अंग 395

अंग
395
राग आसा
राग: आसा · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਕਰਿ ਕਿਰਪਾ ਅਪੁਨੈ ਨਾਇ ਲਾਏ ਸਰਬ ਸੂਖ ਪ੍ਰਭ ਤੁਮਰੀ ਰਜਾਇ ॥ ਰਹਾਉ ॥
ਸੰਗਿ ਹੋਵਤ ਕਉ ਜਾਨਤ ਦੂਰਿ ॥ ਸੋ ਜਨੁ ਮਰਤਾ ਨਿਤ ਨਿਤ ਝੂਰਿ ॥੨॥
ਜਿਨਿ ਸਭੁ ਕਿਛੁ ਦੀਆ ਤਿਸੁ ਚਿਤਵਤ ਨਾਹਿ ॥
ਮਹਾ ਬਿਖਿਆ ਮਹਿ ਦਿਨੁ ਰੈਨਿ ਜਾਹਿ ॥੩॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਪ੍ਰਭੁ ਸਿਮਰਹੁ ਏਕ ॥
ਗਤਿ ਪਾਈਐ ਗੁਰ ਪੂਰੇ ਟੇਕ ॥੪॥੩॥੯੭॥
करि किरपा अपुनै नाइ लाए सरब सूख प्रभ तुमरी रजाइ ॥ रहाउ ॥
संगि होवत कउ जानत दूरि ॥ सो जनु मरता नित नित झूरि ॥२॥
जिनि सभु किछु दीआ तिसु चितवत नाहि ॥
महा बिखिआ महि दिनु रैनि जाहि ॥३॥
कहु नानक प्रभु सिमरहु एक ॥
गति पाईऐ गुर पूरे टेक ॥४॥३॥९७॥

हिन्दी अर्थ: हे प्रभू ! जिन मनुष्यों को मेहर करके तू अपने नाम के साथ जोड़े रखता है, तेरी रजा में चलने से सारे सुख प्राप्त होते हैं।1।रहाउ। (हे भाई !) जो मनुष्य अपने अंग-संग बसते परमात्मा को कहीं दूर बसता समझता है वह सदा (माया की तृष्णा के अधीन) खिझ-खिझ के आत्मिक मौत सहेड़ी रखता है। 2। (हे भाई !) जिस परमात्मा ने हरेक चीज दी है जो मनुष्य उसको याद नहीं करता उस के (जिंदगी के) सारे रात-दिन खासी माया (के मोह) में (फसे हुए ही) गुजरते हैं। 3। हे नानक ! कह, (हे भाई !) पूरे गुरू की शरण पड़ के एक परमात्मा को याद करते रहा करो (इस तरह) ऊँची आत्मिक अवस्था प्राप्त हो जाती है (और माया की तृष्णा में नहीं फंसते)। 4। 3। 97।
ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਨਾਮੁ ਜਪਤ ਮਨੁ ਤਨੁ ਸਭੁ ਹਰਿਆ ॥
ਕਲਮਲ ਦੋਖ ਸਗਲ ਪਰਹਰਿਆ ॥੧॥
ਸੋਈ ਦਿਵਸੁ ਭਲਾ ਮੇਰੇ ਭਾਈ ॥
ਹਰਿ ਗੁਨ ਗਾਇ ਪਰਮ ਗਤਿ ਪਾਈ ॥ ਰਹਾਉ ॥
ਸਾਧ ਜਨਾ ਕੇ ਪੂਜੇ ਪੈਰ ॥
ਮਿਟੇ ਉਪਦ੍ਰਹ ਮਨ ਤੇ ਬੈਰ ॥੨॥
ਗੁਰ ਪੂਰੇ ਮਿਲਿ ਝਗਰੁ ਚੁਕਾਇਆ ॥
ਪੰਚ ਦੂਤ ਸਭਿ ਵਸਗਤਿ ਆਇਆ ॥੩॥
ਜਿਸੁ ਮਨਿ ਵਸਿਆ ਹਰਿ ਕਾ ਨਾਮੁ ॥
ਨਾਨਕ ਤਿਸੁ ਊਪਰਿ ਕੁਰਬਾਨ ॥੪॥੪॥੯੮॥
आसा महला ५ ॥
नामु जपत मनु तनु सभु हरिआ ॥
कलमल दोख सगल परहरिआ ॥१॥
सोई दिवसु भला मेरे भाई ॥
हरि गुन गाइ परम गति पाई ॥ रहाउ ॥
साध जना के पूजे पैर ॥
मिटे उपद्रह मन ते बैर ॥२॥
गुर पूरे मिलि झगरु चुकाइआ ॥
पंच दूत सभि वसगति आइआ ॥३॥
जिसु मनि वसिआ हरि का नामु ॥
नानक तिसु ऊपरि कुरबान ॥४॥४॥९८॥

हिन्दी अर्थ: आसा महला ५ ॥ (हे भाई ! जैसे पानी मिलने से वृक्ष हरा-भरा हो जाता है।वृक्ष में मानो जान वापस आ जाती है वैसे ही) परमात्मा का नाम जपने से (नाम-जल से) मनुष्य का मन मनुष्य का हृदय आत्मिक जीवन वाला हो जाता है (उसके अंदर से) सारे पाप-एैब दूर हो जाते हैं। 1। हे मेरे भाई ! सिर्फ वही दिन (मनुष्य के लिए) बढ़िया होता है जब वह परमात्मा के गुण गा के सबसे ऊँची आत्मिक अवस्था हासिल करता है। 1।रहाउ। जो मनुष्य गुरमुखों के पैर पूजता है उसके मन में से सारी छेड़खानियां-उपद्रव सारे वैर-विरोध मिट जाते हैं। 2। (हे भाई !) जिस मनुष्य ने गुरू को मिल के (अपने अंदर से विकारों का) झगड़ा खत्म कर लिया। कामादिक पाँच वैरी सारे उसके काबू में आ जाते हैं। 3। हे नानक ! (कह,) जिस मनुष्य के मन में परमात्मा का नाम आ बसता है उससे सदा सदके होना चाहिए। 4। 4। 98।
ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਗਾਵਿ ਲੇਹਿ ਤੂ ਗਾਵਨਹਾਰੇ ॥
ਜੀਅ ਪਿੰਡ ਕੇ ਪ੍ਰਾਨ ਅਧਾਰੇ ॥
ਜਾ ਕੀ ਸੇਵਾ ਸਰਬ ਸੁਖ ਪਾਵਹਿ ॥
ਅਵਰ ਕਾਹੂ ਪਹਿ ਬਹੁੜਿ ਨ ਜਾਵਹਿ ॥੧॥
ਸਦਾ ਅਨੰਦ ਅਨੰਦੀ ਸਾਹਿਬੁ ਗੁਨ ਨਿਧਾਨ ਨਿਤ ਨਿਤ ਜਾਪੀਐ ॥
ਬਲਿਹਾਰੀ ਤਿਸੁ ਸੰਤ ਪਿਆਰੇ ਜਿਸੁ ਪ੍ਰਸਾਦਿ ਪ੍ਰਭੁ ਮਨਿ ਵਾਸੀਐ ॥ ਰਹਾਉ ॥
ਜਾ ਕਾ ਦਾਨੁ ਨਿਖੂਟੈ ਨਾਹੀ ॥
ਭਲੀ ਭਾਤਿ ਸਭ ਸਹਜਿ ਸਮਾਹੀ ॥
ਜਾ ਕੀ ਬਖਸ ਨ ਮੇਟੈ ਕੋਈ ॥
ਮਨਿ ਵਾਸਾਈਐ ਸਾਚਾ ਸੋਈ ॥੨॥
ਸਗਲ ਸਮਗ੍ਰੀ ਗ੍ਰਿਹ ਜਾ ਕੈ ਪੂਰਨ ॥
ਪ੍ਰਭ ਕੇ ਸੇਵਕ ਦੂਖ ਨ ਝੂਰਨ ॥
ਓਟਿ ਗਹੀ ਨਿਰਭਉ ਪਦੁ ਪਾਈਐ ॥
ਸਾਸਿ ਸਾਸਿ ਸੋ ਗੁਨ ਨਿਧਿ ਗਾਈਐ ॥੩॥
ਦੂਰਿ ਨ ਹੋਈ ਕਤਹੂ ਜਾਈਐ ॥
ਨਦਰਿ ਕਰੇ ਤਾ ਹਰਿ ਹਰਿ ਪਾਈਐ ॥
ਅਰਦਾਸਿ ਕਰੀ ਪੂਰੇ ਗੁਰ ਪਾਸਿ ॥
ਨਾਨਕੁ ਮੰਗੈ ਹਰਿ ਧਨੁ ਰਾਸਿ ॥੪॥੫॥੯੯॥
आसा महला ५ ॥
गावि लेहि तू गावनहारे ॥
जीअ पिंड के प्रान अधारे ॥
जा की सेवा सरब सुख पावहि ॥
अवर काहू पहि बहुड़ि न जावहि ॥१॥
सदा अनंद अनंदी साहिबु गुन निधान नित नित जापीऐ ॥
बलिहारी तिसु संत पिआरे जिसु प्रसादि प्रभु मनि वासीऐ ॥ रहाउ ॥
जा का दानु निखूटै नाही ॥
भली भाति सभ सहजि समाही ॥
जा की बखस न मेटै कोई ॥
मनि वासाईऐ साचा सोई ॥२॥
सगल समग्री ग्रिह जा कै पूरन ॥
प्रभ के सेवक दूख न झूरन ॥
ओटि गही निरभउ पदु पाईऐ ॥
सासि सासि सो गुन निधि गाईऐ ॥३॥
दूरि न होई कतहू जाईऐ ॥
नदरि करे ता हरि हरि पाईऐ ॥
अरदासि करी पूरे गुर पासि ॥
नानकु मंगै हरि धनु रासि ॥४॥५॥९९॥

हिन्दी अर्थ: आसा महला ५ ॥ हे भाई ! जब तक गाने की स्मर्था है उसे गाते रहो जो तेरी जिंद का आसरा है जो तेरे शरीर का आसरा है जो तेरे प्राणों का आसरा है। जिसकी सेवा-भक्ति करके तू सारे सुख हासिल कर लेगा (और सुखों की तलाश में) किसी और के पास पुनः जाने की जरूरत नहीं पड़ेगी। 1। (हे भाई !) उस मालिक प्रभू (के नाम) को सदा ही जपना चाहिए जो सारे गुणों का खजाना है जो सदा आनंद का सोमा है। (हे भाई !) उस प्यारे गुरू को सदके जाना चाहिए जिसकी कृपा से परमात्मा को मन में बसा सकते हैं। 1।रहाउ। जिसकी दी हुई दाति कभी खत्म नहीं होती (और जो-जो उसे मन में बसाते हैं वे) सारे अच्छी तरह आत्मिक अडोलता में टिके रहते हैं जिसकी की हुई बख्शिश की राह में कोई रुकावट नहीं डाल सकता हे भाई ! उस सदा स्थिर रहने वाले परमात्मा को ही सदा अपने मन में बसाना चाहिए । 2। जिसके घर में (जीवों के वास्ते) सारे पदार्थ भरे पड़े रहते हैं जिसके सेवकों को कोई दुख कोई झोरे छू नहीं सकते और जिसका आसरा लेने से वह आत्मिक दर्जा मिल जाता है जहाँ कोई डर दबा नहीं सकता। हे भाई ! हरेक सांस के साथ गुणों के खजाने उस प्रभू के गुण गाते रहना चाहिए3। हे भाई ! वह परमात्मा हमसे दूर नहीं बसता।कहीं (दूर) तलाशने जाने की जरूरत नहीं। उसकी प्राप्ति तभी हो सकती है जबवह खुद मेहर की नज़र करे। हे भाई ! मैं तो पूरे गुरू के पास अरदास करता हूँ (और कहता हूँ- हे गुरू ! तेरे से) नानक हरि-नाम-धन मांगता है हरि-नाम की पूँजी मांगता है। 4। 5। 99।
ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਪ੍ਰਥਮੇ ਮਿਟਿਆ ਤਨ ਕਾ ਦੂਖ ॥
ਮਨ ਸਗਲ ਕਉ ਹੋਆ ਸੂਖੁ ॥
ਕਰਿ ਕਿਰਪਾ ਗੁਰ ਦੀਨੋ ਨਾਉ ॥
ਬਲਿ ਬਲਿ ਤਿਸੁ ਸਤਿਗੁਰ ਕਉ ਜਾਉ ॥੧॥
ਗੁਰੁ ਪੂਰਾ ਪਾਇਓ ਮੇਰੇ ਭਾਈ ॥
ਰੋਗ ਸੋਗ ਸਭ ਦੂਖ ਬਿਨਾਸੇ ਸਤਿਗੁਰ ਕੀ ਸਰਣਾਈ ॥ ਰਹਾਉ ॥
ਗੁਰ ਕੇ ਚਰਨ ਹਿਰਦੈ ਵਸਾਏ ॥
ਮਨ ਚਿੰਤਤ ਸਗਲੇ ਫਲ ਪਾਏ ॥
ਅਗਨਿ ਬੁਝੀ ਸਭ ਹੋਈ ਸਾਂਤਿ ॥
ਕਰਿ ਕਿਰਪਾ ਗੁਰਿ ਕੀਨੀ ਦਾਤਿ ॥੨॥
ਨਿਥਾਵੇ ਕਉ ਗੁਰਿ ਦੀਨੋ ਥਾਨੁ ॥
ਨਿਮਾਨੇ ਕਉ ਗੁਰਿ ਕੀਨੋ ਮਾਨੁ ॥
ਬੰਧਨ ਕਾਟਿ ਸੇਵਕ ਕਰਿ ਰਾਖੇ ॥
ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਬਾਨੀ ਰਸਨਾ ਚਾਖੇ ॥੩॥
ਵਡੈ ਭਾਗਿ ਪੂਜ ਗੁਰ ਚਰਨਾ ॥
ਸਗਲ ਤਿਆਗਿ ਪਾਈ ਪ੍ਰਭ ਸਰਨਾ ॥
आसा महला ५ ॥
प्रथमे मिटिआ तन का दूख ॥
मन सगल कउ होआ सूखु ॥
करि किरपा गुर दीनो नाउ ॥
बलि बलि तिसु सतिगुर कउ जाउ ॥१॥
गुरु पूरा पाइओ मेरे भाई ॥
रोग सोग सभ दूख बिनासे सतिगुर की सरणाई ॥ रहाउ ॥
गुर के चरन हिरदै वसाए ॥
मन चिंतत सगले फल पाए ॥
अगनि बुझी सभ होई सांति ॥
करि किरपा गुरि कीनी दाति ॥२॥
निथावे कउ गुरि दीनो थानु ॥
निमाने कउ गुरि कीनो मानु ॥
बंधन काटि सेवक करि राखे ॥
अंम्रित बानी रसना चाखे ॥३॥
वडै भागि पूज गुर चरना ॥
सगल तिआगि पाई प्रभ सरना ॥

हिन्दी अर्थ: आसा महला ५ ॥ (हे भाई ! गुरू को मिल के सबसे) पहले मेरे शरीर के हरेक दुख मिट गए। फिर मेरे मन को पूर्ण आनंद प्राप्त हुआ। गुरू ने कृपा करके मुझे परमात्मा का नाम दिया। (हे भाई !) मैं उस गुरू से सदा कुर्बान जाता हूँ सदके जाता हूँ। 1। हे मेरे भाई ! जब से मुझे पूरा गुरू मिला है गुरू की शरण पड़ के मेरे सारे रोग सारी चिंता-फिक्र सारे दुख नाश हो गए हैं।रहाउ। (हे भाई ! जब से) मैंने गुरू के चरण अपने हृदय में बसाए हैं मुझे सारे मन-इच्छित फल मिल रहे हैं (मेरे अंदर से तृष्णा की) आग बुझ गर्ह है (मेरे अंदर) पूरी ठंड पड़ गई है। ये सारी दाति गुरू ने ही मेहर करके दी है। 2। मुझे पहले कोई आसरा नहीं था मिलता।गुरू ने मुझे (अपने चरणों में) जगह दी। मुझ निमाणे को गुरू ने आदर दिया है। मेरे (माया के मोह के) बंधन काट के मुझे गुरू ने अपना सेवक बना के अपने चरणों में टिका लिया। अब मेरी जीभ आत्मिक जीवन देने वाली सिफत सालाह की बाणी (का रस) चखती रहती है। 3। (हे भाई !) बड़ी किस्मत से मुझे गुरू के चरणों की पूजा (का अवसर मिला जिसकी बरकति से) मैं और सारे आसरे छोड़ के प्रभू की शरण में आ पड़ा हूँ।

संदर्भ: यह अंग 395 है, राग आसा का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।

M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।

Sunday सुबह 7 बजे parents से 30-मिनट की video-call, बीच में silence।

ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।

यह अंग कुल 53 पंक्तियों का है, 4 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 395” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।

राग के context में: आसा राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।

पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।

अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।

“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।

नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।

अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।

तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।

हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।

ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।

दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।

“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।

हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।

अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।

आगे का अंग: अंग 396 →, पीछे का: ← अंग 394

हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।

(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)

शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।

संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।

शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।

संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।

एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।

अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।

स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।