सारे) नौ-खजानों (जैसा) परमात्मा का नाम मेरे हृदय-घर में आ के बसा है। मेरी सारी तृष्णा समाप्त हो चुकी है। हे नानक ! (कह,) जब (किसी जीव-स्त्री को) प्रभू-पति ने सुंदर जीवन वाली बना दिया। वह प्रभू-पति के चरणों में जुड़ के अच्छे भाग्यों वाली बन गई। वह सदा के लिए अडोल चित्त हो गई। 4। 7।
ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਦਾਨੁ ਦੇਇ ਕਰਿ ਪੂਜਾ ਕਰਨਾ ॥
ਲੈਤ ਦੇਤ ਉਨੑ ਮੂਕਰਿ ਪਰਨਾ ॥
ਜਿਤੁ ਦਰਿ ਤੁਮੑ ਹੈ ਬ੍ਰਾਹਮਣ ਜਾਣਾ ॥
ਤਿਤੁ ਦਰਿ ਤੂੰਹੀ ਹੈ ਪਛੁਤਾਣਾ ॥੧॥
ਐਸੇ ਬ੍ਰਾਹਮਣ ਡੂਬੇ ਭਾਈ ॥
ਨਿਰਾਪਰਾਧ ਚਿਤਵਹਿ ਬੁਰਿਆਈ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਅੰਤਰਿ ਲੋਭੁ ਫਿਰਹਿ ਹਲਕਾਏ ॥
ਨਿੰਦਾ ਕਰਹਿ ਸਿਰਿ ਭਾਰੁ ਉਠਾਏ ॥
ਮਾਇਆ ਮੂਠਾ ਚੇਤੈ ਨਾਹੀ ॥
ਭਰਮੇ ਭੂਲਾ ਬਹੁਤੀ ਰਾਹੀ ॥੨॥
ਬਾਹਰਿ ਭੇਖ ਕਰਹਿ ਘਨੇਰੇ ॥
ਅੰਤਰਿ ਬਿਖਿਆ ਉਤਰੀ ਘੇਰੇ ॥
ਅਵਰ ਉਪਦੇਸੈ ਆਪਿ ਨ ਬੂਝੈ ॥
ਐਸਾ ਬ੍ਰਾਹਮਣੁ ਕਹੀ ਨ ਸੀਝੈ ॥੩॥
ਮੂਰਖ ਬਾਮਣ ਪ੍ਰਭੂ ਸਮਾਲਿ ॥
ਦੇਖਤ ਸੁਨਤ ਤੇਰੈ ਹੈ ਨਾਲਿ ॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਜੇ ਹੋਵੀ ਭਾਗੁ ॥
ਮਾਨੁ ਛੋਡਿ ਗੁਰ ਚਰਣੀ ਲਾਗੁ ॥੪॥੮॥
ਦਾਨੁ ਦੇਇ ਕਰਿ ਪੂਜਾ ਕਰਨਾ ॥
ਲੈਤ ਦੇਤ ਉਨੑ ਮੂਕਰਿ ਪਰਨਾ ॥
ਜਿਤੁ ਦਰਿ ਤੁਮੑ ਹੈ ਬ੍ਰਾਹਮਣ ਜਾਣਾ ॥
ਤਿਤੁ ਦਰਿ ਤੂੰਹੀ ਹੈ ਪਛੁਤਾਣਾ ॥੧॥
ਐਸੇ ਬ੍ਰਾਹਮਣ ਡੂਬੇ ਭਾਈ ॥
ਨਿਰਾਪਰਾਧ ਚਿਤਵਹਿ ਬੁਰਿਆਈ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਅੰਤਰਿ ਲੋਭੁ ਫਿਰਹਿ ਹਲਕਾਏ ॥
ਨਿੰਦਾ ਕਰਹਿ ਸਿਰਿ ਭਾਰੁ ਉਠਾਏ ॥
ਮਾਇਆ ਮੂਠਾ ਚੇਤੈ ਨਾਹੀ ॥
ਭਰਮੇ ਭੂਲਾ ਬਹੁਤੀ ਰਾਹੀ ॥੨॥
ਬਾਹਰਿ ਭੇਖ ਕਰਹਿ ਘਨੇਰੇ ॥
ਅੰਤਰਿ ਬਿਖਿਆ ਉਤਰੀ ਘੇਰੇ ॥
ਅਵਰ ਉਪਦੇਸੈ ਆਪਿ ਨ ਬੂਝੈ ॥
ਐਸਾ ਬ੍ਰਾਹਮਣੁ ਕਹੀ ਨ ਸੀਝੈ ॥੩॥
ਮੂਰਖ ਬਾਮਣ ਪ੍ਰਭੂ ਸਮਾਲਿ ॥
ਦੇਖਤ ਸੁਨਤ ਤੇਰੈ ਹੈ ਨਾਲਿ ॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਜੇ ਹੋਵੀ ਭਾਗੁ ॥
ਮਾਨੁ ਛੋਡਿ ਗੁਰ ਚਰਣੀ ਲਾਗੁ ॥੪॥੮॥
आसा महला ५ ॥
दानु देइ करि पूजा करना ॥
लैत देत उन॑ मूकरि परना ॥
जितु दरि तुम॑ है ब्राहमण जाणा ॥
तितु दरि तूंही है पछुताणा ॥१॥
ऐसे ब्राहमण डूबे भाई ॥
निरापराध चितवहि बुरिआई ॥१॥ रहाउ ॥
अंतरि लोभु फिरहि हलकाए ॥
निंदा करहि सिरि भारु उठाए ॥
माइआ मूठा चेतै नाही ॥
भरमे भूला बहुती राही ॥२॥
बाहरि भेख करहि घनेरे ॥
अंतरि बिखिआ उतरी घेरे ॥
अवर उपदेसै आपि न बूझै ॥
ऐसा ब्राहमणु कही न सीझै ॥३॥
मूरख बामण प्रभू समालि ॥
देखत सुनत तेरै है नालि ॥
कहु नानक जे होवी भागु ॥
मानु छोडि गुर चरणी लागु ॥४॥८॥
दानु देइ करि पूजा करना ॥
लैत देत उन॑ मूकरि परना ॥
जितु दरि तुम॑ है ब्राहमण जाणा ॥
तितु दरि तूंही है पछुताणा ॥१॥
ऐसे ब्राहमण डूबे भाई ॥
निरापराध चितवहि बुरिआई ॥१॥ रहाउ ॥
अंतरि लोभु फिरहि हलकाए ॥
निंदा करहि सिरि भारु उठाए ॥
माइआ मूठा चेतै नाही ॥
भरमे भूला बहुती राही ॥२॥
बाहरि भेख करहि घनेरे ॥
अंतरि बिखिआ उतरी घेरे ॥
अवर उपदेसै आपि न बूझै ॥
ऐसा ब्राहमणु कही न सीझै ॥३॥
मूरख बामण प्रभू समालि ॥
देखत सुनत तेरै है नालि ॥
कहु नानक जे होवी भागु ॥
मानु छोडि गुर चरणी लागु ॥४॥८॥
हिन्दी अर्थ: आसा महला ५ ॥ (हे भाई ! देखो ऐसे ब्राहमणों का हाल ! जजमान तो) उन्हें दान दे के उनकी पूजा-मान्यता करते हैं। पर वे ब्राहमण लेते-देते भी (सब कुछ हासिल करते हुए भी) सदा मुकरे रहते हैं (कभी अपने जजमानों का धन्यवाद तक नहीं करते। बल्कि दान ले के भी यही जाहिर करते हैं कि हम जजमानों का परलोक सवार रहे हैं)। पर। हे ब्राहमण ! (ये याद रख) जिस प्रभू-दर पर (आखिर) तूने पहुँचना है उस दर पर तू ही (अपनी इन करतूतों के कारण) पछताएगा। 1। हे भाई ! ऐसे ब्राहमणों को (माया के मोह में) डूबे हुए जानो जो निर्दोष लोगों को भी नुकसान पहुँचाने की सोचें सोचते रहते हैं (ऊँची जाति का होना। अथवा वेद-शास्त्र पढ़े होना भी उनके आत्मिक जीवन को गर्क होने से नहीं बचा सकता। अगर वे दूसरों का बुरा देखते रहते हैं)। 1। रहाउ। हे भाई ! वैसे तो ये ब्राहमण अपने आप को वेद आदि धर्म-पुस्तकों का ज्ञाता जाहिर करते हैं। पर इनके मन में लोभ (प्रबल हिलोरे ले रहा है। ये लोभ के कारण) हलकाए हुए फिरते हैं। अपने आप को विद्वान जाहिर करते हुए भी ये (दूसरों की) निंदा करते फिरते हैं। अपने सिर पर निंदा का भार उठाए फिरते हैं। (हे भाई !) माया (के मोह) के हाथों अपने आत्मिक जीवन की राशि-पूँजी लुटा बैठा ये ब्राहमण परमात्मा को याद नहीं करता (इस तरफ) ध्यान नहीं देता। माया की भटकना के कारण गलत रास्ते पर पड़ा हुआ ब्राहमण कई दिशाओं से दुखी हुआ फिरता है। 2। (हे भाई !) बाहर (लोगों को पतियाने के लिए अपने आप को लोगों का धार्मिक आगू जाहिर करने के वास्ते) कई (धार्मिक) भेष करते हैं। पर ऐसे ब्राहमणों के अपने अंदर तो माया घेर के डेरा डाले बैठी है पर (हे भाई ! जो ब्राहमण) औरों को तो (धर्म का) उपदेश करता है। पर स्वयं (उस धर्म को) नहीं समझता। ऐसा ब्राहमण (लोक-परलोक) कहीं भी कामयाब नहीं होता। 3। हे नानक ! (ऐसे ब्राहमण को कह,) हे मूर्ख ब्राहमण ! परमात्मा को (अपने हृदय में) याद किया कर। वह परमात्मा (तेरे सारे काम) देखता (तेरी सारी बातें) सुनता (सदैव) तेरे साथ रहता है। अगर तेरे भाग्य जागें तो (अपनी उच्च जाति और विद्ववता का) गुमान त्याग के गुरू की शरण पड़। 4। 8।
ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੫ ॥
आसा महला ५ ॥
हिन्दी अर्थ: आसा महला ५ ॥
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 372 है, राग आसा का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।
M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।
Noida के office-tower की 15वीं मंज़िल से शाम का Delhi-view।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 58 पंक्तियों का है, 4 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 372” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: आसा राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 373 →, पीछे का: ← अंग 371।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।