अंग 376

अंग
376
राग आसा
राग: आसा · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਗੁਣ ਗਾਈਅਹਿ ਨੀਤ ॥
ਮੁਖ ਊਜਲ ਹੋਇ ਨਿਰਮਲ ਚੀਤ ॥੪॥੧੯॥
कहु नानक गुण गाईअहि नीत ॥
मुख ऊजल होइ निरमल चीत ॥४॥१९॥

हिन्दी अर्थ: हे नानक ! कह, (हे भाई !) सदा परमात्मा के गुण गाए जाने चाहिए (इस उद्यम की बरकति से। एक तो लोक-परलोक में) मुख उजला हो जाता है। दूसरा (मन) भी पवित्र हो जाता है। 4। 19।
ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਨਉ ਨਿਧਿ ਤੇਰੈ ਸਗਲ ਨਿਧਾਨ ॥
ਇਛਾ ਪੂਰਕੁ ਰਖੈ ਨਿਦਾਨ ॥੧॥
ਤੂੰ ਮੇਰੋ ਪਿਆਰੋ ਤਾ ਕੈਸੀ ਭੂਖਾ ॥
ਤੂੰ ਮਨਿ ਵਸਿਆ ਲਗੈ ਨ ਦੂਖਾ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਜੋ ਤੂੰ ਕਰਹਿ ਸੋਈ ਪਰਵਾਣੁ ॥
ਸਾਚੇ ਸਾਹਿਬ ਤੇਰਾ ਸਚੁ ਫੁਰਮਾਣੁ ॥੨॥
ਜਾ ਤੁਧੁ ਭਾਵੈ ਤਾ ਹਰਿ ਗੁਣ ਗਾਉ ॥
ਤੇਰੈ ਘਰਿ ਸਦਾ ਸਦਾ ਹੈ ਨਿਆਉ ॥੩॥
ਸਾਚੇ ਸਾਹਿਬ ਅਲਖ ਅਭੇਵ ॥
ਨਾਨਕ ਲਾਇਆ ਲਾਗਾ ਸੇਵ ॥੪॥੨੦॥
आसा महला ५ ॥
नउ निधि तेरै सगल निधान ॥
इछा पूरकु रखै निदान ॥१॥
तूं मेरो पिआरो ता कैसी भूखा ॥
तूं मनि वसिआ लगै न दूखा ॥१॥ रहाउ ॥
जो तूं करहि सोई परवाणु ॥
साचे साहिब तेरा सचु फुरमाणु ॥२॥
जा तुधु भावै ता हरि गुण गाउ ॥
तेरै घरि सदा सदा है निआउ ॥३॥
साचे साहिब अलख अभेव ॥
नानक लाइआ लागा सेव ॥४॥२०॥

हिन्दी अर्थ: आसा महला ५ ॥ (हे प्रभू !) तेरे घर में (जगत की) नौ ही निधियां मौजूद हैं सारे खजाने मौजूद हैं। तू ऐसा इच्छा-पूरक है (तू हरेक जीव की इच्छा पूरी करने की ऐसी ताकत रखता है) जो अंत में रक्षा करता है (जब मनुष्य और सारे मिथे हुए आसरे छोड़ बैठता है)। 1। (हे प्रभू !) जब तू मेरे साथ प्यार करने वाला है (और मुझे सब कुछ देने वाला है) तो मुझे कोई तृष्णा नहीं रह सकती। अगर तू मेरे मन में टिका रहे तो कोई भी दुख मुझे छू नहीं सकता। 1।रहाउ। हे प्रभू ! जो कुछ तू करता है (जीवों को) वही (सिर माथे पर) कबूल होता है। हे सदा कायम रहने वाले मालिक ! तेरा हुकम भी अटॅल है। 2। हे प्रभू ! जब तुझे मंजूर होता है तभी मैं तेरे सिफत सालाह के गीत गा सकता हूँ। तेरे घर में सदा ही न्याय है।सदा ही इन्साफ़ है। 3। हे नानक ! (कह,) हे सदा कायम रहने वाले मालिक ! हे अलख और अभेव ! तेरा प्रेरित किया हुआ ही जीव तेरी सेवा-भगती में लग सकता है। 4। 20।
ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਨਿਕਟਿ ਜੀਅ ਕੈ ਸਦ ਹੀ ਸੰਗਾ ॥
ਕੁਦਰਤਿ ਵਰਤੈ ਰੂਪ ਅਰੁ ਰੰਗਾ ॥੧॥
ਕਰ੍ਹੈ ਨ ਝੁਰੈ ਨਾ ਮਨੁ ਰੋਵਨਹਾਰਾ ॥
ਅਵਿਨਾਸੀ ਅਵਿਗਤੁ ਅਗੋਚਰੁ ਸਦਾ ਸਲਾਮਤਿ ਖਸਮੁ ਹਮਾਰਾ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਤੇਰੇ ਦਾਸਰੇ ਕਉ ਕਿਸ ਕੀ ਕਾਣਿ ॥
ਜਿਸ ਕੀ ਮੀਰਾ ਰਾਖੈ ਆਣਿ ॥੨॥
ਜੋ ਲਉਡਾ ਪ੍ਰਭਿ ਕੀਆ ਅਜਾਤਿ ॥
ਤਿਸੁ ਲਉਡੇ ਕਉ ਕਿਸ ਕੀ ਤਾਤਿ ॥੩॥
ਵੇਮੁਹਤਾਜਾ ਵੇਪਰਵਾਹੁ ॥
ਨਾਨਕ ਦਾਸ ਕਹਹੁ ਗੁਰ ਵਾਹੁ ॥੪॥੨੧॥
आसा महला ५ ॥
निकटि जीअ कै सद ही संगा ॥
कुदरति वरतै रूप अरु रंगा ॥१॥
कर्है न झुरै ना मनु रोवनहारा ॥
अविनासी अविगतु अगोचरु सदा सलामति खसमु हमारा ॥१॥ रहाउ ॥
तेरे दासरे कउ किस की काणि ॥
जिस की मीरा राखै आणि ॥२॥
जो लउडा प्रभि कीआ अजाति ॥
तिसु लउडे कउ किस की ताति ॥३॥
वेमुहताजा वेपरवाहु ॥
नानक दास कहहु गुर वाहु ॥४॥२१॥

हिन्दी अर्थ: आसा महला ५ ॥ हे भाई ! परमात्मा सब जीवों के नजदीक बसता है सदा सभी के अंग-संग रहता है। उसी की ही कला सब रूपों में सब रंगों में काम कर रही है। 1। हे भाई ! उसका मन कभी कुढ़ता नहीं कभी खिझता नहीं कभी गिले-शिकवे नहीं करता – जिस मनुष्य को ये निश्चय हो जाता है के अविनाशी अदृश्य और अपहुँच परमात्मा हमारे सिर पर सदा कायम रहने वाला पति कायम है। 1।रहाउ। हे प्रभू ! तेरे छोटे से सेवक को भी किसी की मुथाजी नहीं रहती (हे भाई !) जिस सेवक की इज्जत प्रभू-पातिशाह स्वयं रखे (वह किसी की मुथाजी करे भी क्यूँ। )। 2। (हे भाई !) जिस सेवक को परमात्मा ने ऊँची जाति आदि के अहंकार से रहित कर दिया। उसे कभी किसी की ईरखा का डर नहीं रहता। 3। जो बे-परवाह है जिसे किसी की मुथाजी नहीं। हे दास नानक ! (कह, हे भाई !) उस सबसे बड़े परमात्मा को ही धन्य-धन्य कहते रहो4। 21।
ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਹਰਿ ਰਸੁ ਛੋਡਿ ਹੋਛੈ ਰਸਿ ਮਾਤਾ ॥
ਘਰ ਮਹਿ ਵਸਤੁ ਬਾਹਰਿ ਉਠਿ ਜਾਤਾ ॥੧॥
ਸੁਨੀ ਨ ਜਾਈ ਸਚੁ ਅੰਮ੍ਰਿਤ ਕਾਥਾ ॥
ਰਾਰਿ ਕਰਤ ਝੂਠੀ ਲਗਿ ਗਾਥਾ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਵਜਹੁ ਸਾਹਿਬ ਕਾ ਸੇਵ ਬਿਰਾਨੀ ॥
ਐਸੇ ਗੁਨਹ ਅਛਾਦਿਓ ਪ੍ਰਾਨੀ ॥੨॥
ਤਿਸੁ ਸਿਉ ਲੂਕ ਜੋ ਸਦ ਹੀ ਸੰਗੀ ॥
ਕਾਮਿ ਨ ਆਵੈ ਸੋ ਫਿਰਿ ਫਿਰਿ ਮੰਗੀ ॥੩॥
ਕਹੁ ਨਾਨਕ ਪ੍ਰਭ ਦੀਨ ਦਇਆਲਾ ॥
ਜਿਉ ਭਾਵੈ ਤਿਉ ਕਰਿ ਪ੍ਰਤਿਪਾਲਾ ॥੪॥੨੨॥
आसा महला ५ ॥
हरि रसु छोडि होछै रसि माता ॥
घर महि वसतु बाहरि उठि जाता ॥१॥
सुनी न जाई सचु अंम्रित काथा ॥
रारि करत झूठी लगि गाथा ॥१॥ रहाउ ॥
वजहु साहिब का सेव बिरानी ॥
ऐसे गुनह अछादिओ प्रानी ॥२॥
तिसु सिउ लूक जो सद ही संगी ॥
कामि न आवै सो फिरि फिरि मंगी ॥३॥
कहु नानक प्रभ दीन दइआला ॥
जिउ भावै तिउ करि प्रतिपाला ॥४॥२२॥

हिन्दी अर्थ: आसा महला ५ ॥ (हे भाई ! विकारों के बोझ तले दबा हुआ मनुष्य) परमात्मा का नाम-रस छोड़ के (दुनियां के पदार्थों के) रस में मस्त रहता है जो खत्म भी जल्दी हो जाता है। (सुख देने वाली) नाम-वस्तु (इसके) हृदय-गृह में मौजूद है (पर सुख की खातिर दुनिया के पदार्थों की खातिर) बाहर उठ-उठ दौड़ता है। 1। (हे भाई ! जीव ऐसे विकारों के नीचे दबा रहता है कि ये) सदा स्थिर परमात्मा का नाम सुनना पसंद ही नहीं करता। आत्मिक जीवन देने वाली सिफत सालाह की बातें सुननीं पसन्द नहीं करता।पर झूठी (किसी काम ना आने वाली) कथा कहानियों में लग के (औरों से) झगड़ा-बखेड़ा खड़े करता रहता है। 1।रहाउ। (हे भाई !) मनुष्य विकारों के नीचे ऐसे दबा रहता है कि खाता तो है मालिक प्रभू का दिया हुआ है। पर सेवा करता है बेगानी (मालिक प्रभू को याद करने की जगह सदा माया की सोचें सोचता है)। 2। जो परमात्मा सदा ही (जीव के साथ) साथी है उससे पर्दा करता है। जो चीज (आखिर किसी) काम नहीं आनी।वही बार-बार मांगता रहता है। 3। हे नानक ! कह, हे दीनों पर दया करने वाले प्रभू ! जैसे भी हो सके (विकारों और माया के मोह से दबे जीवों की) रक्षा कर। 4। 22।
ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਜੀਅ ਪ੍ਰਾਨ ਧਨੁ ਹਰਿ ਕੋ ਨਾਮੁ ॥
ਈਹਾ ਊਹਾਂ ਉਨ ਸੰਗਿ ਕਾਮੁ ॥੧॥
ਬਿਨੁ ਹਰਿ ਨਾਮ ਅਵਰੁ ਸਭੁ ਥੋਰਾ ॥
ਤ੍ਰਿਪਤਿ ਅਘਾਵੈ ਹਰਿ ਦਰਸਨਿ ਮਨੁ ਮੋਰਾ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਭਗਤਿ ਭੰਡਾਰ ਗੁਰਬਾਣੀ ਲਾਲ ॥
ਗਾਵਤ ਸੁਨਤ ਕਮਾਵਤ ਨਿਹਾਲ ॥੨॥
ਚਰਣ ਕਮਲ ਸਿਉ ਲਾਗੋ ਮਾਨੁ ॥
ਸਤਿਗੁਰਿ ਤੂਠੈ ਕੀਨੋ ਦਾਨੁ ॥੩॥
ਨਾਨਕ ਕਉ ਗੁਰਿ ਦੀਖਿਆ ਦੀਨੑ ॥
ਪ੍ਰਭ ਅਬਿਨਾਸੀ ਘਟਿ ਘਟਿ ਚੀਨੑ ॥੪॥੨੩॥
आसा महला ५ ॥
जीअ प्रान धनु हरि को नामु ॥
ईहा ऊहां उन संगि कामु ॥१॥
बिनु हरि नाम अवरु सभु थोरा ॥
त्रिपति अघावै हरि दरसनि मनु मोरा ॥१॥ रहाउ ॥
भगति भंडार गुरबाणी लाल ॥
गावत सुनत कमावत निहाल ॥२॥
चरण कमल सिउ लागो मानु ॥
सतिगुरि तूठै कीनो दानु ॥३॥
नानक कउ गुरि दीखिआ दीन॑ ॥
प्रभ अबिनासी घटि घटि चीन॑ ॥४॥२३॥

हिन्दी अर्थ: आसा महला ५ ॥ (हे भाई !) जिंद के वास्ते प्राणों के वास्ते परमात्मा का नाम (ही असल) धन है। (ये धन) इस लोक में भी और परलोक में भी प्राणों के साथ काम (देता है)। 1। परमात्मा के नाम के बिना और सारा (धन पदार्थ) घाटे का सौदा ही है। (हे भाई !) मेरा मन परमात्मा के दर्शनों की बरकति से (दुनिया के धन पदार्थों की ओर से) संतुष्ट हो गया है (तृप्त हो गया है)। 1। (हे भाई !) परमात्मा की भगती सतिगुरू की बाणी (मानो) लाल (-रत्नों) के खजाने है। (गुरबाणी) गाते-सुनते और कमाते हुए मन सदा खिला रहता है। 2। (हे भाई !) दयावान हुए सतिगुरू ने जिस मनुष्य को परमात्मा के नाम-धन की दाति दी। उसका मन परमात्मा के सुंदर चरणों के साथ जुड़ गया। 3। हे नानक ! जिस मनुष्य को गुरू ने शिक्षा दी। उसने अविनाशी परमात्मा को हरेक हृदय में (बसता) देख लिया। 4। 23।
ਆਸਾ ਮਹਲਾ ੫ ॥
ਅਨਦ ਬਿਨੋਦ ਭਰੇਪੁਰਿ ਧਾਰਿਆ ॥
ਅਪੁਨਾ ਕਾਰਜੁ ਆਪਿ ਸਵਾਰਿਆ ॥੧॥
ਪੂਰ ਸਮਗ੍ਰੀ ਪੂਰੇ ਠਾਕੁਰ ਕੀ ॥
ਭਰਿਪੁਰਿ ਧਾਰਿ ਰਹੀ ਸੋਭ ਜਾ ਕੀ ॥੧॥ ਰਹਾਉ ॥
ਨਾਮੁ ਨਿਧਾਨੁ ਜਾ ਕੀ ਨਿਰਮਲ ਸੋਇ ॥
ਆਪੇ ਕਰਤਾ ਅਵਰੁ ਨ ਕੋਇ ॥੨॥
ਜੀਅ ਜੰਤ ਸਭਿ ਤਾ ਕੈ ਹਾਥਿ ॥
ਰਵਿ ਰਹਿਆ ਪ੍ਰਭੁ ਸਭ ਕੈ ਸਾਥਿ ॥੩॥
आसा महला ५ ॥
अनद बिनोद भरेपुरि धारिआ ॥
अपुना कारजु आपि सवारिआ ॥१॥
पूर समग्री पूरे ठाकुर की ॥
भरिपुरि धारि रही सोभ जा की ॥१॥ रहाउ ॥
नामु निधानु जा की निरमल सोइ ॥
आपे करता अवरु न कोइ ॥२॥
जीअ जंत सभि ता कै हाथि ॥
रवि रहिआ प्रभु सभ कै साथि ॥३॥

हिन्दी अर्थ: आसा महला ५ ॥ जगत के सारे करिश्मे उस सर्व-व्यापक परमात्मा के ही रचे हुए हैं। अपने रचे हुए संसार को उसने खुद ही (इन करिश्में-तमाशों से) सुंदर बनाया है। 1। जिस परमात्मा की शोभा-वडिआई (सारे संसार में) हर जगह बिखर रही है। ये सारे जगत पदार्थ उस अभुल परमात्मा के ही बनाए हुए हैं। 1। जिस (परमात्मा) की (की हुई) सिफत सालाह (सारे जीवों को) पवित्र जीवन वाला बना देती है। जिसका नाम (सारे जीवों के वास्ते) खजाना है वह स्वयं ही सबको पैदा करने वाला है।उसके बराबर का और कोई नहीं। 2। (हे भाई ! जगत के) सारे जीव-जंतु उस परमात्मा के ही हाथ में हैं। वह परमात्मा सब जगह बस रहा है।हरेक जीव के अंग-संग बसता है। 3।

संदर्भ: यह अंग 376 है, राग आसा का हिस्सा। मुख्य रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)।

M5 की वाणी, courtly-intimate, settled-mature।

Chittaranjan Park के Bengali-दुर्गा-puja के बीच पंडाल में किसी quiet pause में।

ऊपर दिखाए गए शबद आदि ग्रंथ की मूल वाणी हैं, गुरमुखी में original और साथ में देवनागरी transliteration। हिन्दी अर्थ banidb.com के verified translation (मुख्यत: प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका) से लिया गया है।

यह अंग कुल 55 पंक्तियों का है, 6 शबद में बँटा। ग्रंथ साहिब की पारंपरिक pagination में यही “अंग 376” है। हर ang एक leaf है, “पन्ना” नहीं, क्योंकि सिख परंपरा में पूरी पोथी को एक जीवित-शरीर (Guru) माना जाता है, और हर पन्ना उसका एक अंग।

राग के context में: आसा राग का स्वर specific है, समय और mood दोनों define करता है। पूरे राग का full background /adi-granth/raag/… पर है।

पाठ का तरीक़ा: ऊपर के शबद को धीरे-धीरे एक बार पढ़िए, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के सिर्फ़ देवनागरी पढ़िए, rhythm के लिए। यह दोनों pass एक साथ ज़्यादा देते हैं।

अगर इस शबद की कोई पंक्ति आज की ज़िंदगी में सीधे लगती है, उसे note कर लीजिए। ग्रंथ साहिब का design ही यही है, हर अंग पर कुछ-न-कुछ हर पाठक के लिए होता है।

“हुकमनामा” परंपरा: हर सुबह gurdwara में रागी जी एक अंग खोलते हैं randomly, और जो शबद पहले आता है, वो दिन का “हुकमनामा” (आदेश) कहलाता है। आप भी यही कर सकते हैं, online, हर रोज़ एक अलग ang पर click करते जाइए।

नई दिल्ली के पुराने gurdwaras (बंगला साहिब, सीस-गंज, रकाब-गंज, बाबा साहिब का गुरुद्वारा) में रोज़ अंग-by-अंग पाठ चलता है। अगर वहाँ कभी समय बिताया है, यह commentary उस आदत को रिफ़्रेश करेगी।

अगर आप ग्रंथ साहिब को पहली बार पढ़ रहे हैं: किसी एक specific राग को चुनिए (जैसे राग सूही की लावां, M4 की), उसकी सब अंगों को क्रम से पढ़िए। यह random-click से बेहतर है शुरुआत के लिए।

तीसरा approach: अगर आप किसी एक रचयिता (जैसे कबीर) में specifically interested हो, उनकी वाणी की सूची देखिए और वहीं से अंगों पर जाइए।

हर शबद का अपना mood, अपनी कहानी, अपनी historical setting। 16वीं-17वीं सदी की पंजाब-context सब वाणी में बैठी है, मगर underlying claims universal हैं।

ग्रंथ साहिब का format unique है: 31 रागों में organize, 5 गुरुओं + 9वें गुरु की वाणी, plus 15 भगतों की वाणी (कबीर, फ़रीद, नामदेव, रविदास, etc.)। यह pan-Indian + pan-class + pan-religious आवाज़ें एक साथ हैं।

दिल्ली के context में ग्रंथ साहिब विशेष है: सीस-गंज और रकाब-गंज दिल्ली में हैं (शाहजहाँनाबाद के दिल में), गुरु तेग बहादुर जी की शहादत यहीं हुई, गुरु हरकिशन साहिब का गुरुद्वारा बाला साहिब भी यहीं।

“एक ओंकार” से शुरू, “सलोक महला 9” + “मुंदावनी M5” से समाप्त, बीच में 1430 अंग। यह एक sustained spiritual document है, sixteenth-seventeenth century में compile, मगर अब भी fully living।

हर अंग पर आप दो-तीन बार वापस आ सकते हैं अलग-अलग times पर, और हर बार कुछ नया दिखेगा। यही reading-design है।

अगर specific verses की deeper commentary चाहिए, या किसी विशेष शबद का context, contact कर सकते हैं lulla.net से।

आगे का अंग: अंग 377 →, पीछे का: ← अंग 375

हर रोज़ एक नया अंग, धीरे-धीरे, बिना hurry के। यही ग्रंथ-साहिब-reading का सबसे sensible approach है।

(यह अंग की commentary संक्षेप में। पूरी verse-by-verse interpretation के लिए traditional steek/teeka resources भी available हैं, जो SGGS के scholarly commentary में deep जाते हैं।)

शबद को पढ़ने का एक और तरीक़ा: किसी भी पंक्ति को धीरे-धीरे तीन-चार बार पढ़िए, अर्थ खुलने दीजिए। हर बार थोड़ा अलग layer सामने आता है। यह “slow reading” है, scanning नहीं।

संगति का अहम role: ग्रंथ साहिब को अकेले भी पढ़ा जा सकता है, मगर कीर्तन-संगति में सुनना एक अलग depth देता है। दिल्ली के gurdwaras में रोज़ शाम 7 बजे की रहिरास और सुबह की आसा-दी-वार, दोनों openings हैं।

शबद का audio: SikhiToTheMax जैसी apps पर हर अंग का audio available है, classical raagis की voices में। एक बार audio साथ पढ़ कर देखिए, शबद की rhythm पकड़ने लगती है।

संदर्भ पर थोड़ा और: यह अंग 16वीं-17वीं सदी के Punjab में compose हुआ। उस वक़्त की सामाजिक-राजनीतिक-आर्थिक स्थिति काफ़ी अलग थी, मगर मन-की-mechanics universal हैं। इसीलिए आज भी relevant है।

एक practice suggestion: अगर आज कोई specific मुद्दा/decision/feeling आपको परेशान कर रहा है, इस शबद को पढ़ कर बैठिए। कोई एक line आज की state से directly speak कर सकती है। ग्रंथ-साहिब का “हुकमनामा” design यही करता है।

अंत में एक छोटी-सी note: यह commentary helper है, substitute नहीं। genuine sant-समाज, granthi साहिबान, और experienced kirtaniye जी से सीखना सबसे ऊँचा रास्ता है। यह site उस path का supplement है, replacement नहीं।

स्रोत: मूल गुरमुखी पाठ banidb.com (Khalis Foundation, open-source SGGS database) से। हिन्दी अर्थ प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।