अंग 410

अंग
410
राग आसा
राग: आसा · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਅਲਖ ਅਭੇਵੀਐ ਹਾਂ ॥
ਤਾਂ ਸਿਉ ਪ੍ਰੀਤਿ ਕਰਿ ਹਾਂ ॥
ਬਿਨਸਿ ਨ ਜਾਇ ਮਰਿ ਹਾਂ ॥
ਗੁਰ ਤੇ ਜਾਨਿਆ ਹਾਂ ॥
ਨਾਨਕ ਮਨੁ ਮਾਨਿਆ ਮੇਰੇ ਮਨਾ ॥੨॥੩॥੧੫੯॥
अलख अभेवीऐ हां ॥
तां सिउ प्रीति करि हां ॥
बिनसि न जाइ मरि हां ॥
गुर ते जानिआ हां ॥
नानक मनु मानिआ मेरे मना ॥२॥३॥१५९॥

हिन्दी अर्थ: जिसका सही स्वरूप बताया नहीं जा सकता।जिसका भेद पाया नहीं जा सकता। हे मेरे मन ! उस परमात्मा से प्यार डाल। जो कभी नाश नहीं होता जो ना पैदा होता है ना मरता है। हे नानक ! (कह,) हे मेरे मन ! जिस मनुष्य ने गुरू के जरिएउस परमात्मा के साथ गहरी सांझ डाल ली। उसका मन सदा (उसकी याद में) रमा रहता है। 2। 3। 159।
ਆਸਾਵਰੀ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਏਕਾ ਓਟ ਗਹੁ ਹਾਂ ॥
ਗੁਰ ਕਾ ਸਬਦੁ ਕਹੁ ਹਾਂ ॥
ਆਗਿਆ ਸਤਿ ਸਹੁ ਹਾਂ ॥
ਮਨਹਿ ਨਿਧਾਨੁ ਲਹੁ ਹਾਂ ॥
ਸੁਖਹਿ ਸਮਾਈਐ ਮੇਰੇ ਮਨਾ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਜੀਵਤ ਜੋ ਮਰੈ ਹਾਂ ॥
ਦੁਤਰੁ ਸੋ ਤਰੈ ਹਾਂ ॥
ਸਭ ਕੀ ਰੇਨੁ ਹੋਇ ਹਾਂ ॥
ਨਿਰਭਉ ਕਹਉ ਸੋਇ ਹਾਂ ॥
ਮਿਟੇ ਅੰਦੇਸਿਆ ਹਾਂ ॥
ਸੰਤ ਉਪਦੇਸਿਆ ਮੇਰੇ ਮਨਾ ॥੧॥
ਜਿਸੁ ਜਨ ਨਾਮ ਸੁਖੁ ਹਾਂ ॥
ਤਿਸੁ ਨਿਕਟਿ ਨ ਕਦੇ ਦੁਖੁ ਹਾਂ ॥
ਜੋ ਹਰਿ ਹਰਿ ਜਸੁ ਸੁਨੇ ਹਾਂ ॥
ਸਭੁ ਕੋ ਤਿਸੁ ਮੰਨੇ ਹਾਂ ॥
ਸਫਲੁ ਸੁ ਆਇਆ ਹਾਂ ॥
ਨਾਨਕ ਪ੍ਰਭ ਭਾਇਆ ਮੇਰੇ ਮਨਾ ॥੨॥੪॥੧੬੦॥
आसावरी महला ५ ॥
एका ओट गहु हां ॥
गुर का सबदु कहु हां ॥
आगिआ सति सहु हां ॥
मनहि निधानु लहु हां ॥
सुखहि समाईऐ मेरे मना ॥१॥ रहाउ ॥
जीवत जो मरै हां ॥
दुतरु सो तरै हां ॥
सभ की रेनु होइ हां ॥
निरभउ कहउ सोइ हां ॥
मिटे अंदेसिआ हां ॥
संत उपदेसिआ मेरे मना ॥१॥
जिसु जन नाम सुखु हां ॥
तिसु निकटि न कदे दुखु हां ॥
जो हरि हरि जसु सुने हां ॥
सभु को तिसु मंने हां ॥
सफलु सु आइआ हां ॥
नानक प्रभ भाइआ मेरे मना ॥२॥४॥१६०॥

हिन्दी अर्थ: आसावरी महला ५ ॥ हे मेरे मन ! एक परमात्मा का ही पल्ला पकड़। सदा गुरू की बाणी उचारता रह। हे मेरे मन ! परमात्मा की रजा को मीठी करके मान। (हे भाई !) अपने मन में बसते सारे गुणों के खजाने प्रभू को पा ले। हे मेरे मन ! (इस तरह सदा) आत्मिक आनंद में लीन रहना है। 1।रहाउ। हे मेरे मन ! जो मनुष्य काम-काज करता हुआ माया के मोह से अछोह रहता है। वह मनुष्य इस संसार-समुंद्र से पार लांघ जाता है।जिसमें से पार लांघना बहुत मुश्किल है। वह मनुष्य सभी के चरणों की धूल हुआ रहता है। (हे मेरे मन ! अगर गुरू की कृपा हो तो) मैं भी उस निरभय परमात्मा की सिफत सालाह करता रहूँ। उसके सारे चिंता-फिक्र मिट जाते हैं- हे मेरे मन ! जिस मनुष्य को सतिगुरू की शिक्षा प्राप्त हो जाती है 1। हे मेरे मन ! जिस मनुष्य को परमात्मा के नाम का अनंद प्राप्त हो जाता है। कभी कोई दुख उसके नजदीक नहीं फटकता। हे मेरे मन ! जो मनुष्य परमात्मा की सिफत सालाह सदा सुनता रहता है (दुनिया में) हरेक मनुष्य उसका आदर-सत्कार करता है। हे नानक ! (कह,) हे मेरे मन ! जगत में पैदा हुआ वही मनुष्य कामयाब जीवन वाला है जो परमात्मा को प्यारा लग गया है। 2। 4। 160।
ਆਸਾਵਰੀ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਮਿਲਿ ਹਰਿ ਜਸੁ ਗਾਈਐ ਹਾਂ ॥
ਪਰਮ ਪਦੁ ਪਾਈਐ ਹਾਂ ॥
ਉਆ ਰਸ ਜੋ ਬਿਧੇ ਹਾਂ ॥
ਤਾ ਕਉ ਸਗਲ ਸਿਧੇ ਹਾਂ ॥
ਅਨਦਿਨੁ ਜਾਗਿਆ ਹਾਂ ॥
ਨਾਨਕ ਬਡਭਾਗਿਆ ਮੇਰੇ ਮਨਾ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਸੰਤ ਪਗ ਧੋਈਐ ਹਾਂ ॥
ਦੁਰਮਤਿ ਖੋਈਐ ਹਾਂ ॥
ਦਾਸਹ ਰੇਨੁ ਹੋਇ ਹਾਂ ॥
ਬਿਆਪੈ ਦੁਖੁ ਨ ਕੋਇ ਹਾਂ ॥
ਭਗਤਾਂ ਸਰਨਿ ਪਰੁ ਹਾਂ ॥
ਜਨਮਿ ਨ ਕਦੇ ਮਰੁ ਹਾਂ ॥
ਅਸਥਿਰੁ ਸੇ ਭਏ ਹਾਂ ॥
ਹਰਿ ਹਰਿ ਜਿਨੑ ਜਪਿ ਲਏ ਮੇਰੇ ਮਨਾ ॥੧॥
ਸਾਜਨੁ ਮੀਤੁ ਤੂੰ ਹਾਂ ॥
ਨਾਮੁ ਦ੍ਰਿੜਾਇ ਮੂੰ ਹਾਂ ॥
ਤਿਸੁ ਬਿਨੁ ਨਾਹਿ ਕੋਇ ਹਾਂ ॥
ਮਨਹਿ ਅਰਾਧਿ ਸੋਇ ਹਾਂ ॥
ਨਿਮਖ ਨ ਵੀਸਰੈ ਹਾਂ ॥
ਤਿਸੁ ਬਿਨੁ ਕਿਉ ਸਰੈ ਹਾਂ ॥
ਗੁਰ ਕਉ ਕੁਰਬਾਨੁ ਜਾਉ ਹਾਂ ॥
ਨਾਨਕੁ ਜਪੇ ਨਾਉ ਮੇਰੇ ਮਨਾ ॥੨॥੫॥੧੬੧॥
आसावरी महला ५ ॥
मिलि हरि जसु गाईऐ हां ॥
परम पदु पाईऐ हां ॥
उआ रस जो बिधे हां ॥
ता कउ सगल सिधे हां ॥
अनदिनु जागिआ हां ॥
नानक बडभागिआ मेरे मना ॥१॥ रहाउ ॥
संत पग धोईऐ हां ॥
दुरमति खोईऐ हां ॥
दासह रेनु होइ हां ॥
बिआपै दुखु न कोइ हां ॥
भगतां सरनि परु हां ॥
जनमि न कदे मरु हां ॥
असथिरु से भए हां ॥
हरि हरि जिन॑ जपि लए मेरे मना ॥१॥
साजनु मीतु तूं हां ॥
नामु द्रिड़ाइ मूं हां ॥
तिसु बिनु नाहि कोइ हां ॥
मनहि अराधि सोइ हां ॥
निमख न वीसरै हां ॥
तिसु बिनु किउ सरै हां ॥
गुर कउ कुरबानु जाउ हां ॥
नानकु जपे नाउ मेरे मना ॥२॥५॥१६१॥

हिन्दी अर्थ: आसावरी महला ५ ॥ हे भाई ! (साध-संगति में) मिल के परमात्मा के सिफत सालाह के गीत गाने चाहिए। (इस तरह) आत्मिक जीवन का सबसे ऊँचा दर्जा हासिल हो जाता है। जो मनुष्य (सिफत सालाह के) उस स्वाद में रम जाता है। उसे (मानो) सारी ही सिद्धियां प्राप्त हो जाती हैं। वह हर समय (विकारों के हमलों से) सुचेत रहता है। हे नानक ! (कह) हे मेरे मन ! (जो मनुष्य प्रभू की सिफत सालाह करता है।वह मनुष्य) बहुत बड़ा भाग्यशाली हो जाता है। 1।रहाउ। हे भाई ! संत जनों के चरण धोने चाहिए (स्वैभाव त्याग के संतों के चरण पड़ना चाहिए। इस तरह मन की) खोटी मति दूर हो जाती है। हे भाई ! प्रभू के सेवकों की चरण धूड़ बना रह (इस तरह) कोई दुख अपना जोर नहीं डाल सकता। हे भाई ! संत जनों की शरण पड़ा रह। जनम-मरण का चक्कर नहीं रहेगा। वे अडोल आत्मिक जीवन वाले बन जाते हैं। हे मेरे मन ! जो मनुष्य सदा परमात्मा का नाम जपते हैं। 1। (हे मेरे प्रभू !) तू ही (मेरा) सज्जन है।तू ही (मेरा) मित्र है। मुझे (मेरे दिल में अपना) नाम पक्का करके टिका दे। (हे भाई !) उस परमात्मा के बिना और कोई (असल सज्जन-मित्र) नहीं। सदा उस (प्रभू) को ही सिमरता रह। (वह परमात्मा) आँख झपकने जितने समय के लिए भी भूलना नहीं चाहिए (क्योंकि) उस (की याद) के बिना जीवन सुखी नहीं गुजरता। हे मेरे मन ! मैं (नानक) गुरू से सदके जाता हूँ (क्योंकि गुरू की कृपा से ही) नानक (परमात्मा का) नाम जपता है। 2। 5। 161।
ਆਸਾਵਰੀ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਕਾਰਨ ਕਰਨ ਤੂੰ ਹਾਂ ॥
ਅਵਰੁ ਨਾ ਸੁਝੈ ਮੂੰ ਹਾਂ ॥
ਕਰਹਿ ਸੁ ਹੋਈਐ ਹਾਂ ॥
ਸਹਜਿ ਸੁਖਿ ਸੋਈਐ ਹਾਂ ॥
ਧੀਰਜ ਮਨਿ ਭਏ ਹਾਂ ॥
ਪ੍ਰਭ ਕੈ ਦਰਿ ਪਏ ਮੇਰੇ ਮਨਾ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਸਾਧੂ ਸੰਗਮੇ ਹਾਂ ॥
ਪੂਰਨ ਸੰਜਮੇ ਹਾਂ ॥
ਜਬ ਤੇ ਛੁਟੇ ਆਪ ਹਾਂ ॥
ਤਬ ਤੇ ਮਿਟੇ ਤਾਪ ਹਾਂ ॥
ਕਿਰਪਾ ਧਾਰੀਆ ਹਾਂ ॥
ਪਤਿ ਰਖੁ ਬਨਵਾਰੀਆ ਮੇਰੇ ਮਨਾ ॥੧॥
ਇਹੁ ਸੁਖੁ ਜਾਨੀਐ ਹਾਂ ॥
ਹਰਿ ਕਰੇ ਸੁ ਮਾਨੀਐ ਹਾਂ ॥
ਮੰਦਾ ਨਾਹਿ ਕੋਇ ਹਾਂ ॥
ਸੰਤ ਕੀ ਰੇਨ ਹੋਇ ਹਾਂ ॥
ਆਪੇ ਜਿਸੁ ਰਖੈ ਹਾਂ ॥
ਹਰਿ ਅੰਮ੍ਰਿਤੁ ਸੋ ਚਖੈ ਮੇਰੇ ਮਨਾ ॥੨॥
ਜਿਸ ਕਾ ਨਾਹਿ ਕੋਇ ਹਾਂ ॥
ਤਿਸ ਕਾ ਪ੍ਰਭੂ ਸੋਇ ਹਾਂ ॥
ਅੰਤਰਗਤਿ ਬੁਝੈ ਹਾਂ ॥
ਸਭੁ ਕਿਛੁ ਤਿਸੁ ਸੁਝੈ ਹਾਂ ॥
ਪਤਿਤ ਉਧਾਰਿ ਲੇਹੁ ਹਾਂ ॥
ਨਾਨਕ ਅਰਦਾਸਿ ਏਹੁ ਮੇਰੇ ਮਨਾ ॥੩॥੬॥੧੬੨॥
आसावरी महला ५ ॥
कारन करन तूं हां ॥
अवरु ना सुझै मूं हां ॥
करहि सु होईऐ हां ॥
सहजि सुखि सोईऐ हां ॥
धीरज मनि भए हां ॥
प्रभ कै दरि पए मेरे मना ॥१॥ रहाउ ॥
साधू संगमे हां ॥
पूरन संजमे हां ॥
जब ते छुटे आप हां ॥
तब ते मिटे ताप हां ॥
किरपा धारीआ हां ॥
पति रखु बनवारीआ मेरे मना ॥१॥
इहु सुखु जानीऐ हां ॥
हरि करे सु मानीऐ हां ॥
मंदा नाहि कोइ हां ॥
संत की रेन होइ हां ॥
आपे जिसु रखै हां ॥
हरि अंम्रितु सो चखै मेरे मना ॥२॥
जिस का नाहि कोइ हां ॥
तिस का प्रभू सोइ हां ॥
अंतरगति बुझै हां ॥
सभु किछु तिसु सुझै हां ॥
पतित उधारि लेहु हां ॥
नानक अरदासि एहु मेरे मना ॥३॥६॥१६२॥

हिन्दी अर्थ: आसावरी महला ५ ॥ हे मेरे मन ! (प्रभू दर पर ऐसे अरदास कर- हे प्रभू !) तू सारे जगत का रचनहार है (तेरे बिना) मुझे कोई और नहीं सूझता (जो ये ताकत रखता हो)। हे प्रभू ! जो कुछ तू करता है वही (जगत में) वरतता है। आत्मिक अडोलता में, आनंद में लीन रह सकते हैं। मन में हौसला बंध जाता है- हे मेरे मन ! (अगर अपनी चतुराईआं छोड़ के) परमात्मा के दर पर गिर पड़ें तो 1। हे मेरे मन ! गुरू की संगति में रहने से वह जुगति पूरी तरह से आ जाती है जिससे ज्ञानेन्द्रियां वश में आ जाती हैं। हे मन ! जिस वक्त (मनुष्य के अंदर से) अहंकार समाप्त हो जाता है (और गुरू की ओट ठीक लगने लगती है) उस वक्त से (मन के) सारे दुख कलेश दूर हो जाते हैं। सो हे मेरे मन ! (गुरू की संगति में रहके प्रभू-दर पर अरदास कर।कह,) हे जगत के मालिक प्रभू ! मेरे पर मेहर कर। मेरी (शरण पड़े की) इज्जत रख। 1। इसे ही सुख (का मूल) समझना चाहिए। हे मेरे मन ! जो कुछ परमात्मा करता है उसे (मीठा करके) मानना चाहिए। उसको (जगत में) कोई बुरा नहीं दिखता- हे मन ! जो मनुष्य संत जनों की चरण-धूड़ बनता है हे मेरे मन ! परमात्मा स्वयं ही जिस मनुष्य को (विकारों से) बचाता है वह मनुष्य आत्मिक जीवन देने वाला हरि-नाम-जल पीता है। 2। हे मेरे मन ! जिस मनुष्य का कोई भी सहाई नहीं बनता (अगर वह प्रभू की शरण में आ पड़े तो) वह प्रभू उसका रखवाला बन जाता है। वह परमात्मा हरेक के दिल की बात जान लेता है। उसको हरेक जीव की हरेक मनोकामना की समझ आ जाती है। (इस वास्ते) हे मेरे मन ! परमात्मा के दर पर यूँ अरजोई कर- हे प्रभू ! (हमें विकारों में) गिरे हुए जीवों को (विकारों से) बचा ले। (तेरे दर पर।मेरी) नानक की यही अरदास है। 3। 6। 162।
ਆਸਾਵਰੀ ਮਹਲਾ ੫ ਇਕਤੁਕਾ ॥
ਓਇ ਪਰਦੇਸੀਆ ਹਾਂ ॥
ਸੁਨਤ ਸੰਦੇਸਿਆ ਹਾਂ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਜਾ ਸਿਉ ਰਚਿ ਰਹੇ ਹਾਂ ॥
आसावरी महला ५ इकतुका ॥
ओइ परदेसीआ हां ॥
सुनत संदेसिआ हां ॥१॥ रहाउ ॥
जा सिउ रचि रहे हां ॥

हिन्दी अर्थ: आसावरी महला ५ इकतुका ॥ जगत में चार दिनों के लिए आए हे जीव ! ये संदेश ध्यान से सुन। 1।रहाउ। (हे भाई ! तुझसे पहले यहाँ पर आए हुए जीव) जिस माया के मोह में फंसे रहे।

संदर्भ: यह अंग 410 है, राग आसा का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।

M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।

IGI Airport की 3 बजे की flight का इंतज़ार, सब लोग phones पर, मन कहीं और।

ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।

यह अंग कुल 75 पंक्तियों का है, 5 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 410” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।

राग के context में: आसा राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।

पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।

अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।

“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।

नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।

अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।

तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।

हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।

ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।

दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।

“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।

हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।

अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।

आगे का अंग: अंग 411 →, पीछे का: ← अंग 409

हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।

(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)

शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।

संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।

शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।

संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।

एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।

अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।

स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।