अंग
384
राग आसा
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਕਾਮੁ ਕ੍ਰੋਧੁ ਅਹੰਕਾਰੁ ਗਾਖਰੋ ਸੰਜਮਿ ਕਉਨ ਛੁਟਿਓ ਰੀ ॥
ਸੁਰਿ ਨਰ ਦੇਵ ਅਸੁਰ ਤ੍ਰੈ ਗੁਨੀਆ ਸਗਲੋ ਭਵਨੁ ਲੁਟਿਓ ਰੀ ॥੧॥
ਦਾਵਾ ਅਗਨਿ ਬਹੁਤੁ ਤ੍ਰਿਣ ਜਾਲੇ ਕੋਈ ਹਰਿਆ ਬੂਟੁ ਰਹਿਓ ਰੀ ॥
ਐਸੋ ਸਮਰਥੁ ਵਰਨਿ ਨ ਸਾਕਉ ਤਾ ਕੀ ਉਪਮਾ ਜਾਤ ਨ ਕਹਿਓ ਰੀ ॥੨॥
ਕਾਜਰ ਕੋਠ ਮਹਿ ਭਈ ਨ ਕਾਰੀ ਨਿਰਮਲ ਬਰਨੁ ਬਨਿਓ ਰੀ ॥
ਮਹਾ ਮੰਤ੍ਰੁ ਗੁਰ ਹਿਰਦੈ ਬਸਿਓ ਅਚਰਜ ਨਾਮੁ ਸੁਨਿਓ ਰੀ ॥੩॥
ਕਰਿ ਕਿਰਪਾ ਪ੍ਰਭ ਨਦਰਿ ਅਵਲੋਕਨ ਅਪੁਨੈ ਚਰਣਿ ਲਗਾਈ ॥
ਪ੍ਰੇਮ ਭਗਤਿ ਨਾਨਕ ਸੁਖੁ ਪਾਇਆ ਸਾਧੂ ਸੰਗਿ ਸਮਾਈ ॥੪॥੧੨॥੫੧॥
ਸੁਰਿ ਨਰ ਦੇਵ ਅਸੁਰ ਤ੍ਰੈ ਗੁਨੀਆ ਸਗਲੋ ਭਵਨੁ ਲੁਟਿਓ ਰੀ ॥੧॥
ਦਾਵਾ ਅਗਨਿ ਬਹੁਤੁ ਤ੍ਰਿਣ ਜਾਲੇ ਕੋਈ ਹਰਿਆ ਬੂਟੁ ਰਹਿਓ ਰੀ ॥
ਐਸੋ ਸਮਰਥੁ ਵਰਨਿ ਨ ਸਾਕਉ ਤਾ ਕੀ ਉਪਮਾ ਜਾਤ ਨ ਕਹਿਓ ਰੀ ॥੨॥
ਕਾਜਰ ਕੋਠ ਮਹਿ ਭਈ ਨ ਕਾਰੀ ਨਿਰਮਲ ਬਰਨੁ ਬਨਿਓ ਰੀ ॥
ਮਹਾ ਮੰਤ੍ਰੁ ਗੁਰ ਹਿਰਦੈ ਬਸਿਓ ਅਚਰਜ ਨਾਮੁ ਸੁਨਿਓ ਰੀ ॥੩॥
ਕਰਿ ਕਿਰਪਾ ਪ੍ਰਭ ਨਦਰਿ ਅਵਲੋਕਨ ਅਪੁਨੈ ਚਰਣਿ ਲਗਾਈ ॥
ਪ੍ਰੇਮ ਭਗਤਿ ਨਾਨਕ ਸੁਖੁ ਪਾਇਆ ਸਾਧੂ ਸੰਗਿ ਸਮਾਈ ॥੪॥੧੨॥੫੧॥
कामु क्रोधु अहंकारु गाखरो संजमि कउन छुटिओ री ॥
सुरि नर देव असुर त्रै गुनीआ सगलो भवनु लुटिओ री ॥१॥
दावा अगनि बहुतु त्रिण जाले कोई हरिआ बूटु रहिओ री ॥
ऐसो समरथु वरनि न साकउ ता की उपमा जात न कहिओ री ॥२॥
काजर कोठ महि भई न कारी निरमल बरनु बनिओ री ॥
महा मंत्रु गुर हिरदै बसिओ अचरज नामु सुनिओ री ॥३॥
करि किरपा प्रभ नदरि अवलोकन अपुनै चरणि लगाई ॥
प्रेम भगति नानक सुखु पाइआ साधू संगि समाई ॥४॥१२॥५१॥
सुरि नर देव असुर त्रै गुनीआ सगलो भवनु लुटिओ री ॥१॥
दावा अगनि बहुतु त्रिण जाले कोई हरिआ बूटु रहिओ री ॥
ऐसो समरथु वरनि न साकउ ता की उपमा जात न कहिओ री ॥२॥
काजर कोठ महि भई न कारी निरमल बरनु बनिओ री ॥
महा मंत्रु गुर हिरदै बसिओ अचरज नामु सुनिओ री ॥३॥
करि किरपा प्रभ नदरि अवलोकन अपुनै चरणि लगाई ॥
प्रेम भगति नानक सुखु पाइआ साधू संगि समाई ॥४॥१२॥५१॥
हिन्दी अर्थ: हे बहन ! ये काम।क्रोध।ये अहंकार (ये हरेक।जीवों को) बहुत मुश्किलें देने वाले हैं।(तेरे अंदर से) किस युक्ति से इनका नाश हुआ। हे बहन ! भले मनुष्य।देवते।दैत्य।सारे त्रिगुणी जीव- सारा जगत ही इन्होंने लूट लिया है (सारे जगत का आत्मिक जीवन का सरमाया इन्होंने लूट लिया है)। 1। हे सहेली ! जब जंगल को आग लगती है तो बहुत सारा घास-बूटा जल जाता है।कोई विरला हरा पौधा ही बचता है (इसी तरह जगत-जंगल को तृष्णा की आग जला रही है।कोई विरला आत्मिक तौर पे बली मनुष्य ही बच सकता है। जो इस तृष्णा-अग्नि की जलन से बचा है) ऐसे बली मनुष्य की आत्मिक अवस्था मैं बयान नहीं कर सकती।मैं बता नहीं सकती कि उस जैसा और कौन हो सकता है। 2। हे बहन ! मेरे हृदय में सतिगुरू का (शबद रूपी) बड़ा बली मंत्र बस रहा है।मैं आश्चर्य (ताकत वाले) प्रभू का नाम सुनती रहती हूँ। (इस वास्ते इस) काजल भरी कोठड़ी (संसार में रहते हुए भी) मैं विकारों की (कालिख़ से) काली नहीं हुई।मेरा साफ-सुथरा रंग ही टिका रहा है। 3। हे नानक ! (कह,) हे बहिन ! प्रभू ने कृपा करके अपनी (मेहर की) निगाह से मुझे देखा।मुझे अपने चरणों में जोड़े रखा। मुझे उसका प्रेम प्राप्त हुआ।मुझे उसकी भक्ति (की दाति) मिली।मैं (तृष्णा-अग्नि में जल रहे संसार में भी) आत्मिक आनंद पा रही हूँ।मैं साध-संगति में लीन रहती हूँ। 4। 12। 51।
ੴ ਸਤਿਗੁਰ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ॥
ਰਾਗੁ ਆਸਾ ਘਰੁ ੭ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਲਾਲੁ ਚੋਲਨਾ ਤੈ ਤਨਿ ਸੋਹਿਆ ॥
ਸੁਰਿਜਨ ਭਾਨੀ ਤਾਂ ਮਨੁ ਮੋਹਿਆ ॥੧॥
ਕਵਨ ਬਨੀ ਰੀ ਤੇਰੀ ਲਾਲੀ ॥
ਕਵਨ ਰੰਗਿ ਤੂੰ ਭਈ ਗੁਲਾਲੀ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਤੁਮ ਹੀ ਸੁੰਦਰਿ ਤੁਮਹਿ ਸੁਹਾਗੁ ॥
ਤੁਮ ਘਰਿ ਲਾਲਨੁ ਤੁਮ ਘਰਿ ਭਾਗੁ ॥੨॥
ਤੂੰ ਸਤਵੰਤੀ ਤੂੰ ਪਰਧਾਨਿ ॥
ਤੂੰ ਪ੍ਰੀਤਮ ਭਾਨੀ ਤੁਹੀ ਸੁਰ ਗਿਆਨਿ ॥੩॥
ਪ੍ਰੀਤਮ ਭਾਨੀ ਤਾਂ ਰੰਗਿ ਗੁਲਾਲ ॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਸੁਭ ਦ੍ਰਿਸਟਿ ਨਿਹਾਲ ॥੪॥
ਸੁਨਿ ਰੀ ਸਖੀ ਇਹ ਹਮਰੀ ਘਾਲ ॥
ਪ੍ਰਭ ਆਪਿ ਸੀਗਾਰਿ ਸਵਾਰਨਹਾਰ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ਦੂਜਾ ॥੧॥੫੨॥
ਰਾਗੁ ਆਸਾ ਘਰੁ ੭ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਲਾਲੁ ਚੋਲਨਾ ਤੈ ਤਨਿ ਸੋਹਿਆ ॥
ਸੁਰਿਜਨ ਭਾਨੀ ਤਾਂ ਮਨੁ ਮੋਹਿਆ ॥੧॥
ਕਵਨ ਬਨੀ ਰੀ ਤੇਰੀ ਲਾਲੀ ॥
ਕਵਨ ਰੰਗਿ ਤੂੰ ਭਈ ਗੁਲਾਲੀ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਤੁਮ ਹੀ ਸੁੰਦਰਿ ਤੁਮਹਿ ਸੁਹਾਗੁ ॥
ਤੁਮ ਘਰਿ ਲਾਲਨੁ ਤੁਮ ਘਰਿ ਭਾਗੁ ॥੨॥
ਤੂੰ ਸਤਵੰਤੀ ਤੂੰ ਪਰਧਾਨਿ ॥
ਤੂੰ ਪ੍ਰੀਤਮ ਭਾਨੀ ਤੁਹੀ ਸੁਰ ਗਿਆਨਿ ॥੩॥
ਪ੍ਰੀਤਮ ਭਾਨੀ ਤਾਂ ਰੰਗਿ ਗੁਲਾਲ ॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਸੁਭ ਦ੍ਰਿਸਟਿ ਨਿਹਾਲ ॥੪॥
ਸੁਨਿ ਰੀ ਸਖੀ ਇਹ ਹਮਰੀ ਘਾਲ ॥
ਪ੍ਰਭ ਆਪਿ ਸੀਗਾਰਿ ਸਵਾਰਨਹਾਰ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ਦੂਜਾ ॥੧॥੫੨॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
रागु आसा घरु ७ महला ५ ॥
लालु चोलना तै तनि सोहिआ ॥
सुरिजन भानी तां मनु मोहिआ ॥१॥
कवन बनी री तेरी लाली ॥
कवन रंगि तूं भई गुलाली ॥१॥ रहाउ ॥
तुम ही सुंदरि तुमहि सुहागु ॥
तुम घरि लालनु तुम घरि भागु ॥२॥
तूं सतवंती तूं परधानि ॥
तूं प्रीतम भानी तुही सुर गिआनि ॥३॥
प्रीतम भानी तां रंगि गुलाल ॥
कहु नानक सुभ द्रिसटि निहाल ॥४॥
सुनि री सखी इह हमरी घाल ॥
प्रभ आपि सीगारि सवारनहार ॥१॥ रहाउ दूजा ॥१॥५२॥
रागु आसा घरु ७ महला ५ ॥
लालु चोलना तै तनि सोहिआ ॥
सुरिजन भानी तां मनु मोहिआ ॥१॥
कवन बनी री तेरी लाली ॥
कवन रंगि तूं भई गुलाली ॥१॥ रहाउ ॥
तुम ही सुंदरि तुमहि सुहागु ॥
तुम घरि लालनु तुम घरि भागु ॥२॥
तूं सतवंती तूं परधानि ॥
तूं प्रीतम भानी तुही सुर गिआनि ॥३॥
प्रीतम भानी तां रंगि गुलाल ॥
कहु नानक सुभ द्रिसटि निहाल ॥४॥
सुनि री सखी इह हमरी घाल ॥
प्रभ आपि सीगारि सवारनहार ॥१॥ रहाउ दूजा ॥१॥५२॥
हिन्दी अर्थ: ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। रागु आसा घरु ७ महला ५ ॥ (हे बहिन !) तेरे शरीर पे लाल रंग का चोला सुंदर लग रहा है (तेरे मुंह की लाली सुंदर झलक मार रही है। शायद) तू सज्जन हरी को प्यारी लग रही है।तभी तो तूने मेरा मन (भी) मोह लिया है। 1। हे बहिन ! (बता। ) तेरे चेहरे पे लाली कैसे आ गई है। किस रंग की बरकति से तू सुंदर गाढ़े गुलाल रंग वाली बन गई है। 1।रहाउ। हे बहिन ! तू बड़ी खूबसूरति दिख रही है।तेरे सुहाग-भाग्य उघड़ के सामने आ गए हैं (ऐसा प्रतीत होता है कि) तेरे हृदय घर में प्रीतम प्रभू आ बसा है।तेरे हृदय घर मेंकिस्मत जाग पड़ी है। 2। हे बहिन ! तू स्वच्छ आचरण वाली हो गई है तू अब हर जगह आदर-मान पा रही है। (अगर) तू प्रीतम प्रभू को अच्छी लग रही है (तो) तू श्रेष्ठ ज्ञान वाली बन गई है। 3। हे नानक ! कह, (हे बहिन ! मैं) प्रीतम प्रभू को अच्छी लग गई हूँ।तभी तो मैं गाढ़े प्रेम रंग में रंगी गई हूँ। वह प्रीतम प्रभू मुझे अच्छी (प्यार भरी) निगाह से देखता है। 4। (पर) हे सहेली ! तू पूछती है (मैंने कौन सी मेहनत की। बस !) यही है मेहनत जो मैंने की कि उस सुंदरता की दाति देने वाले प्रभू ने खुद ही मुझे (अपने प्यार की दाति दे के) सुंदरी बना लिया है। 1।रहाउ दूसरा। 1। 52।
ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਦੂਖੁ ਘਨੋ ਜਬ ਹੋਤੇ ਦੂਰਿ ॥
ਅਬ ਮਸਲਤਿ ਮੋਹਿ ਮਿਲੀ ਹਦੂਰਿ ॥੧॥
ਚੁਕਾ ਨਿਹੋਰਾ ਸਖੀ ਸਹੇਰੀ ॥
ਭਰਮੁ ਗਇਆ ਗੁਰਿ ਪਿਰ ਸੰਗਿ ਮੇਰੀ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਨਿਕਟਿ ਆਨਿ ਪ੍ਰਿਅ ਸੇਜ ਧਰੀ ॥
ਕਾਣਿ ਕਢਨ ਤੇ ਛੂਟਿ ਪਰੀ ॥੨॥
ਮੰਦਰਿ ਮੇਰੈ ਸਬਦਿ ਉਜਾਰਾ ॥
ਅਨਦ ਬਿਨੋਦੀ ਖਸਮੁ ਹਮਾਰਾ ॥੩॥
ਮਸਤਕਿ ਭਾਗੁ ਮੈ ਪਿਰੁ ਘਰਿ ਆਇਆ ॥
ਥਿਰੁ ਸੋਹਾਗੁ ਨਾਨਕ ਜਨ ਪਾਇਆ ॥੪॥੨॥੫੩॥
ਦੂਖੁ ਘਨੋ ਜਬ ਹੋਤੇ ਦੂਰਿ ॥
ਅਬ ਮਸਲਤਿ ਮੋਹਿ ਮਿਲੀ ਹਦੂਰਿ ॥੧॥
ਚੁਕਾ ਨਿਹੋਰਾ ਸਖੀ ਸਹੇਰੀ ॥
ਭਰਮੁ ਗਇਆ ਗੁਰਿ ਪਿਰ ਸੰਗਿ ਮੇਰੀ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਨਿਕਟਿ ਆਨਿ ਪ੍ਰਿਅ ਸੇਜ ਧਰੀ ॥
ਕਾਣਿ ਕਢਨ ਤੇ ਛੂਟਿ ਪਰੀ ॥੨॥
ਮੰਦਰਿ ਮੇਰੈ ਸਬਦਿ ਉਜਾਰਾ ॥
ਅਨਦ ਬਿਨੋਦੀ ਖਸਮੁ ਹਮਾਰਾ ॥੩॥
ਮਸਤਕਿ ਭਾਗੁ ਮੈ ਪਿਰੁ ਘਰਿ ਆਇਆ ॥
ਥਿਰੁ ਸੋਹਾਗੁ ਨਾਨਕ ਜਨ ਪਾਇਆ ॥੪॥੨॥੫੩॥
आसा महला ५ ॥
दूखु घनो जब होते दूरि ॥
अब मसलति मोहि मिली हदूरि ॥१॥
चुका निहोरा सखी सहेरी ॥
भरमु गइआ गुरि पिर संगि मेरी ॥१॥ रहाउ ॥
निकटि आनि प्रिअ सेज धरी ॥
काणि कढन ते छूटि परी ॥२॥
मंदरि मेरै सबदि उजारा ॥
अनद बिनोदी खसमु हमारा ॥३॥
मसतकि भागु मै पिरु घरि आइआ ॥
थिरु सोहागु नानक जन पाइआ ॥४॥२॥५३॥
दूखु घनो जब होते दूरि ॥
अब मसलति मोहि मिली हदूरि ॥१॥
चुका निहोरा सखी सहेरी ॥
भरमु गइआ गुरि पिर संगि मेरी ॥१॥ रहाउ ॥
निकटि आनि प्रिअ सेज धरी ॥
काणि कढन ते छूटि परी ॥२॥
मंदरि मेरै सबदि उजारा ॥
अनद बिनोदी खसमु हमारा ॥३॥
मसतकि भागु मै पिरु घरि आइआ ॥
थिरु सोहागु नानक जन पाइआ ॥४॥२॥५३॥
हिन्दी अर्थ: आसा महला ५ ॥ हे सखी ! हे सहेली ! जब मैं प्रभू-चरणों से दूर रहती थी मुझे बहुत दुख (होता था) अब (गुरू की) शिक्षा की बरकति से मुझे (प्रभू की) हजूरी प्राप्त हो गई है (मैं प्रभू-चरणों में टिकी रहती हूँ। इस वास्ते कोई दुख-कलेश मुझे छू नहीं सकता)। 1। हे सखी ! हे सहेली ! (प्रभू चरणों से पहले विछोड़े के कारण पैदा हुए दुख कलेशों का) उलाहमा देना खत्म हो गया है। मुझे गुरू ने पति-प्रभू के साथ मिला दिया है।अब मेरी भटकना दूर हो गई है 1।रहाउ। हे सखी ! (गुरू ने) मुझे प्रभू-चरणों के नजदीक ला के प्यारे प्रभू-पति की सेज पर बैठा दिया है (प्रभू-चरणों में जोड़ दिया है)। अब (हरेक की) मुथाजी करने से मैं बच गई हूँ। 2। (हे सखी ! हे सहेली !) गुरू के शबद की बरकति से मेरे हृदय मंदिर में (सही आत्मिक जीवन का) प्रकाश हो गया है। सारे आनंदों और खेल-तमाशों का मालिक मेरा पति-प्रभू (मुझे मिल गया है)। 3। माथे (के) भाग जाग पड़े हैं (क्योंकि) मेरा पति-प्रभू मेरे (हृदय-) घर में आ गया है। हे दास नानक ! (कह, हे सखी !) मेरे मैंने अब वह सुहाग ढूँढ लिया है। 4। 2। 53।
ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਸਾਚਿ ਨਾਮਿ ਮੇਰਾ ਮਨੁ ਲਾਗਾ ॥
ਲੋਗਨ ਸਿਉ ਮੇਰਾ ਠਾਠਾ ਬਾਗਾ ॥੧॥
ਬਾਹਰਿ ਸੂਤੁ ਸਗਲ ਸਿਉ ਮਉਲਾ ॥
ਅਲਿਪਤੁ ਰਹਉ ਜੈਸੇ ਜਲ ਮਹਿ ਕਉਲਾ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਮੁਖ ਕੀ ਬਾਤ ਸਗਲ ਸਿਉ ਕਰਤਾ ॥
ਜੀਅ ਸੰਗਿ ਪ੍ਰਭੁ ਅਪੁਨਾ ਧਰਤਾ ॥੨॥
ਦੀਸਿ ਆਵਤ ਹੈ ਬਹੁਤੁ ਭੀਹਾਲਾ ॥
ਸਗਲ ਚਰਨ ਕੀ ਇਹੁ ਮਨੁ ਰਾਲਾ ॥੩॥
ਨਾਨਕ ਜਨਿ ਗੁਰੁ ਪੂਰਾ ਪਾਇਆ ॥
ਸਾਚਿ ਨਾਮਿ ਮੇਰਾ ਮਨੁ ਲਾਗਾ ॥
ਲੋਗਨ ਸਿਉ ਮੇਰਾ ਠਾਠਾ ਬਾਗਾ ॥੧॥
ਬਾਹਰਿ ਸੂਤੁ ਸਗਲ ਸਿਉ ਮਉਲਾ ॥
ਅਲਿਪਤੁ ਰਹਉ ਜੈਸੇ ਜਲ ਮਹਿ ਕਉਲਾ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਮੁਖ ਕੀ ਬਾਤ ਸਗਲ ਸਿਉ ਕਰਤਾ ॥
ਜੀਅ ਸੰਗਿ ਪ੍ਰਭੁ ਅਪੁਨਾ ਧਰਤਾ ॥੨॥
ਦੀਸਿ ਆਵਤ ਹੈ ਬਹੁਤੁ ਭੀਹਾਲਾ ॥
ਸਗਲ ਚਰਨ ਕੀ ਇਹੁ ਮਨੁ ਰਾਲਾ ॥੩॥
ਨਾਨਕ ਜਨਿ ਗੁਰੁ ਪੂਰਾ ਪਾਇਆ ॥
आसा महला ५ ॥
साचि नामि मेरा मनु लागा ॥
लोगन सिउ मेरा ठाठा बागा ॥१॥
बाहरि सूतु सगल सिउ मउला ॥
अलिपतु रहउ जैसे जल महि कउला ॥१॥ रहाउ ॥
मुख की बात सगल सिउ करता ॥
जीअ संगि प्रभु अपुना धरता ॥२॥
दीसि आवत है बहुतु भीहाला ॥
सगल चरन की इहु मनु राला ॥३॥
नानक जनि गुरु पूरा पाइआ ॥
साचि नामि मेरा मनु लागा ॥
लोगन सिउ मेरा ठाठा बागा ॥१॥
बाहरि सूतु सगल सिउ मउला ॥
अलिपतु रहउ जैसे जल महि कउला ॥१॥ रहाउ ॥
मुख की बात सगल सिउ करता ॥
जीअ संगि प्रभु अपुना धरता ॥२॥
दीसि आवत है बहुतु भीहाला ॥
सगल चरन की इहु मनु राला ॥३॥
नानक जनि गुरु पूरा पाइआ ॥
हिन्दी अर्थ: आसा महला ५ ॥ (हे भाई !) मेरा मन सदा कायम रहने वाले परमात्मा के नाम में (सदा) जुड़ा रहता है। दुनिया के लोगों से मेरा उतना ही वरतन-व्यवहार है जितने की अति जरूरी जरूरत पड़ती है। 1। (हे भाई !) दुनिया से बरतने-व्यवहार के समय मैं सबसे प्यार वाला संबंध रखता हूँ। (पर दुनिया के साथ बरतता हुआ भी दुनिया से ऐसे) निर्लिप रहता हूँ जैसे पानी में (रहते हुए भी) कमल का फूल (पानी से निर्लिप रहता है)। 1।रहाउ। (हे भाई !) मैं सब लोगों से (जरूरत के मुताबिक) मुंह से बातें करता हूँ (पर। कहीं भी मोह में अपने मन को फसने नहीं देता) अपने हृदय में मैं सिर्फ परमात्मा को ही टिकाए रखता हूँ। 2। (हे भाई ! मेरे इस तरह के आत्मिक जीवन के अभ्यास के कारण लोगों को मेरा मन) बड़ा रूखा और कोरा दिखता है; पर (दरअसल मेरा) ये मन सबके चरणों की धूल बना रहता है। 3। हे नानक ! जिस (भी) मनुष्य ने पूरा गुरू पा लिया है
स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
संदर्भ: यह अंग 384 है, राग आसा का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।
M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।
Holi के दूसरे दिन (puddva), सब रंग धुल चुके, और घर का calm।
ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।
यह अंग कुल 43 पंक्तियों का है, 4 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 384” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।
राग के context में: आसा राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।
पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।
अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।
“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।
नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।
अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।
तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।
हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।
ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।
दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।
“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।
हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।
अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।
आगे का अंग: अंग 385 →, पीछे का: ← अंग 383।
हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।
(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)
शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।
संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।
शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।
संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।
एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।
अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।