अंग 412

अंग
412
राग आसा
राग: आसा · रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਜੋ ਤਿਸੁ ਭਾਵੈ ਸੋ ਫੁਨਿ ਹੋਇ ॥
ਸੁਣਿ ਭਰਥਰਿ ਨਾਨਕੁ ਕਹੈ ਬੀਚਾਰੁ ॥
ਨਿਰਮਲ ਨਾਮੁ ਮੇਰਾ ਆਧਾਰੁ ॥੮॥੧॥
जो तिसु भावै सो फुनि होइ ॥
सुणि भरथरि नानकु कहै बीचारु ॥
निरमल नामु मेरा आधारु ॥८॥१॥

हिन्दी अर्थ: जगत में वही कुछ हो रहा है जो उसको अच्छा लगता है। हे भरथरी जोगी ! सुन।नानक तुझे विचार की बात बताता है कि उस (सर्व-व्यापक) परमात्मा का पवित्र नाम मेरी जिंदगी का आसरा है। 8। 1।
ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੧ ॥
ਸਭਿ ਜਪ ਸਭਿ ਤਪ ਸਭ ਚਤੁਰਾਈ ॥
ਊਝੜਿ ਭਰਮੈ ਰਾਹਿ ਨ ਪਾਈ ॥
ਬਿਨੁ ਬੂਝੇ ਕੋ ਥਾਇ ਨ ਪਾਈ ॥
ਨਾਮ ਬਿਹੂਣੈ ਮਾਥੇ ਛਾਈ ॥੧॥
ਸਾਚ ਧਣੀ ਜਗੁ ਆਇ ਬਿਨਾਸਾ ॥
ਛੂਟਸਿ ਪ੍ਰਾਣੀ ਗੁਰਮੁਖਿ ਦਾਸਾ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਜਗੁ ਮੋਹਿ ਬਾਧਾ ਬਹੁਤੀ ਆਸਾ ॥
ਗੁਰਮਤੀ ਇਕਿ ਭਏ ਉਦਾਸਾ ॥
ਅੰਤਰਿ ਨਾਮੁ ਕਮਲੁ ਪਰਗਾਸਾ ॥
ਤਿਨੑ ਕਉ ਨਾਹੀ ਜਮ ਕੀ ਤ੍ਰਾਸਾ ॥੨॥
ਜਗੁ ਤ੍ਰਿਅ ਜਿਤੁ ਕਾਮਣਿ ਹਿਤਕਾਰੀ ॥
ਪੁਤ੍ਰ ਕਲਤ੍ਰ ਲਗਿ ਨਾਮੁ ਵਿਸਾਰੀ ॥
ਬਿਰਥਾ ਜਨਮੁ ਗਵਾਇਆ ਬਾਜੀ ਹਾਰੀ ॥
ਸਤਿਗੁਰੁ ਸੇਵੇ ਕਰਣੀ ਸਾਰੀ ॥੩॥
ਬਾਹਰਹੁ ਹਉਮੈ ਕਹੈ ਕਹਾਏ ॥
ਅੰਦਰਹੁ ਮੁਕਤੁ ਲੇਪੁ ਕਦੇ ਨ ਲਾਏ ॥
ਮਾਇਆ ਮੋਹੁ ਗੁਰ ਸਬਦਿ ਜਲਾਏ ॥
ਨਿਰਮਲ ਨਾਮੁ ਸਦ ਹਿਰਦੈ ਧਿਆਏ ॥੪॥
ਧਾਵਤੁ ਰਾਖੈ ਠਾਕਿ ਰਹਾਏ ॥
ਸਿਖ ਸੰਗਤਿ ਕਰਮਿ ਮਿਲਾਏ ॥
ਗੁਰ ਬਿਨੁ ਭੂਲੋ ਆਵੈ ਜਾਏ ॥
ਨਦਰਿ ਕਰੇ ਸੰਜੋਗਿ ਮਿਲਾਏ ॥੫॥
ਰੂੜੋ ਕਹਉ ਨ ਕਹਿਆ ਜਾਈ ॥
ਅਕਥ ਕਥਉ ਨਹ ਕੀਮਤਿ ਪਾਈ ॥
ਸਭ ਦੁਖ ਤੇਰੇ ਸੂਖ ਰਜਾਈ ॥
ਸਭਿ ਦੁਖ ਮੇਟੇ ਸਾਚੈ ਨਾਈ ॥੬॥
ਕਰ ਬਿਨੁ ਵਾਜਾ ਪਗ ਬਿਨੁ ਤਾਲਾ ॥
ਜੇ ਸਬਦੁ ਬੁਝੈ ਤਾ ਸਚੁ ਨਿਹਾਲਾ ॥
ਅੰਤਰਿ ਸਾਚੁ ਸਭੇ ਸੁਖ ਨਾਲਾ ॥
ਨਦਰਿ ਕਰੇ ਰਾਖੈ ਰਖਵਾਲਾ ॥੭॥
ਤ੍ਰਿਭਵਣ ਸੂਝੈ ਆਪੁ ਗਵਾਵੈ ॥
ਬਾਣੀ ਬੂਝੈ ਸਚਿ ਸਮਾਵੈ ॥
ਸਬਦੁ ਵੀਚਾਰੇ ਏਕ ਲਿਵ ਤਾਰਾ ॥
ਨਾਨਕ ਧੰਨੁ ਸਵਾਰਣਹਾਰਾ ॥੮॥੨॥
आसा महला १ ॥
सभि जप सभि तप सभ चतुराई ॥
ऊझड़ि भरमै राहि न पाई ॥
बिनु बूझे को थाइ न पाई ॥
नाम बिहूणै माथे छाई ॥१॥
साच धणी जगु आइ बिनासा ॥
छूटसि प्राणी गुरमुखि दासा ॥१॥ रहाउ ॥
जगु मोहि बाधा बहुती आसा ॥
गुरमती इकि भए उदासा ॥
अंतरि नामु कमलु परगासा ॥
तिन॑ कउ नाही जम की त्रासा ॥२॥
जगु त्रिअ जितु कामणि हितकारी ॥
पुत्र कलत्र लगि नामु विसारी ॥
बिरथा जनमु गवाइआ बाजी हारी ॥
सतिगुरु सेवे करणी सारी ॥३॥
बाहरहु हउमै कहै कहाए ॥
अंदरहु मुकतु लेपु कदे न लाए ॥
माइआ मोहु गुर सबदि जलाए ॥
निरमल नामु सद हिरदै धिआए ॥४॥
धावतु राखै ठाकि रहाए ॥
सिख संगति करमि मिलाए ॥
गुर बिनु भूलो आवै जाए ॥
नदरि करे संजोगि मिलाए ॥५॥
रूड़ो कहउ न कहिआ जाई ॥
अकथ कथउ नह कीमति पाई ॥
सभ दुख तेरे सूख रजाई ॥
सभि दुख मेटे साचै नाई ॥६॥
कर बिनु वाजा पग बिनु ताला ॥
जे सबदु बुझै ता सचु निहाला ॥
अंतरि साचु सभे सुख नाला ॥
नदरि करे राखै रखवाला ॥७॥
त्रिभवण सूझै आपु गवावै ॥
बाणी बूझै सचि समावै ॥
सबदु वीचारे एक लिव तारा ॥
नानक धंनु सवारणहारा ॥८॥२॥

हिन्दी अर्थ: आसा महला १ ॥ जो मनुष्य सारे जप करता है सारे तपसाधता है (शास्त्र आदि को समझने के लिए) हरेक किस्म की समझदारी व बुद्धि का प्रदर्शन भी करता है।पर यदि वह (परमात्मा का दास बनने की युक्ति) नहीं समझता।तो उसके (जप-तप आदि का) कोई उद्यम (प्रभू की हजूरी में) परवान नहीं चढ़ता। वह गलत रास्ते पर भटक रहा है। वह सही रास्ते पर नहीं जा रहा। परमात्मा के नाम से वंचित मनुष्य के सिर पर राख ही पड़ती है। 1। जगत पैदा होता मरता रहता है।(पर) जगत का मालिक प्रभू सदा कायम रहने वाला है। जो प्राणी गुरू की शरण पड़ के परमात्मा का दास (भगत) बन जाता है वह (जनम-मरन के चक्कर से) बच जाता है। 1।रहाउ। जगत माया के मोह में बंधा हुआ बहुती आशाओं में बंधा हुआ (पैदा होता-मरता रहता) है। पर कई (भाग्यशाली मनुष्य) गुरू की शिक्षा पर चल के मोह से निर्लिप रहते हैं। उनके अंदर परमात्मा का नाम बसता है (जिसकी बरकति से उनका हृदय-) कमल खिला रहता है। ऐसे लोगों को जनम-मरण के चक्कार का डर नहीं रहता। 2। (गुरू की शरण से टूट के) जगत कामातुर हो रहा है।स्त्री के मोह में फसा हुआ है; पुत्र-पत्नी के मोह में पड़ के परमात्मा के नाम को भुला रहा है। इस तरह अपना जीवन व्यर्थ गवाता है और मानस जन्म की खेल हार के जाता है। पर जो मनुष्य गुरू की (बताई हुई) सेवा करता है उसका नित्य कर्म श्रेष्ठ हो जाता है। 3। वैसे दुनिया की किरत-कार करता वह स्वै को जताता है। वह अंतरात्मे माया के मोह से आजाद रहता है।माया का प्रभाव उसके ऊपर कभी नहीं पड़ता। जो मनुष्य गुरू के शबद में (जुड़ के अपने अंदर से) माया का मोह जला देता है। परमात्मा के पवित्र नाम को सदा अपने हृदय में याद रखता है। 4। वह अपने भटकते मन की रक्षा करता है (माया के मोह से) रोक के रखता है। (गुरू के जिस) सिख को (परमात्मा) अपनी मेहर से।संगति में मिलाता है। गुरू की शरण आए बिना मनुष्य (जिंदगी के सही रास्ते से) भटक जाता है।और जनम-मरन के चक्कर में पड़ जाता है। जब प्रभू मेहर की निगाह करता है।तो उसे भी संगति में मिला के अपने चरणों में जोड़ लेता है। 5। (हे प्रभू !) तू सुंदर है।पर यदि मैं बताने का प्रयत्न करूँ कि तू कैसा सुंदर है तो बताया नहीं जा सकता। हे प्रभू ! तेरे गुण बयान नहीं किए जा सकते।अगर मैं बयान करने का यतन करूँ।तो भी तेरे गुणों का मूल्य नहीं पाया जा सकता। (तुझसे विछुड़ के दुख आने है।पर) तेरी रजा में चल के सारे दुख सुख बन जाते हैं। सदा स्थिर रहने वाले प्रभू की सिफत सालाह करने से सारे ही दुख मिट जाते हैं। 6। उस मनुष्य के अंदर ऐसी आत्मिक अवस्था बन जाती है कि।जैसे बिना हाथ से बजाए बाजा बजता है और पैरों से नाचे ताल पूरी होती है। अगर मनुष्य (गुरू के) शबद को समझ ले।तो वह अपने अंदर सदा-सिथर प्रभू का दीदार कर लेता है।उसके अंदरवह सदा स्थिर प्रभू प्रगट हो जाता है। उसको अपने अंतरात्मा में सुख ही सुख प्रतीत होते हैं। जिस मनुष्य को रखवाला प्रभू मेहर की नजर करके (माया के मोह से) बचाता है। 7। जो मनुष्य (गुरू की शरण पड़ कर प्रभू का दास बन कर) स्वै भाव दूर करता है।उसको परमात्मा तीनों भवनों में बसता दिखाई पड़ता है। गुरू की बाणी के द्वारा उसको सही ज्ञान हो जाता है।वह सदा स्थिर प्रभू में लीन रहता है। वह मनुष्य गुरू के शबद को अपने सोच-मण्डल में टिकाए रखता है।एक-रस सुरति प्रभू में जोड़ता है। हे नानक ! उस मनुष्य का मानस जनम मुबारक है वह औरों का जीवन भी सोहना बना देता है। 8। 2।
ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੧ ॥
ਲੇਖ ਅਸੰਖ ਲਿਖਿ ਲਿਖਿ ਮਾਨੁ ॥
ਮਨਿ ਮਾਨਿਐ ਸਚੁ ਸੁਰਤਿ ਵਖਾਨੁ ॥
ਕਥਨੀ ਬਦਨੀ ਪੜਿ ਪੜਿ ਭਾਰੁ ॥
ਲੇਖ ਅਸੰਖ ਅਲੇਖੁ ਅਪਾਰੁ ॥੧॥
ਐਸਾ ਸਾਚਾ ਤੂੰ ਏਕੋ ਜਾਣੁ ॥
ਜੰਮਣੁ ਮਰਣਾ ਹੁਕਮੁ ਪਛਾਣੁ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਮਾਇਆ ਮੋਹਿ ਜਗੁ ਬਾਧਾ ਜਮਕਾਲਿ ॥
ਬਾਂਧਾ ਛੂਟੈ ਨਾਮੁ ਸਮੑਾਲਿ ॥
ਗੁਰੁ ਸੁਖਦਾਤਾ ਅਵਰੁ ਨ ਭਾਲਿ ॥
ਹਲਤਿ ਪਲਤਿ ਨਿਬਹੀ ਤੁਧੁ ਨਾਲਿ ॥੨॥
ਸਬਦਿ ਮਰੈ ਤਾਂ ਏਕ ਲਿਵ ਲਾਏ ॥
ਅਚਰੁ ਚਰੈ ਤਾਂ ਭਰਮੁ ਚੁਕਾਏ ॥
ਜੀਵਨ ਮੁਕਤੁ ਮਨਿ ਨਾਮੁ ਵਸਾਏ ॥
ਗੁਰਮੁਖਿ ਹੋਇ ਤ ਸਚਿ ਸਮਾਏ ॥੩॥
ਜਿਨਿ ਧਰ ਸਾਜੀ ਗਗਨੁ ਅਕਾਸੁ ॥
ਜਿਨਿ ਸਭ ਥਾਪੀ ਥਾਪਿ ਉਥਾਪਿ ॥
ਸਰਬ ਨਿਰੰਤਰਿ ਆਪੇ ਆਪਿ ॥
ਕਿਸੈ ਨ ਪੂਛੇ ਬਖਸੇ ਆਪਿ ॥੪॥
ਤੂ ਪੁਰੁ ਸਾਗਰੁ ਮਾਣਕ ਹੀਰੁ ॥
ਤੂ ਨਿਰਮਲੁ ਸਚੁ ਗੁਣੀ ਗਹੀਰੁ ॥
आसा महला १ ॥
लेख असंख लिखि लिखि मानु ॥
मनि मानिऐ सचु सुरति वखानु ॥
कथनी बदनी पड़ि पड़ि भारु ॥
लेख असंख अलेखु अपारु ॥१॥
ऐसा साचा तूं एको जाणु ॥
जंमणु मरणा हुकमु पछाणु ॥१॥ रहाउ ॥
माइआ मोहि जगु बाधा जमकालि ॥
बांधा छूटै नामु सम॑ालि ॥
गुरु सुखदाता अवरु न भालि ॥
हलति पलति निबही तुधु नालि ॥२॥
सबदि मरै तां एक लिव लाए ॥
अचरु चरै तां भरमु चुकाए ॥
जीवन मुकतु मनि नामु वसाए ॥
गुरमुखि होइ त सचि समाए ॥३॥
जिनि धर साजी गगनु अकासु ॥
जिनि सभ थापी थापि उथापि ॥
सरब निरंतरि आपे आपि ॥
किसै न पूछे बखसे आपि ॥४॥
तू पुरु सागरु माणक हीरु ॥
तू निरमलु सचु गुणी गहीरु ॥

हिन्दी अर्थ: आसा महला १ ॥ (परमात्मा के स्वरूप बारे) अनगिनत (विचार भरे) लेख लिख-लिख के (लिखने वालों के मन में अपनी विद्या और विचार-शक्ति का) गुमान ही (पैदा होता है)। बेशक अनगिनत लेख लिखे जाएं।परमात्मा का स्वरूप बयान से।लेख से परे है।उसके गुणों का परला छोर नहीं पाया जा सकता। उसके गुण कहने पर।बोलने पर।बारंबार पढ़-पढ़ के भी (मन पर अहंकार का) भार (ही बढ़ता) है। (पर हाँ) यदि मनुष्य का मन परमातमा की याद में रम जाए।यदि (मनुष्य की) सुरति में सदा स्थिर प्रभू (टिक जाए) तो बस ! यही है असल लेख (जो उसको परवान है)। 1। (हे भाई !) इस तरह का (अलेख) और सदा कायम रहने वाला तू सिर्फ एक प्रभू को ही जान (बाकी सारा जगत जनम मरन के ही चक्कर में है। और ये) पैदा होना-मरना भी तू उस परमात्मा का हुकम ही समझ। 1।रहाउ। (हे भाई ! उस सदा-स्थिर प्रभू को बिसार के) माया के मोह के कारण जगत मौत के सहम में बंधा पड़ा है। परमात्मा के नाम को ही संभाल के बंधन टूट सकते हैं। (पर ये नाम गुरू के द्वारा ही मिल सकता है) गुरू ही (नाम की दाति दे के) आत्मिक सुख देने वाला है।(गुरू के बिना ये दाति देने वाला) कोई और ना तलाशता फिर। ये नाम ही (हे भाई !) इस लोक और परलोक में तेरे साथ निभ सकता है।2। (पर जगत तो माया के मोह में फसा हुआ है।नाम में जुड़े भी कैसे।जीव) तब ही एक परमात्मा में सुरति जोड़ सकता है।जब गुरू के शबद द्वारा (मोह की ओर से) मन जाए (मोह का प्रभाव अपने ऊपर पड़ने ही ना दे)। तब ही जीव माया की ओर मन की भटकना को दूर कर सकता है।जब (गुरू के शबद के द्वारा कामादिक पाँचों के) ना खत्म किए जा सकने वाले टोले (के प्रभाव को) समाप्त कर दे। जो मनुष्य अपने मन में परमात्मा का नाम बसा लेता है वह इसी जिंदगी में ही (इन पाँचों के प्रभाव से) आजाद हो जाता है; पर सदा स्थिर प्रभू (के नाम) में वही मनुष्य लीन होता है जो गुरू के सन्मुख रहे। 3। (हे भाई ! ऐसा सदा स्थिर सिर्फ एक परमात्मा ही है) जिसने ये धरती।आकाश आदि रचे हैं।जिसने सारी सृष्टि रची है। जो रच के नाश करने के भी समर्थ है। फिर वह स्वयं ही स्वयं सबके अंदर एक-रस मौजूद है। खुद ही (सब जीवों पर) बख्शिश करता है (इस बख्शिश के लिए) किसी और की सालाह नहीं लेता। 4। हे प्रभू ! तू खुद ही भरा हुआ ये (संसार-) समुंद्र है तू स्वयं ही इसमें माणिक हीरा है। तू पवित्र स्वरूप है।सदा स्थिर रहने वाला है।और सारे गुणों का खजाना है।

संदर्भ: यह अंग 412 है, राग आसा का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)।

गुरु नानक की वाणी, observational, direct, बिना ornament।

Sarojini Nagar की hagling के बीच कोई unexpected calm।

ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।

यह अंग कुल 59 पंक्तियों का है, 3 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 412” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।

राग के context में: आसा राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।

पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।

अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।

“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।

नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।

अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।

तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।

हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।

ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।

दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।

“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।

हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।

अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।

आगे का अंग: अंग 413 →, पीछे का: ← अंग 411

हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।

(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)

शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।

संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।

शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।

संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।

एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।

अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।

स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।