नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।
हिन्दी अर्थ: वह कभी बुरे काम के नजदीक नहीं जाते।भला काम करते हैं और धर्म अनुसार अपना जीवन निभाते हैं। दुनिया के धंधों में खचित करने वाली माया के मोह रूपी जंजीर उन्होंने तोड़ दी है।थोड़ा खाते हैं।थोड़ा ही पीते हैं (भाव।खाना-पीना चस्के की खातिर नहीं।शारीरिक निर्वाह के वास्ते है)। “हे प्रभू ! आप बड़ी बख्शिशें करने वाला है। सदा जीवों को दातें बख्शता है”- इस तरह की प्रभू की सिफत सालाह करके वह संतोषी मनुष्य प्रभू को प्राप्त कर लेते हैं। 7।
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।
हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 1॥ मनुष्य।वृक्ष।तीरथ।तट (भाव।नदियां)।बादल।खेत। द्वीप।लोक।मण्डल।खंड-ब्रहमण्ड।सरोवर।मेरु आदि पर्वत। चारे खाणियां (अण्डज।जेरज।उतभुज व सेतज) के जीव-जंतु – इन सबकी गिनती का अंदाजा वही प्रभू जानता है (जिसने ये सब पैदा किए हैं)। हे नानक ! सारे जीव-जंतु पैदा करके।प्रभू उन सब की पालना भी करता है। जिस करतार ने ये सृष्टि रची है।इसकी पालना का फिक्र भी उसे ही है। जिस करतार ने जगत पैदा किया है।वही इनका ख्याल रखता है। मैं उसी से सदके हूँ।उसी की ही जै-जैकार करता हूँ (भाव।उसी की सिफत सालाह करता हूँ) उस प्रूभ का आसरा (जीव के वास्ते) सदा अटल है। हे नानक ! उस हरी का सच्चा नाम सिमरन के बिना तिलक जनेऊ आदि धार्मिक भेष कोई मायने नहीं रखते। 1।
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।
हिन्दी अर्थ: महला 1॥ लाखों नेकी के अच्छे काम किए जाएं।लाखों धर्म के काम किए जाएं।जो लोगों की नजरों में ठीक हों। तीर्थों पे जा के लाखों तप साधे जाएं।जंगलों में जा के सुन्न समाधि में टिक के योग-साधनाएं की जाएं; रण-भूमियों में जा के सूरमों के वाले बेअंत बहादरी वाले कारनामें दिखाए जाएं।युद्ध में (ही वैरी के सन्मुख हो के) जान दे दी जाए। लाखों (तरीकों से) सुरति पकाई जाए।ज्ञान-चर्चा की जाए और मन को एकाग्र करने के यत्न किए जाएं।बेअंत बार ही पुराण आदि धर्म-पुस्तकों के पाठ पढ़े जाएं; जिसने ये सारी सृष्टि रची है और जिसने जीवों का जीना-मरना नियत किया है (पर) हे नानक ! ये सारी समझदारियां व्यर्थ हैं।(दरगाह में कबूल होने के लिए) उस प्रभू की बख्शिश ही सच्चा परवाना है।(इसलिए उसकी बख्शिश का पात्र बनने के लिए उसका नाम सिमरना ही उक्तम मत है)। 2।
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।
हिन्दी अर्थ: पउड़ी। हे प्रभू ! केवल आप ही पूरन तौर पर अडोल रहने वाला मालिक (पूरन तौर पे खिड़ाव में) है।और तूने खुद ही अपनी अडोलता का गुण (जगत में) वरता दिया है। (पर) ये खिड़ाव वाला गुण (केवल) उस-उस जीव को ही मिलता है जिस जिस को स्वयं देता है।आपकी किरपा की बरकति से।वह मनुष्य उस खिड़ाव अनुसार अपना जीवन बनाते हैं। जिन्हें सतिगुरू मिल जाता है।उन्हें इस पूरन खिड़ाव वाली दाति मिलती है।सतिगुरू उनके हृदय में ये खिड़ाव टिका देता है। मूर्खों को खिड़ाव की सार नहीं आती।वे मनमुख (उससे वंचित रह के) अपना जनम व्यर्थ गवाते हैं। जगत में उनके जन्म का कोई लाभ नहीं होता। 8।
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।
हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 1॥ अगर इतनी पोथियां पढ़ लें।जिनसे कई गड्डियां लादी जा सकें।जिनके ढेरों के ढेर लगाए जा सकें; अगर इतनी पुस्तकें पढ़ जायं।जिनसे एक बेड़ी भरी जा सके। कई गड्ढे भरे जा सकें; अगर पढ़-पढ़ के सालों के साल गुजारे जाएं अगर पढ़-पढ़ के (साल के) सारे महीने बिता दिए जाएं; अगर पुस्तकें पढ़-पढ़ के सारी उम्र गुजार दी जाए। और पढ़-पढ़ के सारे स्वास गुजार दिए जाएं (तो भी ईश्वर के दरबार में इस में से कुछ भी परवान नहीं होता)। हे नानक ! प्रभू की दरगाह में केवल प्रभू की सिफत सालाह कबूल होती है।(प्रभू की वडिआई के बिना) कोई उद्यम करना।अपने अहंकार में ही भटकते फिरना है। 1।
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।
हिन्दी अर्थ: महला 1॥ जितना कोई मनुष्य (किसी विद्या) को लिखना-पढ़ना जानता है। उतना ही उसे अपनी विद्या पे घमण्ड है (सो।यह जरूरी नहीं कि ईश्वर के दर पे परवान होने के लिए विद्या की जरूरत है); जितना ही कोई बहुत तीर्थों की यात्रा करता है। उतना ही जगह-जगह पे बताता फिरता है (कि मैं फलाने तीर्थ पर स्नान कर आया हूँ।सो।तीर्थ यात्रा भी अहंकार का कारण बनती है)। किसी ने (लोगों को रिझाने के लिए।धर्म के) कई चिन्ह धारण किए हुए हैं।और कोई अपने शरीर को कष्ट दे रहा है (उसके लिए भी यही कहना ठीक है कि) हे भाई ! अपने किए का दुख सह (भाव।ये भेष धारन करने।शरीर को दुख देने भी ईश्वर के दर पर कबूल नहीं हैं)।(और देखो। जिसने) अन्न छोड़ा हुआ है (प्रभू का सिमरन नहीं करता।सिमरन त्याग के) उसे यही अच्छा काम लगता है। उसने भी अपनी जिंदगी तल्ख बनाई हुई है और दुख सह रहा है। कपड़े नहीं पहनता। दिन-रात दुखी हो रहा है। (एकांत में) चुप रह के (असली राह से) टूटा हुआ।भला। बताओ (माया की नींद में) सोया हुआ मनुष्य गुरू के बिना कैसे जाग सकता है। (एक) पैरों से नंगा फिरता है और अपनी इस की हुई भूल का दुख सह रहा है। (साफ-बढ़िया भोजन छोड़ के) झूठ-मीठ खाता है।और सिर पर राख डाल रखी है। अज्ञानी मूर्ख ने (इस तरह) अपनी इज्जत गवा ली है। प्रभू के नाम के बिना और कोई उद्यम परवान नहीं। अंधा (मूर्ख) उजाड़ों में।मढ़ियों में।मसाणों में जा रहता है। (ईश्वर वाला रास्ता) नहीं समझता और समय बीत जाने पर पछताता है।
आसा राग में एक भोर की हलकी ताज़गी है। आसा दी वार इसी राग में बँधी, और सिख-संगीत के परिदृश्य को आकार दिया। हर सुबह, अमृतसर के हरमंदिर साहिब में, यही राग खुलता है। आसा राग का क्षेत्र है। ‘आसा दी वार’ की रचना गुरु नानक की है, बाद में गुरु अंगद और गुरु अर्जन के साथ संगठित हुई।
गुरु नानक की वाणी का अपना मिज़ाज है, सीधा-सादा, बिना अलंकार के, मगर हर पंक्ति में एक ठहराव। 1469 में तलवण्डी में जन्म, सुलतानपुर के बहीखाते में कुछ साल काम, फिर तीस की उम्र के क़रीब वो लम्बी पैदल यात्रा जो काबुल, बग़दाद, मक्का, जगन्नाथ-पुरी, तिब्बत की सरहद तक उन्हें ले गयी। उनके शबद इन्हीं यात्राओं की वाणी हैं।
इस अंग पर 6 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “वह कभी बुरे काम के नजदीक नहीं जाते।”
बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।