नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।
हिन्दी अर्थ: (सिमरन की इस) सच्ची सीढ़ी के द्वारा सतिगुरू के बताए हुए रास्ते पे चल के वह मनुष्य वह आत्मिक ठिकाना हासिल कर लेता है जो सदा उसका अपना बना रहता है। 1। पर। जो मनुष्य अपने मन को वश में कर लेता है, वह मानो छे शास्त्रों का ज्ञाता हैं गया है उसको अकाल-पुरख की जोति सब जीवों में व्यापक दिखती है। 1। रहाउ। अगर मनुष्य के अंदर माया की तृष्णा हो। तो (बाहर जगत दिखावे के लिए चाहे) बहुत धार्मिक लिबास पहने। पर माया के मोह से उपजे कलेश उसके अंदर के आत्मिक सुख को दूर कर देते हैं। और काम-क्रोध उसके अंदर के नाम-धन को चुरा ले जाते हैं। (तृष्णा की बाढ़ में से वही मनुष्य) पार होता है जो प्रभू के नाम में जुड़ा रहता है और जो दुचिक्तापन छोड़ता है। 2। (जिसने मन को मार लिया) वह परमात्मा की सिफत सालाह करता है आत्मिक अडोलता का आनंद पाता है। गोबिंद के प्रेम को अपना साथी-मित्र बनाता है। उसे यकीन रहता है कि प्रभू खुद ही (जीवों को) पैदा करता है और खुद ही दातें बख्शने वाला है वह मनुष्य अपना तन। अपना मन अपनी जिंद प्रभू के हवाले किए रहता है। 3। (मन मार के आत्मिक आनंद लेने वाले को) झूठ आदि विकार शरीर के लिए भारी कष्ट (का मूल) प्रतीत होते हैं। (जगत दिखावे वाले) सारे धार्मिक भेष और वर्ण (-आश्रमों का गुमान) मिट्टी के समान दिखाई देते हैं। हे नानक ! उसे यकीन रहता है कि जगत तो पैदा होता है और नाश हो जाता है। परमात्मा का एक नाम ही सदा स्थिर रहने वाला है (इस वास्ते वह नाम जपता है)। 4। 11।
आसा महला 1 ॥ एको सरवरु कमल अनूप ॥ सदा बिगासै परमल रूप ॥ ऊजल मोती चूगहि हंस ॥ सरब कला जगदीसै अंस ॥1॥ जो दीसै सो उपजै बिनसै ॥ बिनु जल सरवरि कमलु न दीसै ॥1॥ रहाउ ॥ बिरला बूझै पावै भेदु ॥ साखा तीनि कहै नित बेदु ॥ नाद बिंद की सुरति समाइ ॥ सतिगुरु सेवि परम पदु पाइ ॥2॥ मुकतो रातउ रंगि रवांतउ ॥ राजन राजि सदा बिगसांतउ ॥ जिसु तूं राखहि किरपा धारि ॥ बूडत पाहन तारहि तारि ॥3॥ त्रिभवण महि जोति त्रिभवण महि जाणिआ ॥ उलट भई घरु घर महि आणिआ ॥ अहिनिसि भगति करे लिव लाइ ॥ नानकु तिन कै लागै पाइ ॥4॥12॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।
हिन्दी अर्थ: आसा महला 1 ॥ (सत्संग) एक सरोवर है (जिस में) संत-जन सुंदर कमल-पुष्प हैं। संत-हंस, सारी ताकतों के मालिक जगदीश का हिस्सा (बने रहते हैं; जगदीश से एक-रूप हुए रहते हैं)। (और उस सत्संग-सरोवर में रहके प्रभू की सिफत सालाह के) सुंदर मोती चुग के खाते हैं (सत्संग उनको नाम-जल दे के) सदा खिलाए रखता है (उन्हें आत्मिक जीवन की) सुगंधि और सुंदरता देता है। 1। जो कुछ दिखाई दे रहा है (भाव। ये दिखाई देता जगत) पैदा होता है और नाश होता है। पर सरोवर में (उगा हुआ) कमल फूल पानी के बिना नहीं है (इस वास्ते वह नाश होता) नहीं दिखता (भाव। जैसे सरोवर में उगा हुआ कमल फूल पानी के कारण हरा-भरा रहता है। वैसे ही सत्संग में टिके रहने वाले गुरमुख का दिल रूपी कमल सदा आत्मिक जीवन वाला है)। 1। रहाउ। (सत्संग-सरोवर की इस) के इस गुप्त लाभ (के भेद) को कोई दुर्लभ व्यक्ति ही समझता है (जगत आम तौर पर त्रिगुणी संसार की बातें ही करता है) वेद (भी) त्रिगुणी संसार का ही वर्णन करते हैं। (सत्संग में रहके) जिस मनुष्य की सुरति परमात्मा की सिफत सालाह की बाणी की सूझ में लीन रहती है। वह अपने गुरू के बताए हुए राह पर चल के ऊँची से ऊँची आत्मिक अवस्था हासिल कर लेता है। 2। (सत्संग-सरोवर में डुबकी लगाने वाला मनुष्य) माया के प्रभाव से स्वतंत्र है। प्रभू की याद में मस्त रहता है। प्रेम में टिक के सिमरन करता है; राजाओं के राजे प्रभू में (जुड़ा रह के) सदैव प्रसन्न-चित्त रहता है। (पर। हे प्रभू ! ये आपकी ही मेहर है) आप मेहर करके जिसको (माया के असर से) बचा लेता है (वह बच जाता है)। आप अपने नाम की बेड़ी में (बड़े-बड़े) पत्थर (-दिलों) को तैरा लेता है। 3। (जो मनुष्य सत्संग में टिका उसने) तीन भवनों में प्रभू की ज्योति देख ली। उसने सारे जगत में बसते को पहिचान लिया। उसकी सुरति माया के मोह से उलट गई। उसने परमात्मा का निवास-स्थान अपने दिल में बना लिया। वह सुरति जोड़ के दिन-रात भक्ति करता है। नानक ऐसे (भाग्यशाली संत) जनों की चरनीं लगता है। 4। 12।
आसा महला 1 ॥ गुरमति साची हुजति दूरि ॥ बहुतु सिआणप लागै धूरि ॥ लागी मैलु मिटै सच नाइ ॥ गुर परसादि रहै लिव लाइ ॥1॥ है हजूरि हाजरु अरदासि ॥ दुखु सुखु साचु करते प्रभ पासि ॥1॥ रहाउ ॥ कूड़ु कमावै आवै जावै ॥ कहणि कथनि वारा नही आवै ॥ किआ देखा सूझ बूझ न पावै ॥ बिनु नावै मनि त्रिपति न आवै ॥2॥ जो जनमे से रोगि विआपे ॥ हउमै माइआ दूखि संतापे ॥ से जन बाचे जो प्रभि राखे ॥ सतिगुरु सेवि अंम्रित रसु चाखे ॥3॥ चलतउ मनु राखै अंम्रितु चाखै ॥ सतिगुर सेवि अंम्रित सबदु भाखै ॥ साचै सबदि मुकति गति पाए ॥ नानक विचहु आपु गवाए ॥4॥13॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।
हिन्दी अर्थ: आसा महला 1 ॥ जो मनुष्य गुरू की (इस) मति को दृढ़ करके धारण करता है। (परमात्मा की अंग-संगता के बारे में) उस मनुष्य की अश्रद्धा दूर हो जाती है। (गुरू की मति पर श्रद्धा की जगह) मनुष्य की अपनी बहुती चतुराईयों से मन में (विकारों की) मैल इकट्ठी होती है। ये एकत्र हुई मैल सदा-स्थिर-प्रभू के नाम द्वारा ही मिट सकती है। और। गुरू की किरपा से ही मनुष्य (परमात्मा के चरणों में) सुरति टिका के रख सकता है। 1। (हे भाई !) परमात्मा हर समय हमारे अंग-संग है। एक-मन हो के उसके आगे अरदास करो। ये यकीन जानो कि हरेक जीव का दुख-सुख वह करतार प्रभू जानता है। 1। रहाउ। जो मनुष्य (अश्रद्धा भरी चतुराईयों की) व्यर्थ कमाई करता है वह जनम-मरण के चक्कर में पड़ा रहता है। उसकी ये बेकार की बातें कभी खत्म नहीं होती। (अज्ञानी-अंधे ने हुजॅतों में ही रहके) अस्लियत नहीं देखी। इस वास्ते उसे कोई समझ नहीं आती। और। परमात्मा के नाम के बिना उसके मन में शांति नहीं आती। 2। जो भी जीव जगत में जनम लेते हैं (परमात्मा की हस्ती द्वारा अश्रद्धा के कारण) आत्मिक रोगो से दबे रहते हैं। और अहंकार के दुख में। माया के मोह और दुख में वे कलेश पाते रहते हैं। इस रोग से। इस दुख से वही लोग बचते हैं। जिनकी प्रभू ने खुद रक्षा की; जिन्होंने गुरू के बताए रास्ते पर चल के प्रभू के अमृत-नाम चखा। 3। जो मनुष्य परमात्मा का सदा स्थिर रहने वाला नाम-रस चखता है। और चंचल मन को काबू में रखता है। जो मनुष्य गुरू की शिक्षा पे चल के अटॅल आत्मिक जीवन देने वाली सिफत सालाह की बाणी उचारता है। वह मनुष्य इस सच्ची बाणी के द्वारा विकारों से खलासी हासिल कर लेता है। उच्च आत्मिक अवस्था प्राप्त कर लेता है। और। हे नानक ! वह अपने अंदर से (अपनी बुद्धि का) अहंकार खत्म कर लेता है। 4। 13।
आसा महला 1 ॥ जो तिनि कीआ सो सचु थीआ ॥ अंम्रित नामु सतिगुरि दीआ ॥ हिरदै नामु नाही मनि भंगु ॥ अनदिनु नालि पिआरे संगु ॥1॥ हरि जीउ राखहु अपनी सरणाई ॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।
हिन्दी अर्थ: आसा महला 1 ॥ जिस जीव को उस परमात्मा ने अपना बना लिया। वह उस सदा स्थिर प्रभू का ही रूप बन गया। उसे सतिगुरू ने अटल आत्मिक जीवन देने वाला नाम हरी-नाम दे दिया। उस जीव के हृदय में (सदा प्रभू का) नाम बसता है। उसका मन हमेशा प्रभू चरणों से जुड़ा रहता है। हर रोज (हर समय) प्यारे प्रभू से उसका साथ बना रहता है। 1। हे प्रभू जी ! जिस मनुष्य को आप अपनी शरण में रखता है।
आसा राग सुबह की पहली रोशनी का है, उम्मीद से भरा, चलने को तैयार। आसा का अर्थ ही ‘आशा’ है। ‘आसा दी वार’ सिख परम्परा की सुबह-कीर्तन का केन्द्र-स्तम्भ रही है, चार-पाँच सदियों से। आसा राग का क्षेत्र है। ‘आसा दी वार’ की रचना गुरु नानक की है, बाद में गुरु अंगद और गुरु अर्जन के साथ संगठित हुई।
नानक की रचनाओं में एक खास तरह की आबजर्वेशनल आँख है। एक पटवारी का पेशा छोड़ कर तीस के बाद के दशकों में वो काबुल, मक्का, अरब, असम, श्रीलंका, और तिब्बत की सरहद तक गए। हर जगह संत-फ़क़ीरों, बादशाहों, और साधारण किसानों से बातचीत की, और उसी बातचीत की पर्तें इन शबदों में बैठी हैं।
इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(सिमरन की इस) सच्ची सीढ़ी के द्वारा सतिगुरू के बताए हुए रास्ते पे चल के वह मनुष्य वह आत्मिक ठिकाना हासिल कर लेता है जो सदा उसका अपना बना रहता है।”
इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।